Tuesday, December 30, 2008

भूले हुए ग़म

फ़ैज़ अहमद फैज़


दिल में अब यूँ तेरे भूले हुए ग़म आते हैं

जैसे बिछड़े हुए काबे में सनम आते हैं

एक-इक करके हुए जाते हैं तारे रौशन
मेरी मज़िल की तरफ़ तेरे क़दम आते हैं

रक़्से-मैं1 तेज़ करो साज़ की लय तेज़ करो
सूए-मैख़ाना2 सफ़ीराने-हरम3 आते हैं

कुछ हमीं को नहीं एहसान उठाने का दिमाग
वो तो जब आते हैं माइल-ब-करम4 आते हैं

1. मदिरा-नृत्य

2. शराबखाने की ओर
3. मस्जिद के प्रतिनिधि
4. मेहरबानी करते हुए

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