Tuesday, November 18, 2008

ये प्यासे-प्यासे होठ ठण्डी आह मेरे साथियो,

धर्मवीर भारती
ये प्यासे-प्यासे होठ ठण्डी आह मेरे साथियो,
ये नहीं है जिन्दगी की राह मेरे साथियों !
आस्मान चीरकर
उतर पड़ो जमीन पर
तुम प्रलय की धार बन कर बन्धनों को तोड़ दो
बह चले फिर जिन्दगी की धार मेरे साथियों !
नाश है निर्माण का सिंगार मेरे साथियों !!
रूप के उभार से
रंग के निखार से
कण्टकों की छोटी-छोटी जालियों को तोड़ दो
छोटे-छोटे बन्धनों के पार मेरे साथियों !
जिन्दगी का हर नया उभार मेरे साथियों !!
प्यास हो अगर लगी
प्यास हो अगर जगी
तो एक पाँव से दबा के आस्मां निचोड़ दो
जिन्दगी है मौत का सवाल मेरे साथियों !
जिन्दगी की रेत खूँ से लाल मेरे साथियों !!

1 comment:

seema gupta said...

तो एक पाँव से दबा के आस्मां निचोड़ दो
जिन्दगी है मौत का सवाल मेरे साथियों !
जिन्दगी की रेत खूँ से लाल मेरे साथियों
" very emotional expression..."

Regards