Sunday, December 7, 2008

उड़े,बस उड़े

हरीश बादानी


धरती से ऊपर
उड़-उड़कर
हब्बलवाली आंख पहनकर
बिना रंग के सन्नाटे में
पिण्ड खोजते
उन लोगों से
तेरी मेरी
इस पल तक की
हर सीमा अनदेखी,
पर वे तो उड़े,बस उड़े .

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