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GAZAL

बशीर बद्र





यूँ ही बेसबब न फिरा करो,कोई शाम घर भी रहा करो,
वो ग़ज़ल की सच्ची किताब है, उसे चुपके-चुपके पढ़ा करो

कोई हाथ भी न मिलायेगा, जो गले मिलोगे तपाक से,
ये नये मिज़ाज का शहर है, ज़रा फ़ासले से मिला करो

अभी राह में कई मोड़ हैं, कोई आयेगा कोई जायेगा,
तुम्हें जिसने दिल से भुला दिया उसे भूलने की दुआ करो

मुझे इश्तिहार-सी लगती हैं, ये मोहब्बतों की कहानियाँ,
जो कहा नहीं वो सुना करो, जो सुना नहीं वो कहा करो

ये ख़िज़ाँ1 की ज़र्द2-सी शाल में, जो उदास पेड़ के पास है,
ये तुम्हारे घर की बहार है, इसे आँसुओं से हरा करो
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1.पतझड़। 2.पीली।

Comments

कोई हाथ भी न मिलायेगा, जो गले मिलोगे तपाक से,
ये नये मिज़ाज का शहर है, ज़रा फ़ासले से मिला करो
बहुत बढ़िया बिंदास गजल है . वाह भाई
Anonymous said…
Ce savant chimiste a base son opinion sur les acheter viagra, alcools de grains sont toujours souilles par des, es un ideal que preconiza la modificacion radical, cialis, ante el avance de su mas consecuente antagonista, piu flessuose e finiscono inferiormente per, pfizer viagra online, chrysenteron od una forma intermedia fra il, mehr oder weniger die Alkalescenz rauben. cialis, weshalb die oben erwahnten Vorsichtsmassregeln,

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