Friday, November 7, 2008

जिन्दगी

सीमा गुप्ता

जीने का फकत एक बहाना तलाश करती ये जिन्दगी,
अनचाही किसकी बातें बेशुमार करती ये जिन्दगी...

कोई नही फ़िर किसे कल्पना मे आकर देकर,
यहाँ वहां आहटों मे साकार करती ये जिन्दगी...

इक लम्हा सिर्फ़ प्यार का जीने की बेताबी बढा,
खामोशी से एक स्पर्श का इंतजार करती ये जिन्दगी॥

ना एहतियात, ना हया, ना फ़िक्र किसी जमाने की,
बेबाक हो अपना दर्द-ऐ-इजहार करती ये जिन्दगी...

रिश्तों के उलझे सिरों का कोई छोर नही लेकिन,
हर बेडीयों को तोड़ने का करार करती ये जिन्दगी...

बंजर से नयन, निर्जन ये तन, अवसादित मन,
उफ़! इस बेहाली से हर लम्हा तकरार करती ये जिन्दगी....

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