Tuesday, December 16, 2008

दृष्टि

Seema Gupta

अनंतकाल से ये दृष्टि
प्रतीक्षा पग पर अडिग ,
पलकों के आंचल से
सर को ढांक ,
आतुरता की सीमा लाँघ
अविरल अश्रुधारा मे
डूबती , तरती , उभरती ,
व्याकुलता की ऊँचाइयों को छु
प्रतीक्षाक्षण से तकरार करती
तुम्हारी इक आभा को प्यासी
अनंतकाल से ये दृष्टि
प्रतीक्षा पग पर अडिग

4 comments:

बवाल said...

आदणीय भाई साहब,
सीमाजी की सुन्दर कविता प्रस्तुत करने और पढ्वाने का बहुत बहुत आभार.

रश्मि प्रभा said...

achhi prtibhawon tak laane ke liye shukriyaa

bhoothnath said...

हम्म............जितना लम्बा इंतज़ार.......उतनी गहरी कविता.........ताज्जुब है कि ये लेखिका इसी भाव को लेकर कविता रचती चली आ रही हैं....मगर रचनाओं में ये दुहराव बहुत ज्यादा दृष्टिगोचर नहीं होता.......लेकिन हमें ऐसा लगता है कि इन्हें तनिक इस एकरसता से बाहर भी आन चाहिए....क्यूँ कि जो दर्द को झेल गया...वो खुशी को भी अपने शब्दों में कई रंग दे देगा....सीमा जी....सच....मैं झूठ नहीं बोलता....सच...!!

seema gupta said...

" आप सभी की दिल से शुक्रिया"

regards