Monday, November 24, 2008

सुलगती तनहाई

सीमा गुप्ता

बिलबिला के इस दर्द से,

किस पनाह मे निजात पाऊं...

तुने वसीयत मे जो दिए,

कुछ रुसवा लम्हे,

सुलगती तनहाई ,

जख्मो के सुर्ख नगीने...

इस खजाने को कहाँ छुपाऊं ...

अरमानो के बाँध किरकिराए,

अश्कों के काफिले साथ हुए,

किस बंजर भूमि पर बरसाऊ ...

जेहन मे बिखरी सनसनी,
रूह पे फैला सन्नाटा ,

संभावना की टूटती कडियाँ ,

किस ओक मे समेटूं , कहाँ सजाऊ...

No comments: