Monday, September 22, 2008

कानों में बारूद डाल विस्फोट करुँगा.

*** राजीव रंजन प्रसाद

कानों में बारूद डाल विस्फोट करूँगा
आहत हो, बेदर्द मगर मैं चोट करूँगा॥
दरिया का पानी घाटी गहरा करता है,
किंतु किनारे वहीं काटता जहाँ जमीं समतल है
गरज गरज कर मेघ मरुस्थल से कहते हैं
जंगल सदा बहार देख कर हम झरते हैं
करवट देखी, ऊँट कहाँ लेटा फिर बैठे,
भीड़ बना कर, भेड़ साथ मिल कर चरते हैं
रंगे सियारों की बस्ती में बकरी बोली,
मै हूँ जिंटलमैन नाम मैं “गोट” करूँगा ।
कानों में बारूद डाल विस्फोट करूँगा
आहत हो, बेदर्द मगर मैं चोट करूँगा॥
खरगोशों के दाँत गिनो और “भरत” कहा लो
लोहे फेंको, चने रखे हैं, वही चबा लो
बीच सड़क पर हिजड़े ताली पीट रहे हैं
सौ रुपये का नोट खरच कर खूब दुआ लो
भूखे रह कर भजन करोगे, हे गोपाला!!
व्रत रक्खो, फल खाओ, छककर मालपुआ लो
दुश्सासन जन नायक है बोला, दुस्साहस
गाँधी के तीनों बंदर की ओट करुँगा ।
कानों में बारूद डाल विस्फोट करूँगा
आहत हो, बेदर्द मगर मै चोट करूँगा॥
अगर सोच के हाथों भर भर चूड़ी डालो
हर जलसे में उसे रिसेप्शन थमा सकोगे
मछली जल की रानी है, सो पानी रखना
अगर शिराओं ही में सारा, बहा न दोगे
पैरों में पाजेब डाल कर भांड़ नाचते
जनरेशन है नयी, सबेरों कहाँ छुपोगे?
टेढ़ा आँगन, टूटी है दीवार, खुली छत
दारू की इक बोतल पर मैं वोट करूँगा
कानों में बारूद डाल विस्फोट करूँगा
आहत हो, बेदर्द मगर मैं चोट करूँगा॥
परबत के सीने से सोते फूट पड़ेंगे
तन कर बंद हुई एक मुट्ठी ही काफी है
अंगारों पर चलने वाले जादूगर हैं
खान कोयले की, केवल चिनगी काफी है
जड़ की बातें जड़ करती हैं गुलशन मेरे
नयी सोच है, अब गुल की टहनी काफी है
एक परिंदा पत्थर ले कर उड़ा जा रहा
कहता है सूराख आसमा में कर दूँगा
कानों में बारूद डाल विस्फोट करूँगा
आहत हो, बेदर्द मगर मैं चोट करूँगा॥

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