Monday, December 29, 2008

मुहब्बत में हार

फ़ैज़ अहमद फैज़

दोनों जहान तेरी मुहब्बत में हार के
वो जा रहा है कोई शबे-ग़म1 गुज़ार के

वीराँ है मैकदा ख़ुमो-सागर2 उदास है
तुम क्या गए कि रूठ गए दिन बहार के

इक फ़ुर्सते-गुनाह मिली, वो भी चार दिन
देखे हैं हमने हौसले परवरदिगार के

दुनिया ने तेरी याद से बेगाना कर दिया
तुझसे भी दिलफ़रेब3 हैं, ग़म रोज़गार के4

भूले से मुस्करा तो दिए थे वो आज ‘फ़ैज़’
मत पूछ वलवले5 दिले नाकर्दाकार6 के

1. दुख की रात2. शराब का मटका और प्याला3. दिल को धोखा देने वाले4. रोजी-रोटी की चिन्ता5. उमंग हौसले 6. नातजुर्बेकार हृदय