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काला चांद: एक विवेचन

मो. आसिफ खान

भानू चैहान



भारतीय समाज तीन वर्गाें- उच्च वर्ग, मध्यवर्ग और निम्नवर्ग में बंटा हुआ है। निम्न वर्ग को अपनी बुनियादी आवश्यकताओं (रोटी, कपड़ा और मकान) को जुटाने और उसके लिए हर उचित-अनुचित तरीके अपनाने ही पड़ते हैं। उच्च वर्ग पाश्चात्य सभ्यता की अंधी होड़ में व पैसे की चकाचैंध में अपनी संस्कृति, सभ्यता, मूल्यों को पैसे की चकाचैंध में अपनी, संस्कृति, सभ्यता, मूल्यों को पीछे भूल चुका है। मध्यवर्ग ही एक ऐसा वर्ग है, जो उच्चवर्ग की बराबरी तो करना चाहता है किंतु अपने मूल्यों, संस्कारों को भूला नहीं है। आज उसके सामने सबसे बड़ा प्रश्न यही है कि वह इन दोनों के बीच किस प्रकार सामंजस्य स्थापित करे। इसी के परिणामस्वरूप व दिग्भ्रमित, दिशाहीन हो रहा है। विशेषकर मध्यवर्गीय कामकाजी युवा पीढ़ी। माता-पिता व संतान के भिन्न विचारों ने जिस ‘जनरेशन गैप’ को जन्म दिया है उसने भी इस वर्ग की समस्या को और भी बढ़ा दिया है।

‘भारतीय समाज में विवाह एक पवित्रा संस्था है। विवाह मात्रा नारी-पुरुष का संसर्ग नहीं, अपितु परिवार के परस्पर आत्मीय स्नेहिल संबंधों का सूत्राधार भी है’1 किंतु आज उच्च तकनीकी युग में जब व्यक्ति भौतिकता के पीछे भाग रहा है। विवाह का अस्तित्व ही बदलकर रह गया है। पुरानी पीढ़ी व नयी पीढ़ी के विवाह संबंधी विचारों में मतभेद उत्पन्न हो गया है। पुरानी पीढ़ी जहां विवाह के आज भी पवित्रा बंधन मानती हैं वहीं युवा पीढ़ी में विवाह के प्रति उदासीनता देखने को मिलती है। ‘विवाह के प्रति यौन संबंधों की काली रातों में अपना अस्तित्व खोने लगा है, लिव-इन-रिलेशनशिप ने विवाह के पवित्रा उद्देश्य को तार-तार कर दिया है।’2

‘काला-चाँद’ उपन्यास में डाॅ. सुधाकर आशावादी जी ने भारतीय विवाह पद्वति व उससे संबंधित अनेक प्रश्नों के उत्तर ढूंढने का प्रयास किया है। उपन्यास की कहानी चार पात्रों को केन्द्र में रखकर बुनी गई है- मयंक, स्नेहा, सलोनी और प्रशांत। मयंक और प्रशांत विदेश में कार्यरत है और मयंक बैंगलोर में। दोनों ही प्रतीक हैं आज के उच्च युवा वर्ग के। जिसके लिए संस्कार, आदर्श, प्रेम भावना, विवाह, रिश्ते आदि मान्यताओं का कोई मूल्य नहीं है। एक स्थान पर प्रशांत कहता भी है कि विदेश में जाकर भावनाओं की कद्र करते रहें....ऐसा संभव नहीं है.... वहां काम करें या संबंधों को ढोते रहें...?3

स्नेहा और सलोनी उ.प्र. के छोटे शहरों क्रमशः हरिद्वार और मेरठ की पीढ़ी-लिखी लड़कियाँ हैं जो आधुनिकता की दौड़ में पीछे रह जाती हैं और करूणांत को प्राप्त होती हैं। सलोनी स्नेहा की तुलना में दृढ़, आत्मनिर्भर व स्वाभिमानी है। जिसका दर्शन उपन्यास के प्रारंभ में ही हो जाते हैं और अंत तक वह अपने सिद्धांतों व आदर्शाें से समझौता नहीं करती जिसके परिणामस्वरूप उसका व प्रशांत का विवाह टूट जाता है। स्नेहा सुंदर, कोमल भावुक लड़की है। मयंक से विवाह तय होने पर उसे ही अपना सब कुछ मान लेती है। किंतु मयंक उसमें कोई खास रुचि न दिखाकर उसकी उपेक्षा करता है तुम लड़कियों की अदा ही निराली होती है...जरा सी छूट दी नहीं कि

शेष भाग पत्रिका में..............



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