सीमा गुप्ता
वक्त के जंगल के ये झंखाड़,
और वो झाड़ियाँसाफ़ दिखने में ख़लल डालें,
जो बनकर गुत्थियाँचंद क़दमों पर नज़र आएँगे,
फिर से हम ज़रूरबस भरोसे से हटाना है,
तुम्हें बेज़ारियाँ.........
(बेज़ारियाँ = विमुखता, क्रोध, नाख़ुशी)
वक्त के जंगल के ये झंखाड़,
और वो झाड़ियाँसाफ़ दिखने में ख़लल डालें,
जो बनकर गुत्थियाँचंद क़दमों पर नज़र आएँगे,
फिर से हम ज़रूरबस भरोसे से हटाना है,
तुम्हें बेज़ारियाँ.........
(बेज़ारियाँ = विमुखता, क्रोध, नाख़ुशी)
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