Sunday, October 24, 2010

साहित्य सम्राट: मंुशी प्रेमचंद

डा. मजीद शेख



साहित्य सम्राट मुंशी प्रेमचन्द जी की लोकप्रियता दिनोंदिन देश-विदेश में भी बढ़ रही हैं। चूंकि उनके साहित्य का सबसे बड़ा आकर्षण यह है कि वह अपने साहित्य में ग्रामीण जीवन की तमाम दारूण परिस्थितियों को चित्रित करने के बावजूद मानवीयता की अलख को जगाए रखते हैं। इनके उपन्यासों और कहानियों में कृषि प्रधान समाज, जातिप्रथा, महाजनी व्यवस्था, रूढ़िवाद की जो गहरी समझ देखने को मिलती है,उसका कारण ऐसी बहुत-सी परिस्थितियों से प्रेमचंद का स्वयं गुज़रना था।

प्रेमचंद जी का जन्म बनारस के समीपवर्ती (चार मील दूर) लमही नामक ग्राम में 31 जुलाई सन् 1880 ई. में एक निम्न मध्य श्रेणी के कायस्थ परिवार में हुआ था। पिता अजायबलाल डाकखाने मंे मुंशी थे जिनका वेतन पच्चीस-तीस रुपये मात्रा था। खेत-खलिहानों में घूमते, गुल्ली-डण्डा, आती-पाती खेलते, उस्ताद मौलवी को चिढ़ाते-लिजाते गरीबी में उनका बचपन बीता था। सनातन धर्मी कर्मकाण्ड से आर्य समाज उन्हें अच्छा लगा। इसी कारण तो आपने बालविधवा ‘शिवरानी देवी’ से विवाह किया। सन् 1920 ई. के बाद महात्मा गांधी के व्यक्तित्व, व्यापक राष्ट्रीय आंदोलन और उदात्त नैतिक मूल्यों से वे बेहद प्रभावित थे। गांधी-दर्शन से प्रभावित होने के बाद वे विधवा-विवाह के विरोधी बन गए थे। अपने मित्रा रघुवीर सिंह जी को एक पत्रा में लिखा था- ‘‘मैंने विधवा का विवाह कराके (स्वयं विधवा से विवाह करके?) हिन्दू नारी को आदर्श से गिरा दिया था। उस वक्त जवानी की उम्र थी और सुधार की प्रवृत्ति जोरों पर थी।’’ सन् 1917 ई. की रूसी बोलशेविक क्रांति ने उन्हें नए सिरे से सोचने को बाध्य किया। गांधीवादी और समाजवादी अवधारणाओं का अंतर्विरोध उनकी रचनाओं में प्रायः मिलता हैं। डाॅ. सूर्यनारायण रणसंुभे जी के शब्दों में- ‘‘सच्चे अर्थाें में प्रेमचंद ‘कलम के सिपाही’ थे। व्यक्तिगत ज़िंदगी में कही पर भी कृत्रिमता नहीं, पांडित्य प्रदर्शन नहीं। झरने की सी सहजता और स्वाभाविकता है। यही स्वाभाविकता साहित्य में भी है। इस कारण वे एक ‘महान् साहित्यकार’ थे, उससे भी अधिक वे ‘महामानव’ थे।’’ उनके साहित्य-कर्म के संबंध में डाॅ. रामविलास शर्मा जी लिखते हैं- ‘‘प्रेमचंद उन लेखकों में हैं जिनकी रचनाओं से बाहर के साहित्य-प्रेमी हिन्दुस्तान को पहचानते हैं और हिन्दुस्तान उनपर गर्व करता है, दुनिया की शांति-प्रेमी जनता गर्व करती है, सोवियत-संघ के आलोचक मुक्त कण्ठ से उनका महत्त्व घोषित करते हैं, हम हिन्दी-भाषी प्रदेश के लोग उन पर खासतौर से गर्व करते हैं, क्योंकि वह सबसे पहले हमारे थे, जिन विशेषताओं को उन्होंने अपने कथा-साहित्य में झलकाया हैं, वे हमारी जनता की जातीय विशेषताएँ थीं।

प्रेमचंद जी ने साहित्य के उद्देश्य के संबंध में लिखा हैं- ‘‘साहित्य की बहुत सी परिभाषाएँ दी गई हैं, पर मेरे विचार से उसकी सर्वाेत्तम परिभाषा ‘जीवन की आलोचना’ है। चाहे वह निबंध के रूप में हो, चाहे कहानियों के या काव्य के, उसे हमारे जीवन

शेष भाग पत्रिका में..............

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