Tuesday, October 26, 2010

मेरे जीवन पर किसी का हस्ताक्षर नहीं

नासिरा शर्मा

यदि कोई पूछे कि इलाहाबाद का सबसे खूबसूरत और जानदार इलाका कौन- सा है तो मैं कहूगी नखास कोना और उसके आसपास का वह सारा इलाक़ा जो मेरी कहानियों में धड़कता है। क़ायदे से मुझे अपने घर और मोहल्ले से प्यार होना चाहिए था मगर इश्क़ मुझे बहादुरगंज, कोतवाली, घंटाघर, ठठेरी बाज़ार, बर्फवाली गली, सब्ज़ी मंडी, पत्थरगली, चुड़ैलीवाली गली, स्टेशन रोड गढ़ी, सराय वगैरह से है जहाँ गलियों के डेल्टा और मधुमक्खियों के छतों की तरह मकानों की भरमार है। लाख चाहू कि कहानी किसी और मोहल्ले की लिखू मगर मेरा रचनाकार ज़िन्दगी से भरपूर इसी परिवेश में पहुंच जाता है। कोतवाली के अलावा कोई और थाना, थाना ही नहीं लगता है। मीर अम्मन देहलवी ने भी अपने समय के कुछ इसी तरह के इलाके का ज़िक्र अपनी प्रसिद्ध कृति ‘बाग व बहार’ में किया था जहाँ खोया से खोया छिलता है।

बाज़ार, दुकान, खोंचे वाले, मकान, हवेली, मन्दिर- मस्जिद, ताड़ीखाना, हमामघर, पुराने पटे कुएँ, लकड़ी का टाल, बोसीदा इमारतें, रिक्शा, इक्का, साइकिल, मोटर, जीप, पैदल गर्जकि ऐसा कुछ नहीं है जो वहाँ आपको ज़िन्दगी से जूझता नहीं मिलेगा। यहाँ तक घूमती भटकती गायें और रास्ता रोके साँड़ तो हर शहर की शान हैं मगर यहाँ की रौनक भारी थनों पर थैला चढ़ाए बकरियां अपने बच्चों के साथ गली में कुलायें भरती नज़र आती हैं और किसी घर का दरवाज़ा खुला मिला तो अन्दर घुस बड़ी बेतकल्लुफी से बिना जान पहचान, सलाम दुआ के वह पेड़ों और पौधों पर मुँह मारने लगती हैं। उन्हीं की तरह बत्तखें और मुर्गियाँ हैं। जो टहलती घूमती कीचड़ से भरी नाली में चोंच डाल दाना ढूढ ही लेती हैं। मगर अंडे अपने दर्बे में जाकर देती हैं। अगर आप गधों के झुण्ड में फँस गए तो फिर कहना ही क्या। ऊपर से मलाई बर्फ वाले, कुल्फी वाले, चूरन वाले और जाने क्या-क्या सर पर उठाए फेरी वाले दोपहर में सोने नहीं देंगे। इस सारे शोर के साथ लाउडस्पीकर पर पाँच वक़्त आज़ान और अखंड कीर्तन का पाठ। इस इलाके में पहुँचकर दिल घबराने का सवाल ही नहीं है। आखिर मारपीट और माँ बहन की गालियों से गुलज़ार गली के नुक्कड़ और मोड़ आपको उदास होने ही नहीं देते हैं।

इस इलाके के भूगोल का छोटा-सा ब्यौरा आपको देती हँू। एक ही रास्ता आधा पत्थरगली कहलाता है और आधा शाहनूर अलीगंज। पत्थरगली में मेरा हमीदिया गल्र्स कालेज और शाहनूर अलीगंज में मेरी मौसी का घर। आधी गली में हिन्दुओं के घर और मन्दिर। बाकी गली में मुसलमानों के मकान और मस्जिदें। रास्ते को दायें काटती.............................................शेष भाग पढ़ने के लिए पत्रिका देखिए









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