Tuesday, December 16, 2008

मैं

अमृता प्रीतम



आसमान जब भी रात का
और रोशनी का रिश्ता जोड़ते...
सितारे मुबारकबाद देते..
क्यों सोचती हूँ मैं : अगर कहीं....
मैं, जो तेरी कुछ नहीं लगती
जिस रात के होठों ने कभी
सपने का माथा चूम लिया
ख़्यालों के पैरों में उस रात से
इक पायल-सी बज रही....
जब इक बिजली आसमान में
बादलों के वर्क़ उलटती
मेरी कहानी भटकती-
आदि ढूँढती, अन्त ढूँढती...
तेरे दिल की एक खिड़की
जब कहीं खड़क जाती
सोचती हूँ, मेरे सवाल की
यह कैसी जुर्रत है !
हथेलियों पर इश्क़ की
मेहँदी का कोई दावा नहीं
हिज्र का एक रंग है
और खुसबू है तेरे जिक़्र की
मैं, जो तेरी कुछ नहीं लगती

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