Tuesday, September 23, 2008

तलब

सीमा गुप्ता

ख़ुद को आजमाने की एक ललक है ,

एक ग़ज़ल तुझ पे बनाने की तलब है...

लफ्ज को फ़िर आसुओं मे भिगो कर,

तेरे दामन पे बिछाने की तलब है ...

आज फ़िर बन के लहू का एक कतरा,

तेरी रगों मे दौड़ जाने की तलब है ...

अपने दिल-ऐ-दीमाग से तुझ को भुलाकर,

दीवानावार तुझको याद आने की तलब है...
दम जो निकले तो वो मंजर तू भी देखे,
रुखसती मे तुझसे नजर मिलाने की तलब है...

2 comments:

योगेन्द्र मौदगिल said...

अच्दी कविता....
लेकिन निरन्तरता आवश्यक...
शुभकामनाएं...

Yogesh said...

likhte to hum bhi hain kabhi kuchh to kabhi kuchh

magar ab to aapki tarah likhne ki talab hai....


Bahut hi sundar....

Congrats !!