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ख्वाबों के आँगन

SEEMA GUPTA


ख्वाबों के आँगन ने अपना
कुछ ऐसे फ़िर विस्तार किया,
वर्तमान ने हकीक़त ,
का दामन ठुकराया ,
अस्तित्व ने अपने,
सामर्थ्य से मुख फैरा,
शीशमहल का निर्माण किया...
विवशता का परित्याग कर ,
दर्पण मचला जिज्ञासा का,
भ्रम की आगोश मे,
मनमोहक श्रिंगार किया ...
बहते दरिया की भूमि पर ,
इक नीवं बना अरमानो की,
हर तर्ष्णा को पा लेने का,
निरर्थक एक प्रयास किया ...
ख्वाबों के आँगन ने अपना
कुछ ऐसे फ़िर विस्तार किया.........

Comments

bhoothnath said…
सीमा जी....निस्तार ही असल में विस्तार है....खैर ये रचना आपकी पिछली रचनाओं से हल्की बन पड़ी है.....!!
sudama said…
असान श्ब्दो मे गेहराइ, एक सुन्रदर कविता .........

धन्यवाद्

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