Thursday, September 11, 2008

हॉं मैं

Sanat Kumar Jain
वे कहते हैं
मै पलायनवादी हॅू, मै निराशवादी हूं
हॉ मैं वृक्षों के पत्तों के बीच
बहने वाली हवा की छुअन चाहता हूं
हॉ मैं गाय बैलों के खुरों से
पगडंडियों की उडती धूल चाहता हूं
हां मै पहली बरसा की बॅदों और
धूल के सानिय से उठती गंध चाहता हूं
हॉ मैं महॅए की महक और
आम के बौर की गंध चाहता हूं
हॉं मैं चिडियों का कलख चाहता हूं
हॉ मैं सांझ में उडते पंछियों का बादल चाहता हूं
हॉ मैं पलों के जीवन का काई पल खोना नहीं चाहता हूं
हॉं मैं पलायनवादी हूं
हॉं मैं निराशावादी हूं