Saturday, December 13, 2008

ग़ज़ल

अहमद फ़राज

जिससे ये तबियत बड़ी मुश्किल से लगी थी
देखा तो वो तस्वीर हर एक दिल से लगी थी

तनहाई में रोते हैं कि यूँ दिल को सुकूँ हो
ये चोट किसी साहिबे-महफ़िल से लगी थी

ऐ दिल तेरे आशोब1 ने फिर हश्र2 जगाया
बे-दर्द अभी आँख भी मुश्किल से लगी थी

ख़िलक़त3 का अजब हाल था उस कू-ए-सितम4 में
साये की तरह दामने-क़ातिल5 से लगी थी

उतरा भी तो कब दर्द का चढ़ता हुआ दरिया
जब कश्ती ए-जाँ6 मौत के साहिल7 से लगी थी

1. हलचल, उपद्रव, 2. प्रलय, मुसीबत, 3. जनता 4. अत्याचार की गली 5. हत्यारे के पल्लू 6. जीवन नौका 7. किनारा

5 comments:

SANJAY SINGH said...

बहुत उम्दा गज़ल लिखे हं इसी तरह लगे रहिए

विवेक सिंह said...

बेहतरीन गज़ल ! आभार !

परमजीत बाली said...

बेहतरीन गज़ल है।

"अर्श" said...

अहमद फ़राज़ साहब की ये ग़ज़ल बहोत ही खास है ,,, आपको भी ढेरो बधाई.....

बवाल said...

भाई जान बड़ी बेहतरीन बन पड़ी जी ग़ज़ल. क्या कहना !
देखा तो वो तस्वीर हर एक दिल से लगी थी. वाह वाह.
और मक्तआ तो लाजवाब, सब कह गया जी.
उतरा भी तो कब दर्द का चढ़ता हुआ दरिया
जब कश्ती ए-जाँ6 मौत के साहिल7 से लगी थी
अश अश