Monday, December 8, 2008

ख्वाबों के आँगन

SEEMA GUPTA


ख्वाबों के आँगन ने अपना
कुछ ऐसे फ़िर विस्तार किया,
वर्तमान ने हकीक़त ,
का दामन ठुकराया ,
अस्तित्व ने अपने,
सामर्थ्य से मुख फैरा,
शीशमहल का निर्माण किया...
विवशता का परित्याग कर ,
दर्पण मचला जिज्ञासा का,
भ्रम की आगोश मे,
मनमोहक श्रिंगार किया ...
बहते दरिया की भूमि पर ,
इक नीवं बना अरमानो की,
हर तर्ष्णा को पा लेने का,
निरर्थक एक प्रयास किया ...
ख्वाबों के आँगन ने अपना
कुछ ऐसे फ़िर विस्तार किया.........

2 comments:

bhoothnath said...

सीमा जी....निस्तार ही असल में विस्तार है....खैर ये रचना आपकी पिछली रचनाओं से हल्की बन पड़ी है.....!!

sudama said...

असान श्ब्दो मे गेहराइ, एक सुन्रदर कविता .........

धन्यवाद्