Saturday, October 30, 2010

ईरान की खूनी क्रान्ति से सबक़

अमरीक सिंह दीप

एक अच्छी किताब पाठकों की संवेदनाओं, भावनाओं और विचारों की ठहरी जल सतह में हलचल पैदा करती है, उनमें ज्वार जगाती है और उन्हें अन्याय और अत्याचार के विरुद्ध खड़े होने के लिए उकसाती है। एक अच्छी किताब क्रान्ति का बिगुल नहीं फंूकती चुपचाप धीरे-धीरे क्रान्ति की पृष्ठभूमि तैयार करती है। ऐसी ही एक किताब इधर मुझे पढ़ने को मिली। वह है नासिरा शर्मा का ईरान की खूनी क्रान्ति पर लिखा गया बहुचर्चित उपन्यास ‘सात नदियां एक समुन्दर।’ अब नाम है-‘बेहिश्ते ज़हरा’। लेखिका ने चार बार ईरान आकर और चन्द माह ईरान में रहकर इस खूनी क्रान्ति को अपनी नंगी आंखों से देखा, महसूसा और जिया और खूनी संगीनों की परवाह न कर बड़ी दिलेरी और दुस्साहस के साथ इसे कागज़ पर उतारा। इस बात की परवाह किए बगै़र की उसकी भी दशा उपन्यास की पहाड़ी नदी सादृश्य माक्र्सवादी लेखिका तय्यबा जैसी हो सकती है।

कोई भी युद्ध, कोई भी क्रान्ति हो उससे सबसे अधिक प्रभावित स्त्राी ही होती है, सबसे अधिक पीड़ा और यन्त्राणा स्त्राी को ही झेलनी पड़ती है। सबसे अधिक नुकसान स्त्राी को ही उठाना पड़ता है। इस उपन्यास के केन्द्र में एक नहीं सात स्त्रिायां हैं। तेहरान विश्वविद्यालय में अपनी शिक्षा के अन्तिम चरण पर जा पहुंचने वाली सात युवा लड़कियां सात सहेलियां। भविष्य के सपनों में डूबी। साथ ही भविष्य के भय से आशंकित और आतंकित। एक कहवाघर में एक फालगीरन (महिला ज्योतिष) उनके कहवे के जूठे प्यालों की बची तलछट से उनका भविष्य बांच रही है। झूठे भाग्यवादी सपने दिखा रही फालगीरन का विरोध करती है तय्यबा - ‘मेरा भाग्य पढ़ना इतना आसान नहीं है। उसकी भाषा तुम्हारे लिए अनजान है। मेरा भाग्य मेरा करम है न कि कहवे की तलछट।’1

तय्यबा जो एक लेखिका के साथ-साथ माक्र्सवादी एक्टविस्ट भी है, को छोड़कर उसकी शेष छः सहेलियां परम्परागत स्त्री जीवन को ही अपना भविष्य मान रही है लेकिन तय्यबा - ‘नहीं, ये रेखाएँ मेरा भाग्य नहीं है। यह ईरान का चित्रा है जो मेरे हाथ में है। ये पहाड़, ये नदियां, यह मैदान और विश्वविद्यालय, यह कारावास और यह घर इसे मुझे संवारना है। इसे तुम क्या पढ़ पाओगी।’2

विश्वविद्यालय की पढ़ाई के दौरान ही इन सात सहेलियों में से एक महनाज़ का अपने विश्वविद्यालय के एक छात्रा असलम अतापोर, जो कि कॅालेज टापर होने के साथ-साथ एक चर्चित शायर भी है, के साथ इश्क़ हो जाता है, लेकिन परम्परा और.............................................शेष भाग पढ़ने के लिए पत्रिका देखिए











ज़िन्दा, जीते-जागते दर्द का एक दरिया हैः ‘ज़िन्दा मुहावरे’

नगमा जावेद

‘ज़िन्दा मुहावरे’ ज़िन्दा, जीते-जागते दर्द का एक दरिया है, यह अतीत हुए दर्द की भूली-बिसरी टीस नहीं.... दर्द का एक सिलसिला जो 1947 से शुरू हुआ और आज भी इस दर्द में कमी नहीं आयी है बल्कि दर्द की शिद्दत बढ़ गयी है।
आज़ादी के 61 सालों बाद भी मुसलमाने को शक की निगाह से देखा जाता है - आख़िर क्यों? उनकी देशभक्ति को कटघरे में किसलिए खड़ा किया जाता है? आज भी उनसे कहा जाता है कि ये देश तुम्हारा नहीं है - पाकिस्तान जाओ! और पाकिस्तान में भी एक लंबा अर्सा गुज़ारने के बावजूद उनके माथे पर ‘मुहाजिर’ का लेबल किसी कलंक की तरह चिपका हुआ है। ये ही वह कड़वी, तल्ख हकीक़तें हैं जिन्हें नासिरा शर्मा ने अपने उपन्यास में बड़े विषाद के साथ मुखरित किया है। 1992 में लिखा उपन्यास ‘ज़िन्दा मुहावरे’ बँटवारे की कोख से जन्मी एक ‘चीख’ है,
 ऐसी चीख जिसकी अनुगंूज आज भी सुनाई देती है। बँटवारे ने मुसलमानों को क्या दिया? एक ज़ख़्म, एक घाव जो आज भी खुला हुआ है। क्यों आज भी मुसलमान नकरदा गुनाहों की सज़ा भोग रहे हैं? लेखिका ने समय और समाज के अन्तर्सम्बन्धों की महीन पड़ताल करते हुए जिस निष्पक्षता और रवादारी का परिचय दिया है वह वाकई स्तुत्य है। जो कुछ मुसलमानों ने इस देश में पाया है उसे भी उन्होंने नज़र अंदाज़ नहीं किया है और जो खोया है या खोते जा रहे हैं उससे भी वह आगाह हैं। किसी भी समस्या को बाइपास कर निकल जाने की सुविधा उन्होंने नहीं ढंूढी है।

लेखिका के चिन्तनशील मस्तिष्क और संवेदनशील हृदय की एक-एक परत ने उस दर्द, कर्ब, पीड़ा और छटपटाहट को अपने भीतर महसूस किया है, जिसे सरहद पार के लोग घूँट-घँूट पीने के लिए मज़बूर हैं। बकौल शायर लम्हों ने ग़लती की है और सदियों ने सज़ा पायी है। तकलीफदेह सच्चाई यह है भारत का मुसलमान दोनों जगह परेशान है - सरहद के इस पार भी और उस पार भी। और इस परेशानी का कारण राजनीति का भद्दा चेहरा है। आज़ादी के वक़्त जो लकीर खींची गयी थी धरती के सीने पर - वह अब चैड़ी खाई बन चुकी है। लेकिन राजनीति को परे सरका कर अगर आम इंसानों के दिलों में झांकें तो वहां अपनत्व है, आत्मीयता है, गर्म जोशी है जो इस बात का रौशन सबूत है कि धरती भले ही बट जाये पर इंसानी रिश्ते नहीं बंटते। रिश्तों की महक को कौन चुरा सकता है?.............................................शेष भाग पढ़ने के लिए पत्रिका देखिए

Friday, October 29, 2010

नासिरा शर्मा के बहाने

शीबा असलम फ़हमी

जिस तरह वक़्त कई बार शख़्सियतों को बनाता है उस ही तरह यह वक़्त कई बार उन्हें बनने भी नहीं देता। भारत जैसे सक्रिय लोकतंत्रा में जहां हर विद्या पर सामाजिक सरोकारों को सामने रखकर वरीयताक्रम तय हो रहा हो, वहां यह अपने-अपने में एक विडम्बना हो सकती है कि आप किसी ‘वाद’ या किसी वंचित वर्ग के सांचे में फिट न बैठें।

साहित्यकार नासिरा शर्मा साहेबा को अभी पिछले 6-7 सालों से ही जानती हू। जब ‘हैडलाइन प्लस’ पत्रिका का सम्पादन शुरू किया तो कुछ ऐसे लेखकों की तलाश भी शुरू हुई जो साहित्य के साथ-साथ वृहत्तर विषयों पर भी टिप्पणी कर सकें। यह 2003-04 के दौर की बात है जब ‘गुजरात कांड’ पर कहानियाँ, लघु कथाओं, कथा संग्रहों का उत्पादन बहुत ज़ोर-शोर से चल रहा था। ज़्यादातर रचनाकारों के मुसलमान नाम थे और कम से कम हिन्दी साहित्य में यही लग रहा था कि इस जघन्य कांड पर लिखने की ज़िम्मेदारी शायद सिर्फ़ मुसलमानों पर आ पड़ी है। हिन्दी के इतने बड़े अन्तर्राष्ट्रीय फ़लक पर इस घटना पर संवेदना केवल ‘हिन्दी के मुसलमान लेखकों’ में ही जगी है और इस सच्चाई को महसूस करते हुए ही वह आवरण-कथा ‘हैडलाइन प्लस’ के अक्टूबर 2003 के अंक में छपी थी जो कि 2008 में मीरा सीकरी की बदौलत दस्तावेज़ी अहमियत की हक़दार बन गई और जिसका शीर्षक था ‘हिन्दी के मुसलमान लेखक’। ख़ैर, इस आवरण कथा पर काम करते हुए जिन साहित्यकारों से परिचय हुआ उनमें से एक थीं - नासिरा शर्मा।

उनकी कई रचनाएं पढ़ीं और कुछ एक छापी भी फिर उनसे कई मुलाकातें भी हुईं। इतनी जान-पहचान में यह साफ़ होने लगा कि मैं नासिरा शर्मा की शख़्सियत में एक नई तरह की जटिलता का सामना कर रही हू। फिर उनके बारे में हिन्दी के कुछ बड़े नामों से चर्चा भी हुई। लगा लोग बचते हैं कोई ठोस राय देने से। नासिरा शर्मा के लेखन के कुछ नए तरह के क्लेम हैं। स्त्राी की संवेदना पर जब वह लिखती हैं तो उसके अहसासों की बारीक परतें, उसे मुख्यधारा के ‘स्त्राीवादी’ कोणों से आगे जाकर एक ज़िन्दा औरत और व्यवहारवादी आयाम देती है। आखि़र इन्सानी रिश्ते दो जामा दो बराबर चार की कहानी कहां होते हैं?

यह पहलू उनके दूसरे विषयों में भी उभरता है जैसे कि सामाजिक रिश्तों में जहां ज़िन्दगी तयशुदा खानों में नहीं बंधती। फिर यह कि उनका रचनात्मक फ़लक उतना ही फैला हुआ है जितना कि उनका ज़ाती तजुर्बा।

अन्तर्राष्ट्रीय घटनाक्रम और उससे असमंजित समाज, उससे पीड़ित समाज और उसमें ढलता समाज उनके लेखन के विषय हैं। हिन्दू-मुस्लिम सम्बन्ध, ब्राह्मण-शूद्र सम्बन्ध, स्त्राी-पुरुष सम्बन्ध, इंसान और पूँजीवाद, व्यक्ति और राष्ट्र इन सभी मुद्दों पर नासिरा शर्मा ने कलम उठाई है और उनकी तमाम देश-विदेश यात्राओं ने उन्हें वह बहुमूल्य ‘कच्चामाल’ उपलब्ध कराया है जिसके बिना व्यापक समझ मुमकिन नहीं।

हिन्दी में दूसरे समाजों, ख़ासकर ग़ैर भारतीय मुस्लिम समाजों को, उनके फ्लेवर के साथ (यदि अनुवादों को छोड़ दें) प्रस्तुत करने का खूबसूरत और दिलचस्प काम नासिरा शर्मा ने किया है। हिन्दी साहित्य में आंचलिक जीवन और ठेठ-भारतीयता के उत्सव में यह पहलू नज़रअंदाज़ होता लगता है। लेकिन नासिरा शर्मा के लेखन व शख़्सियत पर मुझे जो कहना है वह कुछ और है।

जयनंदन की मशहूर कहानी ‘कस्तूरी पहचानो वत्स’ की नायिका जुबैदा को संस्कृत के श्लोक पढ़ने के अपराध में ‘ज़बान काट कर’ गूँगा कर दिया गया था, लेकिन वह लड़की क्या करे जिसे ‘मुसलमान-उर्दू-फ़ारसी’ परिवेश की होने के बावजूद यह आज़ादी मिली हो कि चाहे तो उर्दू-फ़ारसी छोड़कर हिन्दी- संस्कृत पढ़े और उसे ही अपना क्षेत्रा बना ले? जिसके पास पत्नी-उत्पीड़न की कहानियों के बजाय यह सुकून हो कि पति हर जगह संबल बने और प्रतिभा के विकास व तराश में आड़े न आकर सहारा दें? हिन्दू-मुस्लिम वैमनस्य की सच्चाई को नकार कर जिस जोड़े ने गंगा-जमुनी तहज़ीब की बुनियाद पर नेह-नीड़ गुंथा हो? शिया-सुन्नी नफ़रत को अपने घर में ख़त्म कर दायरे बढ़ाए हों? ऐेसे आदर्श तजुर्बों की बुनियाद पर जिस तरह की शख़्सियत का निर्माण होगा वह इस दौर की राजनैतिक पहचानों को नकारेगी ही, यह उसकी मजबूरी भी है और ख़ासियत भी।

शायद यही कारण है कि नासिरा शर्मा रचनात्मक लेखन में .............................................शेष भाग पढ़ने के लिए पत्रिका देखिए





















स्त्री-मुक्ति का समावेशी रूप

वेद प्रकाश

नासिरा शर्मा का उपन्यास ‘ठीकरे की मंगनी’ दो दशक पहले प्रकाशित हुआ था। यह सुखद आश्चर्य है कि आज भी इस उपन्यास में स्त्री-विमर्श का एक विश्वसनीय एवं सार्थक रूप मिलता है। यह उपन्यास स्त्रीवाद के समक्ष कुछ चुनौतीपूर्ण सवाल भी व्यंजित करता है। इसीलिए बहुत से स्त्राीवादी इसके निंदक आलोचक हो सकते हैं। कहने का तात्पर्य यह है कि नासिरा शर्मा स्त्री की यातना, उसके जीवन की विसंगतियों-विडंबनाओं पर सशक्त ढंग से विचार करती है। वे सामान्य अर्थों में स्त्रीवादी लेखिका नहीं है। वे नारीवाद की एकांगिता, आवेगिता, आवेगात्मकता को पहचानती हैं। नारीवाद की पश्चिमी परंपरा का प्रभाव तथा उसकी सीमाएं नासिरा शर्मा की दृष्टि में हैं, इसलिए बहुत हद तक वे इन सीमाओं से मुक्त होकर लिखती हैं, उनकी स्त्राी संबंधी दृष्टि कृष्णा सोबती, मन्नू भंडारी जैसी लेखिकाओं की दृष्टि के अधिक निकट ठहरती है। ये लेखिकाएं मौलिक, यथार्थवादी ढंग से स्त्री समस्याओं पर विचार करती हैं। इस संदर्भ में इन लेखिकाओं की रचनाएं द्वंद्वात्मकता से युक्त हैं।

जीवन की अंतःसंबद्धता की उपेक्षा किसी भी प्रकार के लेखन की बहुत बड़ी सीमा हो सकती है। स्त्रीवादी और दलितवादी लेखन को लेकर यह आशंका कम नहीं, अधिक ही है। प्रभावशाली स्त्रीवादी और दलित लेखन वह है जिसमें जीवन की जटिलता और परस्पर संबद्धता की अभिव्यक्ति होती है। बुद्धिजीवी या लेखक, सक्रिय राजनीति के नकारात्मक पहलुओं का चाहे जितना उल्लेख करें लेकिन सक्रिय राजनीति की बड़ी शक्ति यह है कि वह अधिक समावेशी - सबको साथ लेकर चलने वाली होती है। आज की दलित राजनीति इसका सबसे बड़ा प्रमाण है। इस समावेशिता से लेखन को समृद्ध होना चाहिए। स्त्रीवादी एवं दलित लेखन को भी।

नासिरा शर्मा ने ‘ठीकरे की मंगनी’ के माध्यम से हिन्दी साहित्य को महरुख़ जैसा अद्वितीय एवं मौलिक पात्रा दिया है। महरुख़ का जीवन उन स्त्रियों के जीवन का प्रतिनिधित्व करता है जो अपनी मुक्ति को अकेले में न ढूँढकर समाज के उपेक्षित, निम्नवर्गीय, संघर्षरत, शोषितों पात्रों की मुक्ति से जोड़कर मुक्ति के प्रश्न को व्यापक बना देती है। वह ‘मुक्ति अकेले में नहीं मिलती’ पंक्ति को चरितार्थ करती है। बहुत बाद में लिखे गए चित्रा मुद्गल के उपन्यास ‘आवाँ’ की नमिता पाण्डे, महरुख़ की वंशज पात्रा है। यह स्त्री-विमर्श का व्यापक, समावेशी रूप है इसीलिए अनुकरणीय भी। ‘ठीकरे की मंगनी’ उपन्यास के फ्लैप में ठीक ही लिखा गया है कि ‘‘औरत को जैसा होना चाहिए, उसी की कहानी यह उपन्यास कहता है।’’ यह वाक्य औरत को परंपरागत आदर्शवाद की ओर न ले जाकर उसके व्यावहारिक एवं सशक्त रूप की ओर संकेत करता है। उसका स्वयं को समाज की सापेक्षता में देखने का समर्थन करता है। साथ ही पुरुष को जैसा होना चाहिए वैसा होने की माँग भी करता है क्योंकि औरत भी तभी वैसी होगी जैसी उसे होना चाहिए। इन्हीं सब बातों को लेकर चलने वाली महरुख़ की जीवन-यात्रा है। वह जहाँ से आरंभ करती है वह बिन्दु अंत में बहुत व्यापक बन जाता है। जैसे किसी नदी का उद्गम तो सीमित हो लेकिन समुद्र में मिलने से पहले उसका संघर्ष भी है, अनुकूल को मिलाने और प्रतिकूल को मिटाने की प्रक्रिया भी।

समृद्ध और जन-संकुल जै़दी खानदान एक विशाल घर में रहता है। जिसके द्वार ऐसे खुलते हैं मानो जहाज़ के दरवाजे खुल रहे हों। चार पुश्तों से इस खानदान में कोई लड़की पैदा नहीं हुई। जब हुई तो सबके दिल खुशी से झूम उठे। उसका नाम रखा गया महरुख़ - ‘चाँद-से चेहरे वाली। सबकी लाड़ली। दादा तो रोज़ सुबह महरुख़ का मुंह देखकर बिस्तर छोड़ते थे। जै़दी खानदान में बाइस बच्चे थे, जिनकी सिपहसालार महरुख़ थी। उसका बचपन कमोबेश ऐसे ही बीता। उसी महरुख़ की मंगनी बचपन में शाहिदा खाला के बेटे रफ़त के साथ कर दी गई, ठीकरे की मंगनी। शाहिदा खाला ने महरुख़ को गोद ले लिया ताकि वह जी जाए। रफ़त, परंपरागत परिवार में पली-बढ़ी, नाजुक महरुख़ को अपनी तरह से ढालना चाहता है। क्रांति और संघर्ष की बड़ी-बड़ी बातें करता है। पुस्तकें लाकर देता है। महरुख़ अपने को बदलती तो है लेकिन उसकी बदलने की राह और उद्देश्य अलग है। वह क्रांति और आधुनिकता की बातें करने वाले लोगों के जीवन में झाँकती है तो काँप उठती है। वहाँ ये मूल्य फैशन अवसरवाद एवं कुण्ठाग्रस्त हैं। रफ़त दिखने को तो रूस का समर्थक है लेकिन पी-एच.डी. करने अमेरिका जाता है। उसका और उसके दोस्तों का अपना तर्क है, ‘‘पूंजीवादी व्यवस्था देखकर आओ, फिर इन साम्राज्यवादियों की ऐसी-तैसी करेंगे।’’

खुलेपन और प्रगतिशीलता के नाम पर रवि जो माँग एकांत में महरुख़ से करता है, उसे वह स्वीकार नहीं कर पाती। वह रवि की दृष्टि में पिछड़ेपन का प्रतीक बनती है लेकिन महरुख़ का तर्क है, ‘‘उसे हैरत होती है कि इस विश्वविद्यालय में भी औरत को देखने वाली नज़रों का वही पुराना दृष्टिकोण है, तो फिर यह किस अर्थ में अपने को स्वतंत्रा, प्रगतिशील और शिक्षित कहते हैं?’’

नासिरा शर्मा कम्युनिस्ट विचारधारा को मानने वाले कुछ लोगों की सीमाओं और उपभोक्तावाद के दोगलेपन की आलोचना करती है लेकिन वे कम्युनिस्ट विचारधारा की विरोधी नहीं समर्थक हैं क्येकि महरुख़ ने अपने सकर्मक जीवन के माध्यम से इसी विचारधारा को सार्थक बनाया। यह भी कह सकते हैं कि वह इस विचारधारा पर चलकर सार्थक पात्रा बनी। इसके साथ ही लेखिका इस बात की भी अभिव्यक्ति करती है कि परंपरागत, संस्कारी, धर्म को मानने वाले सभी गैरप्रगतिशील तथा जड़ नहीं होते। इस स्तर पर नासिरा शर्मा अनेक रचनाकारों की तरह अग्नीभक्षी या अराजकतावादी नहीं हैं। न ही वे पुराने माने जाने वाले मानवीय मूल्यों की विरोधी लेखिका है। बल्कि वे.............................................शेष भाग पढ़ने के लिए पत्रिका देखिए

Wednesday, October 27, 2010

रास्ता इधर से भी जाता है

सुरेश पंडित

स्त्री-पुरुष के पारस्परिक सम्बन्ध जितने सरल सहज स्वाभाविक दिखाई देते हैं उतने होते नहीं। उनकी जटिलता दुबोधिता व अपारदर्शिता को सुलझाने, समझने व सही तरीक़े से देख पाने के उद्यम प्राचीनकाल से दार्शनिकों, मनोवैज्ञानिकों, विचारकों और लेखकों द्वारा किये जाते रहे हैं लेकिन आज तक कोई उन्हें सुनिश्चित तौर पर स्पष्ट शब्दों में व्याख्यायित नहीं कर पाया है। दोनों के बीच आकर्षण तो सामान्य रूप से स्वीकार कर लिया जाता है लेकिन उसकी परिणति घोर अरुचि में कैसे हो जाती है, कैसे एक दूसरे के लिये कुछ भी बलिदान करने को उद्यत ये दोनों इतने विकर्षण ग्रस्त हो जाते हैं कि एक दूसरे का मुँह तक देखना पसन्द नहीं करते इस रहस्य का पता लगाना आज भी पूरी तरह संभव नहीं दिखाई दे रहा है। मनुष्य ने प्रकृति के रहस्यों का पता लगाकर उनमें ही अनेक पर विजय पा ली है या पाने की ओर अग्रसर हैं पर मनुष्य की प्रकृति अभी तक उसके लिये अज्ञेय बनी हुई है।

स्त्राी-पुरुष को परस्पर एक सूत्रा में बांधे रखने के लिये ही कद्चित विवाह नाम की संस्था बनी होगी। यह संस्था अनेक बुराइयों, दोषों, कमजोरियों के बावजूद आज तक इसलिये चली आ रही है क्योंकि इसका कोई बेहतर, सर्व सन्तुष्टिदायक विकल्प सामने नहीं आया है। यह बात नहीं है कि इसका कभी विरोध नहीं हुआ है या इसे ख़ारिज करने की चेष्टाएँ नहीं हुई हैं लेकिन इसके बरक्स जो कुछ भी रखने की कोशिश हुई वह इससे बदतर नहीं तो इस जैसी भी साबित नहीं हुई। ‘कांट्रेक्ट मैरिज’ और ‘लिविंग टुगैदर’ जैसे प्रयोग इसलिये आम लोगों को स्वीकार्य नहीं हुए क्योंकि उनमें भी स्त्राी-पुरुष के संबंधों की संवेदनशीलता को बनाये रखना, तन और मन की लालसाओं को पूरा करना संभव नहीं हुआ है। आज दोनों के सामने विडंबना यह है कि वे विवाह को नकारना भी चाहते हैं लेकिन ऐसा कर नहीं सकते क्योंकि इसके अलावा और कोई रास्ता नहीं है। जो लोग विवाह कर लेते हैं वे भी दुखी हैं और जो नहीं करते या कर पाते वे भी। आखि़र ऐसा क्या है जो दोनों को किसी हाथ में चैन ही नहीं रहने देता।

इस प्रश्न को केन्द्र में रखकर दुनिया भर के लेखकों ने बहुत-सा साहित्य रचा है और यह आज भी रुका नहीं है। विवाहित जीवन के आदर्श और विवाहजन्य कठिनाइयों से बर्बाद होते दाम्पत्य तथा वैवाहिक मर्यादाओं का अतिक्रमण कर सम्बन्ध बनाते स्त्राी पुरुषों को लेकर लिखे गये अनेक आख्यान जहाँ विश्व साहित्य की धरोहर बन गये हैं वहीं समाज ने उन्हें निन्दा, आलोचना का पात्रा बनाकर छोटी बड़ी अदालतों में घसीटकर चर्चित भी बना दिया है। दरअसल सदियों से चली आ रही विवाह-प्रथा से विभिन्न समाजों के सदस्य इतने अनुकूलित हो गये हैं कि इसकी परिधि से परे बनाये जाने वाले संबन्धों को ये किसी सूरत में हज़म कर ही नहीं पाये। किसी स्त्राी/पुरुष का समय रहते विवाह न होना, वैवाहिक जीवन का सफल न होना, विवाह विच्छेद होना, वैवाहिक प्रतिबद्धता का उल्लंघन करना आदि कुछ ऐसी बातें हैं जो सभी समाजों में आजकल सामान्य हो चली हैं। फिर भी इन्हें सहज रूप मे स्वीकार करने में आज भी भद्र लोग हिचकते हैं और विवाह की मर्यादा को बनाये रखने पर ज़ोर देते हैं यह जानते हुए भी कि ऐसा करना कई बार जानलेवा भी साबित होता रहता है।

विख़्यात कथाकार नासिरा शर्मा का 1987 में पहली बार प्रकाशित उपन्यास ‘शाल्मली’ आज बीस-इक्कीस साल बाद भी पहले जैसी ताज़गी लिये हुए पठनीय बना हुआ है तो इसका कारण उनका कहानी कहने का चमत्कारिक कौशल उतना नहीं है जितना एक ऐसी चिरन्तन समस्या को नये परिप्रेक्ष्य में इस तरह रखना है कि अधिकतर पाठक इसे पढ़ते हुए स्वयं को कहीं न कहीं, किसी न किसी रूप में इससे जुडा़ महसूस करें। उन्हें लगे कि इससे विरूपित शाल्मली या नरेश कई बार कैसी ही प्रतिक्रिया करते हैं जैसी वे स्वयं भी उन परिस्थितियों में करते हैं लेखिका प्रकाशक की घोषणा है कि यह आज की समर्थ नारी को नये आयाम देने वाली शाल्मली की मर्म कथा है। पर ऐसा कुछ इसमें नहीं है। नारी तो हमेशा से ही समर्थ रही है। यह बात अलग है कि उसके सामथ्र्य का रूप समयानुसार बदलता रहा है और उसने अक्सर अपने सामथ्र्य को पहचानते हुए भी उसे ‘असर्ट’ करने में विशेष रुचि नहीं दिखाई है। समर्थ नारी को नये आयाम देने वाली भी कोई ख़ास बात इसमें दिखाई नहीं देती। कहानी की शुरुआत उसी शीतयुद्ध से होती है जो प्रायः हर एकल परिवार वाले घर में चलता रहता है पर बाहर से दिखाई नहीं देता। वैसे भी लोगों को दूसरों के घरों में झाँकने की आदत नहीं रह गई है और न इतना समय ही उन्हें मिल पाता है। साथ ही वे यह भी समझने लगे हैं कि हर घर में चूल्हें प्रायः एक ही तरह से जलते हैं।

विवाह के कुछ दिनों बाद ही शाल्मली को तरह-तरह से यह बोध कराया जाता है कि नरेश पति है और वह पत्नी। उसे पहला झटका तब लगता है जब इन दोनों शब्दों के निहितार्थ ‘स्वामी’ और ‘दासी’, ‘रक्षक’ और ‘रक्षिता’ के रूप में उसे बताये जाते हैं। वह चाहती है कि विवाहजन्य इन आत्मीय संबन्धों को पति पत्नी के पारम्परिक रिश्तों से अलग रखे। पारस्परिक समझ और बराबरी के स्तर पर इस नये जीवन को जीने की एक सुगम राह बनाये। लेकिन अकेले उसके सोचने से क्या होता है। जब तक नरेश स्वयं इस तरह सोचना नहीं शुरू करता तब तक कुछ भी बदला नहीं जा सकता। वह भला ऐसा क्यों सोचे। उसे न तो ऐसा सोचने के संस्कार मिले हैं और न ऐसे साहित्य से उसका वास्ता पड़ा है जो उसे बताता कि वास्तव में इन दोनों शब्दों के समयानुरूप क्या अर्थ हैं या होने चाहिये। इसीलिये उसका संवाद ही इन शब्दों से शुरू होता है - ‘तुम ठहरी एक आधुनिक विचार की महिला... विचारों में स्वतंत्र, .............................................शेष भाग पढ़ने के लिए पत्रिका देखिए

तनी हुई मुट्ठी में बेहतर दुनिया के सपने

अशोक तिवारी

ये उस दौर की बात है जब मैं बारहवीं पास कर अलीगढ़ की ऐतिहासिक ज़मीन पर आगे की पढ़ाई करने के लिए आ चुका था। कोर्स की किताबों के अलावा मेरे और जो शौक थे उनमें एक था पत्रिकाएं पढ़ना। इन पत्रिकाओं में साप्ताहिक हिंदुस्तान, धर्मयुग, सारिका इत्यादि थे। सारिका पत्रिका के अंकों का मुझे इंतज़ार रहता था। मिलते ही चाट जाता। इन्हीं अंकों में उन दिनों ईरान पर कोई लेख छपा था। पढ़ा मगर बांध नहीं पाया। इसी संदर्भ में कुछ दिन बाद साप्ताहिक हिंदुस्तान में भी एक लेख छपा। पढ़ा। लेख से ज़्यादा ये रिपोर्ताज था। मैंने दोनों को मिलाकर पढ़ा। कुछ-कुछ चीजे़ स्पष्ट हुईं किंतु महज़ इतनी ही कि ईरान में जो हो रहा है, अच्छा नहीं हो रहा है। दोनों ही लेख एक ही लेखक के थे - नासिरा शर्मा। नासिरा शर्मा के साथ ये मेरा पहला साक्षात्कार था। नासिरा भी और शर्मा भी। वाह! बिल्कुल नया नाम - एक ऐसा नाम जिसमें एक ओर जहां चार सौ साल पुरानी दीने-इलाही धर्म की महक आती थी वहीं दूसरी ओर प्रगतिशील सोच की एक जि़दा तस्वीर सामने कौंध जाती थी।

क़रीब 27-28 साल बाद नासिरा शर्मा के व्यक्तित्व एवं कृतित्व के साथ गहनता से बावस्ता हुआ। नासिरा शर्मा का साहित्य के क्षेत्रा में जितना योगदान है, उतना ही योगदान साहित्येतर लेखन में भी है। समाज के गूढ़ अंतर्विरोधों को आपने न केवल अपनी कहानियों, उपन्यासों में उकेरा है बल्कि आपने साहित्येतर लेखन में भी उल्लेखनीय योगदान दिया है। आपके साहित्य में एक ओर जहां मानवीय मूल्य एवं सरोकारों की गूढ़ संरचना होती है वहीं दूसरी ओर आमजन के पक्ष में खड़ा होकर आवाज़ को बल देने के सूत्रा भी मौजूद होते हैं।

जाॅर्ज डब्ल्यू. बुश की तबाही के मंजर पूरी दुनिया ने देखे हैं - क्या अफ़ग़ानिस्तान, क्या इराक़़़, दुनिया का हर मुल्क उसकी साम्राज्यवादी नीति की मुख़ालफत करता रहा है। (चंद साम्राज्यवादी नीतियों के पोशक देशों की सरकारों को छोड़कर) बुश की नीतियों का असर दुनिया के और देशों पर ही नहीं स्वयं अमरीका पर भी पड़ा है। अमरीका की साम्राज्यवादी पिपासा शांत होती नज़र नहीं आती। इराक़ और ईरान दो ऐसे देश हैं जो मध्य-पूर्व के सांस्कृतिक इतिहास के बनने बिगड़ने के लिए शुरू से ही साक्षी रहे हैं।

साम्राज्यवाद की एक महती ज़रूरत है चीज़ों को तोड़ते चले जाने की और टूटती चीज़ों पर दिखावटी आंसू बहाने और आंसू पोंछने के बहाने संवेदनाआंे पर क़ब्ज़ा कराने की। साम्राज्यवादी देश उन जगहों पर इस सबमें आसानी से सफल हो जाते हैं जहां पर देश में पहले से ही किसी न किसी स्तर पर असंतोष हो। उसी असंतोष का फ़ायदा.............................................शेष भाग पढ़ने के लिए पत्रिका देखिए











Tuesday, October 26, 2010

अद्भुत जीवट की महिला नासिरा शर्मा

ललित मंडोरा

नासिरा जी के नाम से परिचित था। वह बड़ों के साथ छोटों पर यानी बच्चों के लिए भी लिखती हैं, इसका भी पता था क्योंकि मैं उन्हें चम्पक, नन्दन बाल पत्रिकाओं में पढ़ चुका था मगर नासिरा जी इंसान कैसी होंगी, इसका कोई अन्दाज़ा नहीं था जबकि उनका चित्रा उन रचनाओं के साथ छपे बारहा देख चुका था। याद करें कि कब नासिरा जी के रूबरू हुआ तो याद आता है कि वह मानव अधिकार पर आयोजित ट्रस्ट की कार्यशाला थी जो भोपाल में होना तय पाई थी। नासिरा जी और पंजाबी की लेखिका बंचित कौर को एक साथ भोपाल पहुँचना था। उस समय डा. वर्षादास (प्रख़्यात अभिनेत्री नदिता दास की माँ नेशनल बुक ट्रस्ट में मुख्य सम्पादक एवं संयुक्त निदेशक के पद पर कार्यरत थीं।) वह हमारे साथ थीं। उस कार्यशाला में हिन्दी के वरिष्ठ कथाकारों को बुलाया गया था। मधुकर सिंह, रमेश थानवी, गिरीश पंकज। कार्यशाला में उठते-बैठते महसूस हुआ कि नासिरा जी स्वभाव में सहज हैं। एक बड़ी लेखिका का इतना सरल होना भी वाकई आचंभित करना खासकर तब और जब उस कार्यशाला की अन्य लेखिका की बिखरी कहानी को समेटते संवारते देखता।

भोपाल शहर से दूर होटल में ठहरने का इंतज़ाम यह सोचकर किया गया था ताकि लेखक वर्ग कहीं निकल ही न सके और पूरे ध्यान और समर्पण से इस विषय पर सुन्दर कहानियाँ दे। इस कार्यशाला में नासिरा जी को दो कहानियाँ पसन्द की गई पहली ‘पढ़ने का हक़’ और दूसरी ‘सच्ची सहेली’। इन दोनों कहानियों को नवसाक्षरों के सामने पढ़कर पाण्डुलिपि को सम्पूर्ण स्वीकार करना था ताकि वह भाषा के साथ कहानी के केन्द्र में उठाई समस्या को उन लोगों द्वारा कसौटी पर कसे जिनके लिए यह कहानी लिखी गई है। नासिरा जी की दोनों कहानियाँ पसन्द कीं। सुझाव पर उन्होंने बिना झिझके वह तेवरी पर बल डाले, हिम्मत की जगह हौसला लिखना स्वीकार किया। नासिरा जी जितनी सौभ्य एवं गम्भीर लगती हैं उतना ही उनमें सेन्स आॅफ ह्यूमर है। इसका अन्दाज़ा उनके साथ रहकर ही लगता है जब आप या तो मुस्कराए बिना नहीं रहते या फिर ज़ोर का ठहाका लगाए बिना। बतौर मिसाल खाने का इन्तज़ाम मेरे ज़िम्मे था सो मैंने पूछा खाने पर ‘पीली’ दाल चलेगी। उनका जवाब था ‘‘नीली दाल भी ठीक रहेगी।’’

उनके स्वभाव की गर्मी और नर्मी ने मुझे जहाँ प्रभावित किया वहीं उनसे भय भी भागा और इच्छा हुई कि एक साक्षात्कार उनसे लूँ। दिल्ली लौटते हुए ‘ट्रेन में उनका साथ रहा। वह इच्छा भी पूरी हुई। चलती ट्रेन की गति बैकग्राउन्ड म्यूज़िक की तरह उनके जवाब और मेरे सवाल के संग मेरे छोटे से टेप रिकार्डर में टेप होती रही। मेरे बैग में बच्चों के खिलौने देख उन्होंने मेरे परिवार के बारे में पूछा और मुझे महसूस हुआ कि जो यात्रा लेखिका के आतंक से शुरू हुई थी वह एक इन्सानी मिठास पर ख़त्म हुई।

दिल्ली पहुँच कर मैं अपनी पत्नी के संग उनके सरिता विहार वाले फ्लैट में मिलने गया। वक़्त तेज़ी से बीत रहा था। इस बीच मेरा एक कविता संग्रह ‘दीवार पर टंगी तस्वीर’ नाम से आया और मेरे कहने पर उन्होंने उसकी समीक्षा लिखी जो गगनांचल में छपी। उनको इस बर्ताव ने मुझे महसूस कराया कि उनमें नए लिखने वालों के प्रति प्रोत्साहन एवं अपनापन है। उनका जुड़ाव ट्रस्ट से कई स्तरों पर बढ़ रहा था। इस बीच उनसे मुलाक़ात जामिया के रिसोर्स सेंटर की कार्यशाला में हुई। जहाँ उनकी कहानी ‘गिल्लो बी’ और ‘धन्यवाद धन्यवाद’ पसन्द की गई और मुझे जाने क्यों अफ़सोस हुआ और मैंने नासिरा जी से कह भी दिया कि ‘गिल्लो बी’ कहानी काश हम, यानी नेशनल बुक ट्रस्ट छापता और तब उन्होंने वर्षों पुरानी एक बात बताई कि उनकी कहानी- ‘एक थी सुल्ताना’

सुल्ताना जो वर्कशाप में पास होकर भी नहीं छप पाई थी। क्यांेकि उसका विषय गुज़ारा भत्ता और तलाक़ थी। बात आई गई हो गई मगर उनके ज़हन में वह बात फिर उभरी जब उनकी दोनों पुस्तकों के मुख्य पृष्ठ पर न उनका नाम था और न कापीराइट उनका था। यह सब हमारे साथ भी घटा था। बुरा भी लगा था। तब उन्होंने फ़ोन कर न केवल रिसोर्स सेन्टर जामिया में अपनी नाराज़गी जताई बल्कि इस बात की निन्दा भी की वहाँ लेखक से उसका कापीराइट ले लिया जाता है। नासिरा जी एक राइटर के अधिकार को समझने वाली ही महिला नहीं हैं बल्कि उनका विश्वास इस बात पर भी है कि यदि हमने मुद्दों पर आवाज़ न उठाई तो आने वाली पीढ़ी को अपने लेखकीय अधिकारों के लिए ख़ासी जद्दोजहद करनी पड़ेगी। और वह फिर रिसोर्स सेंटर जामिया नहीं गई मगर बहुत से लेखक गए।

कुछ वर्षों बाद जयपुर में की गई एक दिवसीय संगोष्ठी का आयोजन राज्य संदर्भ-केन्द्र, जयपुर ने अपने प्रांगण में किया था जिसकी पंक्तियाँ आज भी मुझे याद हैं। उन्होंने कहा था ‘‘नवसाक्षर लेखन के लिए ऐसे लेखकों का चयन किया जाना चाहिए जो अपनी ज़मीन से जुड़े हुए हों और नवसाक्षरों के मनोविज्ञान से परिचित हों’’ इस बैठक में रमेश थानवी, प्रो. अजित कुमार जैन, डाॅ. भगवतीलाल व्यास, डा. नन्द भारद्वाज, कमला नाथ शास्त्राी ने अपने विचार रखे थे। सबसे मिलती-जुलती बिना थके वह हमारे साथ बाज़ार घूमती रहीं। ज्वेलरी की दुकानों, चादरों, चूरन व नमकीन के स्वाद का अवलोकन करती रहीं थीं। नासिरा जी के वैविध्य को समझने का हम सबको मौका दे रहा और मैं सुबह की घटना के बारे में सोच .............................................शेष भाग पढ़ने के लिए पत्रिका देखिए















मेरे जीवन पर किसी का हस्ताक्षर नहीं

नासिरा शर्मा

यदि कोई पूछे कि इलाहाबाद का सबसे खूबसूरत और जानदार इलाका कौन- सा है तो मैं कहूगी नखास कोना और उसके आसपास का वह सारा इलाक़ा जो मेरी कहानियों में धड़कता है। क़ायदे से मुझे अपने घर और मोहल्ले से प्यार होना चाहिए था मगर इश्क़ मुझे बहादुरगंज, कोतवाली, घंटाघर, ठठेरी बाज़ार, बर्फवाली गली, सब्ज़ी मंडी, पत्थरगली, चुड़ैलीवाली गली, स्टेशन रोड गढ़ी, सराय वगैरह से है जहाँ गलियों के डेल्टा और मधुमक्खियों के छतों की तरह मकानों की भरमार है। लाख चाहू कि कहानी किसी और मोहल्ले की लिखू मगर मेरा रचनाकार ज़िन्दगी से भरपूर इसी परिवेश में पहुंच जाता है। कोतवाली के अलावा कोई और थाना, थाना ही नहीं लगता है। मीर अम्मन देहलवी ने भी अपने समय के कुछ इसी तरह के इलाके का ज़िक्र अपनी प्रसिद्ध कृति ‘बाग व बहार’ में किया था जहाँ खोया से खोया छिलता है।

बाज़ार, दुकान, खोंचे वाले, मकान, हवेली, मन्दिर- मस्जिद, ताड़ीखाना, हमामघर, पुराने पटे कुएँ, लकड़ी का टाल, बोसीदा इमारतें, रिक्शा, इक्का, साइकिल, मोटर, जीप, पैदल गर्जकि ऐसा कुछ नहीं है जो वहाँ आपको ज़िन्दगी से जूझता नहीं मिलेगा। यहाँ तक घूमती भटकती गायें और रास्ता रोके साँड़ तो हर शहर की शान हैं मगर यहाँ की रौनक भारी थनों पर थैला चढ़ाए बकरियां अपने बच्चों के साथ गली में कुलायें भरती नज़र आती हैं और किसी घर का दरवाज़ा खुला मिला तो अन्दर घुस बड़ी बेतकल्लुफी से बिना जान पहचान, सलाम दुआ के वह पेड़ों और पौधों पर मुँह मारने लगती हैं। उन्हीं की तरह बत्तखें और मुर्गियाँ हैं। जो टहलती घूमती कीचड़ से भरी नाली में चोंच डाल दाना ढूढ ही लेती हैं। मगर अंडे अपने दर्बे में जाकर देती हैं। अगर आप गधों के झुण्ड में फँस गए तो फिर कहना ही क्या। ऊपर से मलाई बर्फ वाले, कुल्फी वाले, चूरन वाले और जाने क्या-क्या सर पर उठाए फेरी वाले दोपहर में सोने नहीं देंगे। इस सारे शोर के साथ लाउडस्पीकर पर पाँच वक़्त आज़ान और अखंड कीर्तन का पाठ। इस इलाके में पहुँचकर दिल घबराने का सवाल ही नहीं है। आखिर मारपीट और माँ बहन की गालियों से गुलज़ार गली के नुक्कड़ और मोड़ आपको उदास होने ही नहीं देते हैं।

इस इलाके के भूगोल का छोटा-सा ब्यौरा आपको देती हँू। एक ही रास्ता आधा पत्थरगली कहलाता है और आधा शाहनूर अलीगंज। पत्थरगली में मेरा हमीदिया गल्र्स कालेज और शाहनूर अलीगंज में मेरी मौसी का घर। आधी गली में हिन्दुओं के घर और मन्दिर। बाकी गली में मुसलमानों के मकान और मस्जिदें। रास्ते को दायें काटती.............................................शेष भाग पढ़ने के लिए पत्रिका देखिए









Monday, October 25, 2010

नासिरा शर्मा- जितना मैंने जाना

डा. सुदेश बत्रा

वह दिसम्बर 1991 का कोई दिन था - शायद 18 दिसम्बर - जब मैंने पहली बार नासिरा शर्मा को देखा - गोरा, गुलाबी आभा लिए दमकता रंग, नीली भूरी चमकती आँखें, उभरे गाल, गुलाबी रंगत लिए अघरों पर हल्का स्मित, लम्बे सीधे खुले बाल, कानों में हरे रंग के कीमती नगों वाले खूबसूरत कर्णफूल, हरे रंग की प्रिन्टेड सिल्क की साड़ी में लिपटा मझोला कद- मैं जैसे उनके चेहरे में शाल्मली को ढूढ रही थी और शाल्मली के माध्यम से उस सुलझी दृष्टि और नायिका की स्वाभिमानी मगर अन्तर्मुखी गरिमा को। उस समय मुझे लगा था - जैसे मेरे मन में छिपे सारे अन्तद्र्वन्द्वों और हलचलों को इन्होंने कैसे पन्नों पर साकार कर दिया है - मेरी संवेदनशीलता को शाल्मली ने भीतर तक एकाकार कर लिया था।

नासिरा शर्मा ने शाल्मली के माध्यम से पति-पत्नी के सम्बन्धों, समीकरणों और समझौतों को द्वन्द्वात्मक रूप में चित्रित किया है। वह पुरुष वर्चस्व एवं व्यवस्था के उपनिवेश के खिलाफ़ संघर्ष भी करती है और उसका हिस्सा भी बनती है। एक ओर वह मुक्तिकामना से छटपटा रही है, दूसरी ओर अपने मनोजगत् से व्यवहार जगत् तक निःसंग न रह पाने के कारण अपने संस्कारों से आक्रान्त भी है। किसी भी लड़ाई के लिए मोहासक्ति से बाहर आना पहली शर्त है। नारी अस्मिता का मुख्य तर्क समाज में उसकी सत्ता और स्थिति का मापदण्ड स्थापित करने का है। विश्व के प्रत्येक धर्म, वर्ग, जाति और समाज में दोहरी स्थितियाँ स्त्री-स्वातन्त्रय की कोई सर्वमान्य परिभाषा नहीं गढ़तीं।

नासिरा जी का साहित्य विविधवर्गीय है। चरित्रा की अन्तरात्मा में उतरना उन्हें बखूबी आता है। शाल्मली के चरित्रा का विकास अनेक छवियों में साकार रूप में आबद्ध है तो ‘ठीकरे की मंगनी’ की महरुख अपने आधुनिक मगर स्वतन्त्र वजूद के लिये लड़ती स्त्राी के रूप में भी उतनी ही जीवंत है।

नासिरा जी से अक्सर अनेक मुद्दों पर खुली चर्चा हुई है। वे आधुनिकता के नाम पर स्त्राी स्वच्छन्दता की पक्षधर नहीं है। वे हर हाल में विवाह और परिवार को बनाये रखने में विश्वास रखती है, अगर एक बार ये आधार खंडित हो गए तो नयी पीढ़ी फैशन के नाम पर अनेक विकृतियों और असाध्य रोगों की शिकार हो जायेगी, जिसका प्रभाव समाज पर दूरगामी रूप में स्वस्थ नहीं होगा। इसीलिए उनके नारी पात्रा आधुनिक होते हुए भी उच्च्छृंखल नहीं हैं।

मैं सम्मेलन के कार्यक्रमों के आयोजन में अत्यधिक व्यस्त थी और उनसे खुलकर बात नहीं कर पाई थी, परन्तु आते-जाते उनके उद्बोधनों को सुनने का लोभ भी संवरण नहीं कर पा रही थी। सभी मेहमान बहुत खुश थे। सम्मेलन के समापन पर विदा होते हुए वे सीढ़ियां उतरकर नीचे के चबूतरे पर सहज भाव से बैठ गई थीं। उनकी आँखें बोलती भी हैं और सामने वाले के भीतर को भेदती भी हैं। अचानक मेरी ओर देखकर बोलीं - ‘आपको देखकर मुझे सद्दाम हुसैन की याद आती है’ - आस-पास खड़े हुए सभी लोग हैरानी से चैंक पड़े - कम से कम मुझे तो उनसे अपने लिए ऐसी टिप्पणी की उम्मीद न थी - सबकी आँखें प्रश्नवाचक चिद्द बन गई थीं - ‘आपको मैं दो दिन से देख रही हँू - आप सबको सम्भाल भी रही हैं, मेहमानों का स्वागत भी कर रही हैं, बीच-बीच में आकर माइक पर टिप्पणी भी कर जाती हैं, लेकिन इतनी भाग-दौड़ के बाद भी आपके चेहरे पर शिकन तक नहीं है’ - फिर पल भर रुक कर बोलीं - ‘बाहर चाहे बम बरस रहे हों पर सद्दाम हुसैन बिना चेहरे पर शिकन डाले, शान्त भाव से अंदर मीटिंग में भाषण दे रहा होता।’ - मुझे याद है, कुछ की चुप्पी के बाद वहाँ एक ज़ोरदार ठहाका गूँज गया था। बरसों बीत गए, इस बात को, पर मैं उनकी टिप्पणी को कभी नहीं भूल पाती। मुझे पता लगा था - नासिरा जी फ़ारसी भाषा की विदुषी हैं और उन्होंने ईरान, इराक, अफ़गानिस्तान तथा अरब देशों में बहुत यात्राएं की हैं तथा वहाँ के जीवन, कानून, धर्म और विशेष रूप से नारी की स्थिति पर बहुत शोध किया है। उनका दृष्टिकोण सदा स्थितियों को यथारूप स्वीकार न कर क्रांतिकारी चेतना का रहा है, मगर ढेर सारे बुनियादी प्रश्नों को उठाते हुए वे इन्सानियत की जीत में विश्वास रखती हैं। ‘बुजकशी का मैदान’ और ईरानी क्रांति पर आधारित ‘पुनश्च’ का विशेषांक उनकी इस चेतना के साक्षी हैं।

नासिरा जी जयपुर कई बार आईं हैं। उन्हें मंच से सुनना एक सुखद अनुभव होता है। उन्होंने एक बार कहा था - पत्राकारिता चीते की सवारी करना है। जन के बीच धँस कर सच्चाई निकालना चीते पर नियन्त्राण करने जैसा है। उनकी उर्दू, फ़ारसी युरू भाषा का ठहरा, गंभीर अंदाज़ और विचारों की धारा-प्रवा.............................................शेष भाग पढ़ने के लिए पत्रिका देखिए















Sunday, October 24, 2010

नासिरा शर्मा विशेषांक

विशेषांक उपलब्ध (मूल्य-150/ रजि. डाक से)







नासिरा शर्मा विशेषांक


सम्पादकीय


नासिरा शर्मा मेरे जीवन पर किसी का हस्ताक्षर नहीं


सुदेश बत्रा नासिरा शर्मा - जितना मैंने जाना


ललित मंडोरा अद्भुत जीवट की महिला नासिरा शर्मा


अशोक तिवारी तनी हुई मुट्ठी में बेहतर दुनिया के सपने


शीबा असलम फहमी नासिरा शर्मा के बहान


अर्चना बंसल अतीत और भविष्य का दस्तावेज: कुंइयाँजान


फज़ल इमाम मल्लिक ज़ीरो रोड में दुनिया की छवियां


मरगूब अली ख़ाक के परदे


अमरीक सिंह दीप ईरान की खूनी क्रान्ति से सबक़


सुरेश पंडित रास्ता इधर से भी जाता है


वेद प्रकाश स्त्री-मुक्ति का समावेशी रूप


नगमा जावेद ज़िन्दा, जीते-जागते दर्द का एक दरिया हैः ज़िन्दा मुहावरे


आदित्य प्रचण्डिया भारतीय संस्कृति का कथानक जीवंत अभिलेखः अक्षयवट


एम. हनीफ़ मदार जल की व्यथा-कथा कुइयांजान के सन्दर्भ में


बन्धु कुशावर्ती ज़ीरो रोड का सिद्धार्थ


अली अहमद फातमी एक नई कर्बला


सगीर अशरफ नासिरा शर्मा का कहानी संसार - एक दृष्टिकोण


प्रत्यक्षा सिंहा संवेदनायें मील का पत्थर हैं


ज्योति सिंह इब्ने मरियम: इंसानी मोहब्बत का पैग़ाम देती कहानियाँ


अवध बिहारी पाठक इंसानियत के पक्ष में खड़ी इबारत - शामी काग़ज़


संजय श्रीवास्तव मुल्क़ की असली तस्वीर यहाँ है


हसन जमाल खुदा की वापसी: मुस्लिम-क़िरदारों की वापसी


प्रताप दीक्षित बुतखाना: नासिरा शर्मा की पच्चीस वर्षों की कथा यात्रा का पहला पड़ाव


वीरेन्द्र मोहन मानवीय संवेदना और साझा संस्कृति की दुनियाः इंसानी नस्ल


रोहिताश्व रोमांटिक अवसाद और शिल्प की जटिलता


मूलचंद सोनकर अफ़गानिस्तान: बुजकशी का मैदान- एक


महा देश की अभिशप्त गाथा


रामकली सराफ स्त्रीवादी नकार के पीछे इंसानी स्वरः औरत के लिए औरत


इकरार अहमद राष्ट्रीय एकता का यथार्थ: राष्ट्र और मुसलमान


सिद्धेश्वर सिंह इस दुनिया के मकतलगाह में फूलों की बात


आलोक सिंह नासिरा शर्मा का आलोचनात्मक प्रज्ञा-पराक्रम


मेराज अहमद नासिरा शर्मा का बाल साहित्य: परिचयात्मक फलक


बातचीत


नासिरा शर्मा से मेराज अहमद और फ़ीरोज़ अहमद की बातचीत


नासिरा शर्मा से प्रेमकुमार की बातचीत

वाङ्मय त्रैमासिक

शोध आलेख/आलेख

डा. परमेश्वरी शर्मा/राजिन्दर कौर

देह और देश के दोराहे पर अज़ीजु़न/10

डा. शान्ती नायर

नगाड़े की तरह बजते शब्द/19

वंदना शर्मा

रामचरितमानस की काव्यभाषा में रस का स्वरूप/26

डा. मजीद शेख

साहित्य सम्राट: मंुशी प्रेमचंद/31

अंबुजा एन. मलखेडकर

मीराकान्त: एक सवेदनशील रचनाकार/36

मो. आसिफ खान/ भानू चैहान

काला चांद: एक विवेचन/39

डा. रिपुदमन सिंह यादव

समकालीन परिप्रेक्ष्य में हिन्दी की दशा एवं दिशा/42

सलीम आय. मुजावर

डा. राही मासूम रजा के कथा साहित्य में विवाह के प्रति बदलते दृष्टिकोण/45

डा.एन.टी. गामीत

मन्नू भंडारी की कहानियों में आधुनिक मूल्यबोध/50

कविता/ग़ज़ल/आपबीती

संजीव ठाकुर

खूनी दरवाज़ा/53

अलकबीर

भारतबासी- 1/30 भारतबासी- 2/59 भारतबासी- 3/54

डा. मधू अग्रवाल

आज़ादी/44

विजय रंजन

ज़िंदगी/35

मूलचन्द सोनकर

लोग अम्बेडकर जयन्ती मनाते रहे और मैं अपने नवजात श्वान-शिशु का प्राण बचाने...../55

लुघकथा/कहानी

अशफाक कादरी की लुघकथाएं/60

नदीम अहमद ‘नदीम’ की लुघकथाएं/61

जयश्री राय

उसके हिस्से का सुख/62

पुस्तक समीक्षा

चक्कर (कहानी-संग्रह) समीक्षक- शिवचंद प्रसाद/66

विरह के रंग(कविता-संग्रह),चाँद पर चाँदनी नहीं होती (ग़ज़ल-संग्रह), समीक्षक- मो. अरशद/69

चक्कर से टक्कर

डा. शिवचन्द प्रसाद

‘चक्कर’ दलित-चेतना पर केन्द्रित जवाहरलाल कौल ‘व्यग्र’ का तेरह कहानियों का प्रकाशित (सन् 2009) संग्रह है जिसमें ब्राह्मणवादी आभिजात्य के मिथ्याभिमान और उसके द्वारा चलाये जाते विभिन्न दुष्चक्रों का बड़ी शालीनता के साथ सामना किया गया है। कौल की कहानियाँ अपने समय का साक्षात्कार करती हुई युग-बोध से उद्भूत दलित-संवदेना की विभिन्न चुनौतियों-असमानता, त्रास, अस्पृश्यता, अपमान, शोषण-दलन-उत्पीड़न से निर्भय होकर जूझती हैं तो दूसरी तरफ दलित सौंदर्यशास्त्रा को एक नया आयाम भी देती हैं। यहाँ पुरानी कहानी ‘नया पाठ’ (नया कफन, सद्गति-गाथा और ठाकुर के कुएं का पानीहै तो जाति-देश से उभरा अम्बेडकरवादी समतामूलक बौद्ध-दर्शन भी है, स्वानुभूति है तो सहानुभूति भी है। जहाँ चक्कर से टक्कर के लिए कबीर और रैदास की परम्परा है तो अंधविश्वासों को मौन निरन्तर कर देने वाला दलित-चिंतन भी है। मुंशी किशनचन्द (चक्कर कहानी) को बड़े-छोटे, जाति, धर्म-संप्रदाय, अलगाव, आतंक, विध्वंश आदि जैसे प्रश्न-चक्कर में डाले हुए हैं। उनके सामने एक ओर तो प्रवाचक शुक्ला जी का वसुधैव कुटुम्बकम् वाला शाश्वत सूक्त वाक्य है तो दूसरी ओर विभिन्न पंथ और खेमों में बंटे रक्त-पिपासु लोग फिर, मुंशी जी सोचते हैं- ‘‘यह कैसे हो सकता है? संसार के सारे लोग एक कैसे हो सकते हैं? मानववाद की कल्पना कोरी बकवास है। संसार के विभिन्न देशों में तरह-तरह की जातियां है। उनका इतिहास उनकी संस्कृति एक दूसरे से भिन्न है। एक जाति दूसरी जाति से अपने धर्म, अपनी सभ्यता के उत्थान में होड़ लगाती है। आपस में कलह मचता है, युद्ध होता है। उस समय शुक्ल जी का वसुधैव कुटुम्बकम् वाला नारा फेल हो जाता है।’’ (पृ. 3) यही सब देखकर ज्ञानचन्द्र (नास्तिक) का भगवान पर से यकीन उठ जाता है। वह कहता है- ‘‘मंदिर में शंकर के रूप में भगवान नहीं है। अगर होता तो अपने मानने वालों में भेद कैसे करता? कुछ को अपने पास बुलाकर पूजा स्वीकार करता और कुछ दूर से ही पूजा करने के लिए बाध्य होते? यह पूजा पाठ आस्था सब दिखावा है, झूठ है।’’ (पृ. 74) भला ऐसे दृश्य को देखकर तुलसी बाबा कैसे गा सकते हैं- सियाराम-मय सब जग जाती?

जाति-पाति के वैषम्य की यह खाई यदि कभी पटती हुई नज़र आती है तो यथास्थितिवादी जड़ ब्राह्मणवाद को लगता है कि उसकी अर्थी उठने वाली है, उसका बड़प्पन, कुलीनता और उच्चभिमान आदि धूं-धूंकर जलने लगते हैं। यही कारण है कि दंगल कहानी के पहलवान इन्द्रजीत पाण्डे को दलित सहानुभूति वाले पहलवान इन्द्रजीत पाण्डे को दलित सहानुभूति वाले पहलवान श्यामसुंदर तिवारी की हरकते रास नहीं आती है और एक दिन अपनी भड़ास तिवारी पर उतार ही देते हैं- अरे तिवारी जी। यह सब क्या कर रहे हो? अंखाड़े में जाति-पाति की लाश गाड़कर बिना भेद-भाव के सब को कुश्ती लड़ा रहे हो, छोटाई-बड़ाई खत्म हो नयी क्या? नीच जाति वाले देह रगड़कर जब ऊँची जाति वालों से लड़ेंगे तो कहां रह जायेगी

शेष भाग पत्रिका में..............



उसके हिस्से का सुख

जयश्री राय



रतनी बाल विधवा थी। चार-पांच घरों में काम करके अपना पेट पालती थी। जोशी जी के गोदाम घर के एक कोने में उसे रहने दिया गया था। बदले में वह उनके मंूगफली के खेत पटाया करती थी। खलिहान की साफ़-सफाई की जिम्मेदारी भी उसी पर थी।

उस जले तवे-सी काली-कलूटी औरत के चेहरे में ऐसा ज़रूर कुछ था जो बरबस अपनी ओर खींचता था। वह अपने झकमकाते दाँतों को निकालकर ऐसे उजली हंसी हंसती थी कि एक पल को उसका बसंत के दागों से भरा चेहरा भी जैसे सुंदर बन पड़ता था। अपनी अनगिन हड्डियाँ बजाती हुई वह दस भुजा की तरह रात-दिन काम में लगी रहती थी। लगता था, वह हाथों से नहीं, अपनी जीभ से चाटकर घर-आंगन साफ करती है। उसे काम करते हुए देखकर प्रतीत होता था, एक साड़ी ही हवा में बिजली की तरह लहराती, कौंधती फिर रहीं हैं। उसका अमावश्या-सा गहरा काला रंग उसे अंधेेरे में प्रायः अदृश्य ही कर देता था। पुकारो रतनी और तत्क्षणात सामने बत्तीस दाँत झमझमा उठे तो समझो वही मटमैली रोशनी में चुड़ैल की तरह नाचती फिर रही है।

वह जितना काम करती थी, खाती उससे दो गुना थी। उसे खाना खाते हुए देखना भी अपने आप में एक अनुभव होता था। स्तूपाकार भात को गोग्रास में खाती हुई पता नहीं वह साँस कब लेती थी। मैं अक्सर सोचती थी, कुत्ते जैसी उसकी क्षीण कटि में गंधर्वमादन पर्वत-जैसा वह भात का ढेर समाता कैसे था। पूछने पर उसी उजली हंसी की वन्या में कल-कल, छल-छलकर उठती थी-क्या दीदी, पेट में ईधन नहीं डालूंगी तो ये रात-दिन का हाड़ तोड़ काम कैसे करुंगी? इसी दावानल में तो अपना सबकुछ झोक चुकी, बेहया बनकर जी रही हूँ! कितना कोसा सबने-करमजली, कब तक जीयेगी...हंसते-हंसते वह अपनी आँखें पोछती-ये जठर अग्नि जो न कराये कम है...

सुबह मैं उसे ठाकुर साहब के यहाँ धपर-धपर धान कूटते देखती तो सांझ को ललायिन के कुएं को जगत में बैठी बर्तनों का अंबार चमकाते हुए...धूसर संध्या की डूबती रोशनी में हवा में टंगी किसी सफे़द साड़ी पर लाल जबा फूल दगदगाते देख कोई ठटरटा करता-लो, रतनी अभिसार पर निकली...पट् अंधेरा गरज उठता-मुँह संभालकर, रतनी कोई ऐसी वैसी न है...मुहल्ले वाले भी उसकी सत् चरित्रा का लोहा मानते थे। रतनी लाख दुःख झेले, भूख सहे, मगर मजाल है कि किसी को आज तक अपने कंधे पर भी हाथ धरने दिया हो। एकबार चैबे जी धूसर संध्या की यवनिका का लाभ उठाते हुए गर्म जलेबी का दोना हाथ में लिए दबे पांव गोदाम की सीढ़िया चढ़ गये थे और फिर थोड़ी ही देर बाद एक टांग पर फूदकते हुए वापस लौटे थे। पीपल के नीचे धूल में लोट-लोटकर फिर वह हाय-तौबा मचायी थी कि देखने सुनने वाले दहल कर रह गये थे। चैबे की घरवाली छाती पीट-पीटकर रतनी को कोसती रही थी और रतनी ताच्छिलय से तिर्यक मुसकराती हुई गरम जलेबियाँ उड़ाती रही थी। ‘‘मेरे घर का सत्यनाथ करके जलेबी भकोस रही है बेहया ब्राह्मण हत्या का पाप लगेगा तुझे कीड़े पडंे़गे मोटे-मोटे..।’’

न जाने कितने ब्राह्मणों, कुलीनों का धर्म भ्रष्ट कर रतनी

शेष भाग पत्रिका में..............

नदीम अहमद ‘नदीम’ की लुघकथाएं

एक ही सफ में

सरफराज साहब शहर में आला सरकारी अफसर है। जुमे की नमाज़ ज़रूर पढ़ते है। सोचते हैं सप्ताह में एक बार तो कम से कम मालिक की इबादत मस्जिद में सामूहिक रूप से कर सके। सरफराज साहब अत्यन्त विनम्र एवं सुलझे विचारों के इन्सान है। दिनभर घर कार्यालय में लोगों की जी हुजूरी से परेशान हो जाते हैं। सोचते थे मस्जिद में एक सामान्य आदमी की तरह दो घण्टे सुकून से गुज़ारेंगे। एक दिन तो हद हो गई। सरफराज साहब किसी कारणवश मस्जिद देर से पहुंचे पीछे की पंक्ति में जगह मिली बैठने ही वाले थे कि आगे की सफ (पंक्ति) में बैठे अली ने उन्हें आगे की सफ में आने की दावत दी। लेकिन सरफराज आगे की सफ में नहीं गए जहां मिली वहीं बैठ गए।

नमाज़ के बाद सरफराज साहब मस्जिद के मुख्य द्वार के पास अली की प्रतीक्षा करने लगे। अली बाहर आया। साहब उसके कंधे पर हाथ रखकर दूसरी तरफ ले गए। बोले ‘अली साहब कभी भी आदमी को उसके रूतबे नहीं आंकना चाहिए।’ खासतौर पर मस्जिद में क्या आपने यह शेर नहीं सुना ‘‘एक ही सफ में खड़े हो गए महमूदों अयाज, न कोई बन्दा रहा न बन्दा नवाज़’’ अली शर्मिन्दा था। उनके मँुह से शब्द नहीं निकल रहे थे।

आॅब्लाईज

बैंक मंैनेजर के मृदु व्यवहार से राहुल बहुत खुश था उसकी सारी आशंकाएं निर्मूल सिद्ध हो रही है। मैंनेजर बिल्कुल दोस्त के सदर्श व्यवहार कर रहा था। बैंक से मकान ऋण स्वीकृत हो गया। राहुल को महज हस्ताक्षर या बैंक द्वारा चाहे गए दस्तावेज उपलब्ध करवाने के अतिरिक्त कुछ नहीं करना पड़ा। बैंक के चक्कर लगाने जैसी कोई बात नहीं थी। राहुल तो अपने मिलने वाले हर व्यक्ति से बैंक मैंनेजर की तारीफ कर रहा था।

एक दिन बैंक मंैनेजर का फ़ोन राहुल के मोबाईल पर आया। बोले राहुल के साथ चाय पीना चाहते हैं। राहुल खुश था मैनेजर साहब आए औपचारिक बातों के बाद निजी इंश्योरेंस कम्पनी की योजनाओं की जानकारी देने लगे। बताया कि उनका बेटा के बाद एजेन्ट है और मंैनेजर साहब ने अधिकार पूर्वक एक फाॅर्म राहुल की ओर दस्तख्त के लिए बढ़ा दिया। बैंक मैंनेजर का मृदु व्यवहार अब राहुल के लिए चिन्तन का विषय था।

वक्त-वक्त की बात

शहर के नामी सेठ हजारी की कोठी दुल्हन की तरह सजी थी, अवसर था उनकी बेटी

शेष भाग पत्रिका में..............

अशफाक कादरी की लुघकथाएं

राजनीति



समाज के स्नेह मिलन कार्यक्रम में नगर विधायक एवं मंत्राी जी मुख्य अतिथि के रूप में विराजमान थे। मंत्राी जी के विरोधी दीवान साहब भी कार्यक्रम में उपस्थित थे। राजनीति के हर मोर्चे पर मंत्राी जी के हाथों शिकस्त खाए दीवान साहब की मौजूदगी सभी के लिए आश्चर्य की बात थी। कार्यक्रम समापन से पूर्व ही मंत्राी जी अपना भाषण समाप्त कर अगले कार्यक्रम के लिए जब मंच से उतरने लगे तभी दीवान साहब ने आगे बढ़कर उन्हें एक काग़ज़ पेश किया जो दीवान साहब की पुत्रावधू के शहर में स्थानान्तरण बाबत प्रार्थना पत्रा था, सभी कौतूहल से दीवान साहब को देख रहे थे। मंत्राी जी ने अनमने ढंग से वह काग़ज़ लेकर अपने पीए को दे दिया और कार्यक्रम से बाहर निकल गए। अचानक दीवान साहब माईक पर आ गये और बोलने लगे ‘‘भाइयों आप जानते हैं कि मैं समाज की उपेक्षा कभी बरदाश्त नहीं कर सकता, मंैने अभी-अभी आपके सामने मंत्राी जी को एक काग़ज़ पेश किया हैं जिसमें समाज के लिए सामुदायिक भवन निर्माण, लड़कियों के लिए स्कूल और आम-अवाम के लिए चिकित्सालय खोलने की मांग रखी हैं, आपका सहयोग मिला तो हम यह मांगे मनवाने में सफल रहेेगे। ‘‘सारा कार्यक्रम तालियों से गड़गड़ा उठा ।

नायक - खलनायक



चुनाव जीतने में सिद्धहस्त भैया जी के समक्ष इस चुनाव में नई चुनौती खड़ी हो गयी। उन्हीं का ‘‘वफादर’’ कार्यकर्ता उनके खिलाफ़ ताल ठोककर चुनाव मैदान में खड़ा हो गया। अपने राजनीतिक कैरियर मे अपने प्रतिद्वन्द्वी को पराजित करने मे भैया जी की चतुराई का सभी लोहा मानते रहे है, मगर अपने खास कार्यकर्ता की चुनौति का निराकरण लोगों के सामने पहेली बन गया था। वह बागी कार्यकर्ता, जिसके पीछे भैया जी के छुपे शत्राु, असंतुष्ट वोटर खड़े हो गये थे, जो अपनी जन सभाओं में लगातार नेता जी भैया जी के खिलाफ़ परते उधाड़ते हुए नायक बन गया था। आखि़र हारकर भैया जी ने उसकी मांगे मानते हुए उसे चुनाव मैदान से हटने के लिए राजी कर लिया। मगर उस ‘‘नायक के खिलाफ़ एक अफ़वाह चुपके से रवाना कर दी ‘‘भैयाजी का विरोधी कार्यकर्ता उम्मीदवार पूरे 50 लाख रुपये लेकर चुनाव मैदान से हट गया हैं’’ अब पूरे शहर में उस नायक की थू-थू हो रही थी।

शेष भाग पत्रिका में..............

लोग अम्बेडकर जयन्ती मनाते रहे और मैं अपने नवजात

मूलचन्द सोनकर



मेरे मन के किसी कोने में यह इच्छा दबी हुई है कि मैं इस वृतांत्त का, जो वास्तव में मेरा स्ंात्रास भरा अनुभव है, का शीर्षक ‘‘मैंने ईश्वर को देख लिया’’ रखता, क्योंकि मैं जिस घटना का वर्णन करने जा रहा हूँ वह लगभग चमत्कार की तरह लग रहा है और संयोग कहकर मैं इसके औचित्य को सिद्ध करने की स्थिति में स्वयं को नहीं पाता। वैसे भी हर एक घटना के परिणाम को संयोग की कसौटी पर कसा भी नहीं जा सकता। हुआ यह कि मेरी पालतू कुतिया ‘चेरी’ ने दिनांक 13.04.2010 को सायंकाल सात-साढ़े सात बजे के दौरान चार बच्चे दिये। इसको लेकर मेरे घर में बहुत उत्कंठा रहती थी कि चेरी कब बच्चे देगी। लगभग डेढ़ वर्ष पहले जाड़े में बरती जा रही थी। अन्ततोगत्वा वह घड़ी आयी। एक-एक करके चार बच्चे पैदा हुए। चारों पूरी तरह स्वस्थ और अत्यन्त सुन्दर। सोचता हूँ कि कितना अन्तर होता है आदमी और पशुओं की संतानांेत्पत्ति की प्रक्रिया में। औरत जहाँ प्रसव की वेदना से छटपटाती हुई तमाम सावधानियों के बीच नर्स, दाई, डाॅक्टर की मदद से बच्चे पैदा करती है वहीं पशु बिना किसी शोर-शराबे के बच्चे पैदा करते हैं और स्वयं ही साफ-सुथरा करके दुनिया के विस्तृत आंगन को सौंप देते हैं। आधे घंटे में ही चेरी के बच्चे अपनी मां के द्वारा साफ-सुथरे होकर बन्द आँखों से रेंगने लगे। घर के छोटे-बड़े सभी सदस्य खुश। सब का मन कर रहा था कि उन्हें छुए, सहलाये, अपने हाथों में लेकर प्यार करे लेकिन हर कोई दूसरे को सख़्ती से मना भी कर रहा था। कह रहा था कि छुओ मत, उठाओ मत, कितने नाज़ुक हैं, कितने कमजोर हैं, उठाने से गिर सकते हैं। कहीं कुछ हो गया तो! अरे, अभी माँ ने दूध भी नहीं पिलाये हैं। देखो किस बेचारगी से देख रही है। यह तो कहो कि चेरी बहुत सीधी और शरीफ़ है जो किसी से कुछ बोल नहीं रही है नहीं तो जस्सो को देखा था? याद है उसकी? जब उसने बच्चे दिये थे तो क्या मजाल जो किसी को छूने दिया हो उसने। कैसा तो गुर्राकर काटने को दौड़ पड़ती थी। मेरी बेटी प्रिया जस्मिन, जिसे सब प्यार से जस्सो कहते थे, की बात बताने लगी।

‘हाँ दीदी तुम सही कह रही हो।’ छोटी तेजल उसकी हाँ में हाँ मिलाते हुए इस प्रकार बोली जैसे उसके कथन की पुष्टि में अपनी मोहर लगा रही हो। अब तक साढ़े तीन वर्ष का छुटकन्ना बातूनी अमन जिसे जस्सो के बारे में कुछ भी पता नहीं था और चेरी के ही बच्चों में मगन था, भी उनकी बातों में खुद को शामिल कर चुका था। प्रिया और तेजल के बीच सतत् चलने वाले वाक्-युद्ध के बीच विराम के ऐसे ही कुछ पल आते हैं जब अमन को भी अमन का निर्लिप्त अनुभव होता है। बाकी समय तो उसे कभी इसकी तो कभी उसकी पक्षधरता ही करनी पड़ती है। वैसे छुटकन्नू मियाँ है पूरे उस्ताद। कब किसके साथ खड़ा होना चाहिए,

शेष भाग पत्रिका में..............



खूनी दरवाज़ा

संजीव ठाकुर





याद आ जाते हैं

दफ़्न कर दिए गए बहादुर शाह के पूत मुझे

जब भी गुज़रता हूँ खूनी दरवाजे से।

दहशत भरी निगाह से उसे देखता

सड़क पार कर अब देखता हूँ।

नाले के किनारे बैठी रहती है एक बुढ़िया

कुछ फदफदाती,

मिट्टी की हाड़ी को पत्तों से झरकाती।

कुछेक दाने हड़िया में खदकते रहते हैं

मेरी समझ में नहीं आता

वह वहीं बैठी रहती है हरवक्त

कहाँ से आता है अन्न फिर

उसकी हांड़ी मैं खदकने को?

क्या ‘ऊपर वाला’....?



कल रात

जब मैं ठंड के कारण

नींद से जागा,

याद आ गई वह बुढ़िया!

खोल लगे कंबल से

मेरा जाड़ा भागता नहीं

शेष भाग पत्रिका में..............

मन्नू भंडारी की कहानियों में आधुनिक मूल्यबोध

डा.एन. टी. गामीत

राष्ट्र जीवन मूल्यों पर आधारित होता है। जब-जब जीवनमूल्य उत्कर्ष की ओर बढ़ते है, तब तब राष्ट्र, समाज और व्यक्ति का उत्थान होता है और जब जीवन मूल्यों में हा्रस होने लगता है तो राष्ट्र अवनति की ओर जाने लगता है। किसी देश की प्रगति उसके जीवन-मूल्यों पर आधारित होती है। व्यक्ति, समाज और साहित्य की प्रक्रिया एक दूसरे पर निर्भर होते हुए भी उसका स्वाभाविक विकास प्रत्येक देश की सभ्यता और संस्कृति के अनुरूप होता है वैश्विक औद्योगिकरण बौद्धिकता के अतिरेक यंत्राीकरण और अस्तित्ववादी पाश्चात्य विचारधाराओं के फलस्वरूप आधुनिकता की जो स्थिति उत्पन्न हुई उसका परिणाम मूल्यों के हा्रस के रूप में समाज में दृष्टिगत होने लगी। इन सभी सामाजिक परिवर्तनों का यथार्थ चित्राण समकालीन साहित्य में विशेष रूप से मन्नू भंडारी के कथा साहित्य में भी देखने को मिलता है।

नैतिक मूल्यों का हा्रस

आज समाज में मूल्यों के साथ-साथ परंपरागत नैतिकता का अर्थ नष्ट हो गया है। आज नैतिकता पिछले युग की नैतिकता से पूर्ण रूप से भिन्न है। नैतिकता के संदर्भ में जैनेन्द्र कुमार का मत दृष्टव्य है- ‘‘नैतिकता कोई बनी बनाई चीज़ नहीं है। वह बनती है फिर टूटती है। इस प्रकार वह क्रमशः बदलती जाती है। नैतिकता मान भी उससे बनते बिगड़ते है।’’1 जीवन की गति द्वन्द्वात्मक और परिवर्तनशील प्रक्रिया है। स्वतंत्रा भारत में पारिवारिक विघटन पुरातन जीवन मूल्यों में परिवर्तन का सूचक है। संबंधों मंे विघटन की स्थितियां मूल्य संघर्ष को जन्म देती है। वेदप्रकाश अमिताभ ने इस संदर्भ में बताया है- ‘‘पुराने मूल्यों के पक्षधर जीवन मूल्यों से एडजस्ट नहीं हो पाते। फलतः उन्हें या तो बिरादरी बाहर होना पड़ता है या एकान्त निर्वासन की यंत्राणा सहनी पड़ती है।’’2 पहले नारीत्व की चरम परिणति मातृत्व में मानी जाती रही है। किन्तु आज परंपरागत पुराने मूल्य भी चुनौती के दायरे में आ गये है। आज सामाजिक जीवन में वात्सल्य, मातृत्व, सहानुभूति आदि फैलता हुआ औद्योगिकरण बढ़ती हुई जनसंख्या का दबाव और आज जीवन के हर क्षेत्रा में राजनीति के प्रवेश के कारण हमारे प्राचीन आदर्श, विश्वास, सेवा, त्याग आदि का अर्थ, शब्द खोखलेे होते जा रहे है।

स्त्राी-पुरुष संबंधों में अलगाव

वर्तमान युग मेे स्त्राी-पुरुषों के संबंधों से दृष्टि का बदलाव, यह परिवर्तन युगीन समाज के विवाह और विवाहेतर प्रेम संबंधों में स्पष्ट दिखाई देता है। एक समय ‘प्रेम’ एक शाश्वत मूल्य था, आज वह महान शब्द पुराना अर्थ बदल चुका है, ‘प्रेम’ शब्द आज स्थूल शब्द मात्रा रह गया है। स्वतंत्राता के पहले सामाजिक जीवन में प्रेम की मान्यता एक परंपरागत सामाजिक मूल्य, जिसकी नैतिक और सामाजिक मूल्यों के अनुरूप विवाह में परिणति अनिवार्य मानी जाती थी। विवाह के बिना प्रेम असामाजिक माना जाता था। किन्तु आज विवाह की सार्थकता, विश्वास के खोखलेपन का दर्शन होता है। एक से टूटकर दूसरे से जुड़ने की प्रक्रिया कहीं समस्याओं का समाधान तो कही नयी समस्याओं का विकास होता है। पति-पत्नी के संबंधों में आए परिवर्तनों को मन्नू भंडारी ने अपनी कहानियों मेें उजागर किया है।

‘तीसरा आदमी’ कहानी में स्त्राी-पुरुष में आपसी तनाव, संबंधों का खोखलापन चित्रित है। सतीश अपनी पत्नी की माँ बनने की कामना में असफल पाना दोनों में दुनिया बढ़ती हैं। शकुन

शेष भाग पत्रिका में..............

डा. राही मासूम रजा के कथा साहित्य में विवाह के प्रति बदलते दृष्टिकोण

सलीम आय. मुजावर



नारी ब्रह्म विद्या है, श्रद्धा है, शक्ति है, पवित्राता है, वह सब कुछ है, जो इस संसार में सर्वश्रेष्ठ के रूप में दृष्टिगोचर होती है, नारी कामधेनु है, अन्नपूर्णा है, सिद्धी है, रिद्धि है और वह सब कुछ है, जो मानव प्राणी के समस्त अभावों, संकटों का निवारण करती है, यदि नारी को श्रद्धा की भावना अर्पित कि जाए तो वह विश्व के कण-कण को स्वर्गीय भावनाओं से ओत-प्रोत कर सकती है। नारी एक संतान शक्ति वह आदिकाल से सामाजिक दायित्व को अपने कंदे पर उठाये आ रही है। जिन्हें केवल पुरुषों के कंधे पर डाल दिया जाता, तो वह कब का लड़खड़ा गया होता, भौतिक जीवन की लालसाओं को उसकी पवित्राता ने रोका और सीमाबद्ध करके उसे प्यार की दिशा दी। नारी के विषय में पुराणों में यह श्लोक अंकित है-

विद्या समस्तास्तव देवि भेदाः स्त्रिायां समस्ता सकला जगत्सु।

त्वथैकया पूरितामन्वयेतत का तैं स्तुति स्तव्यपरा परोकिता।।

अर्थात्- हे देवी! संसार की समस्त विधाएं तुमसे निकली है और सब स्पृहाएं ही स्वरूप है, समस्त विश्व एक तुम्हीं से पूरित है। अतः तुम्हारी स्तुति किस प्रकार की जाए? जहां तक नारी शब्द का प्रश्न है वह नर की ही तरह नृ धातु से बना है, इसका अर्थ क्रियाशील रहने वाला नर है और क्रियाशील रहने वाली नारी भी है ऋग्वेद के दशम मण्डल के 159 में सुक्त में शची का गौरव वर्णित है, शची का कथन है-

अहम् कुतूरहम मूर्धाऽमुग्रा विवाचिनी ममेदनु क्रंतु पतिः सोहानाया उपाचरेत।।

अर्थात् मैं ज्ञान में अग्रगण्य हूँ, मैं स्त्रिायों में मूर्धन्य हूँ, मैं उच्चकोटि की वक्ता हूँ मुझ विपयणी की इच्छानुसार मेरा पति आचरण करता है।

शेष भाग पत्रिका में..............

समकालीन परिप्रेक्ष्य में हिन्दी की दशा एवं दिशा

डा. रिपुदमन सिंह यादव

वर्तमान समय में हिन्दी भाषा एक संक्रमण के दौर से गुज़र रही है। यह संक्रमण भाषाई तो है ही, साथ ही सांस्कृतिक भी है। यह कहने की आवश्यकता नहीं है कि किसी भी राष्ट्र की भाषा ही वह माध्यम है जिसके द्वारा उस राष्ट्र का प्रत्येक नागरिक राष्ट्रीय रूप में संगठित रहता है। भाषा के द्वारा ही वह अपने विचारों को अभिव्यक्त करता है।

जब हम सन् 1947 में अंगे्रजी राज्य से स्वतंत्रा हुये, हमें एक ऐसी राष्ट्र भाषा या राजभाषा की आवश्यकता महसूस हुई, जिसके द्वारा हम पूरे राष्ट्र को जोड़ सके, यह तात्कालीन ऐसी आवश्यकता थी कि जिसने संविधान निर्माताओं को गंभीर चिंतन-मनन के लिए बाध्य किया। स्वतंत्राता प्राप्ति के पूर्व भी ‘‘भातेन्दु हरिश्चन्द्र, महर्षि दयानन्द सरस्वती, केशवचन्द्र सेन, लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक, महामना मदन मोहन मालवीय, महात्मा गाँधी, राजर्षि पुरुषोत्तम दास टंडन और बहुत से अन्य नेताओं और जनसाधारण ने भी अनुभव किया कि हमारे देश का राजकाज हमारी ही भाषा में होना चाहिए और वह भाषा हिन्दी ही हो सकती है। हिन्दी सभी आर्य भाषाओं की सहोदरी है; यह सबसे बड़े क्षेत्रा के लोगों की (42ः से ऊपर जनता की) मातृभाषा है; हिन्दी प्रदेश के बाहर भी यह अधिकतर लोगों की दूसरी या तीसरी भाषा है; हिन्दी-संस्कृत की उत्तराधिकारिणी है और सभी भारतीय भाषाओं की अपेक्षा सरल है। इन विशेषताओं के कारण स्वतन्त्राता प्राप्ति से पहले ही हिन्दी को भारत की सामान्य या संपर्क भाषा के रूप में स्वीकार किया गया है।’’1 इस तरह हिन्दी के प्रति आग्रह तो पहले से ही भारतीय जनमानस में था। संविधान के निर्माताओं के सामने भाषाओं के कारण विशेष समस्या आईं क्योंकि इस देश की विशाल जनसंख्या अनेक भाषाएँ बोलती है। संविधान के निर्माताओं को शासकीय पत्राचार के माध्यम के रूप में इनमें से कुछ भाषाओं को चुनना था जिससे कि देश में अनावश्यक भ्रम न रहे। यह सौभाग्य की बात है कि इन 1652 भाषाओं को बोलने वाले समान अनुपात में नहीं थे और 18 भाषाएँ (जिन्हें भारत की आठवीं अनुसूची में सम्मिलित किया गया था) भारत की प्रमुख भाषाओं के रूप में सरलता से चुनी जा सकीं।2

इसी परिप्रेक्ष्य में परिणामस्वरूप राजभाषा के रूप में हिन्दी को एकमत से स्वीकार किया गया। 14 सितम्बर 1949 ई. को भारत के संविधान ने हिन्दी को मान्यता दी।

भारत के संविधान में भाग 17, राजभाषा, अध्याय 1-संघ की भाषा में, अनु. 343 मंें उल्लिखित है- ‘‘संघ की राजभाषा हिन्दी और लिपि देवनागरी होगी।’’3

शेष भाग पत्रिका में..............



काला चांद: एक विवेचन

मो. आसिफ खान

भानू चैहान



भारतीय समाज तीन वर्गाें- उच्च वर्ग, मध्यवर्ग और निम्नवर्ग में बंटा हुआ है। निम्न वर्ग को अपनी बुनियादी आवश्यकताओं (रोटी, कपड़ा और मकान) को जुटाने और उसके लिए हर उचित-अनुचित तरीके अपनाने ही पड़ते हैं। उच्च वर्ग पाश्चात्य सभ्यता की अंधी होड़ में व पैसे की चकाचैंध में अपनी संस्कृति, सभ्यता, मूल्यों को पैसे की चकाचैंध में अपनी, संस्कृति, सभ्यता, मूल्यों को पीछे भूल चुका है। मध्यवर्ग ही एक ऐसा वर्ग है, जो उच्चवर्ग की बराबरी तो करना चाहता है किंतु अपने मूल्यों, संस्कारों को भूला नहीं है। आज उसके सामने सबसे बड़ा प्रश्न यही है कि वह इन दोनों के बीच किस प्रकार सामंजस्य स्थापित करे। इसी के परिणामस्वरूप व दिग्भ्रमित, दिशाहीन हो रहा है। विशेषकर मध्यवर्गीय कामकाजी युवा पीढ़ी। माता-पिता व संतान के भिन्न विचारों ने जिस ‘जनरेशन गैप’ को जन्म दिया है उसने भी इस वर्ग की समस्या को और भी बढ़ा दिया है।

‘भारतीय समाज में विवाह एक पवित्रा संस्था है। विवाह मात्रा नारी-पुरुष का संसर्ग नहीं, अपितु परिवार के परस्पर आत्मीय स्नेहिल संबंधों का सूत्राधार भी है’1 किंतु आज उच्च तकनीकी युग में जब व्यक्ति भौतिकता के पीछे भाग रहा है। विवाह का अस्तित्व ही बदलकर रह गया है। पुरानी पीढ़ी व नयी पीढ़ी के विवाह संबंधी विचारों में मतभेद उत्पन्न हो गया है। पुरानी पीढ़ी जहां विवाह के आज भी पवित्रा बंधन मानती हैं वहीं युवा पीढ़ी में विवाह के प्रति उदासीनता देखने को मिलती है। ‘विवाह के प्रति यौन संबंधों की काली रातों में अपना अस्तित्व खोने लगा है, लिव-इन-रिलेशनशिप ने विवाह के पवित्रा उद्देश्य को तार-तार कर दिया है।’2

‘काला-चाँद’ उपन्यास में डाॅ. सुधाकर आशावादी जी ने भारतीय विवाह पद्वति व उससे संबंधित अनेक प्रश्नों के उत्तर ढूंढने का प्रयास किया है। उपन्यास की कहानी चार पात्रों को केन्द्र में रखकर बुनी गई है- मयंक, स्नेहा, सलोनी और प्रशांत। मयंक और प्रशांत विदेश में कार्यरत है और मयंक बैंगलोर में। दोनों ही प्रतीक हैं आज के उच्च युवा वर्ग के। जिसके लिए संस्कार, आदर्श, प्रेम भावना, विवाह, रिश्ते आदि मान्यताओं का कोई मूल्य नहीं है। एक स्थान पर प्रशांत कहता भी है कि विदेश में जाकर भावनाओं की कद्र करते रहें....ऐसा संभव नहीं है.... वहां काम करें या संबंधों को ढोते रहें...?3

स्नेहा और सलोनी उ.प्र. के छोटे शहरों क्रमशः हरिद्वार और मेरठ की पीढ़ी-लिखी लड़कियाँ हैं जो आधुनिकता की दौड़ में पीछे रह जाती हैं और करूणांत को प्राप्त होती हैं। सलोनी स्नेहा की तुलना में दृढ़, आत्मनिर्भर व स्वाभिमानी है। जिसका दर्शन उपन्यास के प्रारंभ में ही हो जाते हैं और अंत तक वह अपने सिद्धांतों व आदर्शाें से समझौता नहीं करती जिसके परिणामस्वरूप उसका व प्रशांत का विवाह टूट जाता है। स्नेहा सुंदर, कोमल भावुक लड़की है। मयंक से विवाह तय होने पर उसे ही अपना सब कुछ मान लेती है। किंतु मयंक उसमें कोई खास रुचि न दिखाकर उसकी उपेक्षा करता है तुम लड़कियों की अदा ही निराली होती है...जरा सी छूट दी नहीं कि

शेष भाग पत्रिका में..............



मीराकान्त: एक सवेदनशील रचनाकार

अंबुजा एन. मलखेडकर

आठवें दशक के महिला नाटककारों में मीराकांत का नाम बहुचर्चित है। उन्होंने अपने नाटकों द्वारा संघर्षशील स्त्री और उसपर होने वाले शोषण को केन्द्र में रखकर कृतियों की रचना की है। इनके नाटकों में इतिहास के पन्नों की घटनाओं को नये तरीके से प्रस्तुत करने का प्रयत्न है।

वे लगभग दो दशकों से निरंतर कलम हाथ में पकड़े हिन्दी साहित्य के लिए लिख रही है। उनकी अनेक कृतियां रंगमंच से संबंधित है।

मीराकांत जी का जन्म 22 जुलाई 1958 मंे श्रीनगर में हुआ। उनके पिता का नाम स्वर्गीय दुर्गाप्रसाद और माता का नाम दुर्गेश्वरी भान है। प्राथमिक शिक्षा से लेकर उच्च शिक्षा तक उनकी पढ़ाई दिल्ली में हुई। उन्होंने दिल्ली विश्वविद्यालय से एम.ए. तथा जामिया-मिल्लिया इस्लामियां विश्वविद्यालय से पीएच.डी. किया। उनके शोध का विषय था-अंतर्राष्ट्रीय महिला दशक में हिन्दी पत्राकारिता की भूमिका। अब वे नई दिल्ली के राष्ट्रीय शैक्षिक अनुसंधान और प्रशिक्षण परिषद् (एन.सी.ई.आर.टी) में संपादक के रूप में कार्यरत हैं।

मीराकांत बहुमुखी प्रतिभा सम्पन्न साहित्यकार हैं। वे नाटककार, उपन्यासकार, कहानीकार, कवयित्राी एवं अनुवादक के रूप में विख्यात हैं। उनकी रचनाएं है-

नाटक - ईहामृग, नेपथ्यराग, भुवनेश्वर-दर-भुवनेश्वर, कन्धे पर बैठा था शाप, श्रृयते न तु दृश्यते, कालीबर्फ, मेघ-प्रश्न, बहती व्यथां सतीसर, हुमा को उड़ जाने दो, अंत हाजिर हो, पुनरपी दिव्या, (नाटक रूपांतरण) बाबू जी की थाली (नुक्कड़ नाटक)

उपन्यास - ततः किम, उर्फ हिटलर

कहानी संग्रह - हाइफन, काग़ज़ी बुर्ज

लम्बी कविताएं- तुम क्या निर्वस्त्रा करोगी मुझे? ध से धूल कब साफ होगी?

बाल साहित्य - नाम था उसका आसमानी, ऐसे जमा रेल का खेल।

शोधः- अंतर्राष्ट्र्रीय महिला दशक और हिन्दी पत्राकारिता, मीराः मुक्ति की साधिका

असंभव समय की आत्मसंभव संपादिकाः महादेवी वर्मा-एम.ए.

अनुदित साहित्य (अंग्रेजी) इन द विंग्स (नेपथ्य राग) नाटक अनुवाद: मनु विक्रमन हर्ड बट नेवर सीन (कंधे पर बैठा था शाप/श्रृयते न तु दृश्यते)

नाटक अनुवाद: मनु विक्रमन

डिस्त्रोन मी वाट यू विलफ (सुहासिनी मनु)

शेष भाग पत्रिका में..............

.ज़िन्दगी

विजय रंजन



हमसे रहती है तू क्यों ख़फा ज़िन्दगी??


पहले हमको तू इतना, बता ज़िन्दगी!!


कितनी दिलकश है बन्दिश, तेरे सामने,


कैसे तुझको कहूँ, बेवफा, ज़िन्दगी??


स्वप्न के गाँव में हम हुए दर-ब-दर,


कौन बतलाएगा--अब पता ज़िन्दगी??


हम चले थे जहाँ से वहीं हैं अभी,


अपना हासिल है बस, रास्ता ज़िन्दगी!!


रिश्ता काजर का सुन्दर करे आँख को,


हमको ऐसा दिखा, आईना ज़िन्दगी!!


एक शायर को दे न सफे-दर-सफे,


दे दे उसको मगर, हाशिया ज़िन्दगी!!


उसको तारीफ़ की है जरूरत भी क्या,


जिसको कहना है बस-मर्सिया ज़िन्दगी!!


आज ‘रंजन’ कहे एक अच्छी ग़ज़ल,


दे सके गर तो दे-क़ाफ़िया ज़िन्दगी!!


शेष भाग पत्रिका में..............