Friday, November 14, 2008

रश्क

हस्सान अहमद आज़मी

सारे दिन का थका हारा सूरज भी अब
धीरे-धीरे रवां अपने घर की तरफ
मुंतज़िर अपनी दहलीज़ से
एक दिल कश-सी मुस्कान पाने को है
सारा दर्द और ग़म भूल जाने को है

1 comment:

SACHIN JAIN said...

Miane aapki ek pritikriya padi thi............ (मुझे गर्व है कि मैं हिन्दू हूं)क्या संकुचित सोच है. गर्व इस बात का होना चाहिये कि हम भारतीय है. गर्व इस बात का होना चाहिये कि हम मनुष्य है. मेरे अन्दर मानवता है.गर्व इस बात का होना चाहिये कि हम जहां रहते उसके अगल बगल कोई बेसहारा तो नहीं है. धर्म बाद में आता है कोई धर्म खाने को नहीं देता है.....

Iss par main sirf itna hi kaoonga ki hum log samajh hi nahi paate ki Hindu kya hai, ek to smaaj ne ek aisa mahool bana dia hai hinduon ke lie ki sabko hindu bure lagte hai.........Hindu ek jeevan jeeene ki padyti hai jisko aajkal huma bhartiya darshan kahtein hai wo wastav me hindu darshn hai.......

aap isse bhi padiye agar kabhi samay mile to............. http://sachinjain7882.blogspot.com/2008/10/blog-post_11.html