Saturday, November 8, 2008

कुइयाँजान -नासिरा शर्मा


नासिरा शर्मा



बताशेवाली गली में सुबह फूट चुकी थी, मगर उसका उजाला तंग गली में अपना दूधिया रंग अभी बिखेर नहीं पाया था। मंदिर की घंटी और दूध वाले की साइकिल की टनटनाहट से एक-दूसरे से सटे घर कुनमुना उठे। चंदन हलवाई दातून करता घर के बाहर बने पतले चबूतरे पर आकर बैठ गया। कुत्तों ने भी अंगड़ाई ले बदन सीधा किया और उसे देखकर अपनी दुम हिलानी शुरू कर दी, मगर चंदन उनसे बेगाना बना दातून चबाता रहा। उसकी आंखों से नींद का खुमार अभी उतरा नहीं था। कल रात शादी की पार्टी से लौटते-लौटते दो बज गए थे। एकाएक मद्धिम सुरों से रेंगती छमछम की आवाज चंदन की चेतना से टकराई। इतनी सुबह किसकी विदाई हो रही है ? जब पायजनी का स्वर निरंतर पास आता चला गया तो उसने अपनी मिचमिचाई आंखें खोली और एकदम से झुंझला उठा। ‘‘सत्यानाश ! रंगीले, रसीले की जोड़ी कहां से आय मरी है। सारे दिन का अब भगवान ही मालिक है।’’
कुत्तों ने दौड़कर रंगीले, रसीले को घेरा और उन्हें सूंघने लगे। रसीले ने हाथ में पकड़ी ढोलक पर थाप मारी। कुत्तों ने पीछे हटकर उन दोनों को घूरा, फिर अपना एतराज दर्ज कराते भौंक उठे। ‘‘कहां जात हो रसीले, इतनी सुबह सुबह ?’’ भड़भूजन जो लोटा भर-भरकर सिर पर डाल रही थी, एकाएक हाथ रोक पूछ बैठी।
‘‘बनत तो ऐसे हो चाची, जैसे तोका खबर नहीं।’’ रंगीले ने बदन को झटका देते हुए जोर से ताली बजा, ठुमका लगाया।
‘‘अरे पन्नवा के घर कल रात बेटवा भवा है न !’’ पनवाड़िन अपने पोते का मुंह धुलाते हुए बोली। ‘‘बूढ़े मुंह मुहांसा !’’ भड़भूजन कह हँस पड़ी।
झुंझलाया चंदन कुल्ली कर, मुह पर छीटें डाल दूकान के तखते पर सोए पड़े लड़के को आवाज देने लगा। हलवाइन ने अंदर से आकर चाय का लोटा थमाया और दुकान जा, शीशे के केस से मोतीचूर के चार-पांच लड्डू उठा अंदर घर में चली गई।
बताशेवाली गली जैसे-जैसे जाग रही थी, जिंदगी के आसार बढ़ रहे थे। रामदीन धोबी का ट्रांजिस्टर रोज की तरह चालू हो गया था, जिसके गाने की आवाज में रिक्शे की घंटियों ही नहीं, बल्कि आस-पास वाले भी स्वर से स्वर मिला रहे थे। नल पर पानी भरने की जल्दी में अब औरतें अपना धैर्य खोने लगी थीं। सुरंग जैसी इस गली में नमी भरी गंध हरदम तैरती रहती थी और दोनों तरह बहती काली नालियां हमेशा चालू रहती थीं, जिनमें सूअर के नन्हे बच्चे अकसर फिसलकर गिर जाते, तब छौने के साथ सुअरनी की कें-कें से सबका जीना हराम हो जाता था।
धूप फैलने के साथ ही बताशे वाली गली में पन्नालाल सुनार के यहां लड़का पैदा होने की खबर गरमा गई थी। आखिर पूरे अट्ठारह वर्ष बाद बेटा हुआ था ! बात तो आश्चर्य की थी ही। पन्ना सुनार की उम्र चालीस-पैंतालीस की होने को आई थी। उसके मित्रों के बच्चे जवान हो रहे थे। समय गुजरने के साथ पन्ना की आशा-निराशा में बदलने लगी थी। अगर कोई ग्राहक खुश होकर बच्चा होने की दुआ दे बैठता तो पन्ना खौखिया जाता था। धंधे के चलते खून का घूंट पीकर रह जाता, मगर अंदर ऐसा बवंडर उठता कि मन करता, सामने वाले को काट खाए। जब गली में बच्चे शोर मचाते तो वह काम करते हुए सिर उठा उन्हें घूरता, फिर बेलाग हो मोटी-मोटी गालियां सुनाने लगता, जिसके चलते अकसर पड़ोसियों से उसकी झड़प हो जाती थी। वह कारीगर अच्छा था, मगर दिन-ब-दिन उसकी चिड़चिड़ाहट बढ़ती जा रही थी, जिससे लोग उससे कतराने लगे थे।
इस समय पन्नालाल दुकान के सामने पतले से चबूतरे पर बैठा, मंद-मंद मुस्कराता घर के अंदर से गूंजते सोहर गीत को सुन रहा था। आज उसका कलेजा सौ गज का हो गया था कि उसने मर्दानगी का सुबूत दे दिया। जो भी आते-आते उसे बधाई देता, वह उत्साह में भर उसे छठी पर आने का न्यौता दे बैठता था। अंदर जब रसीले की ढोलक की थाप और रंगीले का नाच खत्म हुआ तो वह घर में घुसा। बेटे का चेहरा देखने की लालसा कब से दबाए वह बैठा पत्नी की दर्द में डूबी चीखों को सुनता रहा था। उसकी तबीयत लगभग एक डेढ़ बजे रात को खराब हुई थी। गली में रहने वाली इकलौती दाई या नाइन, जो भी कहो, रमजानी को वह जाकर बुला लाया था। सुबह चार बजे रमजानी ने बेटा होने की खबर दी थी। तब से अब तक उसने ये चार घंटे गुजारे हैं, यह उसका दिल ही जानता है। ‘‘लेव, देखो बेटवा का मुंह और निहाल कर देव आज रमजानी को।’’ कहती हुई रमजानी पुरानी साड़ी में नंगा-सा काला-कलूटा बच्चा लिए खड़ी थी। पन्ना सुनार की बेकरार आंखें बेटे के मुंह पर पड़ीं और उसका दिल खुशी से नाच उठा।
‘‘कितना सुंदर ! कितनी मनमोहिनी सूरत है इसकी, जैसे स्वयं मुरली मनोहर साक्षात अंखियन के सामने आय गये हों।’’ गद्गद हो पन्ना मन-ही-मन बोल उठा।
इसके होंठ कांपे और आंखें नम हो गईं। उसने दोनों हाथ सीने पर जोड़ उपर वाले को धन्यवाद दिया।
पत्नी मालती का हाल अच्छा न था। वह नीमबेहोश- सी बिस्तर पर पड़ी थी। खून बहुत बह गया था। पन्ना ने अंदर जाकर उसके माथे पर हाथ रखा फिर उसके ठंडे पड़ते हाथों को सहलाया। तभी एकाएक रमजानी चीखी, ‘‘अरे लालाजी, तोहार यहां का काम, जो सोहर की कोठरिया में घुस आए ? चलो, बाहर निकलो।’’
शाम तक मालती की हालत काफी संभल चुकी थी। रमजानी सब कुछ समेटकर घर जा चुकी थी। गांव से आई बूढ़ी मौसी ही मालती की देखभाल कर रही थीं। पन्ना ने आज दुकान बंद रखी थी। उसी के सामने बने पतले चबूतरे पर वह आसन जमाए गली की बढ़ती रौनक को ताक रहा था। आज मलाई बर्फ वाले को देखकर शोर मचाते बच्चे इसे कांटों की तरह नहीं चुभे बल्कि उसने मलाई बर्फवाले को बुलाकर सारे बच्चों को दोना बांटने को कहा और हिसाब कर पैसा खुद अदा किया। उछलते, बर्फ चाटते बच्चों की खुशी देख उसके दिल में संतोष की लहरें बन रही थीं कि एक दिन उसका कन्हैया भी इन्हीं के बीच उछले- कूदेगा।
बताशेवाली गली से ही मिली दाहिनी ओर पेंचदार गली थी। जिसके अंत में नीम के पेड़ों में घिरी एक पुरानी टूटी-फूटी मसजिद खड़ी थी, जिसमें जाने कब से बूढ़े मौलाना रहते थे। वही अजान देते, वही नमाज पढ़वाते और वही मरने जीने की जिम्मेदारी भी निभाते थे। उस मसजिद में हांके-पुकारे के लिए एक लड़का भी रहता था। जिसका नाम बदलू था। अजान की जगह सुबह-सुबह उसके रोने की आवाज सुनकर मसजिद के पास वाले घर की छत से किसी ने पूछ लिया :‘‘कस बे बदलू, आखिर बात का है जो रोवत हो ?’’
‘‘मौलवीजी उठ नहीं रहे हैं।’’ बदलू ने रोते-रोते कहा और मसजिद से बाहर निकला। सामने से रोज आने वाले बुजुर्ग नमाजी लाठी टेकते एक-दूसरे का सहारा बने चले आ रहे थे। मसजिद से लगी खस्ता कोठरी में अस्सी साल के मौलाना आंखें बंद किए साकित पड़े थे। चेहरे पर शांति छाई थी। एक नमाजी ने आगे बढ़कर नब्ज, फिर नाक के पास हाथ लगाकर देखा और घबराकर पूछा, कब हुआ इंतकाल ?’’
‘‘हमें कुछ पता नहीं। हमने सोचा कि सो रहे हैं। सुबह से बंदर बहुत परेशान कर रहे थे। हम उनको भगाने में लगे थे...देखें तो हौज के पानी में लोट-लोटकर कैसा गंदा कर दिया है।’’ बदलू ने आंसू पोंछते हुए कहा।
‘‘कफन-दफन शाम तक हो जाता तो अच्छा था। गरमी का महीना है।’’ दूसरे बुजुर्ग ने फिक्र भरी आवाज में कहा।
‘‘हां, बात मुनासिब है।’’ तीसरे ने सोचते हुए कांपती आवाज में जवाब दिया।
‘‘आज तो इधर का बाजार भी बंद है।’’
‘‘तौलियावाले शेखजी तो अपनी ही गली में रहते हैं। चलकर बात करते हैं। उन्हें छुट्टी के दिन दुकान खोलने में क्या एतराज हो सकता है। आखिर मौत सारा सुभीता देखकर थोड़े आती है।’’‘‘पानी के साथ पानी भरने के बरतन का भी इंतजाम करना होगा।’’
‘‘अब तो कोरे मटके लाने होंगे, कौन अपना बरतन देगा ! सबको पानी भरना होगा अपना-अपना।’’ पहले ने इधर-उधर नजर दौड़ाते हुए कहा।
‘‘बदलू, इधर आ। मौलाना साहब,....मेरा मतलब है कि रुपया-पैसा कहां रखते थे ?’’ पहले ने झिझकते हुए पूछा।
‘‘सिरहाने गुदड़ी के नीचे।’’ बदलू ने आगे बढ़कर चादर के नीचे हाथ डाला और टटोलकर कुछ रुपये और रेजगारी निकाली।
‘‘गिनो तो !’’ दूसरा बोला।
‘‘कुल छह सौ एक और पचहत्तर पैसे हैं।’’ बदलू ने ठंडी सांस भरते हुए कहा।
‘‘रकम इतनी कम और सामान की फेहरिस्त लंबी।’’ दूसरे बुजुर्ग बड़बड़ाए।
तीनों बुजुर्गों के चेहरों पर चिंता उभर आई। उनके घरों में तो इस रकम का आधा भी न था। महीने का अंत था। जेब, कनस्तर सब खाली थे। चंदा भी दें तो किस बलबूते पर, बेटे बहू के सामने हाथ फैलाएं तो कैसे, जब कि वही उन पर बोझ बने हैं। तीनों परेशान, बेबस से कुछ पल खड़े एक-दूसरे को देखते रहे। मौलाना बरसों पहले अकेले यहां आए थे। उनका खानदान कहां था, यह किसी को पता नहीं था, जहां तक उन्हें याद आता है, बुजुर्गवार अकसर कहा करते थे कि इस फानी दुनिया में बदलू ही मुझ लावारिस का इकलौता सहारा है। इस जुमले से लोगों ने समझ लिया था कि मौलाना के ‘आगे नाथ न पीछे पगहा’, मगर मामला अब मौत का था, खर्चे का था। पास के होटल से मौलाना खाना मंगवाते थे। सस्ते दामों में होटलवाला रोटी-शोरबा देकर यह समझता था कि वह बड़ा नेक काम कर रहा है। जन्नत में अपनी जगह बना रहा है। मौलाना की आमदनी तो कुछ थी नहीं, सिवाय उस ‘फितरे’, के जो दो-तीन घरों से उन तक पहुंचता था, जिससे उनका खर्च जैसे-तैसे चल जाता था। तीनों पड़ोसियों ने यही उचित समझा कि उन्हीं साहेबान को मौलाना के इंतकाल की खबर दे देनी चाहिए। फिर वे जो सलाह देंगे उसी के मुताबिक इनके आखिरी सफर का बंदोबस्त कर दिया जाएगा।
धूप निकल आई थी और गरमी गजब की थी। लाश के खराब हो जाने का डर भी था। पता नहीं कब उनकी रूब बदन छोड़कर ऊपर परवाज कर गई हो, इसलिए बर्फ की सिल मंगवाकर लाश उस पर रख दी गई थी। तौलियावाले शेखजी ने आधे दाम पर दुकान खोल, कफन का चालीस मीटर कपड़ा फौरन नापकर फाड़ दिया। मटके खरीदकर बदलू ले आया था। समस्या अब पानी की थी। चौराहे के खंभे में आग लगने से तार जल गए थे। कल दोपहर से पूरे इलाके में बिजली नहीं थी, जो पानी आता। बचे हुए पानी से सबने किसी तरह अपना काम चला लिया था, मगर गुस्ले-मैयत के लिए तो घड़ों पानी चाहिए था। कुछ घरों में दो-तीन बाल्टी पानी मौजूद था, मगर वह पाक नहीं था। दोपहर का सूरज ढलने ही वाला था। लोगों की परेशानी बढ़ रही थी। इत्रवाले ने खबर मिलते ही उन लोगों की रुपयों से मदद कर दी थी, मगर घर दूर होने की वजह से पानी वहां से लाया नहीं जा सकता था। बदलू बौराया सा घर-घर झांकता घूम रहा था।
मोहल्ले के कुएं बरसों पहले कूड़े से पाट दिए गए थे। एक-दो घरों में हैंडपाइप थे, जो खराब पड़े थे। मसजिदवाली गली से मिली अंदरसेवाली गली थी। वहां पक्के बड़े-बड़े घर थे। उनके यहां भी पानी की हाय-तौबा मची थी। शिव मंदिर के पुजारी भी बिना नहाए परेशान बैठे थे। उन्होंने न मंदिर धोया था, न भगवान् को भोग लगाया था। उनके सारे गगरे-लोटे खाली लुढ़के पड़े थे। नल की टोंटी पर कई बार कौआ पानी की तलाश में आ आकर बैठ उड़ चुका था। गरमी ऐसी कि पसीना पानी की तरह शरीर से बह रहा था। पता नहीं किस आशा में पंडितजी बार-बार नल खोलते, फिर बंद कर बड़बड़ा उठते, ‘‘पग-पग रोटी, डग-डग नीर....मगर अब ई शहर का कईसा हाल बनाय दिए हो भगवान्। न पानी है, न रोटी है।’’

1 comment:

तसलीम अहमद said...

bahoot gahra chitaran hai.
kya yeh nashira ji ke upanyaas ka hissa hai?