Monday, September 29, 2008

वाडमय परिवार की ओर आप सभी को ईद की शुभकामनाएं .

हवा

सीमा गुप्ता


ये हवा कुछ ख़ास है, जो तेरे आस पास है,
मुझे छू, मेरा एहसास कराने चली आई ये हवा।
सारी रात मेरे साथ आँसुओं में नहाके,
मेरे दर्द की हर ओस को मुझसे चुराके,
मेरे ज़ख़्मों का हिसाब तेरे पास लाई ये हवा,
ख़ामोश तन्हा से अफ़सानों को अपने लबों पे लाके,
मेरे मुरझाते चेहरे की चमक को मुझसे छुपाके,
भीगे अल्फ़ाज़ों को तुझे सुनाने चली आई ये हवा,
ये हवा कुछ ख़ास है, जो तेरे आस पास है।
तेरे इंतज़ार में सिसकती इन आँखों को सुलगाके,
कुछ तपती झुलसती सिरहन मे ख़ुद को भीगाके,
जलते अँगारों से तुझे सहलाने चली आई ये हवा,
ये हवा कुछ खास है जो तेरे आस पास है।
मुझे ओढ़ कर पहन कर ख़ुद को मुझ में समेटके,
मुझे ज़िन्दगी के वीरान अनसुलझे सवालों मे उलझाके,
मेरे वजूद को तुम्हें जतलाने चली आई ये हवा,
ये हवा कुछ ख़ास है जो तेरे आस पास है

Sunday, September 28, 2008

इन्तहा-ऐ-मोहब्बत

सीमा गुप्ता

इन्तहा-ऐ-मोहब्बत में ,
सहरा मे बसर हो जाएगा...
ये असरा-ऐ-जूनून लेकर ,
की वो दरिया है इश्क का,
कभी तो उतर आएगा ...

Friday, September 26, 2008

पहचान

सीमा गुप्ता


नाम से हुई पहचान हमारी ,
या हमसे नाम का उन्वान हुआ,

बडी पशोपेश मे रही जिन्दगी,

क्या आगाज़ हुआ और,

क्या अंजाम हुआ ???

Thursday, September 25, 2008

तुम कहाँ थे?

राजीव रंजन प्रसाद

जब नेता बिक रहे थे
विधान सभा में फेकी जा रही थी माईकें
टीवी पर बिना पतलून के दिखाई जा रही थी खादीगिरि
"उनके" इशारों पर हो रहे थे एनकाउंटर्स
जलाये जा रहे थे मुहल्ले
तुम कहाँ थे?
मैं कोई सिपहिया तो हूँ नहीं
कि लोकतंत्र के कत्ल की वजह तुमसे पूछूं
मुझे कोई हक नहीं कि सवाल उठाऊं तुम्हारी नपुंसकता पर
लेकिन आज बोरियत बहुत है यार मेरे
मिर्च-मसाले सा कुछ सुन लूं तुम ही से
टाकीज में आज कौन सी पिक्चर नयी है?
तुम्हारी पुरानी गर्लफ्रेंड के
नये ब्वायफ्रेंड की दिलचस्पी लडको में है?
कौन से क्रीकेटर नें फरारी खरीदी?
कौन सा बिजनेसमेन देश से फरार है?
बातें ये एसी हैं, इनमें ही रस है
देश का सिसटम तो जैसे सर्कस है
अब कोई नहीं देखता....
मेरे दोस्त, किसी बम धमाके में
अपने माँ, बाप, भाई, बहन को खो कर
अगर चैन की नींद सोनें का कलेजा है भीतर
तो मत सोचो,
सिगरेट से सुलगते इस देश की कोई तो आखिरी कश होगी?
उस रोज संसद में फिर हंगामा हुआ था
उस रोज फिर बहस न हुई बजट पर
मैं यूं ही भटकता हुआ सडक पर जाता था
कि फेरीवाले नें कहा ठहरो “युवक”
यह भेंट है रखो, बाँट लो आपस में
कहता वह ओझल था, आँखों से पल भर में
खोला जब डब्बे को, हाँथों से छूट गया
बिखर गयी सडक पर चूडियाँ चूडियाँ...

मेरी उम्मीदों को नाकाम ना होने देना

सीमा गुप्ता

ज़िंदगी की उदास राहों में,

कोई एक राह तो ऐसी होगी,

तुम तक जो मुझे लेके चली आयेगी ...

इन बिखरते ओर सम्भालते हुए लम्हात में ,

एक कोई लम्हा भी तो ऐसा होगा,

तेरी खुशबू मुझे महका के चली जायेगी........

ये मोहब्बत के जूनून का ही असर हो शायद ,

तेरे आने की ही आहट कुछ ऐसी होगी,

मेरी साँसों की जो रफ़्तार बढ़ा जायेगी...........

मेरी पल पल की दुआओं में,

कोई एक दुआ तो होगी,

तेरे दरबार में मकबूल करी जायेगी.......

तूने जो मेरी मोहब्बत के लिये होंगे लिखे,

उन्हीं फूलों से एक बार ज़रूर,

खुशबुओं से मेरी आगोश भरी जायेगी........

मैने आवाज़ दुआओं की उठा रक्खी है,

तेरे दरबार में उम्मीद सजा रखी है,

"मेरी उम्मीदों को नाकाम ना होने देना"

Wednesday, September 24, 2008

वाडमय का अगला आयोजन

वाडमय का अगला आयोजन - नासिरा शर्मा पर केन्दित अंक होगा . रचनाये आमंत्रित है . 30 नवम्बर 2008 तक रचनाओं पर विचार होगा .धन्यवाद
अधिक जानकारी के लिये सम्पर्क करें.
Dr. Firoz Ahmad
Editor- Vangmaya Patrika
B-4, Liberty Homes,
Abdullah College Road
Civil Lines,
Aligarh, 202002
India
ph.no.91 941 227 7331

ये हवाएं तेरी ज़मीन से आई थी

Poornima Chaturvedi


ये हवाएं तेरी ज़मीन से आई थी
मेरी मिट्टी मे नही था बेवफा होना

मेरे घर की तासीर कड़वी ही सही, मगर
मैंने सिखा नही था मिश्री से ज़हर होना

ढूंढते कोई और बहाना दूर होने का
मुझे तो आता ही नही था तुझसे ख़फा होना


ये वक्त का तकाज़ा था या तादीर मेरी
पानी मे लिखा था मेरा धुंवा होना


अब मैं मैखाने के जानिब ही जाऊंगा
बहुत हो चुका अब मेरा ख़ुदा होना

खेल ही खेल मे हालात बदल जाएंगे
हमको मालूम न था यूँ दाना होना

दिल की हसरत निगाहों से कही थी हमने
उल्फत ने जाना नही था अभी ज़ुबां होना

वो बात...

राजीव रंजन प्रसाद
वो बात
जो एक नदी बन गयी
क्या तुमने कही थी?
घमंड से आकाश की फुनगी को
एक टक ताक कर
sतुम पत्थर की शिलाओं को परिभाषा कहती हो
हरी भरी उँची सी, बेढब पहाडी...
कितना विनम्र था वो सरिता का पानी
पैरों पर गिर कर और गिड़गिड़ा कर
निर्झर हो गया था..
तुम कब नदी की राह में
गोल-मोल हो कर बिछ गये
क्या याद है तुम्हें?
धीरे-धीरे रे मना
धीरे सब कुछ होय
चिड़िया चुग गयी खेत
अब काहे को रोय?
अहसास के इस खेल में
जब उसकी पारी हो गयी
सरिता आरी हो गयी..
दो फांक हो गये हो
बह-बह के रेत हो कर
उस राह में बिछे हो, कालिन्द की मानिन्द
जिस पर कदम रखे गुजरा किये है
वो याद जो एक सदी बन गयी
वो बात जो एक नदी बन गयी...

Tuesday, September 23, 2008

तलब

सीमा गुप्ता

ख़ुद को आजमाने की एक ललक है ,

एक ग़ज़ल तुझ पे बनाने की तलब है...

लफ्ज को फ़िर आसुओं मे भिगो कर,

तेरे दामन पे बिछाने की तलब है ...

आज फ़िर बन के लहू का एक कतरा,

तेरी रगों मे दौड़ जाने की तलब है ...

अपने दिल-ऐ-दीमाग से तुझ को भुलाकर,

दीवानावार तुझको याद आने की तलब है...
दम जो निकले तो वो मंजर तू भी देखे,
रुखसती मे तुझसे नजर मिलाने की तलब है...

Monday, September 22, 2008

कानों में बारूद डाल विस्फोट करुँगा.

*** राजीव रंजन प्रसाद

कानों में बारूद डाल विस्फोट करूँगा
आहत हो, बेदर्द मगर मैं चोट करूँगा॥
दरिया का पानी घाटी गहरा करता है,
किंतु किनारे वहीं काटता जहाँ जमीं समतल है
गरज गरज कर मेघ मरुस्थल से कहते हैं
जंगल सदा बहार देख कर हम झरते हैं
करवट देखी, ऊँट कहाँ लेटा फिर बैठे,
भीड़ बना कर, भेड़ साथ मिल कर चरते हैं
रंगे सियारों की बस्ती में बकरी बोली,
मै हूँ जिंटलमैन नाम मैं “गोट” करूँगा ।
कानों में बारूद डाल विस्फोट करूँगा
आहत हो, बेदर्द मगर मैं चोट करूँगा॥
खरगोशों के दाँत गिनो और “भरत” कहा लो
लोहे फेंको, चने रखे हैं, वही चबा लो
बीच सड़क पर हिजड़े ताली पीट रहे हैं
सौ रुपये का नोट खरच कर खूब दुआ लो
भूखे रह कर भजन करोगे, हे गोपाला!!
व्रत रक्खो, फल खाओ, छककर मालपुआ लो
दुश्सासन जन नायक है बोला, दुस्साहस
गाँधी के तीनों बंदर की ओट करुँगा ।
कानों में बारूद डाल विस्फोट करूँगा
आहत हो, बेदर्द मगर मै चोट करूँगा॥
अगर सोच के हाथों भर भर चूड़ी डालो
हर जलसे में उसे रिसेप्शन थमा सकोगे
मछली जल की रानी है, सो पानी रखना
अगर शिराओं ही में सारा, बहा न दोगे
पैरों में पाजेब डाल कर भांड़ नाचते
जनरेशन है नयी, सबेरों कहाँ छुपोगे?
टेढ़ा आँगन, टूटी है दीवार, खुली छत
दारू की इक बोतल पर मैं वोट करूँगा
कानों में बारूद डाल विस्फोट करूँगा
आहत हो, बेदर्द मगर मैं चोट करूँगा॥
परबत के सीने से सोते फूट पड़ेंगे
तन कर बंद हुई एक मुट्ठी ही काफी है
अंगारों पर चलने वाले जादूगर हैं
खान कोयले की, केवल चिनगी काफी है
जड़ की बातें जड़ करती हैं गुलशन मेरे
नयी सोच है, अब गुल की टहनी काफी है
एक परिंदा पत्थर ले कर उड़ा जा रहा
कहता है सूराख आसमा में कर दूँगा
कानों में बारूद डाल विस्फोट करूँगा
आहत हो, बेदर्द मगर मैं चोट करूँगा॥

Sunday, September 21, 2008

रूरू रू..... रूरू रू.... रूरू रू....

गरिमा तिवारी

लल्ला लल्ला लल्ला ल ला ला ल ला ला

जब हम तुम किसी दिन कही पर मिलेंगे
कुछ दिल से कहेंगे कुछ दिल से सुनेंगे
न सपनो की दुनिया, न परियों सी कहानी
नही चाहिये कोई ख्वाब सूहानी
हम तुम चलेंगे इक ऐसी गली मे
होगी जहाँ सिर्फ दिल की कहानी
न ख्वाबो मे आना, न दिल से तुम जाना
रहेंगे हम हरदम बनके दिल की निशानी
लल्ला लल्ला लल्ला ल ला ला
हम्मह हम्मह हम्मह ह्म ह्म ह


जब हम तुम किसी दिन कही पर मिलेंगे
कुछ दिल से कहेंगे कुछ दिल से सुनेंगे
होगी आँखो मे बाते, ना होंगी जुबानी
ना कोई शिकायत ना रूसवा कहानी
ना लेना, ना देना, ना ही कोई वादा
होगी मुहब्बत दिल से सीधी साधी
ना रस्मो के बन्धन, ना ही कच्चे धागे
ना ही टूटने का कोई डर हो आगे

रूरू रू... रूरू रू.... रूरू रू

Saturday, September 20, 2008

पधारो म्हारे देस...

राजीव रंजन प्रसाद

बालमवा..पधारो म्हारे देस...
आदम ढूंढो, आदिम पाओ
रक्त पिपासु, प्यास बुझाओ
मेरी माँगें, तेरी माँगे
खींचे इसकी उसकी टाँगे
मेरा परिचय, मेरी जाती
छलनी कर दो दूजी छाती
नेताजी का ले कर नारा
गुंडागर्दी धर्म हमारा
हमें रोकने की जुर्ररत में
खिंचवाने क्या केस

पधारो म्हारे देस..
किसका ज्यादा चौडा सीना
मैं गुज्जर हूँ, वो है मीणा
दोनों मिल कर आग लगायें
रेलें रोकें बस सुलगायें
कितना अपना भाईचारा
मिलकर हमने बाग उजाडा
बीन जला दो, धुन यह किसकी
भैंस उसी की लाठी जिसकी
मरे बिचारे आम दिहाडी
गोली के आदेस

पधारो म्हारे देस..
ईंट ईंट कर घर बनवाओ
जा कर उसमें आग लगाओ
और अगर एसा कर पाओ
हिम्मत वालों देश जलाओ
अपनी पीडा ही पीडा है
भीतर यह कैसा कीडा है
अपनी भी देखो परछाई
निश्चित डर जाओगे भाई
बारूदों में रेत बदल दी
इसी काज के क्लेस

पधारो म्हारे देस...
जाग जाग शैतान जाग रे
आग आग हर ओर आग रे
जला देश परिवेश नाच रे
झूम झूम आल्हे को बाँच रे
इंसानों की मौत हो गयी
सोच सोच की सौत हो गयी
होली रक्त चिता दीवाली
गुलशन में उल्लू हर डाली
हँसी सुनों, हैं सभी भेडिये
इंसानों के भेस
पधारो म्हारे देस...
केसरिया बालमवा.........!!!

खुदगर्ज

सीमा गुप्ता

उसकी खैरियत की ख़बर हो जाती मुझको,
एक बार अगर मेरे हालत का जयाजा लेता...
बडा ही "खुदगर्ज" रहा था वो हर तकाजे मे,
"मुझे गुमान हो उसकी सलामती का भी "
कैसे मगर इतना भी वो मेरा एहसान लेता???

Friday, September 19, 2008

पुस्तक पर चर्चा

पुस्तक पर चर्चा
हिन्दी साक्षात्कार उद्भव और विकास नामक पुस्तक के सम्पादक डा. एम. फीरोज अहमद . विवेकानंद पी.जी. कालेज के हिन्दी प्रवक्ता इकरार अहमद ने विस्तार से इसका वर्णन किया. उनका कहना था कि इस तरह की पहली पुस्तक है जिसमें सैद्धान्तिक एवं व्यवहारिक पक्ष को लेकर लिखा गया है जिसमें सैद्धान्तिकी पर बहुत सारे पठनीय आलेख ही नहीं बहुत सारे साक्षात्कार भी एक साथ है. शिवकुमार मिश्र, काशीनाथ, जाबिर हुसेन,नासिरा शर्मा और मधुरेश के साक्षात्कार बहुत अच्छे है.धर्म ज्योति कालेज के प्राचार्य डा. सर्वोत्तम दीक्षित ने कहा कि यह पुस्तक बहुमूल्य है ही साहित्य के अध्येताओं एवं शोधकर्ताओं के लिये यह एतिहासिक दस्तावेज का काम करेगी.इसी कालेज के सचिव डा. धर्मेन्द्र सिहं ने अपने वक्तव्य में कहा हिन्दी के साक्षात्कार विधा के सिद्धान्तों मान्यताओं एवं उद्भव और विकास की विस्तृत जानकारी देकर इस पुस्तक ने ध्यान आकृष्ट किया है . मथुरा से आये युवा कहानीकार एम.हनीफ. मदार ने इस पुस्तक पर चर्चा करते हुए कहा कि इसमें साक्षात्कारों की विविधता है. इसमें लोक साहित्य ,कहानी,शायरी आदि लेखकों के तो साहित्यिक साक्षात्कार है ही स्त्री विमर्श, दलित विमर्श एवं उत्तर आधुनिकता जैसे ज्वलंत मुद्दों पर भी साक्षात्कार प्रस्तुत किये गये है.इस पुस्तक के सम्पादक को मैं धन्यवाद देता हूं कि साहित्यकारों के साक्षात्कार इकट्ठा करके साहित्य की अनेक उलझी हुई गुत्थियों को सुलझे का प्रयास किया है जो काफी उपयोगी है .इस गोष्ठी में इन विद्वानों के अलावा डा. प्रवीन शर्मा , डा. पुष्पेन्द्र, डा.रामवीर शर्मा, एम.एस. उपाध्याय, रविकान्त महेश्वरी. दिलीप कुमार ,प्रदीप सारस्वत आदि लोग उपस्थित थे .
आलेख
डॉ० मेराज अहमद साक्षात्कार की भूमिका
प्रो० रमेश जैन साक्षात्कार
डॉ० विष्णु पंकज हिन्दी इन्टरव्यू : उद्भव और विकास
डॉ० हरेराम पाठक हिन्दी साक्षात्कार विधा : स्वरूप एवं सम्भावनाएं
अशफ़ाक़ कादरी साहित्य एवं मीडिया में साक्षात्कार - एक दृष्टि
विज्ञान भूषण प्रिंट एवं इलेक्ट्रॉनिक मीडिया से संबंधित
साक्षात्कार की सैद्धान्तिकी में अन्तर
दिनेश-श्रीनेत हमारे समय में नचिकेता का साहस
साक्षात्कार
डॉ० शिवकुमार मिश्र डॉ० सूर्यदीन यादव
प्रो० मैनेजर पाण्डेय देवेन्द्र चौबे, अभिषेक रोशन, रेखा पाण्डेय
एवं उदय कुमार
जाबिर हुसैन रामधारी सिंह दिवाकर
नासिरा शर्मा डॉ० फीरोज अहमद
काशीनाथ सिंह रामकली सराफ
मधुरेश साधना अग्रवाल
ओमप्रकाश वाल्मीकि डॉ० शगुफ्ता नियाज
कंवल भारती अंशुमाली रस्तोगी
डॉ० अर्जुनदास केसरी डॉ० हरेराम पाठक
चित्रा मुद्गल श्याम सुशील
मलखान सिंह सिसौदिया डॉ० राजेश कुमार
शहरयार डॉ० जुल्फिकार
प्रो० जमाल सिद्दीकी डॉ० मेराज अहमद एवं डॉ० फीरोज अहमद
एक साधारण होटल वाला डॉ० मेराज अहमद

ब्राँच कार्यालय : ई-३, अब्दुल्लाह क्वाटर्स,
लालबहादुर शास्त्री मार्ग,
अमीर निशां, अलीगढ़-२०२००२
प्रथम संस्करण : २००8
मूल्य : २००/- रुपए
मुद्रक : नमवान प्रिंटर्स, अलीगढ़

ख्वाबों की तावीर

राही मासूम रजा पर आधारित अंक
वाडमय पत्रिका
मूल्य 70 रूपये india
अपनी प्रति सुरक्षित कराये
बी-4 लिबर्टी होम्स
अब्दुल्लाह कालेज रोड
अलीगढ 202002
09412277331
सम्पादकीय
कहानी
प्रताप दीक्षित : राही मासूम रजा की कहानियाँ: मनुष्य के ख्वाबों की तावीर
राही मासूम रजा : एक जंग हुई थी कर्बला में
राही मासूम रजा : सिकहर पर दही निकाह भया सही
राही मासूम रजा : खुशकी का टुकड़ा
राही मासूम रजा : एम०एल०ए० साहब
राही मासूम रजा : चम्मच भर चीनी
राही मासूम रजा : खलीक अहमद बुआ
राही मासूम रजा : सपनों की रोटी
आलेख/लेख

राही मासूम रजा : फूलों की महक पर लाशों की गंध
राही मासूम रजा : रामायण हिन्दुस्तान के हिन्दुओं की धरोहर है?
राही मासूम रजा : नेहरू एक प्रतिमा
राही मासूम रजा : शाम से पहले डूब न जाये सूरज
शिव कुमार मिश्र : राही मासूम रजा
कुरबान अली : हिन्दोस्तानियत का सिपाही
हसन जमाल : राही कभी मेरी राह में न थे
सग़ीर अशरफ़ : राष्ट्रीय एकता के सम्वाहकः राही
बाकर जैदी : राही और १८५७
मेराज अहमद : राही का रचनात्मक व्यक्तित्व
मूलचन्द सोनकर : रही मासूम रजा की अश्लीलता?
जोहरा अफ़जल : राही मासूम रजा और आधा गाँव
आदित्य प्रचण्डिया : मैं एक फेरी वाला
सन्दीप कुमार : आधा गाँव एवं टोपी शुक्ला में साम्प्रदायिकता
कनुप्रिया प्रचण्डिया : राही और आधा गाँव
साक्षात्कार/यादें

राही मासूम रजा से सुदीप की अंतरंग बातचीत
राही मासूम रजा के साथ विश्वनाथ की लम्बी बातचीत
नीरज, क़ाजी अब्दुस्सत्तार और शहरयार की यादों के राहीः प्रेम कुमार
मासूम से राही मासूम रजा तक : एम० हनीफ़ मदार
नैयर रजा से प्रेमकुमार की बातचीत
यादों के दायरे
सिनेमा

राही मासूम रजा : यथार्थ लेकिन सेंसर?
राही मासूम रजा : दिलीप कुमारः एक वह हैं जिन्हें तस्वीर बना आती है
राही मासूम रजा : फ़िल्मकार में सामाजिक चेतना नहीं है
राही मासूम रजा : फ़िल्म की भाषा
यूनुस ख्नान : जिन्दगी को संवारना होगाः राही का फ़िल्मी सफर
सिदेश्वर सिंह : आधा गाँव के लेखक का फ़िल्मी सफर
फ़ीरोज ख़ान : राही की कुछ महत्त्वपूर्ण फ़िल्में

पिता नहीं आए

रजनी मेहता

लेने गये थे मेरे लिये खिलौना,
पर पिता नहीं आए!
जिनकी आंखों के कहलाते थे हम तारा,
उनसे छूट न जाये साथ हमारा,
दादा-दादी के जो थे सहारा,
जिनके आने से रोशन होता था घर हमारा,
पिता नहीं आए!
पिता नहीं आए पर आई उनकी लाश,
जिस बात पर होता नहीं मुझे विश्वास!
लेने गये थे मेरे लिये खिलौना,
पर पिता नहीं आए!

Thursday, September 18, 2008

मुलाकात

सीमा गुप्ता

चलो कागज के पन्ने पर ही आज ,
छोटी सी हसीं मुलाकात कर लें
कुछ पूरे ,कुछ अधूरे लफ्जों मे फ़िर ,
"आमने सामने बैठ कर बात कर लें "
कुछ अपनी कहें , कुछ तुमसे सुने,
दिल की बातें बे -आवाज़ सही,
" एक साथ कर लें "
"आमने सामने बैठ कर बात कर लें"
युग एक बीता जो हम साथ थे,
ना जाने कब से मिलने को बेताब थे,
इस मिलन की घड़ी को आबाद कर लें ,
आमने सामने बैठ कर बात कर
लें वो बेकल पहर आ गया है ,
मुझे सामने तू नज़र आ गया है,
एक ज़रा देर काबू में जज्बात कर लें
"आमने सामने बैठ कर बात कर लें"
एक दूजे में खो जाएँ आओ चलो,
फिर ना बिछरे कभी ऐसे मिल जाएं चलो,
अब तो पूरी अपनी "मुलाकात " कर लें ,
"आमने सामने बैठ कर बात कर लें"

Tuesday, September 16, 2008

इंतजार का लम्हा

सीमा गुप्ता

इंतजार का लम्हा यूँ भी,
क्या किसी ने देखा होगा
बेखुदी मे सीने की जगह,
"दिल"
जब आंख मे धड़का होगा... ?????

Monday, September 15, 2008

किसको पता

सीमा गुप्ता

कोई गोली कहाँ चलेगी , किसको पता,
कोई बम्ब कहाँ फटेगा, किसको पता,

आज अभी तुम मांग सजा लो,
बिंदीया लगा लो,
कब ये मांग सूनी हो जाए किसको पता???

हरी-हरी ये कांच की चूडी जो मन भाए,
गोरे-गोरे हाथों पर तुम इन्हे सजा लो,
कब ये हाथ सुने हो जायें किसको पता???

अपने बाबा की गोदी पर आज ही चढ़कर,
अपने सारी की सारी जिद्द पुरी कर लो,
कब तुम भी लावारिस बन जाओ किसको पता???

नन्ही आँखों से सपना मत देखो ,
की तुम पायलट बनोगे,
कब नीला अम्बर शमशान बन जाए किसको पता???

आओ हम सब मिलकर कुछ ऐसा कर जायें,
हम हिन्दुस्तानी नही झुकेंगे- नही झुकेंगे,
चल जाएगा सब को पता -सब को पता"

वहीं पर तुम जहाँ हो काग़जों पर

सीमा गुप्ता

वहीं पर तुम जहाँ हो काग़जों पर,
वहीं मैं आजकल रहने लगा हूँ .......
जिगर के दिल के हर एक दर्द से मैं,
रवां दरिया सा इक बहने लगा हूँ .......
सुना दी आईने ने दिल की बातें,
तुम्हे मैं आजकल पहने लगा हूँ .........
तुम्हारे साथ हूँ जैसे अज़ल से,
तुम्हारी बात मैं कहने लगा हूँ........

सुनी सीमा हमारे दिल की बातें ???
तुम्हीं से तो मैं सभी कहने लगा हूँ..........

Sunday, September 14, 2008

हिन्दी दिवस की शुभ कामनाएं

हिन्दी दिवस की शुभ कामनाएं

दुआ करे

सीमा गुप्ता
तजवीज़ कोई मुझ को वो क्यूँ कर सज़ा करे,

जो बात कहनी हो वो निगाहें मिला करे....
कब तक सुकून -ऐ -दिल के लिये वो मकान करे,

घर को मिटा के मुझ को मगर बे-अमां करे....

है तो सदा बुलंद मगर कियूं सुनाई दे,

दिल से निकल रही हो जो उसके दुआ करे....
दागे फिराक देके वो गुलचीन चला गया,

किसके लिये तू बाग़ अब आशियाँ करे....

'सीमा शहर में हो कोई जो सरफिरा बने ,

होगा वो किस गली में यह कैसे गुमान करे ,
झोली में मेरी डाल के हीरा किया करम,

दानी उसे बचाने की रब से दुआ करे..........

Saturday, September 13, 2008

आशनाई

सीमा गुप्ता





'नज़र से नज़र"
कभी मिलाई तो होती....
दिल की बात कभी हमसे भी,
बनाई तो होती....
क्यूँ कर रही शबे-फुरकत से'
आशनाई सारी रात.....
कभी मेरी तरह अंधेरों मे,
"आईने से आंख लडाई तो होती "

निगाहे-नाज़

सीमा गुप्ता

बेज़ारी जान की थी या,
किसी गम की गीरफ्तारी थी,
अंधेरी रात मे भी,
" रोशन रूखे- यार देखा"
शायद ये निगाहे-नाज़ की बीमारी थी

(बेज़ारी - उदासीनता )
(रूखे- यार - प्रेमिका का चेहरा)
(निगाहे-नाज़ - चंचल आँख)

Friday, September 12, 2008

आंख भर के

सीमा गुप्ता


ना आंख भर के देखा ही किए ,
ना सरगोशीयों की कोई बारात थी ,

मुद्दत से जिसकी तडपते रहे

क्या ये वही मुलाकत थी ...????

हो जाने दो

सीमा गुप्ता

ना छुपाओ अपने वजूद को इस जमाने से ,
की ,दुनिया मे ख़ुद की पहचान हो जाने दो.

आईना हूँ , तेरा त्स्सब्बुर नज़र आऊंगा ,
की , मुझे अपने अक्स मे एक बार ढल जाने दो.

मोहब्बत गुनाह ही सही, पर खूबसूरत तो है ,
की , इश्क मे आज अपने बदनाम हो जाने दो.

दिल की धड़कन , शोला -ऐ - एहसास ही सही
की , इस आग मे आज मुझको जल जाने दो.

हाँ, मोहब्बत है मुझसे , ये इकरार कर लो
की , अपने आगोश मे मुझको बिखर जाने दो .....

बिजली

सीमा गुप्ता

खो ना दूँ तुझको इस डर से तुझे कभी मैं पा न सका ,
चाहता रहा शीद्त्त से मगर तुझे कभी जता ना सका.

वीरान आँखों के समुंदर मे अपने आंसुओं को पीता रहा ,
दिल के दर्द की एक झलक भी मगर तुझे दिखा ना सका .

तेरा ख्याल बन कर बिजली और एक तूफान मुझे सताता रहा ,
इश्क मे जलने का सबब मगर तुझे कभी समझा ना सका .

तू बदनाम न हो जाए , मैं जमाने मे गुमनाम सा जीता रहा
लबों पे नाम तो था पर आवाज देकर तुझे बुला ना सका .

तु कभी गैर की न हो जाए ये ख्याल हर पल मुझे डराता रहा
शिकवा आज भी है इस डर से तुझे कभी अपना भी ना सका

उपर वाला बस बेदर्द हो गम की "बिजली" मुझपे ही गीराता रहा,
तुझसे जुदा होके भी अपना आशियाँ झुलसने से मैं बचा ना सका ……-

Thursday, September 11, 2008

हॉं मैं

Sanat Kumar Jain
वे कहते हैं
मै पलायनवादी हॅू, मै निराशवादी हूं
हॉ मैं वृक्षों के पत्तों के बीच
बहने वाली हवा की छुअन चाहता हूं
हॉ मैं गाय बैलों के खुरों से
पगडंडियों की उडती धूल चाहता हूं
हां मै पहली बरसा की बॅदों और
धूल के सानिय से उठती गंध चाहता हूं
हॉ मैं महॅए की महक और
आम के बौर की गंध चाहता हूं
हॉं मैं चिडियों का कलख चाहता हूं
हॉ मैं सांझ में उडते पंछियों का बादल चाहता हूं
हॉ मैं पलों के जीवन का काई पल खोना नहीं चाहता हूं
हॉं मैं पलायनवादी हूं
हॉं मैं निराशावादी हूं

जीवाणु अनंतकाली

Sanat Kumar Jain
कौन सा जीवाणु तेरे शरीर में है अंनतकाल से
और अब तक जागृत है
मैं तो इसे कहता हूं
जीवाणु तो मुखौटा पहनने करता है मजबूर
और कहता है अपने से ही चेहरा छुपा
नकाबपोश जीवाणु
कहता है माया का तिलस्मी जाल ओढ़
तब मुझे मानसिक शांति देगा
क्षितिज का सौदागर जीवाणु
मुद्रा की मुद्राओं में घुंघरूओं की झनक सुनाता है
सपनों का सौदागर जीवाणु
गरीबी का हल
आंखों पर नोटों की पट्टी बांधकर बताता है
अभियंता जीवाणु
अपनी पीड़ा का निदान
दूसरों की ज्यादा पीडा में दिखाता है
पीडाघरी जीवाणु
अपनी खुशी बढ़ाने के लिए
चार दुखियारों को पैदा करना सीखता है खुशहाल जीवाणु
शायद इस जीवाणु का टीका
ईश्वर भी नहीं बना पाया

दरिया की कहानी

सीमा गुप्ता

चश्मे-पुरआब के आगे,
क्या होगी किसी दरिया की रवानी,
रु-ऐ-चश्मतर के आगोश मे पढ़ ले,
हर दरिया की कहानी
(रु-ऐ-चश्मतर- भीगी आंख)
(चश्मे-पुरआब- आंसू भरी आँख)

Wednesday, September 10, 2008

फर्जे-इश्क

सीमा गुप्ता



बेजुबानी को मिले कुछ अल्फाज भी अगर होते
पूछते कटती है क्यूँ आँखों ही आँखों मे सारी रात ..,


सनम-बावफा का क्या है अब तकाजा मुझसे ,
अपना ही साया है देखो लिए पत्थर दोनों हाथ ....


पेशे-नजर रहा महबूब-ऐ-ख्याल गोश-ऐ-तन्हाई मे,
आईना क्यूँ कर है लड़े फ़िर मुझसे ले के तेरी बात...


दिले-बेताब को बख्श दे अब तो सुकून-ऐ-सुबह,
दर्दे-फिराक ने अदा किया है फर्जे-इश्क सारी रात...



(सनम-बावफा - सच्चा-प्रेमी )
(पेशे-नजर - आँखों के सामने)
(गोश-ऐ-तन्हाई -एकांत)
(दर्दे-फिराक -विरह का दर्द)
(फर्जे-इश्क - प्रेम का कर्तव्य)

सीमा गुप्ता

परिचय-
11-10-1971 को अम्बाला में जन्मी कवयित्री सीमा गुप्ता ने अपनी पहली कविता 'लहरों की भाषा' तब ही लिख ली थी जब वो चौथी कक्षा की छात्रा थीं। यहीं से इन्हें लिखने की प्रेरणा मिली। वाणिज्य में परास्नातक कवयित्री सीमा गुप्ता नव शिखा पोली पैक इंडस्ट्रीज, गुड़गाँव में महाप्रबंधक की हैसियत से काम कर रही हैं। इनकी रचनाएँ 'हरियाणा जगत', 'रेपको न्यूज़' आदि जैसे कई समाचार पत्रों में कई बार प्रकाशित हो चुकी हैं। मुख्यरूप से ये दुःख, दर्द और वियोग आदि पर कविताएँ लिखती हैं, जिसका ये कोई कारण नहीं बता पाती हैं, बस्स खुद को सहज महसूस करती हैं।साहित्य से अलग इनकी दो पुस्तकें 'गाइड लाइन्स इंटरनल ऑडटिंग फॉर क्वालिटी सिस्टम' और 'गाइड लाइन्स फॉर क्वालिटी सिस्टम एण्ड मैनेज़मेंट रीप्रीजेंटेटीव' प्रकाशित हो चुकी हैं।
संपर्क-सीमा गुप्तामहा प्रबंधक, नव शिखा पोली पैक इंडस्ट्रीजप्लॉट नं॰ १९४, फेज़-१उद्योग विहार, गुड़गाँव- १२२००१

Tuesday, September 9, 2008

शबे-फुरकत

सीमा गुप्ता


" शबे-फुरकत थी ,
"और"

जख्म - पहलु में,

कोहे - गम ने की ,

शब- बेदारीयाँ हमसे...



(शबे फुरकत- विरह की रात ,
कोहे - गम- दुःख का पहाड़ ,
शब - बेदारीयाँ - रात को जागना )

Monday, September 8, 2008

मंजिल

सीमा गुप्ता


मंजिल नहीं थी कोई मगर गामज़न हुए
ख़ुद राह चुन के तेरी तमन्ना लिए हुए
फिर साया मेरा देके दगा चल दिया किधर
हम आईने को तकते रहे जाने किस लिए
दिलदार ने भुला दिया पर हमने उसको यूँ
सजदे सुकून-ऐ-दिल के लिए कितने कर लिए
अल्फाज़ धोका दे गए जब आखिरश हमें
हमने भी उम्र भर के लिए होंठ सी लिए

"कैसे भूल जाए"

सीमा गुप्ता


जिन्दगी की ढलती शाम के ,
किसी चोराहे पर,
तुमसे मुलाकात हो भी जाए...
"वो दर्द गम",
तेरे लिए जो सहे मैंने,
उनको दिल कैसे भूल जाए

Sunday, September 7, 2008

अमानत

सीमा गुप्ता



अमानत मे अब और खयानत ना की जाए ,
आहें-शरर -फीशां आज उन्हें लौटाई जाए...
हिज्र-ऐ-यार मे जो हुआ चाक दामन मेरा,
दरिया-ऐ-इजतराब उनके सामने ही बहाई जाए
(आहें-शरर -फीशां - चिंगारियां फैंकने वाली आहें
हिज्र-ऐ-यार - प्रेमी का विरह
दरिया-ऐ-इजतराब- बेचेनी का दरीया)

Saturday, September 6, 2008

तुम्हारी याद है

सीमा गुप्ता

एक तरफ़ तुम हो तुम्हारी याद है,
दूसरी जानिब ये दुनिया है कोई बरबाद है,
तीसरी जानिब कोई मासूम सी फरियाद है ....
वस्ल के लम्हों में भी तनहा रहे,
तुम को गुज़रे वक्त याद आते रहे,
तुम से मिल कर भी तो दिल नाशाद है ......
दर्द-ओ-गम की ताब जो न ला सके,
वो कहाँ दिल को कहीं बहला सके,
पास आकर भी तुम्हें ना पा सके,
इश्क में तेरे ये दिल बर्बाद है.......
एक तरफ़ तुम हो तुम्हारी याद है..............

सजा

सीमा गुप्ता


आज ख़ुद को एक बेरहम सजा दी मैंने ,
एक तस्वीर थी तेरी वो जला दी मैंने
तेरे वो खत जो मुझे रुला जाते थे
भीगा के आंसुओं से उनमे भी,
" आग लगा दी मैंने ..."

Friday, September 5, 2008

अच्छा था

सीमा गुप्ता

तेरी यादों में जल जाते तो अच्छा था,

शबनम की तरह पिघल जाते तो अच्छा था.


इन उजालों में मिले हैं वो दर्द गहरे,

हम अंधेरों में बदल जाते तो अच्छा था.


मेरी परछाईं से भी था शिकवा उनको,

ये चेहरे ही बदल जाते तो अच्छा था.


क्यों माँगा था तुझे उमर भर के लिए,

अपना ही सहारा बन जाते तो अच्छा था.


यूं बरसा के भी सावन प्यासा ही रहा,

हम ही समुंदर बन जाते तो अच्छा था.


क्यों संभाला था ख़ुद को एक मुकाम के लिए,

हम यूं ही टूट के बिखर जाते तो अच्छा था.
चाँद और सितारे तो नहीं मांगे थे हमने,

काश अपने भी मुकद्दर सँवर जाते तो अच्छा था

कतरा कतरा

सीमा गुप्ता
कतरा कतरा दरया देखा ,
कतरे को दरया में न देखा ,
लम्हा लम्हा जीवन पाया,
जीवित एक लम्हे को न पाया,
आओ हम दोनों मिलकर
एक लम्हे को जिंदा कर दें,
प्रेम प्रणव से जीवन भर दें

Thursday, September 4, 2008

जरूरी तो है

सीमा गुप्ता

मुझको मिले तेरा प्यार ये जरूरी तो है,
तेरे दिल पे हो मेरा इख्त्यार ये जरूरी तो है,
दर्द कितना भी सताये है, मुझे पर वो तेरा है,
तेरे गम मे हो मेरा दामन तार तार ये जरूरी तो है.
कोई भी एक पल तेरे बगैर सोचु भी तो मैं कैसे,
हर घड़ी हो तेरा मेरा साथ ये जरूरी तो है
जिसकी झलक पाने को सदयीओं से ये ऑंखें थमी हैं,
मैं करू उसका जिन्दगी भर इंतजार, ये जरूरी तो है.
तू है मेरी सांसों मे मुझे हर नब्ज कहती है,
मैं करूं तुझे हर पल टूट के प्यार ये जरूरी तो है.
ये इंतजार भी तेरा, ये आंसू भी तेरा, ये गम भी तेरा.....
ये प्यार भी तेरा , ये ऐतबार भी तेरा ये.............
फिर क्यों न करूं किस्मत से तकरार ,
"ये जरूरी तो है"

याद किया तुमने या नही

सीमा गुप्ता

यूँ ही बेवजह किसी से, करते हुए बातें,

यूँ ही पगडंडियो पर सुबह-शाम आते जाते

कभी चलते चलते रुकते, संभलते डगमगाते.

मुझे याद किया तुमने या नही जरा बताओ..


सुलझाते हुए अपनी उलझी हुई लटों को

फैलाते हुए सुबह बिस्तर की सिलवटों को

सुनकर के स्थिर करतीं दरवाजी आहटों को

मुझे याद किया तुमने या नही जरा बताओ..


बाहों कर करके घेरा,चौखट से सर टिकाके
और भूल करके दुनियाँ सांसों को भी भुलाके

खोकर कहीं क्षितिज में जलधार दो बुलाके

मुझे याद किया तुमने या नही जरा बताओ.

सीढ़ी से तुम उतरते , या चढ़ते हुए पलों में

देखुंगी छत से उसको,खोकर के अटकलों में

कभी दूर तक उड़ाकर नज़रों को जंगलों में

मुझे याद किया तुमने या नही जरा बताओ..


बारिश में भीगते तो, कभी धूप गुनगुनाते
कभी आंसुओं का सागर कभी हँसते-खिलखिलाते

कभी खुद से शर्म करते कभी आइने से बातें

मुझे याद किया तुमने या नही जरा बताओ..


तुमसे दूर मैने, ऐसे हैं पल गुजारे .

धारा बिना हों जैसे नदिया के बस किनारे..

बिन पत्तियों की साखा बिन चाँद के सितारे..

बेबसी के इन पलों में...

मुझे याद किया तुमने या नही जरा बताओ....

Wednesday, September 3, 2008

सुकून है

सीमा गुप्ता

एक अजब खुमार है , एक अजब जूनून है,
तुम अगर नही मिले ,मेरे दिल का खून है
तू ही बता मेरे मन हो क्या अब ऐसा जतन,
हम तुम थोडी देर के लिये कह सकें होके मगन
"सुकून है" "सुकून है" "सुकून है" "सुकून है"

बेखबर

सीमा गुप्ता
अचानक चुप हो जातें हैं
"वो इस कदर यूँ", "की'
"बेखबर" को
हमारी रुकी साँसों का
"ख्याल तक नही रहता"

तेरा ख्याल

सीमा गुप्ता
ख्याल भी तेरा,
" आज"
मुझे रुला ना सका ,
शरारा -ऐ-रंज का दिल से
कोई सौदा हुआ शायद
(शरारा -ऐ-रंज - दुःख की चिंगारी)

Tuesday, September 2, 2008

मलाना जहां हमारे कायदे कानून नहीं चलते

सूरज प्रकाश
हिमाचल की कुल्लू घाटी में मलाना नदी से सटी खूबसूरत पहाडियों पर लगभग 8500 फुट की ऊंचाई पर बसा मलाना गांव शहरी सभ्‍यता और आधुनिकता से कोसों दूर है। इदस गांव तक पहुंचने के लिए कम सये कम 15 किमी का ट्रैक करना पड़ता है।
इस गांव के बारे में कई किम्वदंतियां हैं। कहते हैं जब सिकंदर भारत पर हमला करने आया था तो उसके कुछ सैनिक उसकी सेना छोड़ कर भाग गए थे। इन्हीं भगोड़े सैनिकों ने मलाना नाम के गांव को बसाया था। उनके ग्रीक होने के कुछ पुष्ट प्रमाण भी हैं। लकड़ी के बने उनके अत्यन्त लेकिन कलात्मक मंदिरों में जो उकेरी हुई आकृतियां हैं, उनमें घुड़सवार सैनिक, हाथी, शराब पीते हुए सैनिक हैं, जिन्होंने फ्राकनुमा एक वस्त्र पहन रखा है। यह मूलतः उस युग के ग्रीक सैनिकों की पोशाक हुआ करती थी। साथ ही गांव वासियों के शरीर की बनावट, चेहरे-मोहरों में और गतिविधियों में भारतीयता का अभाव है। इसके अलावा कई लोगों और बच्चों की आंखे नीली हैं। कहा जाता है कि इन सैनिकों ने आसपास के गांवों की लड़कियों से शादी - विवाह किये और वे भेड़ें चराकर और गेहूं की खेती करके गुजर-बसर करने लगे। शुरू-शुरू में इन भगोड़े सैनिकों ने पहचान लिए जाने के डर से अपने आपको पूरी दुनिया से अलग रखा था। बाद में यही अलगाव उनका जीवन-दर्शन बन गया। एक किस्सा सम्राट अकबर के बारे में भी है। सुनते हैं कि किसी रोग से निजात पाने के लिए एक फकीर के कहने पर खुद अकबर पैदल चलकर मलाना के मंदिर गया और वहां अपनी तस्वीर वाली स्वर्ण मुद्राएं चढ़ाई। जब मैं वहांपहली बार गया था तो बातचीत के दौरान कई लोगों ने मुझे बताया कि वे मुद्राएं अभी भी मंदिर में सुरक्षित हैं। कहा तो यह भी जाता है कि सिकंदर के भगोड़े सैनिकों के अस्त्र-शस्त्र भी एक शस्त्रागार में सुरक्षित हैं, लेकिन अभी तक किसी ने देखा नहीं।दिलों में देवता का डर मलानावासी परशुराम के पिता जमदग्नि (जमलू) की पूजा करते हैं और उसके कोप से बहुत डरते हैं। मलाना मंदिर में गूर, पुजारी और कारदार के अलावा किसी भी गांव-वासी को प्रवेश की अनुमति नहीं है। बाहरी व्यक्ति तो मंदिर की दीवारों और पत्थरों तक को छू नहीं सकता। मंदिर में प्रवेश के लिए गूर बनना जरूरी है। कहा जाता है कि पूरे हिमाचल प्रदेश में जिस किसी भी व्यक्ति को सपने में जमलू देवता का आदेश मिले तो वह मलाना आकर वहां की पंचायत को बताए। यदि वह पंचायत के गूढ़ प्रश्नों का जवाब देकर पंचायत को संतुष्ट कर दे, तभी वह गूर बन सकता है। संसार का प्राचीनतम गणतंत्रमलानावासियों का अपना शासनतंत्र है, जो संसार के प्राचीनतम गणतंत्र के रूप में माना जाता है। उसमें हमारी लोकसभा और राज्‍यसभा की तरह चुनी हुई पंचायतें काम करती हैं। उनके ऊपर देवता का फैसला होता है, जिसमें कोई भी परिवर्तन की गुंजाइश नहीं होती। यदि किसी अपराध के पीछे दो आदमी शक के दायरे में हैं तो दोनों को नहलाकर देवदार के दो विशाल वृक्षों के नीचे चेहरा ढक कर खड़ा कर देते हैं। दोनों के सामने बंधी दो भेड़ों की जांघों को चीरकर उसमें जहर भरकर सिल दिया जाता है। जिस व्यक्ति के सामने वाली भेड़ पहले मर जाए, वही दोषी करार दिया जाता है। दोनों भेड़ों के मर जाने पर उनका मांस निकालकर पूरे गांव में बांट दिया जाता है। किसी भी सजा के फैसले के लिए पंचायत विशेष रूप से बनाए गए चबूतरे का ही इस्तेमाल करती है। इन्हें भी कोई छू नहीं सकता। अजीबोगरीब आदतेंमलाना गांव के लोग अनपढ़, काफी हद तक जाहिल होने के बावजूद श्रेष्‍ठता की भावना के इतने पीडित हैं कि पूरी दुनिया को अछूत और अपने से हीन समझते हैं। पिछले कुछ समय से वहां के पोर्टर भेड़ें चराने के सिलसिले में कुल्लू, मंडी और बिलासपुर तक हो आएं हैं। इसलिए वे दूसरों का छुआ-पकाया खा लेते हैं। वरना आम तौर पर आलम यह है कि उन्हें पैसे देते समय उनके हाथों में पैसे गिराने पड़ते हैं, और वे तो जमीन पर फेंककर पैसे देते हैं। वे इस बात के प्रति बहुत सतर्क रहते हैं कि कोई बाहरी व्यक्ति उनसे छू न जाए। इसी वजह से सरकार द्वारा गांव में बनाये गये आयुर्वेदिक दवाखाने में भी नहीं जाते क्योंकि वहां कार्यरत डॉक्टर बाहर का है। इसी मनोवृति के चलते वहां सरकार अब तक बिजली के कनेक्शन नहीं करवा पाई। अलबत्‍ता आपको गांव भर में सोलर लाइट के लिए लगाये गये खम्‍बे जहां तहां नजर आ जायेंगे। यहीं नहीं, लाखों रुपये के पाइप पानी के कनेक्शन के इन्तजार में पड़े हैं।प्रीत की रीत निरालीमलाना गांव मंदिर के दोनों ओर बसा हुआ है। मंदिर के दांई ओर के निवासी बांई ओर के निवासियों से ही विवाह कर सकते हैं। यदि किसी लड़के को लडकी पसंद आ जाए तो वह लडकी के मां-बाप से सीधे प्रस्ताव कर सकता है और लड़का जंच जाने पर अपनी हैसियत के अनुसार पांच-सात सौ रुपये देकर लड़की ले जा सकता है। वहां की महिलाएं बहुत मेहनती और सुंदर होती हैं। उनके चेहरों पर एक अजीब-सी चमक होती है। महिलाओं की तुलना में आदमी अधिक आलसी और कामचोर होते हैं। वे बैठकर ताश खेलते हैं, जो उनका प्रिय शगल है। अमूमन वे एक-दूसरे की बीवी को फुसलाकर अपने घर ले आते हैं। वह औरत भी बिना किसी औपचारिकता के अपने बच्चों को पहले वाले पति के जिम्मे छोड़ आती हैं। यह बात इतनी सहज और साधारण मानी जाती है कि लोग दस-पंद्रह पत्नियां तक बदल लेते हैं।शिक्षा में सिफरगांव में नाम रखने की परम्परा बड़ी अजीब है। सोमवार को पैदा होने वाला सोमू, मंगलवार को मंगलू और शुक्र को शुक्रू के नाम से जाना जाता है। पढ़ने-लिखने के नाम पर सब कुछ शून्य है। हिमाचल के हर गांव में स्कूल और बिजली है। बेशक गांव में सरकारी स्‍कूल है और अब बच्‍चे मिल जुल कर पढ़ने भी लगे हैं। गांव में तब 400 बच्‍चे तो रहे ही होंगे लेकिन पहली से पांचवी तक की एक साथ चल रही कक्षा में मुश्किल से तीव बच्‍चे पढ़ते दिखायी दिये। मैं जब वहां गया था तो गांव के इकलौते हाइस्‍कूल पास युवक से मिला था। पूछने पर मास्टर तुलसीराम जी ने बताया कि देवता के डर से कोई अपने बच्चों को यहां पढ़ने नहीं भेजता। बड़ी मुश्किल से इन बच्चों को ही जुटा पाते हैं मास्‍टर जी। सरकार ने इस दौरान काफी कोशिश की है कि मलाना के लोग अपने खोल से बाहर आएं और जीवन की मुख्य धारा से जुड़ें मगर अभी तक कोई खास असर नहीं नजर आ रहा। उनके स्वर में निराशा थी। लेकिन गांव के अकेले बाहरी व्यक्ति चौकीदार संगतराम ने बरसों पहले गांव में बहुत प्रयास किये थे। वही इस गांव को देश विदेश के र्टैकिंग रूट पर लाया था और उसी के घर देशी-विदेशी सैलानी और ट्रैकर ठहरा करते थे। वक्त की रफ्तार में पीछेआधुनिकता ने भी मलाना को प्रभावित अवश्य किया है। हमें कुछ मकानों के छज्जों पर सिलाई मशीन रखी दिखाई दी थीं। एक घर में प्रेशर कूकर की सीटी की आवाज भी सुनाई दे रही थी। तीन-चार मंगलुओं और सोमुओं के हाथ पर घड़ी तो थी, परन्तु उन्हें वक्त देखना नहीं आता था। औसत मलानी के पास 200 से 500 भेड़ें होती हैं। कई मलानियों ने जरी गांव स्थित बैंक में अपने रिश्तेदारों के जरिए अच्छी-खासी रकम जमा कर रखी है। पता चला है कि इनके पास सोना भी बहुत है, मगर पहनावा उनका अपना कता-बुना मोटा कपड़ा ही है।
मलाना वासी शराब नहीं पीते लेकिन मलाना के आस पास बीसियां मीलों दूर तक अफीम के और भांग के पौधे देखे जा सकते हैं। कुछ अधिक ऊचांई पर बेशकीमती जड़ी बूटियां भी मिलती हैं। दुनिया भी के नशेड़ी गंजेड़ी अपने नशे की लत पूरी करने के लिए मलाना आते हैं और कई कई दिन तक अपने टेंट लगाये गांव के बाहर टिके रहते हैं। कई मलानावासी इस धंधे में लगे हैं। वैसे लगभग सभी गावंवासियों के खेत भी हैं जो बहुत दूर दूर हैं और हर परिवार में से एकाध सदस्‍य खेत पर ही टिका होता है।
जैसे कि मैंने बताया मलाना हिमाचल प्रदेश की ट्रैकिंग के रूट पर है और वहां से तीन दिन के ट्रैक के बाद चंद्रखैनी ग्‍लेशियर आता है। यूथ हॉस्‍टल द्वारा हर साल गर्मियों में आयोजित ट्रैकिंग अभियान में हर बरस सैकड़ों ट्रैकर एक दिन के लिए इस गांव के बाहर बनाये गये कैम्‍प में ठहरते हैं और इन गांव वालों को नजदीक से देखने का मौका पाते हैं। इन्‍हीं कैम्‍पों की वजह से कई गांव वासियों को पोर्टर के रूप में काम करने के लिए अतिरिक्‍त आमदनी भी हो जाती है। इसी लालच में गांव में एक दुकान भी खुल गयी है जहां आप चाय, काफी से ले कर तेल और टूथपेस्‍ट तक खरीद सकते हैं।
पहली बार मैं वहां एक ट्रैकर की हैसियत से गया था लेकिन अगली बार मैं वहां यूथ हास्‍टल के कैम्‍प में कैम्‍प लीडर बन कर गया था और एक महीने तक गांव वासियों के बीच गांव वाला ही बन कर रहा था।
चूंकि मुझे एक महीने तक वहीं रहना था और कैम्‍प लीडर की हैसियत से इस बात की तैयारी करके चला था कि किसी भी चोट या बीमारी की स्थिति में छोटा मोटा इलाज किया जा सके। अभी गांव के भीतर से अपने कैम्प की तरफ जा ही रहा था कि मुझे गांव वालों ने रोका और बताया कि एक आदमी के पैर का घाव बहुत खराब हो गया है। जब मैंने चबूतरे पर उसके पास जा कर देखा तो वाकई उसके जख्‍म की हालत खराब थी। सरकारी कम्‍पाउंडर के पास तो दवा तक नहीं थी, उससे इलाज कैसे कराते। मेरे पास जो भी बेसिक दवाइयां और क्रीम थी, उसके सहारे मैंने उसकी मरहम पट्टी की और कुछ गोलियां खाने के लिए दीं। दो तीन दिन तक मैं उसकी मरहम पट्टी करता रहा और चौथे दिन मेरी हैरानी की सीमा न रही जब मैंने उसे लंगड़ाते हुए अपने कैम्‍प तक आते देखा। वह काफी बेहतर महसूस कर रहा था। तब से मैं गांव वालों के लिए डाक्‍टर बन गया और लोग बाग अपनी तकलीफों के लिए मेरे पास दवा के लिए आने लगे। मेरे पास दवाएं इतनी नहीं थीं। जो थीं भी वे छोटी मोटी तकलीफों के लिए थीं। मैंने मजबूरन ट्रैकरों से उनकी निजी दवाओं में से कुछ दवाएं मांगनी शुरू कीं। डर भी था कि कहीं कम जानकारी के कारण दी गयी कोई दवा रिएक्‍शन न कर जाये और लेने के देने पड़ जायें।
लेकिन उनका विश्‍वास इतना बढ़ गया था मुझ पर कि वे मुझे अपना समझने लगे थे क्‍योंकि मेरी दी गयी दवा से संयोग से कई लोग ठीक हो गये थे। ऐसा भी हुआ कि कई बार मुझे लोग अपने घर भी ले गये ताकि मैं उनकी बीमार बीवी को देख सकूं या उसकी पीठ दर्द के लिए खुद उसकी पीठ पर मरहम का लेप कर सकूं। एक बार तो यहां तक हुआ कि एक मंगलू अपनी जवान बेटी को लेकर मेरे कैम्‍प में आया और बोला कि ये पेड़ से गिर गयी है और इसकी छाती में बहुत दर्द है। भला मैं इस मर्ज का क्‍या इलाज करता। लेकिन वह तो मेरे पीछे ही पड़ गया कि इलाज तो मुझे ही करना है। गोली लेने से उसने मना कर दिया और कहा कि मैं खुद मुआइना करके कोई क्रीम लगाऊं। मंगलू टैंट के बाहर बैठ गया और भीतर लड़की ने अपना कुर्ता उतार दिया और अपनी बोली में बताने की कोशिश की की कहां दर्द है। मेरी हालत खराब। एक जवान लड़की कुर्ता उतारे अधनंगी बैठी है मेरे सामने। उसने कुर्ते के चीने कुछ भी नहीं पहना था। मैंने किसी तरह उसे दर्द निवारक क्रीम दी कि अपने आप लेप कर ले लेकिन उसने मना कर दिया कि आप ही लगाओ। मरता क्‍या न करता।
गांव वालों का मुझा पर भरोसा इतना बढ़ गया था कि वे अक्‍सर मेरे कैम्‍प में आते और मेरे पास फुर्सत होती तो ढेर सारी बातें करते। मुझे अपनी बोली की गिनती सिखाते, अपनी बोली के शब्‍दों के मतलब बताते। कितनी बार ऐसा हुआ कि वे मेरे लिए अपने घर से कुछ खाने का सामान ले कर आये।
जब वहां से मेरे जाने का वक्‍त आया तो बीसियों मलानावासी मुझे गांव के बाहर तक छोड़ने आये थे। मेरी आंखें तब नम हो आयीं जब गांव के उप प्रधान ने खुद अपने हाथों से बनायी गयी कुल्‍लू टोपी मुझे उपहार के तौर पर दी थी। ये मेरे लिए अमूल्‍य भेंट थी।

दस्तक

सीमा गुप्ता

अपने ही साये से ,
"आज"
खौफजदा से हैं,
फ़िर किसी तूफ़ान ने,
दस्तक दी होगी...............

Monday, September 1, 2008

जूनून-ऐ-इश्क

सीमा गुप्ता

जूनून की बात निकली है तो मेरी बात भी सुन लो,
जूनून-ऐ-इश्क सच्चा है तो फिर हारा नहीं करता

मुक़द्दस है जगह वो क्यूंकि घर माशूक का है वो,
कोई मजनूँ कभी भी अपना दिल मारा नहीं करता

तजस्सुस यह के वोह बोलेगा सच या झूट बोलगा,
जूनून में रह के कोई काम यह सारा नही करता

वो मजनू है और उसके दिल में ही है बसी लैला,
हर एक हूरे नज़र पर अपना दिल वारा नहीं करता

अदा

सीमा गुप्ता

फिर वही आतिशफिशानी कर रही उसकी अदा
फिर वही मदिरा पिला डाली है उसके जाम ने ..........

जब भी गुज़रा वो हसीं पैकर मेरे इतराफ़ से
दी सदा उसको हर एक दर ने हर एक बाम ने......

एक अजब खामोश सा एहसास था दिल में मेरे
उसका नज़ारा किया है पहले हर इक गाम ने...

ऐतबार

सीमा गुप्ता

वो पूछते हैं मुझसे किस हद तक प्यार है,
मैंने कहा जहाँ तक ये अनंत नीला आकाश है,

वो पूछते हैं किसका तुम्हारे दिल पे इख्तियार है ,
मैंने कहा जिसका दर्द मेरे दिल मे शुमार है

वो पूछते हैं किस तोहफे का तुमको इन्तजार है ,
मैंने कहा उसका तसुब्ब्र्र जिसके लिए दिल बेकरार है

वो पूछते है मेरा साथ कहाँ तक निभाना है ,
मैंने कहा जहाँ तक चमकते सितारों का संसार है

वो पूछते है , मैं किस तरह ऐतबार करू तुम पर ,
मैंने कहा मेरा वजूद ख़ुद मे एक ऐतबार है...!

जातिसूचक शब्दों की यथार्थता

राम शिवमूर्ति यादव

पुराने समय की बात है। एक बार धरती पर रहने वाले सभी प्राणियों ने मेल-जोल बढ़ाने के लिए एक आम सभा का आयोजन किया। इसमें हर प्राणी वर्ग के एक-एक प्रतिनिधि शामिल हुए पर मानव-वर्ग से कोई नहीं शामिल हुआ। बाद में पता चला कि मानव वर्ग किसी एक सर्वमान्य प्रतिनिधि को भेजने पर सहमत नहीं हो सका वरन उसकी माँग थी कि हर जाति और धर्म से कम से कम एक प्रतिनिधि इस सभा में शामिल होगा। नतीजन, मानव वर्ग से कोई भी प्रतिनिधि उक्त सभा में शामिल न हो सका और आज भी समाज में मानव अपना सर्वमान्य प्रतिनिधि न चुनकर जाति और धर्म के आधार पर ही प्रतिनिधि चुनता आ रहा है। यद्यपि लोकतंत्र सभी को समान अवसरों की गारण्टी देता है पर निहित तत्व अपने-अपने स्वार्थों के मद्देनजर विभिन्न औपचारिक एवं अनौपचारिक गुटों में बंटे नजर आते हैं।

जहाँ तक भारतीय समाज का सवाल है, यह विभिन्न जातियों, धर्मों, त्यौहारों, बोलियों, भाषाओं, पहनावों इत्यादि का देश है पर भारतीय समाज का आधार जाति व्यवस्था है। उत्तर वैदिक काल में विकसित वर्णाश्रम व्यवस्था भले ही कर्म आधारित रही हो पर कालान्तर में कर्म पर जन्म हावी हो गया और फिर जातियों व उपजातियों की एक अनन्त श्रृंखला बनती गई। चाहे रामायण काल में राम द्वारा शंबूक-वध का प्रकरण हो कि एक शूद्र को यज्ञ का अधिकार नहीं दिया जा सकता अथवा महाभारत काल में गुरु द्रोणाचार्य द्वारा एकलव्य को शूद्र होने के कारण शिक्षा देने से मना कर देना हो और कालान्तर में उसके हाथ का अंगूठा गुरुदक्षिणा के बहाने माँग लेना हो। दोनों घटनायें सिद्ध करती हैं कि उस समय तक वर्ण का आधार कर्म नहीं जन्म हो गया था। स्वयं गोस्वामी तुलसीदास ने रामायण काल के बारे में लिखा कि-ढोल, गँवार, शूद्र, पशु, नारी। ये सब ताड़न के अधिकारी॥'' ये पंक्तियाँ दर्च्चाती हैं कि समाज में जातिगत भेदभाव बढ़ गए थे अन्यथा शूद्रों हेतु ऐसी भाषा का इस्तेमाल तुलसीदास नहीं करते। वस्तुतः जाति भारतीय समाज के भीतर एक उत्पीड़नकारी व्यवस्था के रूप में उभरी और समय-समय पर ब्राह्मणवादी सत्ता जाति व्यवस्था को धर्म और पुराण के आधार पर न्यायोचित ठहराने का प्रयास करती रही और आवश्यकतानुसार जाति व्यवस्था को दार्शनिक आधार भी प्रदान करने की कोशिश की गयी।

राष्ट्रीय अनुसूचित आयोग के अध्यक्ष रूप में सूरजभान जी ने कहा था कि -लोगों को जातिसूचक शब्दों का इस्तेमाल अपने नाम के साथ नहीं करना चाहिए।'' जातिसूचक शब्दों को हटाने के लिए यह कवायद नयी नहीं थी॥ महात्मा गाँधी ने भी दलितों को ÷हरिजन' अर्थात ईश्वर के जन' कहकर उनकी प्रतिष्ठा लौटानी चाही थी पर कालान्तर में हरिजन शब्द स्वयं जातिसूचक बन गया। तमिलनाडु में भी इस प्रकार के प्रयास हो चुके हैं। यहाँ तक कि जयप्रकाच्च नारायण व राममनोहर लोहिया ने भी जाति तोड़ो एवं जातिसूचक शब्दों के बहिष्कार के द्वारा जातिविहीन समाज का आह्‌वान किया था। उस दौर में तमाम लोगों ने जिनमें बिहार के मुख्यमंत्री द्वय जगन्नाथ प्रसाद मिश्र और लालू प्रसाद यादव भी शामिल थे, ने अपने नाम के साथ जाति का उपयोग बन्द कर दिया था पर कालान्तर में उन्होंने पुनः इसका उपयोग आरम्भ कर दिया। ऐसे में यह सवाल उठना लाजिमी है कि ऐसे प्रतीकात्मक कदमों की व्यवहारिकता क्या है? महात्मा गाँधी और डॉ० अम्बेडकर दोनों ने ही जाति-व्यवस्था की कुरीतियों को समाप्त करने की बात कही। जहाँ डॉ० अम्बेडकर का मानना था कि-÷÷अछूत या अस्पृच्च्यता की भावना जाति व्यवस्था की उपज है। अतः जाति व्यवस्था को समाप्त करके ही अछूतों का उद्धार किया जा सकता है।'' वहीं महात्मा गाँधी के मत में-÷÷अस्पृच्च्यता और इसकी बुराईयों को समाप्त करने के लिए जाति व्यवस्था को नष्ट कर देना उचित नही होगा। यह उतना ही गलत है, जितना शरीर पर किसी फोड़े-फुन्सी के उठ आने पर पूरे शरीर को नष्ट कर देना या घास-पात के कारण फसल को नष्ट कर देना। जाति व्यवस्था को समाप्त करने की बजाय उसकी बुराईयों मात्र का विनाच्च करना उचित होगा।'' यही कारण था कि डॉ० अम्बेडकर ने अन्ततः हिन्दू धर्म को छोड़ अपने अनुयायियों के साथ बौद्ध धर्म ग्रहण कर लिया। उन्होंने स्पष्ट शब्दों में कहा-÷÷मैं हिन्दू धर्म में पैदा न होऊँ यह मेरे वच्च में नहीं था पर मैं एक हिन्दू के रूप में मृत्यु का वरण नहीं करना चाहता यह मेरे वच्च की बात है।'' अमेरिका जैसे विकसित समाज ने भी काले लोगों के साथ किये गये रंगभेद की सामाजिक भर्त्सना करके, अमानुषिक अत्याचार के लिये माफी माँगी और उनके उत्थान के लिये विच्चेषाधिकार भी प्रदान किये, वहीं भारतीय समाज ऐसा नहीं कर पाया। वस्तुतः भारतीय समाज में मानवीय मानसिकता, लोकाचार, संस्कृति, भाषा, साहित्य सभी जगह जाति ने अपनी गहरी पैठ बना रखी है।
स्पष्ट है कि जाति व्यवस्था भारतीय समाज की एक मजबूत कड़ी है, जिसे तोड़ना इतना आसान नहीं। बहुजन समाज पार्टी ने दलितों को सत्ता में भागीदारी दिलाने के लिए ÷÷तिलक, तराजू और तलवार,-इनको मारो जूते चार'' के साथ अपनी राजनीति आरम्भ की और आज वही बसपा ब्राह्मण महासम्मेलन कराके तथा ÷÷हाथी नहीं गणेच्च है-ब्रह्म, विष्णु, महेच्च है'' जैसे नारों के साथ सत्ता में आकर सामाजिक समरसता का जाप जप रही है। विभिन्न चुनावों में जातियाँ वोट बैंक का काम करती हैं, यही कारण है कि विभिन्न राजनैतिक दल प्रत्याच्चियों के निर्धारण के समय जाति-तत्व का विच्चेष ध्यान रखते हैं। यहाँ तक कि मंत्रिमण्डल गठन के समय भी प्रमुख जातियों के प्रतिनिधियों को शामिल करने का प्रयास किया जाता है। अगर हम भारतीय राजनीति के पन्ने पलटें तो १९९० का दौर जातियों के हिसाब से काफी महत्वपूर्ण माना जाता है, जब तत्कालीन प्रधानमंत्री वी० पी० सिंह ने मण्डल आयोग की सिफारिच्चों को लागू करने की घोषणा की और तत्पच्च्चात १९९२ में पंचायतों को संवैधानिक दर्जा देकर निम्न पायदानों पर भी आरक्षण की व्यवस्था की गई। रातोंरात सामाजिक और राजनैतिक धरातल पर इतने बड़े परिवर्तन हुए कि व्यवस्था का ढाँचा ही बदल गया। आरक्षण ने जहाँ एक ओर प्रच्चासनिक व्यवस्था में लोगों की भागीदारी तय की वहीं राजनैतिक तौर पर जाति विच्चेष के समीकरणों पर आधारित तमाम राजनैतिक दलों की सक्रियता बढ़ी। दक्षिण भारत में यह परिवर्तन बहुत पहले हो चुका था, पर उत्तर भारत में यह निच्च्िचततः नया अनुभव था। जाति आधारित इस क्षेत्रीय राजनीति का असर केन्द्रीय राजनीति पर भी पड़ा और केन्द्र सरकार राज्यों के क्षत्रपों पर नियंत्रण कसने की बजाय खुद क्षेत्रीय क्षत्रपों द्वारा निर्देच्चित होने लगी। इसका सबसे बड़ा फायदा संघात्मक राज्य की वास्तविक अवधारणा के रूप में सामने आया। इसी दौर में आज की तमाम प्रमुख राजनैतिक हस्तियों का अभ्युदय हुआ। यहाँ तक कि विभिन्न जातियों ने अपनी जाति के महापुरुषों को भी महिमामंडित करना आरम्भ कर दिया, जिससे इतिहास के गर्भ में छिपे तमाम जाने-अनजाने महापुरुष उभरकर सामने आए। आरक्षण व्यवस्था ने जहाँ समाज के पिछड़े वर्गों को विभिन्न क्षेत्रों में नेतृत्व का अवसर दिया और सामाजिक न्याय की अवधारणा को मजबूत किया, वहीं इसके चलते अगड़ों-पिछड़ों के बीच खाई भी बढ़ती गई। इस अंतर्द्वन्द ने निश्चिततः विभिन्न जातियों को अपने अस्तित्व के प्रति सोचने हेतु मजबूर कर दिया और फिर जन्म हुआ जाति आधारित सेनाओं का। बिहार में रणवीर सेना (१९९४) और लोरिक सेना (१९९५) इसी दौर की उपज थे। इसके अलावा जाति आधारित कुंवर सेना, ब्रह्मर्षि सेना, श्री राम सेना व लिबरेशन आर्मी भी सक्रिय थे। किसी जाति विच्चेष पर आधारित दल कुछेक समय तक तो सत्ता में रह सकते हैं पर एक लम्बे समय तक सत्ता में टिकने हेतु अन्य जातियों को भी अपनी ओर जोड़ना जरुरी होता है, नतीजन जाति आधारित रैलियों और सम्मेलनों का जन्म हुआ। यही वह दौर था जब यह कहना बहुत मुश्किल हो गया था कि जातियों का राजनीतिकरण हो रहा है या राजनीति का जातीयकरण हो रहा है। पर जातियों की इस संक्रमणकालीन राजनीति ने कुछ नए गुल सिखाए और विभिन्न दलों के शीर्ष नेतृत्व में टकराहट बढ़ गई। नतीजन समाजवादी पार्टी में बेनी प्रसाद वर्मा, राष्ट्रीय जनता दल में प्रो० रंजन कुमार तो बसपा में आर०के०चौधरी जैसे कद्दावर नेता पीछे धकिया दिए गए। यहीं से राजनीति में अपने परिवार को उभारने के प्रयास, फिल्म जगत, उद्योग जगत और मीडिया से जुड़े लोगों को अपने दलों में शामिल करने की होड़ सी आरम्भ हो गई, जो विषम परिस्थितियों में संकटमोचक बनकर उभरे। संक्षिप्त में कहा जाये तो जिन लोगों ने इन राजनैतिक दलों को खड़ा करने में एड़ी-चोटी का जोर लगाया था, वे पीछे की कतार में या बाहर खड़े थे और ग्लैमर तथा चाटुकारिता की राजनीति करने वाले शीर्ष पायदानों के करीब खड़े थे।

ऐसा नहीं कि जातिगत राजनीति का प्रभाव सामाजिक व्यवस्था पर नहीं पड़ा वरन्‌ इसने समाज का आर्थिक ढांचा भी बदला। सकारात्मक रूप से जहाँ दलितों और पिछड़ों ने प्रशासनिक व अन्य सेवाओं में प्रवेच्च पाकर निर्णयों में अपनी प्रभावी भागीदारी सुनिश्चित की और पिछड़ों में भी एक क्रीमीलेयर का जन्म हुआ वहीं दूसरी ओर इसकी प्रतिक्रिया स्वरूप भी कई घटनायें घटीं। मसलन पंचायतें जातिगत राजनीति का अखाड़ा बन गयीं, दलित सरपंचों को कई क्षेत्रों में अधिकारों के प्रयोग से रोका गया और उन्हें अपमानित किया गया। यहाँ तक कि बिहार से मुसहर जाति की एक सांसद को टी०टी० ने ट्रेन के वातानुकूलित कोच से मात्र इसलिए बाहर निकाल दिया कि वह वेश भूषा से न तो सांसद लगती थीं और न ही वातानुकूलित कोच में बैठने लायक। भंवरी देवी बलात्कार काण्ड और तत्पश्चात न्यायालय के निर्णय कि ब्राह्मण बलात्कार नहीं कर सकते, जैसी तमाम घटनाओं ने समाज में उथल-पुथल मचायी। आज भी तमिलनाडु के कई क्षेत्रों में चाय की दुकानों में दलितों हेतु अलग कप की व्यवस्था है, मध्य प्रदेच्च के छतरपुर में दलितों को बालों की कटिंग कराने से मना कर दिया जाता है, दलित दूल्हे को सवर्णों के घर के सामने से घोड़ी पर चढ़कर जाने हेतु मारा-पीटा जाता है, देश की राजधानी दिल्ली से सटे हरियाणा के गोहाना कस्बे में दिनदहाड़े दलित बस्ती को आग के हवाले कर दिया जाता है, फरीदाबाद के एक गाँव में मन्दिर में पूजा कर लेने के कारण दलित व्यक्ति की मूँछें काट दी जाती हैं.........ऐसे न जाने कितने उदाहरण आज भी समाज में देखने को मिल जाते हैं, जो यह दर्शाते हैं कि समाज में अस्पृश्यता और विषमता की भावना आज भी विद्यमान है।

उपरोक्त परिस्थितियों में यह सवाल तर्कसंगत हो जाता है कि क्या जातिसूचक शब्दों के इस्तेमाल पर पाबंदी अथवा कानूनी रोक से समाज में समरसता बढ़ जाएगी? भारत में जाति राजनैतिक और सामाजिक सुरक्षा का परिचायक है। कुछ लोग इसे अपने पूर्वजों की विरासत और संस्कृति से जोड़कर देखते हैं तो कुछ हेतु निम्न जाति में जन्म पूर्वजन्मों के कर्मों का संचित फल है। यदि हम आंकड़ों में देखें तो १९९१ की जनसंख्या के अनुसार देच्च की कुल जनसंख्या में अनुसचित जातियों और जनजातियों का प्रतिशत क्रमश १६.५४ व ८.०८ था। 1 जनवरी २००२ को केन्द्र सरकार की सेवाओं में अनुसूचित जाति और जनजातियों का सम्मिलित प्रतिनिधित्व मात्र ६.१२ प्रतिच्चत था। अनुसूचित जातियों में जहाँ ५४२, वहीं जनजातियों में करीब ५५० जनजातियाँ शामिल हैं। समाज में व्याप्त विषमता के मद्देनजर अनुसूचित जातियों, अनुसूचित जनजातियों और अन्य पिछड़े वर्गों को क्रमश. १५, ७.५ व २७.५ प्रतिच्चत आरक्षण संविधान द्वारा प्रदत्त किया गया है ताकि वे भी प्रच्चासनिक निर्णयों में भागीदार बन अपना जीवन स्तर सुधार सकें। इसी प्रकार अनुसूचित जाति और जनजाति हेतु लोकसभा व विधानसभा में सीटें आरक्षित की गई हैं तथा इनके कल्याणार्थ विभिन्न आयोग बनाए गए हैं। जातिसूचक शब्दों का इस्तेमाल समाप्त करने के मायने सभी जातियों को एक ही धरातल पर खड़ा करना होगा। क्या आज के दौर में आरक्षण प्राप्त जातियाँ अपने इस अधिकार को खोकर जातिविहीन समाज की तरफ अग्रसर होंगी या जाति के नाम पर राजनैतिक रोटियाँ सेंकने वाले सभी राजनैतिक दल इसका समर्थन करेंगे? एक अन्य महत्वपूर्ण पहलू यह है कि क्या जाति व्यवस्था के उन्मूलन पश्चात हम पुनः कर्म आधारित वर्णाश्रम व्यवस्था की ओर लौट रहे हैं, जहाँ जन्मना व्यवस्था की बजाय कर्म आधारित व्यवस्था होगी? गाँधी जी का यह सपना कि सभी लोग शारीरिक श्रम करेंगे वाकई फलीभूत होने जा रहा है? क्या ब्राह्मण जूता पालिश करना पसन्द करेंगे और दलित पुरोहिती करेंगे? निश्चिततः जाति व्यवस्था के उन्मूलन से पहले इन सवालों का जवाब ढूँढ़ना होगा।

आधुनिक भारतीय सेना में भी जाति आधारित रेजिमेंट हैं- डोगरा, राजपूत, सिख, महार इत्यादि रेजिमेंट। सेना इसे विविधता और धर्मनिरपेक्षता के प्रतीक रूप में देखती है। अमेरिका और ब्रिटेन जैसे विकसित राष्ट्रों के लिए पासपोर्ट हेतु आवेदन करने पर जाति अर्थात सरनेम वाले कॉलम को भरना अनिवार्य होता है, जातिसूचक शब्दों के हटाने पर क्या होगा? क्या जातिसूचक शब्द हटने पर अन्तर्जातीय विवाह सम्पन्न होंगे और गोत्रों का कोई अर्थ नहीं रह जाएगा? फिर हरियाणा के झज्जर जिले की कोई जाति-पंचायत रामपाल दहिया और सोनिया जैसे लोगों को एक गोत्र होने के कारण पति-पत्नी की बजाय भाई-बहन के रूप में रहने का आदेच्च नहीं दे सकेगी? फिर कोई दलित धर्मान्तरण के लिए मजबूर नहीं होगा? फिर कोई फर्जी जाति प्रमाणपत्रों के साथ सरकारी नौकरी में प्रवेश हेतु षडयंत्र नहीं रचेगा? क्या फिर विभिन्न समाचार पत्रों के वैवाहिक विज्ञापन जो कि जाति आधारित कालमों में निर्मित होते हैं, बन्द हो जायेंगें? क्या यह पाबन्दी हिन्दुओं के साथ-साथ मुस्लिम, सिक्ख, ईसाईयों इत्यादि पर भी लगेगी? फिर ऐसे नामों का क्या होगा, जो कि धर्म विशेष का होने को इंगित करते हैं, मसलन हिन्दुओं में राम, श्याम, राधा, सीता इत्यादि, मुस्लिमों में आसिफ, जावेद, महबूब इत्यादि एवं ईसाईयों में जोसेफ, टोनी इत्यादि? क्या सरकार समाज के निचले स्तर तक यह व्यवस्था कर पायेगी कि किसी के साथ दोयम व्यवहार न किया जाये और प्रच्चासन व राजनीति में भाई-भतीजावाद, जातिवाद, क्षेत्रवाद का कोई अर्थ नहीं रहेगा? निश्चिततः जातिसूचक शब्दों के इस्तेमाल पर रोक लगाने से पहले इन सवालों का जवाब ढूँढ़ना पड़ेगा।
शेष अगले भाग में