Monday, September 8, 2008

"कैसे भूल जाए"

सीमा गुप्ता


जिन्दगी की ढलती शाम के ,
किसी चोराहे पर,
तुमसे मुलाकात हो भी जाए...
"वो दर्द गम",
तेरे लिए जो सहे मैंने,
उनको दिल कैसे भूल जाए

1 comment:

"SURE" said...

काव्य लेखन में आपने एक ऐसा मुकाम हासिल कर लिया है जहाँ पर पहुँच कर आप में भावों को शब्दों का जामा पहना कर दुनिया को असमंजस में डालने की सक्षमता आ गई है और पढने वाले क्या कल्पना है क्या सत्यता है में कोई अंतर न कर सकें. कईयों को लगता है की आपकी कविता का केंद्र बिंदु आपकी अपनी जिंदगी होगी ....पर मुझे तो ऐसा ही लगता है की आप ने जो कहा है वह मेरी भी कहानी है .. आप की भी हों सकती है ..और हर पाठक की कहानी है ......कविता में व्यक्तिक व्यवहार दिखना उसकी कलात्मकता हों सकती है पर सार्वभौमिकता होना उसका सच्चा गुण होता है .....एक और अच्छी रचना पढ़वाने के लिए धन्यवाद