Sunday, December 14, 2008

ग़ज़ल

बशीर बद्र



ख़ानदानी रिश्तों में अक़्सर रक़ाबत है बहुत
घर से निकलो तो ये दुनिया खूबसूरत है बहुत

अपने कालेज में बहुत मग़रूर जो मशहूर है
दिल मिरा कहता है उस लड़की में चाहता है बहुत

उनके चेहरे चाँद-तारों की तरह रोशन हुए
जिन ग़रीबों के यहाँ हुस्न-ए-क़िफ़ायत1 है बहुत

हमसे हो नहीं सकती दुनिया की दुनियादारियाँ
इश्क़ की दीवार के साये में राहत है बहुत

धूप की चादर मिरे सूरज से कहना भेज दे
गुर्वतों का दौर है जाड़ों की शिद्दत2 है बहुत

उन अँधेरों में जहाँ सहमी हुई थी ये ज़मी
रात से तनहा लड़ा, जुगनू में हिम्मत है बहुत

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1. पर्याप्त सौंदर्य 2. कष्ट

3 comments:

वर्षा said...

बहुत सुंदर ग़ज़ल। बशीर बद्र की कुछ ग़ज़लें पढ़ी हैं, किताब का नाम शायद साये में धूप है। जुगनू की हिम्मत आम लोगों को भी हिम्मत देती है।

"अर्श" said...

बहोत ही पसिंदादा ग़ज़ल है ये .. शायद टाइपिंग में कहीं त्रुटी होगी अन्यथा न ले मगर दुसरे शे'र के मिश्रा सनी में चाहत है बहोत होनी चाहिए कृपया इसे ठीक कर लें ... आपको ढेरो बधाई इसके लिए '''....

अर्श

ranjan said...

bashir badra kaa kamaal he..

aasaam shabdo me gahari baat kah jaate he..