Friday, December 26, 2008

हर जनम में उसी की चाहत

बशीर बद्र


हर जनम में उसी की चाहत थे
हम किसी और की अमानत थे

उसकी आँखों में झिलमिलाती हुई,
हम ग़ज़ल की कोई अलामत1 थे

तेरी चादर में तन समेट लिया,
हम कहाँ के दराज़क़ामत2 थे

जैसे जंगल में आग लग जाये,
हम कभी इतने ख़ूबसूरत थे

पास रहकर भी दूर-दूर रहे,
हम नये दौर की मोहब्बत थे

इस ख़ुशी में मुझे ख़याल आया,
ग़म के दिन कितने ख़ूबसूरत थे

दिन में इन जुगनुओं से क्या लेना,
ये दिये रात की ज़रूरत थे
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1.चिह्न, लक्षण। 2.दीर्घकाय।