Saturday, December 13, 2008

ग़ज़ल

महताब हैदर नक़वी


मुख़्तसर-सी1 ज़िन्दगी में कितनी नादानी करे
इस नज़ारों को कोई देखे कि हैरानी करे

धूप में इन आबगीनों2 को लिए फिरता हूँ मैं
कोई साया मेरे ख़्वाबों की निगहबानी करे

रात ऐसी चाहिए माँगे जो दिनभर का हिसाब
ख़्वाब ऐसा हो जो इन आँखों में वीरानी करे

एक मैं हूँ और दस्तक कितने दरवाज़ों पे दूँ
कितनी दहलीज़ों पे सज़दा एक पेशानी3 करे

साहिलों पर मैं खड़ा हूँ तिश्नाकामों4 की तरह
कोई मौज-ए-आब5 मेरी आँख को पानी करे

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1. छोटी-सी 2. बहुत बारीक काँच की बोतलें 3. माथा 4. प्यासों 5. पानी की लहर

1 comment:

"अर्श" said...

bahot khub sahab bahot hi badhiya ghazal....... dhero badhai....