Saturday, November 8, 2008

नये-नये विहान में

धर्मवीर भारती



नये-नये विहान में
असीम आस्मान में-
मैं सुबह का गीत हूँ।
मैं गीत की उड़ान हूँ
मैं गीत की उठान हूँ
मैं दर्द का उफ़ान हूँ
मैं उदय का गीत हूँ
मैं विजय का गीत हूँ
सुबह-सुबह का गीत हूँ
मैं सुबह का गीत हूँ
चला रहा हूँ छिप के
रोशनी के लाल तीर मैं
जगा रहा हूँ पत्थरों के
दिल में आज पीर मैं
गुदागुदा के फूल को
हँसा रहा हूँ आज मैं
ये सूना-सूना आस्मां
बसा रहा हूँ आज मैं
सघन तिमिर के बाद फिर
मैं रोशनी का गीत हूँ
मैं जागरण का गीत हूँ
बादलों की ओर से
छिप के मुस्करा उठूँ
मैं जमीन से उड़ँ
कि आस्मां पे छा उठूँ
मैं उड़ूँ कि आस्मां के
होश संग उड़ चलें
मैं मुड़ूँ कि जिन्दगी
की राह संग मुड़ चलें
मैं जिन्दगी की राह पर
मुसाफ़िरों की जीत हूँ
स्वर्ण गीत ले
विहग कुमार-सा चहक कर
मैं खिजाँ की डाल पर
बहार-सा महक उठूँ
कण्टकों के बन्धनों में
फूल का उभार हूँ
मैं पीर हूँ मैं प्यार हूँ
बहार हूँ खुमार हूँ
भविष्य मैं महान् हूँ
अतीत हूँ, वर्तमान हूँ
मैं युग-युगों का गीत हूँ
युग-युगों का गीत
मैं सुबह का गीत हूँ !!

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