Thursday, December 18, 2008

कलकत्ता इस बार...

-तसलीमा नसरीन



इस बार कलकत्ता ने मुझे काफ़ी कुछ दिया,
लानत-मलामत; ताने-फिकरे,
छि: छि:, धिक्कार,
निषेधाज्ञा
चूना-कालिख, जूतम्-पजार
लेकिन कलकत्ते ने दिया है मुझे गुपचुप और भी बहुत कुछ,
जयिता की छलछलायी-पनीली आँखें
रीता-पारमीता की मुग्धता
विराट एक आसमान, सौंपा विराटी ने
2 नवम्बर, रवीन्द्र-पथ के घर का खुला बरामदा,
आसमान नहीं तो और क्या है ?
कलकत्ते ने भर दी हैं मेरी सुबहें, लाल-सुर्ख गुलाबों से,
मेरी शामों की उन्मुक्त वेणी, छितरा दी हवा में।
हौले से छू लिया मेरी शामों का चिबुक,
इस बार कलकत्ते ने मुझे प्यार किया खूब-खबू।
सबको दिखा-दिखाकर, चार ही दिनों में चुम्बन लिए चार करोड़।
कभी-कभी कलकत्ता बन जाता है, बिल्कुल सगी माँ जैसा,
प्यार करता है, लेकिन नहीं कहता, एक भी बार,
कि वह प्यार करता है।
चूँकि करता है प्यार, शायद इसीलिए रटती रहती हूँ-कलकत्ता ! कलकत्ता !
अब अगर न भी करे प्यार, भले दुरदुराकर भगा दे
तब भी कलकत्ता का आँचल थामे, खड़ी रहूँगी, बेअदब लड़की की तरह।
अगर धकियाकर हटा भी दे, तो भी मेरे क़दम नहीं होंगे टस से मस।
क्यों ?
प्यार करना क्या अकेले वही जानता है, मैं नहीं ?

1 comment:

Kaushalendra said...

तसलीमा ! यह तो तुम्‍हारी विनम्रता ही है, जो तुम ऐसा सोचती हो, वरना हम तो तुमसे नज़र मिलाने के काबिल भी नहीं रहे। चलो इसी बहाने हमें अपने खोखलेपन का पता तो चला।