Wednesday, December 31, 2008

आया नव वर्ष आया

Vijay Kumar Sappatti

आया नव वर्ष ,आया आपके द्वार
दे रहा है ये दस्तक , बार बार !

बीते बरस की बातों को , दे बिसार
लेकर आया है ये , खुशियाँ और प्यार !
खुले बाहों से स्वागत कर ,इसका यार
और मान ,अपने ईश्वर का आभार !

आओ , कुछ नया संकल्प करें यार
मिटायें ,आपसी बैर ,भेदभाव ,यार !
लोगो में बाटें ,दोस्ती का उपहार
और दिलो में भरे , बस प्यार ही प्यार !

अपने घर, समाज, और देश से करें प्यार
हम सब एक है , ये दुनिया को बता दे यार !
कोई नया हूनर ,आओ सीखें यार
जमाने को बता दे , हम क्या है यार !

आप सबको ,है विजय का प्यारा सा नमस्कार
नव वर्ष मंगलमय हो ,यही है मेरी कामना यार !

आया नव वर्ष ,आया आपके द्वार
दे रहा है ये दस्तक , बार बार !

GAZAL

फ़ैज़ अहमद फैज़




सितम सिखलाएगा रस्मे-वफ़ा ऐसे नहीं होता

सनम1 दिखलाएँगे राहे-ख़ुदा ऐसे नहीं होता

गिनो सब हसरतें जो ख़ूँ हुई हैं तन के मक़तल2 में
मेरे क़ातिल हिसाबे-खूँबहा3, ऐसे नहीं होता

जहाने दिल में काम आती हैं तदबीरें न ताज़ीरें4
यहाँ पैमाने-तललीमो-रज़ा5 ऐसे नहीं होता

हर इक शब हर घड़ी गुजरे क़यामत, यूँ तो होता है
मगर हर सुबह हो रोजे़-जज़ा6, ऐसे नहीं होता

रवाँ है नब्ज़े-दौराँ7, गार्दिशों में आसमाँ सारे
जो तुम कहते हो सब कुछ हो चुका, ऐसे नहीं होता
.........................................
1. मूर्ति, पत्थर 2. हत्यास्थल 3. ख़ून के बदले का हिसाब4. न युक्तियाँ, न सज़ाएँ 5. स्वीकृति की प्रतिज्ञा6. प्रलय का दिन7. युग की धड़कन 8. संकटों

Tuesday, December 30, 2008

भूले हुए ग़म

फ़ैज़ अहमद फैज़


दिल में अब यूँ तेरे भूले हुए ग़म आते हैं

जैसे बिछड़े हुए काबे में सनम आते हैं

एक-इक करके हुए जाते हैं तारे रौशन
मेरी मज़िल की तरफ़ तेरे क़दम आते हैं

रक़्से-मैं1 तेज़ करो साज़ की लय तेज़ करो
सूए-मैख़ाना2 सफ़ीराने-हरम3 आते हैं

कुछ हमीं को नहीं एहसान उठाने का दिमाग
वो तो जब आते हैं माइल-ब-करम4 आते हैं

1. मदिरा-नृत्य

2. शराबखाने की ओर
3. मस्जिद के प्रतिनिधि
4. मेहरबानी करते हुए

Monday, December 29, 2008

मुहब्बत में हार

फ़ैज़ अहमद फैज़

दोनों जहान तेरी मुहब्बत में हार के
वो जा रहा है कोई शबे-ग़म1 गुज़ार के

वीराँ है मैकदा ख़ुमो-सागर2 उदास है
तुम क्या गए कि रूठ गए दिन बहार के

इक फ़ुर्सते-गुनाह मिली, वो भी चार दिन
देखे हैं हमने हौसले परवरदिगार के

दुनिया ने तेरी याद से बेगाना कर दिया
तुझसे भी दिलफ़रेब3 हैं, ग़म रोज़गार के4

भूले से मुस्करा तो दिए थे वो आज ‘फ़ैज़’
मत पूछ वलवले5 दिले नाकर्दाकार6 के

1. दुख की रात2. शराब का मटका और प्याला3. दिल को धोखा देने वाले4. रोजी-रोटी की चिन्ता5. उमंग हौसले 6. नातजुर्बेकार हृदय

Sunday, December 28, 2008

GAZAL

बशीर बद्र




सोचा नहीं अच्छा-बुरा, देखा-सुना कुछ भी नहीं

माँगा ख़ुदा से रात-दिन, तेरे सिवा कुछ भी नहीं

सोचा तुझे, देखा तुझे, चाहा तुझे, पूजा तुझे
मेरी वफ़ा मेरी ख़ता, तेरी ख़ता कुछ भी नहीं

जिस पर हमारी आँख ने मोती बिछाये रात भार,
भेजा वही काग़ज़ उसे, हमने लिखा कुछ भी नहीं

इक शाम की दहलीज़ पर बैठे रहे वो देर तक,
आँखों से की बातें बहुत, मुँह से कहा कुछ भी नहीं

दो-चार दिन की बात है, दिल ख़ाक में सो जायेगा
जब आग पर काग़ज़ रखा, बाक़ी, बचा कुछ भी नहीं

एहसास की ख़शुबू कहाँ, आवाज़ के जुगनू कहाँ,
ख़ामोश यादों के सिवा, घर में रहा कुछ भी नहीं

Saturday, December 27, 2008

GAZAL

बशीर बद्र





यूँ ही बेसबब न फिरा करो,कोई शाम घर भी रहा करो,
वो ग़ज़ल की सच्ची किताब है, उसे चुपके-चुपके पढ़ा करो

कोई हाथ भी न मिलायेगा, जो गले मिलोगे तपाक से,
ये नये मिज़ाज का शहर है, ज़रा फ़ासले से मिला करो

अभी राह में कई मोड़ हैं, कोई आयेगा कोई जायेगा,
तुम्हें जिसने दिल से भुला दिया उसे भूलने की दुआ करो

मुझे इश्तिहार-सी लगती हैं, ये मोहब्बतों की कहानियाँ,
जो कहा नहीं वो सुना करो, जो सुना नहीं वो कहा करो

ये ख़िज़ाँ1 की ज़र्द2-सी शाल में, जो उदास पेड़ के पास है,
ये तुम्हारे घर की बहार है, इसे आँसुओं से हरा करो
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1.पतझड़। 2.पीली।
-वसीम बरेलवी



खुल के मिलने का सलीक़ा आपको आता नहीं
और मेरे पास कोई चोर दरवाज़ा नहीं

वो समझता था, उसे पाकर ही मैं रह जाऊंगा
उसको मेरी प्यास की शिद्दत1 का अन्दाज़ा नहीं

जा, दिखा दुनिया को, मुझको क्या दिखाता है,
ग़रूर तू समन्दर है, तो हो, मैं तो मगर प्यासा नहीं

कोई भी दस्तक करे, आहट हो या आवाज़ दे
मेरे हाथों में मेरा घर तो है, दरवाज़ा नहीं

अपनों को अपना कहा, चाहे किसी दर्जे के हों
और अब ऐसा किया मैंने, तो शरमाया नहीं

उसकी महफ़िल में उन्हीं की रौशनी, जिनके चराग़
मैं भी कुछ होता, तो मेरा भी दिया होता नहीं

तुझसे क्या बिछड़ा, मेरी सारी हक़ीक़त2 खुल गयी
अब कोई मौसम मिले, तो मुझसे शरमाता नहीं

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1. तीव्रता
2. वास्तविकता

Friday, December 26, 2008

हर जनम में उसी की चाहत

बशीर बद्र


हर जनम में उसी की चाहत थे
हम किसी और की अमानत थे

उसकी आँखों में झिलमिलाती हुई,
हम ग़ज़ल की कोई अलामत1 थे

तेरी चादर में तन समेट लिया,
हम कहाँ के दराज़क़ामत2 थे

जैसे जंगल में आग लग जाये,
हम कभी इतने ख़ूबसूरत थे

पास रहकर भी दूर-दूर रहे,
हम नये दौर की मोहब्बत थे

इस ख़ुशी में मुझे ख़याल आया,
ग़म के दिन कितने ख़ूबसूरत थे

दिन में इन जुगनुओं से क्या लेना,
ये दिये रात की ज़रूरत थे
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1.चिह्न, लक्षण। 2.दीर्घकाय।

Thursday, December 25, 2008

GAZAL

बशीर बद्र



जहाँ पेड़ पर चार दाने लगे,


हज़ारों तरफ से निशाने लगे



हुई शाम, यादों के इक गाँव से,

परिन्दे उदासी के आने लगे



घड़ी-दो घड़ी मुझको पलकों पे रख,

यहाँ आते-आते ज़माने लगे



कभी बस्तियाँ दिल की यूँ भी बसीं,

दुकानें खुली, कारख़ाने लगे



वहीं ज़र्द पत्तों का क़ालीन है,

गुलों के जहाँ शामियाने लगे



पढ़ाई-लिखाई का मौसम कहाँ,

किताबों में ख़त आने-जाने लगे

GAZAL

बशीर बद्र



आँखों में रहा दिल में न उतरकर देखा,
कश्ती के मुसाफ़िर ने समन्दर नहीं देखा

बेवक़्त अगर जाऊँगा, सब चौंक पड़ेंगे
इक उम्र हुई दिन में कभी घर नहीं देखा

जिस दिन से चला हूँ मेरी मंज़िल पे नज़र है
आँखों ने कभी मील का पत्थर नहीं देखा

ये फूल मुझे कोई विरासत में मिले हैं,
तुमने मेरा काँटों-भरा बिस्तर नहीं देखा

पत्थर मुझे कहता है मेरा चाहने वाला
मैं मोम हूँ उसने मुझे छूकर नहीं देखा

GAZAL

बशीर बद्र


लोग टूट जाते हैं एक घर बनाने में

तुम तरस नहीं खाते बस्तियाँ जलाने में

और जाम टूटेंगे इस शराबख़ाने में
मौसमों के आने में मौसमों के जाने में

हर धड़कते पत्थर को लोग दिल समझते हैं
उम्र बीत जाती है दिल को दिल बनाने में

फ़ाख़्ता की मजबूरी ये भी कह नहीं सकती
कौन साँप रखता है उसके आशियाने में

दूसरी कोई लड़की ज़िन्दगी में आयेगी
कितनी देर लगती है उसको भूल जाने में

Wednesday, December 24, 2008

GAZAL

बशीर बद्र

मुझसे बिछुड़ के खुश रहते हो
मेरी तरह तुम भी झूठे हो

उजले-उजले फूल खिले थे
बिलकुल जैसे तुम हँसते हो

मुझको शाम बता देती है
तुम कैसे कपड़े पहने हो

दिल का हाल पढ़ा चेहरे से
साहिल से लहरें गिनते हो

तुम तनहा दुनिया से लड़ोगे
बच्चों-सी बातें करते हो

GAZAL

फ़िराक़ गोरखपुरी



बदलता है जिस तरह पहलू ज़माना
यूँ ही भूल जाना, यूँ ही याद आना

अजब सोहबतें हैं मोहब्बतज़दों1 की
न बेगाना कोई, न कोई यगाना2

फुसूँ3 फूँक रक्खा है ऐसा किसी ने
बदलता चला जा रहा है ज़माना

जवानी की रातें, मोहब्बत की बातें
कहानी-कहानी, फ़साना-फ़साना

तुझे याद करता हूँ और सोचता हूँ
मोहब्बत है शायद तुझे भूल जाना

1.प्रेम के मारे हुए, 2. आत्मीय, 3. जादू

Tuesday, December 23, 2008

GAZAL

बशीर बद्र



न जी भर के देखा, न कुछ बात की

बड़ी आरज़ू थी मुलाक़ात की

उजालों की परियाँ नहाने लगीं
नदी गुनगुनायी ख़यालात की

मैं चुप था तो चलती हवा रुक गई
ज़बाँ सब समझते हैं जज़्बात की

मुक़द्दर मिरी चश्म-ए-पुरआब ( आँसुओं से भरी आँख) का,
बरसती हुई रात बरसात की

कई साल से कुछ ख़बर ही नहीं,
कहाँ दिन गुज़ारा, कहाँ रात की

Monday, December 22, 2008

kavita

नरेश मेहता

थके गगन में उषा-गान !!
तम की अँधियारी अलकों में
कुंकम की पतली-सी रेख
दिवस-देवता का लहरों के
सिंहासन पर हो अभिषेक
सब दिशि के तोरण-बन्दनवारों पर किरणों की मुसकान !!
प्राची के दिकपाल इन्द्र ने
छिटका सोने का आलोक
विहगों के शिशु-गन्धर्वों के
कण्ठों में फूटे मधु-श्लोक
वसुधा करने लगी मन्त्र से वासन्ती रथ का आह्वान !!
नालपत्र-सी ग्रीवा वाले
हंस-मिथुन के मीठे बोल
सप्तसिन्धु के घिरें मेघ-से
करें उर्वरा दें रस घोल
उतरे कंचन-सी बाली में बरस पड़ें मोती के धान !!
तिमिर-दैत्य के नील-दुर्ग पर
फहराया तुमने केतन
परिपन्थी पर हमें विजय दो
स्वस्थ बने मानव-जीवन
इन्द्र हमारे रक्षक होंगे खेतों-खेतों औ’ खलिहान !!
सुख-यश, श्री बरसाती आओ
व्योमकन्यके ! सरल, नवल
अरुण-अश्व ले जाएँ तुम्हें
उस सोमदेन के राजमहल
नयन रागमय, अधर गीतमय बनें सोम का कर फिर पान !!

Sunday, December 21, 2008

प्रिय चेहरा

-तसलीमा नसरीन



जब भी देखती हूँ आपका चेहरा, आप मुझे कलकत्ता लगते हैं !
आपको क्या पता है कि मुझे बिल्कुल यही लगता है ?
आप क्या जानते हैं, आप अति असम्भव तरीके से
समूचे के समूचे कलकत्ता ही हैं ?
नहीं जानते न ? अगर जानते तो बार-बार अपना मुँह नहीं फेरते।
सुनें मेरी एक बात-
आपके चेहरे की ओर देखते हुए, आपको नहीं,
मैं देखती हूँ कलकत्ता को,
धूप ने डाल दी है माथे पर सलवटें, आँखों की कोरों में
चिन्ता की झुर्रियाँ,
गालों पर कालिख
होठों पर रेत
आप बेतहाशा दौड़े चले जाते हैं
और फूहड़ तरीके से हो रहे हैं पसीने-पसीने,
अर्से से नहीं कोई खुशख़बरी, अर्से से जी भर नहाए नहीं,
नींद नहीं आती।
आप क्या यह सोच बैठे हैं कि चूँकि मैं पड़ी हूँ, आपके घर में
आपको करीब खींच लेती हूँ, सामने बिठाती हूँ,
चिबुक थामकर चेहरा उठाती हूँ, तन्मय निहारती रहती हूँ
और मेरी पलकों की कोरों में जमा होते जा रहे हैं बूँद-बूँद सपने ?
आपके होठों तक, जब बढ़ाती हूँ अपने भीगे युगल होंठ,
आप सुख से सिहर उठते हैं।
आपको ख़बर नहीं, क्यों मेरे होठ बढ़ जाते हैं,
आपके होठों तक,
गालों
आपके माथे
और आँखों की कोरों तक।
क्यों मेरी उँगलियाँ छूती हैं, आपका चेहरा ?
धीरे-धीरे समेट देती हैं आपके बाल,
सहलाकर मिटा देती हैं माथे की सलवटें,
तनी हुई झुर्रियों को सपाट कर देती हैं,
पोंछ देती हैं पसीना, कालिख-रेत सारा कुछ मेट देती हैं।
क्यों ? मैं क्यों चूमती हूँ आपका चेहरा, आप नहीं जानते।
आपको तो अन्दाज़ा भी नहीं, जब मैं आप से कहती हूँ-
मैं आपसे प्यार करती हूँ,
दरअसल मैं किसे प्यार करती हूँ,
आप नहीं जानते, इसलिए अब भी उम्मीद लगाए हैं !
उफ ! तुम किसी उम्मीद में मत रहो।
किसी को यूँ कंगले की तरह टकटोरते हुए देखना,
कतई भला नहीं लगता मुझे।
तुम इतने बुद्धू क्यों हो ? क्यों नहीं देखते ?
मेरा हाथ जितनी भी बार, कहीं और रखने की कोशिश करते हो,
मैं नहीं रखती, तुम फेरना चाहते हो मेरी निगाह,

फिर भी मेरी आँखें थिर रहती हैं तुम्हारे चेहरे पर !
सिर्फ़ चेहरे पर ही ! मैं तो सिर्फ़ जगे-जगे,
गुज़ार देती हूँ सा-री रात, गुज़ार सकती हूँ पूरी ज़िन्दगी,
तुम्हारा चेहरा निहारते हुए ! हाँ, निहारते हुए सिर्फ़ तुम्हारा चेहरा !

मन

-तसलीमा नसरीन



दरख़्तों को काटकर, नक़्क़ाशीदार घर-मकान ढहाकर,
माचिस की डिबियानुमा, ऐसे अज़ीबोगरीब घर-मकान क्यों उठा रहा है, रे ?
तुझे हो क्या गया है ?
तू क्या स्थापत्य में, सृजन में, श्री में अब ख़ास भरोसा नहीं करता ?
शायद तुझे ढेर-ढेर रुपये चाहिए !
इतने-इतने रुपयों का तू करेगा क्या, कलकत्ता ?
न्यूयॉर्क बनेगा ?
आजकल तेरी चाहिए-चाहिए की ललक काफ़ी बढ़ गई है,
किसे ठगकर शोहरत कमाए, किसी भुनाकर क्या बने-इसी चक्कर में पड़ा है न ?
शामों की तेरी अड्डेबाज़ी
उस वक़्त मुर्दा इन्सानों जैसे ठहाके लगाती है,
जब बोतल तोड़कर निकले हुए जिन को धर दबोचने को तू उमड़ा पड़ता है,
और इस-उसके नाम आधी रात तक गन्दे-गन्दे फिकरे कसते हुए,
जैसे-तैसे दो-एक रवीन्द्र मारकर, लड़खड़ाते हुए घर लौटता है,
उकडूँ होकर उगलने के लिए !
तू क्या कुशल-मंगल है, कलकत्ता ?
धत्त् फिजूल की बकवास मत कर !
कुशल-मंगल होता, तो कोई यूँ रुपये-रुपये की रट लगाता ?
इतने-इतने गहने गढ़ाता ?
अच्छा, अब कभी तुझे फुर्सत होती है, शिशिर के परस के लिए ?
इन्द्रधनुष पर निगाह पड़ते ही, सब कुछ छोड़-छाड़कर,
क्या तू ठिठक नहीं जाता ?
कभी बैठता है कहीं, किसी के करीब ? कभी दु:ख से नज़र मिलाता है ?
अच्छा तेरा वह मन क्या, अब बूँदभर भी नहीं बचा ?
जेब में फूटी कौड़ी भी न हो, फिर भी खुद को राजा-राजा
समझने वाला मन ?

Saturday, December 20, 2008

परिचय

SEEMA

सन्नाटे ने श्रृंगार किया है,
पल पल दिन और रैन का
संध्या की हर साँस है घायल
गुमसुम से सब चाँद सितारे
कोपभवन में छुपी चांदनी
अंगना सुना चंचल नैन का
खुशियों का बाजार लुट गया
निष्प्राण हुआ मन का मुख्यालय
रीता है भावों का बर्तन
परिचय मिले न सुख चैन का
सन्नाटे ने श्रृंगार किया है....

वह लड़की

-तसलीमा नसरीन


वह लड़की अकेली है असहनीय तरीके से अकेली है
वह लड़की ! बस, ऐसे ही अकेली है वह !
इसी तरह निर्लिप्त और दुनिया के सभी कुछ के प्रति,
अपनी तटस्थता समेत, निचाट अकेली !
इसी तरह वह ज़िन्दा है, दीर्घ-दीर्घ काल निर्वासन में।
एकमात्र कलकत्ता ही उठाता है लहरें, उस लड़की के शान्त-थिर जल में,
एकमात्र कलकत्ता ही उसे नदी कर देता है।
कलकत्ता ही फूँकता है, उसके कानों में सकुशल रहने का मन्त्र !
एकमात्र कलकत्ता ही।
कलकत्ते की धूल-मिट्टी में सियाह पड़ गयी उस लड़की की देह !
उधर जितनी भी लिपटी थी कालिमा
उसके मन में, आँखों तले ! सोखकर तमाम कालिमा,
इसी कलकत्ते ने कैसा उजला रखा है सभी कुछ !
अब दोनों जन मिलकर निहारते रहते हैं, जगत् के अदेखे रूप,
पा लेते हैं अनुपलब्ध चेहरे !
कितनी-कितनी तरह के रोग से ग्रस्त है कलकत्ता !
जाने कितनी ही तरह के-नहीं ! नहीं !
अभाव ! मोहताजी !
फिर भी जादू की तरह जाने कहाँ से निकाल लाता है,
हीरे-माणिक !
कई-कई सालों से नितान्त प्रेमहीन वह लड़की,
बिन माँगे ही उसे ढेर-ढेर प्यार दे डाला कलकत्ता ने !

Friday, December 19, 2008

१८५७

- डॉ० अली बाक़र जैदी


डॉ० राही मासूम रजा का महाकाव्य १८५७ दो सौ अड़सठ पृष्ठों और लगभग तेरह सौ पदों पर आधारित है। इससे पहले जो भी महाकाव्य लिखे गये हैं जैसे मिलटन पैराडाइज लास्ट paradises last तुलसीदास की रामचरित मानस व मीर अनीस के शोक काव्य या फिरदौसी का शाहनामा इत्यादि, इन के पात्र धार्मिक देवमालाई ….. या फिर देव शक्तियों के द्योतक थे। फिरदौसी ने तो शाहनामा के अन्त में स्वयं लिख दिया कि -
मनम करदम रुस्तमे पहलवां
वगर न यके बूद दर सेसतां
मैंने रुस्तम को रुस्तम बना दिया वरना वह तो सेसताँ का एक पहलवान था।
इसके विपरीत राही का महाकाव्य अट्ठारह सौ सत्तावन के समस्त पात्र वास्तविक और जमीन से जुड़े हुए हैं। १८५७ के स्वतन्त्रता संग्राम में पहला योदा जो वीर गति को प्राप्त हुआ वह मंगल पाण्डे था जिसने अंग्रेज अधिकारी पर गोली चलाकर विद्रोह का आरम्भ किया था। मंगल पाण्डे गाँव का रहने वाला एक किसान था जो मेरठ छावनी में अंग्रेजी सेना में सेवक था। उसकी बहादुरी की कथा काव्य में इस तरह मिलती है - भारत वाले देख रहे थे महायुद के सपने/जो नहीं समझे वह भी समझे जो समझे वह समझे/ऐसी हवा थी युद का खेल ही खेल रहे थे बच्चे/उन्तीस मार्च को बैरकपूर में लड़ गये मंगल पांडे/अब तक याद है फाँसी के फन्दे में ऐंठन गर्दन की/सुनो भाइयो, सुनो भाइयो, कथा सुनो सत्तावन की...... लफ्जों में टूटती जंजीर की झंकार लिये/लहजे में एक चमकती हुई तलवार लिये... वक्त गोरों को न दो अब किसी तैयारी का/साथियो उठो यही वक्त है जीदारी का। राही मासूम रजाकृत १८५७...... इस लेख का शेष भाग राही विशेषांक में पढ़े.... http://rahimasoomraza.blogspot.com/2008/10/blog-post_7125.html इस पर क्लिक करें .और जानकारी प्राप्त करें.

कविता

नरेश मेहता

हिमालय के तब आँगन में—
झील में लगा बरसने स्वर्ण
पिघलते हिमवानों के बीच
खिलखिला उठा दूब का वर्ण
शुक्र-छाया में सूना कूल देख
उतरे थे प्यासे मेघ
तभी सुन किरणाश्वों की टाप
भर गयी उन नयनों में बात

हो उठे उनके अंचल लाल
लाज कुंकुम में डूबे गाल
गिरी जब इन्द्र-दिशा में देवि
सोमरंजित नयनों की छाँह
रूप के उस वृन्दावन में !!
व्योम का ज्यों अरण्य हो शान्त
मृगी-शावक-सा अंचल थाम
तुम्हें मुनि-कन्या-सा घन-क्लान्त
तुम्हारी चम्पक—बाँहों बीच
हठीला लेता आँखें मीच
लहर को स्वर्ण कमल की नाल
समझ कर पकड़ रहे गज-बाल,
तुम्हारे उत्तरीय के रंग
किरन फैला आती हिम-शृंग
हँसी जब इन्द्र दिशा से देवि
सोम रंजित नयनों की छाँह
मलय के चन्दन-कानन में !!
हिमालय के तब आँगन में !!

कविता


RAJAN DEEP




कोई दर तो खटखटाओ बहरी इस सरकार का,
कब तलक चलता रहेगा
सिलसिला तलवार का!
मौज तो ले जाएगी पल में बहाके नाव को,
न मिला माझी को ग़र कोई पता
पतवार का!
डाल के डेरा रहेंगे जो शिकारी बाग़ में,
बागबाँ होगा हशर क्या उस हसीं गुलज़ार का?
यूँ नहीं रोना ओ बुलबुल बनना तुमको बाज है,
सबको लेना अब है बदला मार से इस मार का.
कब तलक बिलखेंगे बच्चे और उजडेंगे सुहाग
कब तलक होगा फ़ना हर मुखिया परिवार का?
जिस तरफ़ दहके हैं शोले और उठे यह धुआं
अब दबा दो वो धुआं उठता जो सरहद पार का.
हो गयी है इंतहा जुलम-ओ-सितम-ओ-कहर की,
वक़त आया जन्म लो अब दीप कलिक अवतार का.

Thursday, December 18, 2008

कलकत्ता इस बार...

-तसलीमा नसरीन



इस बार कलकत्ता ने मुझे काफ़ी कुछ दिया,
लानत-मलामत; ताने-फिकरे,
छि: छि:, धिक्कार,
निषेधाज्ञा
चूना-कालिख, जूतम्-पजार
लेकिन कलकत्ते ने दिया है मुझे गुपचुप और भी बहुत कुछ,
जयिता की छलछलायी-पनीली आँखें
रीता-पारमीता की मुग्धता
विराट एक आसमान, सौंपा विराटी ने
2 नवम्बर, रवीन्द्र-पथ के घर का खुला बरामदा,
आसमान नहीं तो और क्या है ?
कलकत्ते ने भर दी हैं मेरी सुबहें, लाल-सुर्ख गुलाबों से,
मेरी शामों की उन्मुक्त वेणी, छितरा दी हवा में।
हौले से छू लिया मेरी शामों का चिबुक,
इस बार कलकत्ते ने मुझे प्यार किया खूब-खबू।
सबको दिखा-दिखाकर, चार ही दिनों में चुम्बन लिए चार करोड़।
कभी-कभी कलकत्ता बन जाता है, बिल्कुल सगी माँ जैसा,
प्यार करता है, लेकिन नहीं कहता, एक भी बार,
कि वह प्यार करता है।
चूँकि करता है प्यार, शायद इसीलिए रटती रहती हूँ-कलकत्ता ! कलकत्ता !
अब अगर न भी करे प्यार, भले दुरदुराकर भगा दे
तब भी कलकत्ता का आँचल थामे, खड़ी रहूँगी, बेअदब लड़की की तरह।
अगर धकियाकर हटा भी दे, तो भी मेरे क़दम नहीं होंगे टस से मस।
क्यों ?
प्यार करना क्या अकेले वही जानता है, मैं नहीं ?

तू नहीं आया

अमृता प्रीतम




चैत ने करवट ली
रंगों के मेले के लिए
फूलों ने रेशम बटोरा-
तू नहीं आया

दोपहरें लम्बी हो गयीं,
दाख़ों को लाली छू गयी
दराँती ने गेहूँ की बालियाँ चूम लीं-
तू नहीं आया

बादलों की दुनिया छा गयी,
धरती ने हाथों को बढ़ाया
आसमान की रहमत पी ली-
तू नहीं आया

पेड़ों ने जादू कर दिया,
जंगल से आयी हवा के
होठों में शहद भर गया-
तू नहीं आया

ऋतु ने एक टोना कर दिया,
और चाँद ने आ कर
रात के माथे पर झूमर लटका दिया-
तू नहीं आया

आज तारों ने फिर कहा,
उम्र के महल में अब भी
हुस्न के दीये से जल रहे-
तू नहीं आया

किरणों का झुरमुट कह रहा,
रातों की गहरी नींद से
उजाला अब भी जागता-
तू नहीं आया

Wednesday, December 17, 2008

दावत

अमृता प्रीतम


रात-लड़की ने दावत दी
सितारों के चावल फटक कर
यह देग़ किसने चढ़ा दी ?

चाँद की सुराही कौन लाया
चाँदनी की शराब पी कर
आकाश की आँखें गहरा गयीं

धरती का दिल धड़क रहा है
सुना है आज टहनियों के घर
फूल मेहमान हुए हैं

आगे क्या लिखा है
अब इन तकदीरों से
कौन पूछने जाएगा

उम्र के काग़ज़ पर-
तेरे इश्क़ ने अंगूठा लगाया,
हिसाब कौन चुकाएगा !

किस्मत ने इक नग़मा लिखा है
कहते हैं कोई आज रात
वहीं नग़मा गाएगा

कल्प-वृक्ष की छाँव में बैठकर
कामधेनु के छलके दूध से
किसने आज तक दोहनी भरी ?

हवा की आहें कौन सुने !
चलूँ, आज मुझे
तक़दीर बुलाने आयी है...

कोयल

हरिवंशराय बच्चन


अहे, कोयल की पहली कूक !
अचानक उसका पड़ना बोल,
हृदय में मधुरस देना घोल,
श्रवणों का उत्सुक होना, बनाना जिह्वा का मूक !
कूक, कोयल, या कोई मंत्र,
फूँक जो तू आमोद-प्रमोद,
भरेगी वसुंधरा की गोद ?
काया-कल्प-क्रिया करने का ज्ञात मुझे क्या तंत्र ?
बदल अब प्रकृति पुराना ठाट
करेगी नया-नया श्रृंगार,
सजाकर निज तन विविध प्रकार,
देखेगी ऋतुपति-प्रियतम के शुभागमन का बाट।
करेगी आकर मंद समीर
बाल-पल्लव-अधरों से बात,
ढँकेंगी तरुवर गण के गात
नई पत्तियाँ पहना उनको हरी सुकोमल चीर।
वसंती, पीले, नील, लाले,
बैंगनी आदि रंग के फूल,
फूलकर गुच्छ-गुच्छ में झूल,
झूमेंगे तरुवर शाखा में वायु-हिंडोले डाल।
मक्खियाँ कृपणा होंगी मग्न,
माँग सुमनों से रस का दान,
सुना उनको निज गुन-गुन गान,
मधु-संचय करने में होंगी तन-मन से संलग्न !
नयन खोले सर कमल समान,
बनी-वन का देखेंगे रूप—
युगल जोड़ी सुछवि अनूप;
उन कंजों पर होंगे भ्रमरों के नर्तन गुंजान।
बहेगा सरिता में जल श्वेत,
समुज्ज्वल दर्पण के अनुरूप,
देखकर जिसमें अपना रूप,
पीत कुसुम की चादर ओढ़ेंगे सरसों के खेत।
कुसुम-दल से पराग को छीन,
चुरा खिलती कलियों की गंध,
कराएगा उनका गठबंध,
पवन-पुरोहित गंध सूरज से रज सुगंध से भीन।
फिरेंगे पशु जोड़े ले संग,
संग अज-शावक, बाल-कुरंग, पर्वत की चट्टानों पर कूदेंगे भरे उमंग।
पक्षियों के सुन राग-कलाप—
प्राकृतिक नाद, ग्राम सुर, ताल,

शुष्क पड़ जाएँगे तत्काल,
गंधर्वों के वाद्य-यंत्र किन्नर के मधुर अलाप।
इन्द अपना इन्द्रासन त्याग,
अखाड़े अपने करके बंद,
परम उत्सुक-मन दौड़ अमंद,
खोलेगा सुनने को नंदन-द्वार भूमि का राग !
करेगी मत्त मयूरी नृत्य
अन्य विहगों का सुनकर गान,
देख यह सुरपति लेगा मान,
परियों के नर्तन हैं केवल आडंबर के कृत्य !
अहे, फिर ‘कुऊ’ पूर्ण-आवेश !
सुनाकर तू ऋतुपति-संदेश,
लगी दिखलाने उसका वेश,
क्षणिक कल्पने मुझे घमाए तूने कितने देश !
कोकिले, पर यह तेरा राग
हमारे नग्न-बुभुक्षित देश
के लिए लाया क्या संदेश ?
साथ प्रकृति के बदलेगा इस दीन देश का भाग ?

Tuesday, December 16, 2008

मैं

अमृता प्रीतम



आसमान जब भी रात का
और रोशनी का रिश्ता जोड़ते...
सितारे मुबारकबाद देते..
क्यों सोचती हूँ मैं : अगर कहीं....
मैं, जो तेरी कुछ नहीं लगती
जिस रात के होठों ने कभी
सपने का माथा चूम लिया
ख़्यालों के पैरों में उस रात से
इक पायल-सी बज रही....
जब इक बिजली आसमान में
बादलों के वर्क़ उलटती
मेरी कहानी भटकती-
आदि ढूँढती, अन्त ढूँढती...
तेरे दिल की एक खिड़की
जब कहीं खड़क जाती
सोचती हूँ, मेरे सवाल की
यह कैसी जुर्रत है !
हथेलियों पर इश्क़ की
मेहँदी का कोई दावा नहीं
हिज्र का एक रंग है
और खुसबू है तेरे जिक़्र की
मैं, जो तेरी कुछ नहीं लगती

दृष्टि

Seema Gupta

अनंतकाल से ये दृष्टि
प्रतीक्षा पग पर अडिग ,
पलकों के आंचल से
सर को ढांक ,
आतुरता की सीमा लाँघ
अविरल अश्रुधारा मे
डूबती , तरती , उभरती ,
व्याकुलता की ऊँचाइयों को छु
प्रतीक्षाक्षण से तकरार करती
तुम्हारी इक आभा को प्यासी
अनंतकाल से ये दृष्टि
प्रतीक्षा पग पर अडिग

Gazal

अहमद फ़राज


फिर उसी रहगुज़ार पर शायद
हम कभी मिल सकें मगर, शायद

जिनके हम मुन्तज़र1 रहे उनको
मिल गये और हमसफर शायद

जान पहचान से भी क्या होगा
फिर भी ऐ दोस्त, ग़ौर कर शायद

अजनबीयत की धुन्ध छँट जाये
चमक उठे तेरी नज़र शायद

ज़िन्दगी भर लहू रुलायेगी
यादे-याराने-बेख़बर2 शायद

जो भी बिछड़े, वो कब मिले हैं फ़राज़
फिर भी तू इन्तज़ार कर शायद

1. प्रतीक्षारत 2. भूले-बिसरे दोस्तों की यादें

Monday, December 15, 2008

ग़ज़ल

अहमद फ़राज


बेसरो-सामाँ1 थे लेकिन इतना अन्दाज़ा न था
इससे पहले शहर के लुटने का आवाज़ा2 न था

ज़र्फ़े-दिल3 देखा तो आँखें कर्ब4 से पथरा गयीं
ख़ून रोने की तमन्ना का ये ख़मियाज़ा5 न था

आ मेरे पहलू में आ ऐ रौनके- बज़्मे-ख़याल6
लज्ज़ते-रुख़्सारो-लब7 का अबतक अन्दाजा न था

हमने देखा है ख़िजाँ8 में भी तेरी आमद के बाद
कौन सा गुल था कि गुलशन में तरो-ताज़ा न था

हम क़सीदा ख़्वाँ9 नहीं उस हुस्न के लेकिन फ़राज़
इतना कहते हैं रहीने-सुर्मा-ओ-ग़ाज़ा10 न था

1 ज़िन्दगी के ज़रूरी सामान के बिना 2. धूम 3. दिल की सहनशीलता 4. दुख, बेचैनी, 5. परिणाम, करनी का फल 6. कल्पना की सभा की शोभा 7. गालों और होंटों का आनन्द 8. पतझड़ 9,. प्रशस्ति-गायक, प्रशंसक 10 सुर्मे और लाली पर निर्भर

याद

अमृता प्रीतम


आज सूरज ने कुछ घबरा कर
रोशनी की एक खिड़की खोली
बादल की एक खिड़की बन्द की
और अँधेरे की सीढ़ियाँ उतर गया...

आसमान की भवों पर
जानें क्यों पसीना आ गया
सितारों के बटन कोल कर
उसने चाँद का कुर्ता उतार दिया...

मैं दिल के एक कोने में बैठी हूँ,
तुम्हारी याद इस तरह आयी-
जैसे गीली लकड़ी में से
गाढ़ा और कडुवा धुआँ उठता है...

साथ हज़ारों ख़्याल आये
जैसे कोई सूखी लकड़ी
सुर्ख़ आग की आहें भरे,
दोनों लकड़ियाँ अभी बुझायीं हैं...

वर्ष कोयले की तरह बिखरे हुए
कुछ बुझ गये, कुछ बुझने से रह गये
वक़्त का हाथ जब समेटने लगा
पोरों पर छाले पड़ गये...

तेरे इश्क के हाथ से छूट गयी
और ज़िन्दगी की हँडिया टूट गयी
इतिहास का मेहमान
मेरे चौके से भूखा उठ गया...

Sunday, December 14, 2008

ठण्डा लोहा

धर्मवीर भारती


ठण्डा लोहा ! ठण्डा लोहा !ठण्डा लोहा
मेरी दुखती हुई रगों पर ठण्डा लोहा
मेरी स्वप्न-भरी पलकों पर
मेरे गीत-भरे होठों पर
मेरी दर्द-भरी आत्मा पर
स्वप्न नहीं अब
गीत नहीं अब
दर्द नहीं अब-
एक !पर्त ठण्डे लोहे की
मैं जमकर लोहा बन जाऊँ-
हार मान लूँ-
यही शर्त ठण्डे लोहे की !
ओ मेरी आत्मा की संगिनी
तुम्हें समर्पित मेरी साँस-साँस थी लेकिन
मेरी साँसो में यम के तीखे नेजे-सा
कौन अड़ा है
ठण्डा लोहा !
मेरे और तुम्हारे सारे भोले निश्छल विश्वासों को
आज कुचलने कौन खड़ा है ?
ठण्डा लोहा
फूलों से, सपनों से, आसूँ और प्यार से
कौन है बड़ा ?
ठण्डा लोहा
ओ मेरी आत्मा की संगिनी
अगर जिन्दगी की कारा में,
कभी छटपटाकर मुझको आवाज लगाओ
और कोई उत्तर न पाओ
यही समझना कोई इसको धीरे-धीरे निगल चुका है,
इस बस्ती में कोई दीप जलानेवाला नहीं बचा है,
सूरज और सितारे ठण्डे
राहें सूनी
विवश हवाएँ
शीश झुकाये
खड़ी मौन हैं,
बचा कौन है
ठण्डा लोहा! ठण्डा लोहा !ठण्डा लोहा

सामान्य

राही मासूम रज़ा विशेषांक निकालने के बाद अब सामान्य अंक निकलने जा रहा है. आप साहित्य से सम्बंधित रचनाएं भेज(कहानी, लेख,कविता,गजल,समीक्षा आदि) सकते है. अंक जल्द ही प्रकाशित होगा. धन्यवाद
सम्पादक: वाङ्मय (त्रैमासिक हिन्दी पत्रिका)
बी-4,लिबटी होम्स ,
अलीगढ,
उत्तरप्रदेश(भारत),
202002,
मोब: +91 941 227 7331

ग़ज़ल

बशीर बद्र



ख़ानदानी रिश्तों में अक़्सर रक़ाबत है बहुत
घर से निकलो तो ये दुनिया खूबसूरत है बहुत

अपने कालेज में बहुत मग़रूर जो मशहूर है
दिल मिरा कहता है उस लड़की में चाहता है बहुत

उनके चेहरे चाँद-तारों की तरह रोशन हुए
जिन ग़रीबों के यहाँ हुस्न-ए-क़िफ़ायत1 है बहुत

हमसे हो नहीं सकती दुनिया की दुनियादारियाँ
इश्क़ की दीवार के साये में राहत है बहुत

धूप की चादर मिरे सूरज से कहना भेज दे
गुर्वतों का दौर है जाड़ों की शिद्दत2 है बहुत

उन अँधेरों में जहाँ सहमी हुई थी ये ज़मी
रात से तनहा लड़ा, जुगनू में हिम्मत है बहुत

————————————
1. पर्याप्त सौंदर्य 2. कष्ट

Saturday, December 13, 2008

ग़ज़ल

महताब हैदर नक़वी


मुख़्तसर-सी1 ज़िन्दगी में कितनी नादानी करे
इस नज़ारों को कोई देखे कि हैरानी करे

धूप में इन आबगीनों2 को लिए फिरता हूँ मैं
कोई साया मेरे ख़्वाबों की निगहबानी करे

रात ऐसी चाहिए माँगे जो दिनभर का हिसाब
ख़्वाब ऐसा हो जो इन आँखों में वीरानी करे

एक मैं हूँ और दस्तक कितने दरवाज़ों पे दूँ
कितनी दहलीज़ों पे सज़दा एक पेशानी3 करे

साहिलों पर मैं खड़ा हूँ तिश्नाकामों4 की तरह
कोई मौज-ए-आब5 मेरी आँख को पानी करे

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1. छोटी-सी 2. बहुत बारीक काँच की बोतलें 3. माथा 4. प्यासों 5. पानी की लहर

ग़ज़ल

महताब हैदर नक़वी

सुबह की पहली किरन पर रात ने हमला किया
और मैं बैठा हुआ सारा समां देखा किया

ऐ हवा ! दुनिया में बस तू है बुलन्द इक़बाल1 है
तूने सारे शहर पे आसेब2 का साया किया

इक सदा ऐसी कि सारा शहर सन्नाटे में गुम
एक चिनगारी ने सारे शहर को ठंण्डा किया

कोई आँशू आँख की दहलीज़ पर रुक-सा गया
कोई मंज़र अपने ऊपर देर तक रोया किया

वस्ल3 की शब को दयार-ए-हिज्र4 तक सब छोड़ आए
काम अपने रतजगों ने ये बहुत अच्छा किया

सबको इस मंजर में अपनी बेहिसी पर फ़ख़ है
किसने तेरा सामना पागल हवा कितना किया

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1. तेजस्वी 2. प्रेत-बाधा 3. मिलन 4. विरह-स्थल

ग़ज़ल

अहमद फ़राज

जिससे ये तबियत बड़ी मुश्किल से लगी थी
देखा तो वो तस्वीर हर एक दिल से लगी थी

तनहाई में रोते हैं कि यूँ दिल को सुकूँ हो
ये चोट किसी साहिबे-महफ़िल से लगी थी

ऐ दिल तेरे आशोब1 ने फिर हश्र2 जगाया
बे-दर्द अभी आँख भी मुश्किल से लगी थी

ख़िलक़त3 का अजब हाल था उस कू-ए-सितम4 में
साये की तरह दामने-क़ातिल5 से लगी थी

उतरा भी तो कब दर्द का चढ़ता हुआ दरिया
जब कश्ती ए-जाँ6 मौत के साहिल7 से लगी थी

1. हलचल, उपद्रव, 2. प्रलय, मुसीबत, 3. जनता 4. अत्याचार की गली 5. हत्यारे के पल्लू 6. जीवन नौका 7. किनारा

Friday, December 12, 2008

ग़ज़ल

महताब हैदर नक़वी


उसे भुलाये हुए मुझको इक ज़माना हुआ
कि अब तमाम मेरे दर्द का फ़साना हुआ

हुआ बदन तेरा दुश्मन, अदू1 हुई मेरी रूह
मैं किसके दाम2 में आया हवस निशाना हुआ

यही चिराग़ जो रोशन है बुझ भी सकता था
भला हुआ कि हवाओं का सामना न हुआ

कि जिसकी सुबह महकती थी, शाम रोशन थी
सुना है वो दर-ए-दौलत ग़रीब-ख़ाना हुआ

वो लोग खुश हैं कि वाबस्ता-ए-ज़माना3 हैं
मैं मुतमइन4 हूँ कि दर इसका मुझ पे वा5 न हुआ

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1. शत्रु 2. जाल 3. युग से सम्बद्ध 4. संतुष्ट 5. खुला हुआ

कविता

रवीन्द्रनाथ टैगोर
अनुवादक -डॉ. डोमन साहु ‘समीर

कहाँ आलोक, कहाँ आलोक ?
विरहानल से इसे जला लो।
दीपक है, पर दीप्ति नहीं है;
क्या कपाल में लिखा यही है ?
उससे तो मरना अच्छा है;
विरहानल से इसे जला लो।।
व्यथा-दूतिका गाती-प्राण !
जगें तुम्हारे हित भगवान।
सघन तिमिर में आधी रात
तुम्हें बुलावें प्रेम-विहार-करने,
रखें दुःख से मान।
जगें तुम्हारे हित भगवान।’
मेघाच्छादित आसमान है;
झर-झर बादल बरस रहे हैं।
किस कारण इसे घोर निशा में
सहसा मेरे प्राण जगे हैं ?
क्यों होते विह्वल इतने हैं ?
झर-झर बादल बरस रहे हैं।
बिजली क्षणिक प्रभा बिखेरती,
निविड़ तिमिर नयनों में भरती।
जानें, कितनी दूर, कहाँ है-
गूँजा गीत गम्भीर राग में।
ध्वनि मन को पथ-ओर खींचती,
निविड़ तिमिर नयनों में भरती।
कहाँ आलोक, कहाँ आलोक ?
विरहानल से इसे जला लो।
घन पुकारता, पवन बुलाता,
समय बीतने पर क्या जाना !
निविड़ निशा, घन श्याम घिरे हैं;
प्रेम-दीप से प्राण जला लो।।

Thursday, December 11, 2008

कविता

रवीन्द्रनाथ टैगोर

अनुवादक -डॉ. डोमन साहु ‘समीर






आओ नव-नव रूपों में तुम प्राणों में;
आओ गन्धों में, वर्णों में, गानों में।
आओ अंगों में तुम, पुलिकत स्पर्शों में;
आओ हर्षित सुधा-सिक्त सुमनों में।
आओ मुग्ध मुदित इन दोनों नयनों में;
आओ नव-नव रूपों में तुम प्राणों में।
आओ निर्मल उज्ज्वल कान्त !
आओ सुन्दर स्निग्ध प्रशान्त !
आओ, आओ हे वैचित्र्य-विधानों में।
आओ सुख-दुःख में तुम, आओ मर्मों में;
आओ नित्य-नित्य ही सारे कर्मों में।
आओ, आओ सर्व कर्म-अवसानों में;
आओ नव-नव रूपों में तुम प्राणों में।।

कविता

रवीन्द्रनाथ टैगोर

अनुवादक -डॉ. डोमन साहु ‘समीर






प्रेम, प्राण, गीत, गन्ध, आभा और पुलक में,
आप्लावित कर अखिल गगन को, निखिल भुवन को,
अमल अमृत झर रहा तुम्हारा अविरल है।
दिशा-दिशा में आज टूटकर बन्धन सारा-
मूर्तिमान हो रहा जाग आनंद विमल है;
सुधा-सिक्त हो उठा आज यह जीवन है।
शुभ्र चेतना मेरी सरसाती मंगल-रस,
हुई कमल-सी विकसित है आनन्द-मग्न हो;
अपना सारा मधु धरकर तब चरणों पर।
जाग उठी नीरव आभा में हृदय-प्रान्त में,
उचित उदार उषा की अरुणिम कान्ति रुचिर है,
अलस नयन-आवरण दूर हो गया शीघ्र है।।

Wednesday, December 10, 2008

मायाजाल

SEEMA GUPTA

ह्रदय के मानचित्र पर पल पल
तमन्नाओं के प्रतिबिम्ब उभरते रहे,
यथार्थ को दरकिनार कर
कुछ स्वप्नों ने सांसे भरी...
छलावों की हवाएं बहती रही
बहकावे अपनी चाल चलते रहे,
कायदों को सुला , उल्लंघन ने
जाग्रत हो अंगडाई ली..
द्रढ़निश्चयता का उपहास कर
संकल्प मायाजाल में उलझते रहे,
ह्रदय के मानचित्र पर पल पल
तमन्नाओं के प्रतिबिम्ब उभरते रहे...

कविता

रवीन्द्रनाथ टैगोर

अनुवादक -डॉ. डोमन साहु समीर


मेरी रक्षा करो विपत्ति में, यह मेरी प्रार्थना नहीं है;
मुझे नहीं हो भय विपत्ति में, मेरी चाह यही है।
दुःख-ताप में व्यथित चित्त को
यदि आश्वासन दे न सको तो,
विजय प्राप्त कर सकूँ दुःख में, मेरी चाह यही है।।

मुझे सहारा मिले न कोई तो मेरा बल टूट न जाए,
यदि दुनिया में क्षति-ही-क्षति हो,
(और) वंचना आए आगे,
मन मेरा रह पाये अक्षय, मेरी चाह यही है।।

मेरा तुम उद्धार करोगे, यह मेरी प्रार्थना नहीं है;
तर जाने की शक्ति मुझे हो, मेरी चाह यही है।
मेरा भार अगर कम करके नहीं मुझे दे सको सान्त्वना,
वहन उसे कर सकूँ स्वयं मैं, मेरी चाह यही है।।

नतशिर हो तब मुखड़ा जैसे
सुख के दिन पहचान सकूँ मैं,
दुःख-रात्रि में अखिल धरा यह जिस दिन करे वंचना मुझसे,
तुम पर मुझे न संशय हो तब, मेरी चाह यही है।।

Tuesday, December 9, 2008

समय

शैलेन्द्र

समय को गले नहीं लगाया
उसके सिर पर नहीं फेरा हाथ
पीठ भी नहीं थपथपाई उसकी
धड़कनों को महसूस नहीं किया
सीने में समय ने भी ऐसा ही सलूक किया
उसने छोड़ दिया साथ
रवीन्द्रनाथ टैगोर

अनुवादक -डॉ. डोमन साहु ‘समीर






अनजानों से भी करवाया है परिचय मेरा तुमने;
जानें, कितने आवासों में ठाँव मुझे दिलवाया है।
दूरस्थों को भी करवाया है स्वजन समीपस्थ तुमने,
भाई बनवाए हैं मेरे अन्यों को, जानें, कितने।

छोड़ पुरातन वास कहीं जब जाता हूँ, मैं,
‘क्या जाने क्या होगा’-सोचा करता हूँ मैं।
नूतन बीच पुरातन हो तुम, भूल इसे मैं जाता हूँ;
दूरस्थों को भी करवाया है स्वजन समीपस्थ तुमने।

जीवन और मरण में होगा अखिल भुवन में जब जो भी,
जन्म-जन्म का परिचित, चिन्होगे उन सबको तुम ही।
तुम्हें जानने पर न पराया होगा कोई भी;
नहीं वर्जना होगी और न भय ही कोई भी।

जगते हो तुम मिला सभी को, ताकि दिखो सबमें ही।
दूरस्थों को भी करवाया है स्वजन समीपस्थ तुमने।।
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Monday, December 8, 2008

ख्वाबों के आँगन

SEEMA GUPTA


ख्वाबों के आँगन ने अपना
कुछ ऐसे फ़िर विस्तार किया,
वर्तमान ने हकीक़त ,
का दामन ठुकराया ,
अस्तित्व ने अपने,
सामर्थ्य से मुख फैरा,
शीशमहल का निर्माण किया...
विवशता का परित्याग कर ,
दर्पण मचला जिज्ञासा का,
भ्रम की आगोश मे,
मनमोहक श्रिंगार किया ...
बहते दरिया की भूमि पर ,
इक नीवं बना अरमानो की,
हर तर्ष्णा को पा लेने का,
निरर्थक एक प्रयास किया ...
ख्वाबों के आँगन ने अपना
कुछ ऐसे फ़िर विस्तार किया.........

कविता

रवीन्द्रनाथ टैगोर

मेरा माथा नत कर दो तुम
अपनी चरण-धूलि-तल में;
मेरा सारा अहंकार दो
डुबो-चक्षुओं के जल में।
गौरव-मंडित होने में नित
मैंने निज अपमान किया है;
घिरा रहा अपने में केवल
मैं तो अविरल पल-पल में।
मेरा सारा अहंकार दो
डुबो चक्षुओं के जल में।।
अपना करूँ प्रचार नहीं मैं,
खुद अपने ही कर्मों से;
करो पूर्ण तुम अपनी इच्छा
मेरी जीवन-चर्या से।
चाहूँ तुमसे चरम शान्ति मैं,
परम कान्ति निज प्राणों में;
रखे आड़ में मुझको
आओ, हृदय-पद्म-दल में।
मेरा सारा अहंकार दो।
डुबो चक्षुओं के जल में।।

Sunday, December 7, 2008

उड़े,बस उड़े

हरीश बादानी


धरती से ऊपर
उड़-उड़कर
हब्बलवाली आंख पहनकर
बिना रंग के सन्नाटे में
पिण्ड खोजते
उन लोगों से
तेरी मेरी
इस पल तक की
हर सीमा अनदेखी,
पर वे तो उड़े,बस उड़े .

Saturday, December 6, 2008

रात भर यूं ही.........

V I J A Y K U M A R S A P P A T T I


कुछ भी कहो, पर....
रात भर यूं ही आलाव जलाते रहो.......

चाहता हूँ कि तुम प्यार ही जताते रहो,
अपनी आंखो से तुम मुझे पुकारते रहो,
कुछ भी कहो, पर....
रात भर यूं ही आलाव जलाते रहो.......

चुपके से हवा ने कुछ कहा शायाद ..
या तुम्हारे आँचल ने कि कुछ आवाज़..
पता नही पर तुम गीत सुनाते रहो...
रात भर यूं ही आलाव जलाते रहो.......

ये क्या हुआ , यादों ने दी कुछ हवा ,
कि आलाव के शोले भड़कने लगे ,
पता नही , पर तुम दिल को सुलगाते रहो
रात भर यूं ही आलाव जलाते रहो.......

ये कैसी सनसनाहट है मेरे आसपास ,
या तुमने छेडा है मेरी जुल्फों को ,
पता नही पर तुम भभकते रहो..
रात भर यूं ही आलाव जलाते रहो.......

किसने की ये सरगोशी मेरे कानो में ,
या थी ये सरसराहट इन सूखे हुए पत्तों की,
पता नही ,पर तुम गुनगुनाते रहो ;
रात भर यूं ही आलाव जलाते रहो.......

ये कैसी चमक उभरी मेरे आसपास ,
या तुमने ली है ,एक खामोश अंगढाईं
पता नही पर तुम मुस्कराते रहो;
रात भर यूं ही आलाव जलाते रहो.......

कुछ भी कहो, पर....
रात भर यूं ही आलाव जलाते रहो.......

अधबीच

राजकिशोर

मैंने जीवन भर
एक ही कविता लिखी
एक ही कहानी
एक ही उपन्यास
और आज भी
वह उतनी ही अधूरी है
जितनी कल जान पड़ती थी

Friday, December 5, 2008

सच

शंकरानंद


यह कौन सा सय है कि
झूठ निकला है घर से बाहर
आ गया है सड़क पर
और हंस रहा है जोर जोर से
झूठ भाग रहा है बदहवास
पीछे पीछे दौड़ रहा है सच
झूठ गिर पड़ा है
झूठ चाट रहा है धूल
बगल में खड़ा
पसीना पोछ रहा है सच
धीरे-धीरे मुसकरा रहा है सच

Tuesday, December 2, 2008

रिक्शेवाला

अशोक चक्रधर


आवाज़ देकर
रिक्शेवाले को बुलाया
वो कुछ
लंगड़ाता हुआ आया।
मैंने पूछा—
यार, पहले ये तो बताओगे,
पैर में चोट है कैसे चलाओगे ?
रिक्शेवाला कहता है—
बाबू जी,
रिक्शा पैर से नहीं
पेट से चलता है।

Monday, December 1, 2008

तुम्हें बाँध पाती सपने में

महादेवी वर्मा

तुम्हें बाँध पाती सपने में !
तो चिरजीवन-प्यास बुझालेती
उस छोटे क्षण अपने में !
पावस-घन सी उमड़ बिखरती,
शरद-दिशा सी नीरव घिरती,
धो लेती जग का विषादढुलते
लघु आँसू-कण अपने में !
मधुर राग बन विश्व सुलाती
सौरभ बन कण कण बस जाती,
भरती मैं संसृति का क्रन्दन
हँस जर्जर जीवन अपने में !
सब की सीमा बन सागर सी,
हो असीम आलोक-लहर सी,
तारोंमय आकाश छिपा रखती
चंचल तारक अपने में !
शाप मुझे बन जाता वर सा,
पतझर मधु का मास अजर सा,
रचती कितने स्वर्ग एक लघु
प्राणों के स्पन्दन अपने में !
साँसे कहतीं अमर कहानी,
पल-पल बनता अमिट निशानी,
प्रिय ! मैं लेती बाँध मुक्ति सौ सौ,
लघुपत बन्धन अपने में।
तुम्हें बाँध पाती सपने में !
आज क्यों तेरी वीणा मौन ?
शिथिल शिथिल तन थकित हुए कर,
स्पन्दन भी भूला जाता उर,
मधुर कसक सा आज
हृदय में आन समाया कौन ?
आज क्यों तेरी वीणा मौन ?
झुकती आती पलकें निश्चल,
चित्रित निद्रित से तारक चल;
सोता पारावार दृगों में भर भर
लाया कौन ?
आज क्यों तेरी वीणा मौन ?
बाहर घन-तम;
भीतर दुख-तम,
नभ में विद्युत तुझ में प्रियतम,
जीवन पावस-रात बनाने
सुधि बन छाया कौन ?
आज क्यों तेरी वीणा मौन ?

पहली दलित कहानी का जन्म

रमणिका गुप्ता
ऐसे तो कहानी की उत्पत्ति तब हुई होगी, जब मनुष्य ने भाषा गढ़ ली होगी। एक तरफ़ वह आदि मनुष्य प्रकृति से जूझता रहा होगा, दूसरी तरफ़ उसी निर्भर या उसी के सहारे जीवित था। सम्भवतः प्रकृति के साथ उसका मित्र और शत्रु, संरक्षक और उपभोक्ता, प्रेम और घृणा का यह रिश्ता उसके मनुष्य बनने के साथ ही क़ायम हो गया था। प्रेम ने जहाँ उसे यह रिश्ता उसके मनुष्य बनने के साथ ही क़ायम हो गया था। प्रेम ने जहाँ उसे कल्पना दी और दी उम्मीदें, वहीं घृणा ने उसे सच्चाइयों का बोध कराया। प्रकृति की विध्वसंक शक्तियों के अहसास ने उसे उन पर विजय पाने की योजना के लिए प्रेरित किया और योजना के लिए उसने लिया कल्पना का सहारा। प्रकृति से जीवन पाकर वह जिन्दा था, यह भी यथार्थ था और प्रकृति ही उसका विनाश करती थी, यह सच भी वह जान गया था। जब इस यथार्थ के अनुसार उसने अपनी सन्तति या संगिनी को प्रकृति के सन्दर्भ में अथवा प्रकृति के प्रत्याशित-अप्रत्याशिक स्वभाव के कारण घटी घटनाओं और हादसों को अपनी आप-बीती बताना शुरू किया होगा, सम्भवतः तभी कहानी का जन्म हुआ होगा। कविता की तरह कहानी एकाएक नहीं फूटा करती। कहानी तो घटा करती है यानी घटती है, इसलिए कहानी तो विकसित हुई होगी, गढ़ी और तराशी भी गई होगी। आदिम मनुष्य की कहानी भी घटी थी जो एक सामूहिक कथा थी या कहें कि आदिम गाथा थी, जो शुरू में किसी एक भौगोलिक क्षेत्र में समानरूपता रही होगी। पर अन्न की खोज में निकला मनुष्य जब पत्थर युग से लौह युग पार करता हुआ सभ्यता के युग में पहुँचा, तो वह अपने लिए कई इतिहास मिथकों स्मृतियों विचारों धाराणाओं, आस्थाओं विश्वासों एवं शक्ति केन्द्रों का निर्माण कर चुका था, जिन पर शायद वह आस्था रखने लगा था। जब वह प्रकृति से जूझा होगा तो उसने तर्क किए होंगे, तरकीब लड़ाई या योजना बनाई होगी, पर जब वह प्रकृति पर मुग्ध होकर अभिभूत, विस्मित और चकित हुआ होगा तो चमत्कृत हो गया होगा, जिसने उसमें एक आस्था पैदा करने के साथ साथ डर भी पैदा किया होगा।
कालान्तर में, सभ्यता की यात्रा में मनुष्य खेमों में बँटने लगा। फिर खेमों में होड़ लगी, युद्ध जय पराजय हुई और विजेता खेमा खुद को दूसरे से श्रेष्ठ समझने लगा और वह श्रेणियों में बँट गया। समानता एवं सामूहिकता ख़त्म होने लगी। जिस युग में सामूहिकता ख़त्म होने पर वह किसी व्यक्ति का ग़ुलाम और दास बना होगा-उसी दिन ‘स्वामी’ का जन्म हुआ, शायद पहली दलित कहानी भी उसी दिन घटी होगी। चूँकि दासता ही दलित अवधारणा की जननी है। यह दासता उसकी पराजय के कारण हो या उसके रंग के कारण जन्म, जाति या क़बीलों के स्तर की भिन्नता के कारण, इसका सतत विकास होता चला गया। दासता की मानसिकता के विकास के साथ-साथ समानता और सामूहिकता समाप्त होती गईं। समूह पर भी व्यक्ति क़ाबिज़ होने लगा। वे सैनिक के रूप में राजा के, भक्त के रूप में भगवान के ,अनुयायी के रूप में धर्म के और शिष्य के रूप में गुरु के दास बन गए। श्रेष्ठ लोगों की जमातें बनने की प्रक्रिया में ही हीन-भावना का जन्म हुआ होगा, चूँकि, श्रेष्ठता की यह प्रक्रिया सब-अस्तित्व से नहीं, कमतर और कमज़ोर को नष्ट करके, निम्न वर्गों की कीमत पर उच्च वर्गों के निर्माण के सम्पन्न होती है न जाने कितनी कहानियाँ जन्मीं और मरी होंगी इस दौर में ! विरोध का स्वर ही दलित कहानी का स्वर और ताक़त होता है, किन्तु सभ्यता का मूल मन्त्र है-‘विरोध को खत्म करना’, इसलिए अन्याय ‘प्रायश्चित्त’ का पर्याय बना दिया गया और दुःख पिछले जन्म का कर्मफल’। यही धारणा दलित कहानी की पोषक बनी और उनकी निरन्तरता का कारण भी !
इस धारणा को माननेवाला श्रेष्ठ समूह जब सत्ता के शिखर पर था तो ‘राम’ नाम के एक राजा हुए थे। वे मर्यादा पुरुषोत्तम कहलाते थे। वे उस भेद-मूलक व्यवस्था के भयंकर पोषक थे। उनके गौरव को चार चाँद लगाने वाली अपनी सर्वण जाति के वर्चस्व के रक्षार्थ ही राम ने शम्बूक की हत्या की थी, ताकि शम्बूक सवर्ण समाज की तरह ज्ञान अर्जित न कर पाए, उनके समकक्ष न बन पाए, ताकि ब्राह्मणवादी सवर्ण-व्यवस्था का वर्चस्व शम्बूकों की जमात पर क़ायम रहे। दरअसल सवर्ण वाड्मय में शम्बूक वध की चर्चा राम के गुणगान का एक हिस्सा है, जो उनकी कर्त्तव्य-परायणता और राज धर्म निभाने की प्रशंसा में लिखी गई थी। यह कथा ब्राह्मण वर्ग के हितों के रक्षार्थ शम्बूक की हत्या को उचित ठहराती है यानी ब्राह्मण-सत्ता के दिनों को सुरक्षित रखने के लिए शम्बूक प्रजा के वध की एक वीरगाथा है यह। कैसा अद्भुत षड्यन्त्र था यह ! राजसत्ता और वर्चस्व क़ायम रखने की योजनाबद्ध साज़िश-जिसे लोग साज़िश नहीं वीरता कहें, कर्त्तव्य-परायणता कहें। सम्भवतः तभी पैदा हुई यह दलित कहानी। हाँ ! दलित कहानी, जो सदियों बाद मानववादी सोच से परिभाषित हुई-जिसका नायक है शम्बूक !
प्रथम कविता का जन्म अगर वाल्मीकि के मन में क्रौंच-वध से फूटी करुणा के कारण हुआ तो उसी युग में वाल्मीकि के नायक राम ने अपने जातीय दम्भ से शम्बूक की हत्या करके, भय और आतंक से दलित कहानी का सूत्रपात किया। इस प्रकार हुई थी विरोधी स्वर की हत्या, जिसे शम्बूक का विरोधी स्वर, आनेवाली सदियों को प्रेरित करता और परिवर्तन के संकल्प की याद दिलाता रहा है। दलित कहानी में दो गुणों का होना अति आवश्यक है-एक भेदमूलक व्यवस्था का विरोध और दूसरा परिवर्तन का संकल्प। ये गुण शम्बूक-कथा में तीव्रता से मौजूद हैं, भले इन गुणों को आज परखा-पहचाना जा रहा है। इसी प्रकार हर युग में दलित कहानियाँ घटती रही हैं, भले वाड्मय उन व्याख्याओं या परखों को नकारता रहा हो, पर लोक साहित्य और किंवदन्तियों में सच कहा जाता रहा है। गौरवमयी भाषा, अलंकार और छन्दों से छद्म को छिपाने के लाख जतन किए जाने पर भी उन कथाओं की सत्यता छिपाई नहीं जा सकी। यह सही है कि बाबा साहब आम्बेडकर ने सही रूप में इन कथाओं को देखने-परखने की दृष्टि दी, अन्यथा, अपने ही ख़िलाफ़ लिखी इन कथाओं को इस व्यवस्था के रचयिता समाज के साथ-साथ वह समाज भी रस लेकर, सुनता-सुनाता था और राम जैसे नायकों के गुणों पर मुग्ध होकर झूमता था जो इसका खुद शिकार था।
महाभारत में दोणाचार्य ने गुरु के शीर्ष स्थान पर बैठकर एक अन्य महत्त्वपूर्ण दलित कथा को जन्म दिया था, एकलव्य का अँगूठा जबरन कटवाकर, ताकि क्षत्रिय-पुत्र अर्जुन से शूद्र-पुत्र एकलव्य आगे न बढ़ जाए। सवर्ण इतिहास ने इसे एकलव्य का त्याग बताकर सदियों तक गुरु के छद्म को गौरवान्वित किया। लेकिन डॉ. आम्बेडकर ने जो तर्क की कसौटी दलित साहित्यकार के हाथों में दी तो सारा का सारा गौरव ढह गया-छद्म बेनक़ाब हो गया और एक और बड़ी कहानी, दलित-कहानी वाड्मय के पृष्ठों पर उभर आई जो पूरे ढाँचे को चूर-चूर करने की कुव्वत रखती थी। पर इसे सुनने, पढ़ने और इसका सच समझने में युगों का अन्तराल बीच में खड़ा है। हालाँकि मध्यप्रदेश के जंगलों में आज भी यह कथा कही जाती है, जिसमें गुरु द्रोण के अन्याय का ज़िक्र आता है। एक कथा तो यह है कि अँगूठा कट जाने के बाद एकलव्य पाँव के अँगूठे से तीर चलाने लगा और अचानक गुरु द्रोण वहाँ पहुँचे तो उन्होंने एक कुत्ते का मुँह वाणों से भरा देखा। तत्काल वे जान गए कि यह एकलव्य ही हो सकता है। ये लोग गीत और लोक कथाएँ गुरु द्रोण पर व्यंग्य ही नहीं, बल्कि करारी चोट भी करते हैं। यह विडम्बना है कि जन-मानस ने तो द्रोण के छल-कपट को पहचाना, पर वाड्मय के रचयिता साहित्यकार, इस सच को नकारते रहे। बस यह दलित कथा जन-मानस को भीतर-ही-भीतर सालती रही और आज तो हर दलित के लिए यह एक प्रेरक कथा है। रज़िया अपने हब्शी ग़ुलाम से प्रेम करती थी। वह अपने ही सरदारों द्वारा इसलिए मार दी गई कि वह रानी थी और उसकी प्रेमी एक हब्शी। काले आबनूसी रंग का जीव, मनुष्यता का दावा भला कैसे कर सकता था ? शहंशाह कुल में जन्मी रज़िया से प्रेम की कल्पना करना ही उसका अपराध था और गुलाम समेत रज़िया की हत्या कर दी गई, यह एक और दलित कहानी थी। रज़िया द्वारा किए गए परम्परा के खिलाफ इस विद्रोह के बार-बार न जाने कितनी घटनाओं को अंजाम दिया होगा ? पता नहीं सतयुग में कितनी और दलित कहानियाँ घटी होंगी और त्रेता में कितनी ! कलयुग में तो आज लाइन ही लग गई है इन कहानियों की।
हज़ारीबाग़ जिले में एक चमार लड़के महावीर रविदास ने कुर्मी जाति की एक लड़की से प्रेम-विवाह किया। महावीर को चार सौ घर कुर्मियों की पंचायत ने पत्थरों से कूँच-कूँचकर ज़िन्दा मार डाला और अपनी बेटी मालती को नंगा कर जलती लुकाठी से दाग़ दिया। कहाँ फ़र्क है रज़िया और मालती की कहानी में या उस आबनूसी रंग के हब्शी और महावीर में ? हेन्देगढ़ा के जंगल में आज भी आवाज़ गूँजती है-‘महावीर’ ‘मालती’। बाँसुरी चुप पड़ी है, चूँकि महावीर के होंठ कूँच दिए गए हैं-पत्थरों से-अँगुलियाँ तोड़ दी गई हैं लाठियों से। जंगलों में ‘धोकर रविदास’ की आवाज़ गूँजती है, महावीर की बाँसुरी पर मनु कुंडली मारकर बैठ गया है-दलित को प्यार करने का अधिकार नहीं है, इसलिए उसे मारना ही होगा और मार दिया गया महावीर नंगी कर दी गई मालती। दलित से प्यार करने की सजा दे दी गई उसे और ‘धोकर रविदास’ हेन्देगढ़ा के जंगलों में हर पत्थर को देखकर उसे छीनने के लिए दौड़ता है कि कहीं उसके महावीर पर कोई पत्थर न मार दें ! पर पत्थर तो चल चुके-महावीर मारा जा चुका। सवर्ण संहिता के अनुसार दलितों का इलाज पत्थर ही करते रहे हैं। चेतना की सजा चेतना शून्य, पत्थर से बढ़कर और कौन दे सकता था भला संवेदनशील सुवर्ण संहिता की नज़र में ?तमिलनाडु के एक स्कूल में पढ़ने गई एक छात्रा सवर्णों के लिए रखे गए घड़े से पानी पी लिया-बस उसकी आँखें निकाल ली गईं। कहाँ भिन्न है एकलव्य की कथा से यह ? अँगूठा नहीं काटा, आँखें निकाल लीं ! न आँख रहेंगी, न वह पढ़ेगी। शिक्षा से तो ज्ञान होता है न ! ज्ञान अहसास दिला सकता है ग़ुलामी का, जिससे मुक्ति का रास्ता सरल हो जा सकता है ! बस पढ़ने का रास्ता ही बन्द कर दिया ! आँखें ही निकाल लीं ! न रहेगा बाँश ना बजेगी बाँसुरी !
शंकराचार्य के आदेशानुसार मध्य युग में दलितों की परछाईं सवर्णों पर पड़ने के चलते कितने दलितों की ख़ाल खींचकर हत्या कर दी गई होगी। न जाने कितनी दलित कहानियाँ इन ज़ुल्मों की परछाइयों में छिपी हैं ? कौन जाने कब कोई सोधकर्ता उन्हें खोज निकालेगा !
एक और दलित कथा भी है इतिहास में, जब चाणक्य जैसे ब्राह्मण ने बदला लेने के लिए एक दलित लड़के चन्द्रगुप्त को राजा बना दिया था। चन्द्रगुप्त में योग्यता थी राजा बनने की, तभी तो बना है वह राजा, मात्र चाणक्य के प्रयास से नहीं। यह दलितों की योग्यता की कहानी थी, चाणक्य के मन में दलित प्रेम नहीं बल्कि राज्य के प्रति प्रतिशोध था, खासकर राजा नन्द के प्रति चूँकि वह भी एक शूद्र ही था। यह इस बात का द्योतक है कि दलित बड़े-से-बड़े काम को अंजाम देने में भी सक्षम थे, इसीलिए चाणक्य के द्वारा चुना गया दलित बालक चन्द्रगुप्त राजा बना।
मातंग एक बहुत बड़ा कवि हुआ था हर्षवर्धन के दरबार में। बहुत नाम था उसका। दलित और कवि ? यह भला कैसे सम्भव हो सकता है ब्राह्मण कोश में ? कौन बर्दाश्त करेगा उसे ? बस हर्षवर्धन के बाद मातंग का नाम मिटा देने के लिए उसकी सब कृतियाँ ही नष्ट कर दी गईं। केवल चीन से आए यात्री के यात्रा वर्णन में उसका उल्लेख मिलता है, कृतियों का अता पता नहीं है। इतिहास में दर्ज यह एक और दलित कहानी थी।अद्भुत कहानी तो लिखी पन्ना धाय ने। राजा के बेटे को अपने बेटे की कीमत पर बचाया था तलवार की धार से, किन्तु उफ़ तक नहीं की उसने। राजा के बेटे को लेकर निकल पड़ी वह जंगलों की ओर, अपने समाज के पास। राजा को राजा का अधिकार दिलाने के लिए एक आदिवासी भील धाय पन्ना ने, मरने के लिए अभिशप्त उस बालक को तीर चलाना सिखाया। दलित थी न पन्ना धाय। ईमानदारी व़फादारी के सिवा छल तो कभी जाना ही नहीं था उसने। मरने के लिए अभिशप्त वह बालक उदयपुर का राजा बन गया। पर वाह रे राजा ! वाह रे साहित्य ! वाह रे न्याय ! पन्ना पन्ना धाय ही रही, दासी ही रही। उनकी नज़र में राजकुमर को नया जन्म देनेवाली पन्ना धाय बस एक वफा़दार दासी के रूप में दर्ज हुई इतिहास में वाड्मय में ! पन्ना धाय-जिससे तो राजमाता का रुतबा भी छोटा पड़ गया था। पर क्या करूँ ?दलित कहानी है न यह ! इस व्यवस्था में दलित को दास ही रहने दिया जा सकता है। ज़्यादा-से-ज़्यादा वफा़दारी और ईमानदारी का खि़ताब दिया जा सकता है। राजमाता तो राजकुल की वंशज ही हो सकती है न ! पन्ना के बेटे की लाश पर लिखी थी उदयपुर के मृत राजा के भाई विक्रम सिंह ने यह दलित कथा, जिसे आज तक महान् भारतीय संस्कृति के गौरव की गाथा कहा जाता है। ये तो आज समझ में आया कि यह गौरव गाथा नहीं, अन्याय गाथा थी। ऐसा बताते हैं कि 1857 में भारतीय स्वतन्त्रता युद्ध परवान नहीं चढ़ता, अगर एक मातादीन नाम का दलित मंगल पांडेय को यह सूचना नहीं देता कि कारतूसों पर गाय की चर्बी चढ़ी है। अछूत मातादीन को छूने से परहेज़ करने वाला मंगल पांडे, अंग्रेजों की ग़ुलामी के कारण, हर रोज़ गोली चलाने वक़्त अपनी तथा कथित प्राण पूज्य गाय माता की चर्बी से मुँह तो जूठा कर लेता था लेकिन हिन्दू धर्म के आदेशनुसार मातादीन को छूना पाप समझता था। इसी पाप की प्रतिमा समझे जाने वाले मातादीन को मंगल पांडे ने जब छू जाने पर दुतकारा तो उसने पांडे को गोली पर गाय की चर्बी चढ़ी होने से सूचना दी-यानी ज्ञान दिया और पांडे ने विद्रोह का बिगुल फूँक दिया। जगंलों, में भारत माँ का नारा गूँज उठा, ‘विद्रोह-विद्रोह-विद्रोह’-फैल गया वादियों, घाटियों पहाड़ियों से मैदानों तक पर मातादीन कहाँ खो गया ? इतिहास में उसकी चर्चा ही नहीं है, ख़ून तो अफरात बहा उस विद्रोह में, पर सम्भवतः इतिहासकारों और साहित्यकारों की क़लम की स्याही ही सूख गई थी मातादीन का सच लिखते वक़्त या फिर शायद सकुचा गई थी सवर्ण-क़लम !
हालाँकि 1857 का स्वतन्त्रता संग्राम (जो अंग्रेजों की दृष्टि से गदर था) निरक्षर और हथियार-विहीन मातादीन भंगी की प्ररेणा से शुरू किया था मंगल पांडे ने। सम्भवतः इतिहास में उसका इसलिए ज़िक्र नहीं है, क्योंकि वह दलित था। पर घटना तो घट ही गई थी। गदर युद्ध या स्वतन्त्रता युद्ध, जो भी हो, वह भारत में दलित का छेड़ा हुआ युद्ध था, अंग्रज़ों के ख़िलाफ़ ! प्रथम स्वतन्त्रता युद्ध ! भारत के एक दलित द्वारा प्रेरित युद्ध ! पर इतिहास से प्रेरणा स्रोत ही गायब ! कितनी दर्दनाक दलित कथा है यह ! भारतीय संस्कृति गौरवशाली संस्कृति का कितना कुरूप चेहरा है, यह अब पता चल रहा है। 1857 ई. में अंग्रेज़ों से युद्ध करते हुए झलकारी बाई मारी गई थी, लक्ष्मीबाई नहीं। झलकारी बाई की सूरत लक्ष्मीबाई से मिलती थी। वह रानी लक्ष्मी बाई की एक वफ़ादार सेविका थी, जिसने लक्ष्मी बाई को बचाने के लिए भगा दिया था और स्वयं अंग्रेजों से लड़ते-लड़ते झांसी के युद्ध में मारी गई थी। पर इतिहास में नाम दर्ज है लक्ष्मीबाई का, झलकारी बाई का नामो निशान नहीं है। यह भी एक दलित कहानी का प्लाट है। कितनी दलित कथाएँ गिनाऊँ ? अनगिनत कहानियाँ हैं, जो दर्ज नहीं हैं, पर उनकी किंवदंतियाँ रह गईं, कथ्य रह गया, घटना के निशान रह गए। कल की गौरव गाथाओं की परिभाषा बदली। आज के सच की गाथा बनी दलित कहानी। भले सवर्ण वाड्मय के कर्त्ता धर्त्ताओं ने साहित्य में उसका महत्व नहीं माना, वे इतिहास लायक़ भी नहीं समझी गईं, चूँकि उनकी दृष्टि में कथा का नायक दलित बन ही नहीं सकता था, पर वे सदैव अस्तित्व में रहीं।
चतरा की धरती जानती थी कि उसकी हर दलित बेटी का डोला पहली रात बाबू साहब के घर ही उतरेगा पति नहीं, राजा साहब के यहाँ उतरता रहा है इस महान भारत देश में। महान् भारतीय, संस्कृति की यह महान अन्तहीन पीड़ादायक बर्बरता है और दलित कथा पीड़ा और बर्बरता के इस दौर से गुज़रती रही है और आज भी गुज़र रही हैं। महाभारत की मत्स्यगंधाएँ शान्तनुओं द्वारा सैदव अपने महलों में ले जाई जाती रही हैं। क्षत्रिय राजा जो थे। झारखंड के चतरा की भुइयाँ जाति की नवव्याहता बहू हो या महाभारत की मतस्यगंधा, कहाँ फ़र्क है दोनों में ? सदियों बाद भी स्थिति वहीं की वहीं है।
व्यास की सन्तान है पूरा कौरव और पांडव कुल। लेकिन वाह रे सवर्ण मन ! जहाँ जो रास आया उसी को मान्यता दे दी। पुत्रवधुएँ क्षत्री-पिता दलित पर उनकी सन्तान क्षत्री ? दलित की सक्षमता को मान्यता न मिल जाए कहीं, तो पितृसत्ता की बजाय मातृसत्ता को मान लिया। विदुर की पत्नी तक तो व्यास से सन्तान प्राप्त करनी पड़ी। सच में देखा जाए तो धृतराष्ट्र और पांडव दलित पुत्र थे यदि यही संस्कृति भी चलती रहती तो सम्भवतः नक़्शा कुछ और ही होता। एक संकर संस्कृति पनपती, जिसमें श्रेष्ठ-अश्रेष्ठ आर्य-अनार्य का भेद ख़त्म हो गया होता और महाभारत का अन्त वह न होता, जो हुआ। पर फिर सनातन वैदिक धर्म की, ब्राह्मण की रक्षा कैसे होती ? उसकी रक्षा के लिए कूटनीति लाज़िमी थी और कूटनीति कृष्ण के बिना सम्भव नहीं थी। कलह होनी थी, कलह बढ़ी-महाभारत तय था महाभारत हुआ। दलित कथाएँ घटनी ही थीं-वे घटीं।
(दलित कहानी संचयन से साभार )