Monday, September 8, 2008

मंजिल

सीमा गुप्ता


मंजिल नहीं थी कोई मगर गामज़न हुए
ख़ुद राह चुन के तेरी तमन्ना लिए हुए
फिर साया मेरा देके दगा चल दिया किधर
हम आईने को तकते रहे जाने किस लिए
दिलदार ने भुला दिया पर हमने उसको यूँ
सजदे सुकून-ऐ-दिल के लिए कितने कर लिए
अल्फाज़ धोका दे गए जब आखिरश हमें
हमने भी उम्र भर के लिए होंठ सी लिए

2 comments:

Shastri said...

"अल्फाज़ धोका दे गए जब आखिरश हमें
हमने भी उम्र भर के लिए होंठ सी लिए "

अरे, ऐसी जल्दी क्या थी???



-- शास्त्री जे सी फिलिप

-- हिन्दी चिट्ठाकारी अपने शैशवावस्था में है. आईये इसे आगे बढाने के लिये कुछ करें. आज कम से कम दस चिट्ठों पर टिप्पणी देकर उनको प्रोत्साहित करें!!

शोभा said...

ंजिल नहीं थी कोई मगर गामज़न हुए
ख़ुद राह चुन के तेरी तमन्ना लिए हुए
फिर साया मेरा देके दगा चल दिया किधर
हम आईने को तकते रहे जाने किस लिए
दिलदार ने भुला दिया पर हमने उसको यूँ
सजदे सुकून-ऐ-दिल के लिए कितने कर लिए
बहुत अच्छे . बधाई