Thursday, December 25, 2008

GAZAL

बशीर बद्र



जहाँ पेड़ पर चार दाने लगे,


हज़ारों तरफ से निशाने लगे



हुई शाम, यादों के इक गाँव से,

परिन्दे उदासी के आने लगे



घड़ी-दो घड़ी मुझको पलकों पे रख,

यहाँ आते-आते ज़माने लगे



कभी बस्तियाँ दिल की यूँ भी बसीं,

दुकानें खुली, कारख़ाने लगे



वहीं ज़र्द पत्तों का क़ालीन है,

गुलों के जहाँ शामियाने लगे



पढ़ाई-लिखाई का मौसम कहाँ,

किताबों में ख़त आने-जाने लगे

1 comment:

Smart Indian - स्मार्ट इंडियन said...

वहीं ज़र्द पत्तों का क़ालीन है,
गुलों के जहाँ शामियाने लगे

ज़िंदगी की उदास हकीकत को सहजता और खूबसूरती से बयान करना तो कोई बशीर बद्र साहब से सीखे! धन्यवाद!