Monday, December 1, 2008

तुम्हें बाँध पाती सपने में

महादेवी वर्मा

तुम्हें बाँध पाती सपने में !
तो चिरजीवन-प्यास बुझालेती
उस छोटे क्षण अपने में !
पावस-घन सी उमड़ बिखरती,
शरद-दिशा सी नीरव घिरती,
धो लेती जग का विषादढुलते
लघु आँसू-कण अपने में !
मधुर राग बन विश्व सुलाती
सौरभ बन कण कण बस जाती,
भरती मैं संसृति का क्रन्दन
हँस जर्जर जीवन अपने में !
सब की सीमा बन सागर सी,
हो असीम आलोक-लहर सी,
तारोंमय आकाश छिपा रखती
चंचल तारक अपने में !
शाप मुझे बन जाता वर सा,
पतझर मधु का मास अजर सा,
रचती कितने स्वर्ग एक लघु
प्राणों के स्पन्दन अपने में !
साँसे कहतीं अमर कहानी,
पल-पल बनता अमिट निशानी,
प्रिय ! मैं लेती बाँध मुक्ति सौ सौ,
लघुपत बन्धन अपने में।
तुम्हें बाँध पाती सपने में !
आज क्यों तेरी वीणा मौन ?
शिथिल शिथिल तन थकित हुए कर,
स्पन्दन भी भूला जाता उर,
मधुर कसक सा आज
हृदय में आन समाया कौन ?
आज क्यों तेरी वीणा मौन ?
झुकती आती पलकें निश्चल,
चित्रित निद्रित से तारक चल;
सोता पारावार दृगों में भर भर
लाया कौन ?
आज क्यों तेरी वीणा मौन ?
बाहर घन-तम;
भीतर दुख-तम,
नभ में विद्युत तुझ में प्रियतम,
जीवन पावस-रात बनाने
सुधि बन छाया कौन ?
आज क्यों तेरी वीणा मौन ?

1 comment:

Manoshi said...

ये मेरे प्रिय गीतो में से हुआ करता था। इसकी एक अभुत प्यारी धुन भी सीखी थी बचपन में। आपने पुराना वक़्त याद दिला दिया। शुक्रिया..