Monday, November 24, 2008

जिन्दगी है मेरे साथी-मरने की कला

धर्मवीर भारती



न शान्ति के लिए मचल
जल निशा प्रदीप जल !
जल कि काली मौत वाली रात को जला !
जल कि खुद परवाना बनकर सूरज तुझ पर मँडराये
तेरी एक जलन में विहँसें सौ विहान उज्ज्वल !
जल शिक्षा प्रदीप जल !!
जिन्दगी की रात में मत प्रेत बन कर घूम
पतझड़ों में झूम
पीली-पीली पत्तियों के मुर्दा होठ चूम
धीमे से उन पर उढ़ा दे मौत का झीना कफ़न
किन्तु फिर उन पर सिसक कर मत तू मिट जा धूल में
जल उठ खिल उठ मेरे दीपक, जिन्दगी के फूल में
इस दुनिया की डालियों में इन घुटती आँधी मालियों में
बन बसन्ती आग तू सुलगा दे जलती कोपलें
जिन्दगी की कोपलें
जिन्दगी है मेरे साथी-मरने की कला !
जल कि काली मौत वाली रात को जला !!!

4 comments:

DR.Shagufta Niyaz said...

जिन्दगी की कोपलें
जिन्दगी है मेरे साथी-मरने की कला !
जल कि काली मौत वाली रात को जला !!!
बहुत अच्छी रचना .

Udan Tashtari said...

आभार इस सुन्दर रचना की प्रस्तुति के लिए.

परमजीत बाली said...

बहुत सुन्दर रचना है।

जिन्दगी की कोपलें
जिन्दगी है मेरे साथी-मरने की कला !
जल कि काली मौत वाली रात को जला !!!

Vijay Kumar Sappatti said...

bahut umda prastutji

bahut samay pahle maine dharamveer ji ki rachnaaye padha tha , jismein unka do novel bhi hai , unki lekhni bahut sashakt hai .

जिन्दगी की कोपलें
जिन्दगी है मेरे साथी-मरने की कला !
जल कि काली मौत वाली रात को जला !!!

in panktiyon mein jo sandesh hai , wo anupam hai ..

unhe mera pranam ..
very good job Dr. Firoz...

vijay