Thursday, December 11, 2008

कविता

रवीन्द्रनाथ टैगोर

अनुवादक -डॉ. डोमन साहु ‘समीर






आओ नव-नव रूपों में तुम प्राणों में;
आओ गन्धों में, वर्णों में, गानों में।
आओ अंगों में तुम, पुलिकत स्पर्शों में;
आओ हर्षित सुधा-सिक्त सुमनों में।
आओ मुग्ध मुदित इन दोनों नयनों में;
आओ नव-नव रूपों में तुम प्राणों में।
आओ निर्मल उज्ज्वल कान्त !
आओ सुन्दर स्निग्ध प्रशान्त !
आओ, आओ हे वैचित्र्य-विधानों में।
आओ सुख-दुःख में तुम, आओ मर्मों में;
आओ नित्य-नित्य ही सारे कर्मों में।
आओ, आओ सर्व कर्म-अवसानों में;
आओ नव-नव रूपों में तुम प्राणों में।।

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