Monday, December 15, 2008

याद

अमृता प्रीतम


आज सूरज ने कुछ घबरा कर
रोशनी की एक खिड़की खोली
बादल की एक खिड़की बन्द की
और अँधेरे की सीढ़ियाँ उतर गया...

आसमान की भवों पर
जानें क्यों पसीना आ गया
सितारों के बटन कोल कर
उसने चाँद का कुर्ता उतार दिया...

मैं दिल के एक कोने में बैठी हूँ,
तुम्हारी याद इस तरह आयी-
जैसे गीली लकड़ी में से
गाढ़ा और कडुवा धुआँ उठता है...

साथ हज़ारों ख़्याल आये
जैसे कोई सूखी लकड़ी
सुर्ख़ आग की आहें भरे,
दोनों लकड़ियाँ अभी बुझायीं हैं...

वर्ष कोयले की तरह बिखरे हुए
कुछ बुझ गये, कुछ बुझने से रह गये
वक़्त का हाथ जब समेटने लगा
पोरों पर छाले पड़ गये...

तेरे इश्क के हाथ से छूट गयी
और ज़िन्दगी की हँडिया टूट गयी
इतिहास का मेहमान
मेरे चौके से भूखा उठ गया...

3 comments:

नीरज गोस्वामी said...

मैं दिल के एक कोने में बैठी हूँ,
तुम्हारी याद इस तरह आयी-
जैसे गीली लकड़ी में से
गाढ़ा और कडुवा धुआँ उठता है...
सुभान अल्लाह...वाह...
नीरज

Vijay Kumar Sappatti said...

waaah waah kya likha hai ,

ek ek alfaaz apni kahani khud hi kahta hai ..

bahut badhai , firoz ji ..

vijay
http://poemsofvijay.blogspot.com/

रंजना [रंजू भाटिया] said...

शुक्रिया इसको पढ़वाने के लिए