Saturday, November 29, 2008

प्रिय इन नयनों का अश्रु-नीर !

महादेवी वर्मा

प्रिय इन नयनों का अश्रु-नीर !
दुख से आविल सुख से पंकिल,
बुदबुद् से स्वप्नों से फेनिल,
बहता है युग-युग अधीर !

जीवन-पथ का दुर्गमतम तल
अपनी गति से कर सजग सरल,
शीतल करता युग तृषित तीर !
इसमें उपजा यह नीरज सित,

कोमल कोमल लज्जित मीलित;
सौरभ सी लेकर मधुर पीर !
इसमें न पंक का चिह्न शेष,
इसमें न ठहरता सलिल-लेश,

इसको न जगाती मधुप-भोर !
तेरे करुणा-कण से विलसित,
हो तेरी चितवन में विकसित,
छू तेरी श्वासों का समीर !

1 comment:

Udan Tashtari said...

आभार इस प्रस्तुति के लिए.