Sunday, December 28, 2008

GAZAL

बशीर बद्र




सोचा नहीं अच्छा-बुरा, देखा-सुना कुछ भी नहीं

माँगा ख़ुदा से रात-दिन, तेरे सिवा कुछ भी नहीं

सोचा तुझे, देखा तुझे, चाहा तुझे, पूजा तुझे
मेरी वफ़ा मेरी ख़ता, तेरी ख़ता कुछ भी नहीं

जिस पर हमारी आँख ने मोती बिछाये रात भार,
भेजा वही काग़ज़ उसे, हमने लिखा कुछ भी नहीं

इक शाम की दहलीज़ पर बैठे रहे वो देर तक,
आँखों से की बातें बहुत, मुँह से कहा कुछ भी नहीं

दो-चार दिन की बात है, दिल ख़ाक में सो जायेगा
जब आग पर काग़ज़ रखा, बाक़ी, बचा कुछ भी नहीं

एहसास की ख़शुबू कहाँ, आवाज़ के जुगनू कहाँ,
ख़ामोश यादों के सिवा, घर में रहा कुछ भी नहीं

3 comments:

sudama said...

फ़िरोज़ साहब,सलाम
वाह.......
धन्यवाद

mehek said...

bahut khub

'Yuva' said...

Umda hai...!!