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वह लड़की

-तसलीमा नसरीन


वह लड़की अकेली है असहनीय तरीके से अकेली है
वह लड़की ! बस, ऐसे ही अकेली है वह !
इसी तरह निर्लिप्त और दुनिया के सभी कुछ के प्रति,
अपनी तटस्थता समेत, निचाट अकेली !
इसी तरह वह ज़िन्दा है, दीर्घ-दीर्घ काल निर्वासन में।
एकमात्र कलकत्ता ही उठाता है लहरें, उस लड़की के शान्त-थिर जल में,
एकमात्र कलकत्ता ही उसे नदी कर देता है।
कलकत्ता ही फूँकता है, उसके कानों में सकुशल रहने का मन्त्र !
एकमात्र कलकत्ता ही।
कलकत्ते की धूल-मिट्टी में सियाह पड़ गयी उस लड़की की देह !
उधर जितनी भी लिपटी थी कालिमा
उसके मन में, आँखों तले ! सोखकर तमाम कालिमा,
इसी कलकत्ते ने कैसा उजला रखा है सभी कुछ !
अब दोनों जन मिलकर निहारते रहते हैं, जगत् के अदेखे रूप,
पा लेते हैं अनुपलब्ध चेहरे !
कितनी-कितनी तरह के रोग से ग्रस्त है कलकत्ता !
जाने कितनी ही तरह के-नहीं ! नहीं !
अभाव ! मोहताजी !
फिर भी जादू की तरह जाने कहाँ से निकाल लाता है,
हीरे-माणिक !
कई-कई सालों से नितान्त प्रेमहीन वह लड़की,
बिन माँगे ही उसे ढेर-ढेर प्यार दे डाला कलकत्ता ने !

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