Skip to main content

१८५७

- डॉ० अली बाक़र जैदी


डॉ० राही मासूम रजा का महाकाव्य १८५७ दो सौ अड़सठ पृष्ठों और लगभग तेरह सौ पदों पर आधारित है। इससे पहले जो भी महाकाव्य लिखे गये हैं जैसे मिलटन पैराडाइज लास्ट paradises last तुलसीदास की रामचरित मानस व मीर अनीस के शोक काव्य या फिरदौसी का शाहनामा इत्यादि, इन के पात्र धार्मिक देवमालाई ….. या फिर देव शक्तियों के द्योतक थे। फिरदौसी ने तो शाहनामा के अन्त में स्वयं लिख दिया कि -
मनम करदम रुस्तमे पहलवां
वगर न यके बूद दर सेसतां
मैंने रुस्तम को रुस्तम बना दिया वरना वह तो सेसताँ का एक पहलवान था।
इसके विपरीत राही का महाकाव्य अट्ठारह सौ सत्तावन के समस्त पात्र वास्तविक और जमीन से जुड़े हुए हैं। १८५७ के स्वतन्त्रता संग्राम में पहला योदा जो वीर गति को प्राप्त हुआ वह मंगल पाण्डे था जिसने अंग्रेज अधिकारी पर गोली चलाकर विद्रोह का आरम्भ किया था। मंगल पाण्डे गाँव का रहने वाला एक किसान था जो मेरठ छावनी में अंग्रेजी सेना में सेवक था। उसकी बहादुरी की कथा काव्य में इस तरह मिलती है - भारत वाले देख रहे थे महायुद के सपने/जो नहीं समझे वह भी समझे जो समझे वह समझे/ऐसी हवा थी युद का खेल ही खेल रहे थे बच्चे/उन्तीस मार्च को बैरकपूर में लड़ गये मंगल पांडे/अब तक याद है फाँसी के फन्दे में ऐंठन गर्दन की/सुनो भाइयो, सुनो भाइयो, कथा सुनो सत्तावन की...... लफ्जों में टूटती जंजीर की झंकार लिये/लहजे में एक चमकती हुई तलवार लिये... वक्त गोरों को न दो अब किसी तैयारी का/साथियो उठो यही वक्त है जीदारी का। राही मासूम रजाकृत १८५७...... इस लेख का शेष भाग राही विशेषांक में पढ़े.... http://rahimasoomraza.blogspot.com/2008/10/blog-post_7125.html इस पर क्लिक करें .और जानकारी प्राप्त करें.

Comments

Popular posts from this blog

साक्षात्कार

प्रो. रमेश जैन
साक्षात्कार जनसंचार का अनिवार्य अंग है। प्रत्येक जनसंचारकर्मी को समाचार से संबद्ध व्यक्तियों का साक्षात्कार लेना आना चाहिए, चाहे वह टेलीविजन-रेडियो का प्रतिनिधि हो, किसी पत्र-पत्रिका का संपादक, उपसंपादक, संवाददाता। साक्षात्कार लेना एक कला है। इस विधा को जनसंचारकर्मियों के अतिरिक्त साहित्यकारों ने भी अपनाया है। विश्व के प्रत्येक क्षेत्र में, हर भाषा में साक्षात्कार लिए जाते हैं। पत्र-पत्रिका, आकाशवाणी, दूरदर्शन, टेलीविजन के अन्य चैनलों में साक्षात्कार देखे जा सकते हैं। फोन, ई-मेल, इंटरनेट और फैक्स के माध्यम से विश्व के किसी भी स्थान से साक्षात्कार लिया जा सकता है। अंतरिक्ष में संपर्क स्थापित कर सकते हैं। पहली बार पूर्व प्रधानमंत्री श्रीमति इंदिरा गांधी ने अंतरिक्ष यात्री कैप्टन राकेश शर्मा से संवाद किया था, जिसे दूरदर्शन ने प्रसारित किया था। इस विधा का दिन पर दिन प्रचलन बढ़ता जा रहा है।
मनुष्य में दो प्रकार की प्रवृत्तियाँ होती हैं। एक तो यह कि वह दूसरों के विषय में सब कुछ जान लेना चाहता है और दूसरी यह कि वह अपने विषय में या अपने विचार दूसरों को बता देना चाहता है। अपने अनुभ…

समकालीन साहित्य में स्त्री विमर्श

जया सिंह


औरतों की चुप्पी सदियों और युगों से चली आ रही है। इसलिए जब भी औरत बोलती है तो शास्त्र, अनुशासन व समाज उस पर आक्रमण करके उसे खामोश कर देते है। अगर हम स्त्री-पुरुष की तुलना करें तो बचपन से ही समाज में पुरुष का महत्त्व स्त्री से ज्यादा होता है। हमारा समाज स्त्री-पुरुष में भेद करता है।
स्त्री विमर्श जिसे आज देह विमर्श का पर्याय मान लिया गया है। ऐसा लगता है कि स्त्री की सामाजिक स्थिति के केन्द्र में उसकी दैहिक संरचना ही है। उसकी दैहिकता को शील, चरित्रा और नैतिकता के साथ जोड़ा गया किन्तु यह नैतिकता एक पक्षीय है। नैतिकता की यह परिभाषा स्त्रिायों के लिए है पुरुषों के लिए नहीं। एंगिल्स की पुस्तक ÷÷द ओरिजन ऑव फेमिली प्राइवेट प्रापर्टी' के अनुसार दृष्टि के प्रारम्भ से ही पुरुष सत्ता स्त्राी की चेतना और उसकी गति को बाधित करती रही है। दरअसल सारा विधान ही इसी से निमित्त बनाया गया है, इतिहास गवाह है सारे विश्व में पुरुषतंत्रा, स्त्राी अस्मिता और उसकी स्वायत्तता को नृशंसता पूर्वक कुचलता आया है। उसकी शारीरिक सबलता के साथ-साथ न्याय, धर्म, समाज जैसी संस्थायें पुरुष के निजी हितों की रक्षा करती …

स्त्री-विमर्श के दर्पण में स्त्री का चेहरा

- मूलचन्द सोनकर

4
अब हम इस बात की चर्चा करेंगे कि स्त्रियाँ अपनी इस निर्मित या आरोपित छवि के बारे में क्या राय रखती हैं। इसको जानने के लिए हम उन्हीं ग्रन्थों का परीक्षण करेंगे जिनकी चर्चा हम पीछे कर आये हैं। लेख के दूसरे भाग में वि.का. राजवाडे की पुस्तक ‘भारतीय विवाह संस्था का इतिहास' के पृष्ठ १२८ से उद्धृत वाक्य को आपने देखा। इसी वाक्य के तारतम्य में ही आगे लिखा है, ‘‘यह नाटक होने के बाद रानी कहती है - महिलाओं, मुझसे कोई भी संभोग नहीं करता। अतएव यह घोड़ा मेरे पास सोता है।....घोड़ा मुझसे संभोग करता है, इसका कारण इतना ही है अन्य कोई भी मुझसे संभोग नहीं करता।....मुझसे कोई पुरुष संभोग नहीं कर रहा है इसलिए मैं घोड़े के पास जाती हूँ।'' इस पर एक तीसरी कहती है - ‘‘तू यह अपना नसीब मान कि तुझे घोड़ा तो मिल गया। तेरी माँ को तो वह भी नहीं मिला।''
ऐसा है संभोग-इच्छा के संताप में जलती एक स्त्री का उद्गार, जिसे राज-पत्नी के मुँह से कहलवाया गया है। इसी पुस्तक के पृष्ठ १२६ पर अंकित यह वाक्य स्त्रियों की कामुक मनोदशा का कितना स्पष्ट विश्लेषण …