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पास तुम न आ सके

राजश्री खत्री कभी याद हमने किया, कभी खुद याद आ गये, हम उदासियों में खो गये ॥ न हॅसी है, न रूदन है, बची केवल खामोशी है । हम धुन कोई न बजा सके ॥ जिन्दगी वही, पर मंजिल नही, रास्ते वही, पर महफिल नहीं, बहुत दूर तुम निकल गये ॥ बढ़ा हाथ, पकड़ना चाहा, बढ़े पैर, मुड़कर न देखा तुमने दामन बचा तुम चले गये॥ इक चॉद आसमान में खोया, भीगा ऑचल, तार-तार हुआ, पर ढाढस तुम न दिला सके॥ पास तुम न आ सके॥ ************************ एफ-१८७०, राजाजी पुरम लखनऊ

गजल

अतुल अजनबी जिसमें जलने का हौसला न हुआ वो दिया मेरे काम का न हुआ मेरा दुशमन था मेरा क्या होता आपका दोस्त, आपका न हुआ यूं खिजॉ ने चमन पे जुल्म किया एक पत्ता भी फिर हरा न हुआ फाइदे मुझसे हैं तमाम उसको इसलिए आज तक खफा न हुआ उसको दुख दर्द मेरा क्या मालूम जिसका अपना कोई जुदा न हुआ टूटकर जिसको मैने चाहा था वे मुसीबत में भी मेरा न हुआ 'अजनबी' हॉ भला नहीं, लेकिन वो किसी के लिए बुरा न हुआ *************************************

गजल

अतुल अजनबी कैसे होता है अब गुजर मेरा आओ देखो कभी ये घर मेरा एक दिन साथ चल के देख जरा कितना दुश्वार है सफर मेरा साजिशे धूप की कुछ ऐसी है। बच नहीं सकता अब शजर मेरा गॉव की याद जब सताती है मन नहीं लगता तब इधर मेरा उस तरफ जाऊं किस बहाने से कोई रहता नहीं उधर मेरा कुछ न पाओगे तुम वफा के सिवा चीर कर देख लो जिगर मेरा इक मुलाकात बस हुई उससे आज तक उस पे है असर मेरा बस यही दिल में एक हसरत है मुझको जिन्दा रखे हुनर मेरा 'अजनबी' बन के जिस मकॉ में रहा कैसे कह दूं कि वो है घर मेरा ***************************

गजल

अतुल अजनबी झूट का बोझ अगर उठाऊगा मैं तो जीते-जी मर ही उठाऊगा सबको तू आजमा के देख जरा मैं ही बस तेरे काम उठाऊगा इतने दुशमन न तू बना, वरना तुझको किस-किस से मैं बचाऊगा लौट आये कहीं अगर बचपन फिर मैं पढ़ने से जी चुराऊगा जिनसे जल जाये घर किसी का भी उन चिरागों को मैं बुझाऊगा सर कलम कर दें चाहे लोग, मगर सच की खातिर मैं सर उठाऊगा 'अजनबी' तुझको खो दिया जब से क्या बचा है जो अब गवाऊगा **************************************

प्यारा दोस्त

जिजिथ हरिदास हर पल एक परछाई की तरफ वो मेरा साथ देता रहा। एक भी दिन न था जब वो मेरे यादों में न आया हो। वह दिन जिंदगी का अनमेल दिन था मेरे प्यारे दोस्तों कभी टीचर सताते हुए कभी किए गलती के लिए माफी मांगते हुए एक भी न था जो हमारे से अधूरा माँ तो गई हमारी शिकायत सुनते-सुनते एक भी गली न थी जहाँ हम न गए हो एक भी न था हमने न खेला हो उसे कभी न मैं भूलूगा आज वो पल कभी न वापस आएगा जब वो अपने नए शहर चला गया आज भी याद आता है वो मेरा प्यारा दोस्त। ************************

दर्दे दिल की पुकार

Vidhya Devdas Nair दिल की गहराईयों में झाँकतें समय मुझे दर्द ही दर्द नजर आता है, जिन्दगी की राह में चलते समय मुझे सिर्फ तन्हाईयाँ नजर आती है, कभी-कभी लगता है मिटा दूँ नामो निशां इस जिन्दगी का, मगर जिन्दगी जीना है मुझे हर लम्हा, पर क्यों हो जीती हूँ मैं हर बार तन्हा, दिल रोता है, पर आँखों में आँसू नहीं, बहुत कुछ कहना है मुझे, पर होंठों पर अलफाज नहीं, कहूँ तो किससे कहूँ, कोई हमदर्द भी तो नहीं , अगर कुछ है तो वो है बस मीलों की खामोशी, यूँही चलती रहेगी लहर ये जिन्दगी की। कभी जगा देती है मुझे एक किरण ममता की, पर थोड़ी ही देर में इसे मिटा देती है तूफान मायूसी की, किसी अनदेखा, अनजान एक चेहरा पैगाम देती है सलाह जीने की, मगर तन्हाई का आलम तो याद कराती है मुझे मौत के सूने दहलीज की, एक पल जब मुझे छू लेती है खुशी की लहर, दूसरे ही पल में जिन्दगी बन जाती है जहर, आदत पड़ गई है मुझे अब इस तन्हाई की, यूँही चलती रहेगी लहर ये जिन्दगी की। कहते है जिन्दगी तो एक खुली किताब है, इसे पढ़ना और समझना मुशिकल ही तो है, क्या इसमें होते है पन्ने केवल टूटे ख्वाबों के, और अधूरी मनोकामना के दर्द भरे चीत्कारों से, कितनी...

बचपन में दीवाली के दिए न चुराए होते तो मैं अफ़सानानिगार न होता! इंतिज़ार हुसेन

प्रेम कुमार ए०एम०यू० के उर्दू विभाग ने कहानी पर एक सेमिनार आयोजित किया था। सार्क देशों के कई ख्यातनाम साहित्यकार उसमें भाग लेने आए थे और भी कई बड़े नाम उन तीन दिनों में अलीगढ़ में थे, पर उनकी वह व्यस्तता और लोकप्रियता-ग़ज़ल! एक-एक दिन में कई-कई कार्यक्रम, मिलने, बात करने, ऑटोग्राफ़ लेने के लिए ललकते-लपकते लोग, जब जहाँ देखो, वे भीड़ में घिरे खड़े हैं, मुश्किल से दो घंटे का समय मिला, वह भी सुबह एकदम जल्दी, वह उतना कम समय, वे तरह-तरह की रुकावटें और उस पर वह जल्दबाज़ी, उतने चैन से तो बैठ ही नहीं पाए थे तब भी वे यूनिवर्सिर्टी के न्यू गेस्ट हाउस पहुँचा तो दो लोग पहले से उपस्थित थे, परिचय मिला - 'आप यूनिवर्सिटी में संस्कृत पढ़ाते हैं... और आप इनकी पत्नी हैं... राजनीति का काम करती हैं,' उन तीनों की बातचीत को मैं चुप बैठा सुन रहा था, पति-पत्नी बेहद श्रद्धाभाव के साथ उनसे प्रश्न कर रहे थे, उनकी तारीफ़ कर रहे थे, जी, मैं पाकिस्तान के प्रख्यात लेखक इंतिज़ार हुसैन साहब की बात कर रहा हूँ, दरमियाना क़द, गोरा रंग, आकर्षक-सुव्यवस्थित वेश-सफ़ारी सूट की सी दो जेबों वाली शर्ट सौम्य, लुभावना व्यक्तित्त्व! श्वे...

लिखोगे किस्मत

Aithihya A .V क्यों पूछते है हम किस्मत को, जब सोचना हमें है, जब करना हमें है, जब भूगतना हमें है, ये दुनिया डरनेवालों के लिए नहीं, ये दुनिया है स्वतंत्र दिलों वालों के लिए हमारे लिए ............................. आज हम आजाद है, हमें रोकता कौन है? सफलता और ज्ञान वरदान है आज अपने कदम रोकना मौत की जिन्दगी है, किस्मत को जब आजमाना है, तो लिखो ........... एक नया किस्मत अपने कर्मों से ..... किसी के लिए एक खुशियों भरी किस्मत जिससे होगी किस्मत हमारी मुट्ठी में ********************************

यादें

जिजिथ हरिदास कितनी सुन्दर है यह चंचल हवा कहाँ से आते और कहाँ जाते सात में लाते हैं पुरानी यादे वह मीठी यादें। मैं भी जीता हूँ उन यादों में प्यार करता हूँ उन हसीन पलों से मन करता है उन पलों में खो जाने के लिए मगर न, न ................ यह जिंदगी है, आगे जाना है यादों को पीछे छोडकर आगे जाना है न जान आगे कौन सा हसीन पल फिर मिल जाए।

अधूरी कहानी

जिजिथ हरिदास वो यादें तुम्हारी वो बातें तुम्हारी जो हमको सताती रही .......... न जाने कब से उम्मीदें कुछ बाकी है मुझे फिर भी तेरी याद आती है ................ मेरा दिल मेरा सफर ढूढें तुझे फिर क्यों नजर लेकर यादें तेरी रातें मरी कटी मुझसे बात तेरी करती है चाँदनी .............. यह है मेरी अधूरी कहानी

गज़ल

अतुल अजनबी (ग्वालियर) झूट का बोझ अगर उठाऊगा मैं तो जीते-जी मर ही जाऊगा सबको तू आजमा के देख जरा मैं ही बस तेरे काम आऊगा इतने दुशमन न तू बना, वरना तुझको किस-किस से मैं बचाऊगा लौट आये कहीं अगर बचपन फिर मैं पढ़ने से जी चुराऊगा जिनसे जल जाये घर किसी का भी उन चिरागों को मैं बुझाऊगा सर कलम कर दें चाहे लोग, मगर सच की खातिर मैं सर उठाऊॅगा 'अजनबी' तुझको खो दिया जब से क्या बचा है जो अब गवाऊॅगा

गज़ल

अतुल अजनबी (ग्वालियर ) अब कोई भी तुम्हारा हमारा नहीं भाई को भाई का जब सहारा नहीं साथ देता वो कैसे मेरा वक्त पर वक्त पर मैंने उसको पुकारा नहीं जो इशारा समझ ले हर-इक आदमी वो इशारा तो कोई इशारा नहीं कैसे कह दूं मैं उसको बुरा दोस्तों साथ उसके जब इक दिन गुजारा नहीं मान ली हार उसने, अलग बात है सच तो ये है कि वो मुझसे हारा नहीं सच कहॅूगा अगर, रूठ जायेगा वो झूट सुनना भी उसको गवारा नहीं 'अजनबी' कॉप उठता हूं ये सोचकर मार सकता था वो फिर भी मारा नहीं ********************************

गज़ल

अतुल अजनबी (ग्वालियर) उसके हक में गलत फैसला हो गया देखते देखते क्या से क्या हो गया जाने क्या मुझपे जादू किया आपने इक मुलाकात में आपका हो गया धूप चेहरे पर जब भी पड़ी आपके सारा मंजर लगा आइना हो गया उसकी जादूगरी थी कि धोका हुआ सामने था मेरे और हवा हो गया एक मुद्दत से वो साथ में था मेरे एक लम्हे में मुझसे जुदा हो गया मैं रहॅू 'अजनबी' ये अलग बात है फन मेरा हर किसी को पता हो गया **************************************

गज़ल

अतुल अजनबी (ग्वालियर) याद मेरा ये मशविरा रखना अपने घर को न यूं खुला रखना कोई सीखे ये आप से साहब खुद को खुद से जुदा-जुदा रखना रात के बाद दिन भी होता है लाख दुख आएं, हौसला रखना मैं भी रहता हूं दूर-दूर बहुत तुम भी कुछ उससे फासला रखना जो परिन्दा खुले में उड़ता हो उस के ऊपर निगाह क्या रखना जंग में जा रहे हो, जाओ मगर वापसी का भी रास्ता रखना 'अजनबी' क्यों है इतनी मायूसी किसलिए दिल बुझा-बुझा रखना

विकास दर विकास

- डॉ० वी०के० अग्रवाल विकास दर विकास, मानव मूल्यों का हृास। गरीब और मेहनतकश की रोजी-रोटी और अमन चैन सभी का सभी, माफिया, भ्रष्टों और गुण्डों का ग्रास, विकास दर...। नाले में पड़ी चील-कउओं और कुत्तों की खायी नवजात शिशु की लाश... आप कहते हैं विकास, मैं कहता हूँ विनाश...। विनाश दर विनाश...। मानवता बदहवास...। विनाश दर विनाश...। ****************** अध्यक्ष-वाणिज्य विभाग पी०सी० बागला (पी०जी०) कालेज, हाथरस २०४१०१ (उ०प्र०) ********************

कविता

मूल चन्द सोनकर तुझे जाने की थी जल्दी ये था बरख़िलाफ़ मेरे कभी तो बताता क्यों था तू बर ख़िलाफ़ मेरे करूँ किससे मैं शिकायत है कौन सुनने वाला सारा जहाँ हुआ है जब बरख़िलाफ़ मेरे पुरख़ार रास्तों पर किसका करूँ भरोसा गिरे ही क़दम हुए हैं जब बरख़िलाफ़ मेरे दुनिया में आने की जब तू न दौड़ जीत पाया जाने में जीतने को हुआ बरख़िलाफ़ मेरे तुझे ऐसी क्या थी जल्दी मुँह मोड़ चल दिया जो अपनों को बख्श देता जो था बरख़िलाफ मेरे ऐ काश! जान पाता तू मेरी बेबसी को होता न तब तू शायद यूँ बरख़िलाफ़ मेरे अल्लाह तेरी रहमत की ये भी बानगी है मौत-ओ-नफ़स का शज्र : हुआ ख़िलाफ़ मेरे तेरा लिहाज शायद गिरी बेबसी से हारा तिरी सीरत-ए-तकल्लुफ किया बरख़िलाफ मेरे अगर आईना मैं देखूं नजर आये शक्ल-ए-वालिद बुना क्या कहूंगा क्यों था तू बरख़िलाफ़ मेरे हूँ गुनाहगार तेरा, पशेमां हूँ बेबसी पर मुझे तू मुआफ करना ऐ, बरखिलाफ़ मेरे आऊँगा तुझसे मिलने जब रोज-ए-हश्र को मैं मिन्नत है तब न होता तू बरखिलाफ़ मेरे ********************* ४८, राज राजेश्वरी, गिलट बाजार, वाराणसी *******************************

विरासत

विमलेश कुमार चतुर्वेदी जैसे ही चुनाव आया, मैंने - दौरे का प्लान बनाया। गाँव-गाँव, घर-घर जाकर हर गरीब को समझाया। भाया! जब जब मैं आया, तुमने.... हमारा मान बढ़ाया है; इलेक्शन जिताया है। हम...तुम्हें समझते हैं, तुम्हारी गरीबी के लिए लड़ते हैं। गरीब दास! गरीबी... तुम्हारी विरासत है तुम्हारी भाषा है, हम इसे बचाएंगे; तुम्हें याद दिलाएंगे। तुम्हारे पूर्वज जंगलों में रहते थे, आधे बदन कपड़ा पहनते थे, जानवरों सा रहते थे, उन्हीं की तरह खाते थे; और.... अपनी गरीबी संजोते मर जाते थे। पिछले चुनाव में मैंने एक सर्वेक्षण कराया था, ...गरीबी के स्तर को - एक मानक दिलाया था, योजनाएं बनवाईं थीं; आर्थिक सहायता दिलाई थी। ...खुशी हुई कि आप - गरीबी रेखा के ऊपर जा रहे हैं, धीरे-धीरे अपने को.... खुशहाल पा रहे हैं। मगर डरता हूँ कि लोग - कल जब तुम्हें गरीब दास... कहने से कतराएंगे, कोई और नया नाम लेकर बुलाएंगे, तो..... तुम्हारा अपनापन गरीब दास का गरीबपन कहीं खो न जाए। इसलिए मैंने - फिर से सर्वेक्षण कराया है, गरीबी के स्टेटस्‌ को और ऊपर बढ़वाया है, इससे तुम उसी.... गरीबी रेखा में आ जावोगे; फिर अपने आपको.. अपनी संस्कृति से...

मुझे जीने दो

सीमा सचदेव मुझे जीना है मुझे जीने दो हे जननी तुम तो समझो मुझे दुनिया में आने तो दो तुम जननी हो माँ केवल एक बार तो मान लो मेरा भी कहना नहीं सह सकती मैं और बार-बार अब और नही मर सकती मैं कोई तो मुझे दे दो घर में शरण अपावन नही हैं मेरे चरण क्यों हर बार मुझे तिरस्कार ही मिलता है? मेरा आना सबको ही खलता है हे जनक मैं तुम्हारा ही तो बोया हुआ बीज हूँ नहीं कोई अनोखी चीज़ हूँ बोलो मेरी क्या ग़लती है? क्यों केवल मुझे ही तुम्हारी ग़लती की सज़ा मिलती है? कब तक आख़िर कब तक मैं यह सब सहूंगी? दुनिया में आने को तड़पती रहूंगी? क्या माँ का गर्भ ही है मेरा सदा का ठिकाना? बस वहीं तक होगा मेरा आना जाना? क्या नही खोलूँगी मैं आँख दुनिया में कभी? क्यों निर्दयी बन गये हैं माँ बाप भी? कहाँ तक चलेगी यह दुनिया बिना बेटी के आने से? बेटी बन कर मैने क्या पाया जमाने से? मैं दिखाऊंगी नई राह दूँगी नई सोच ज़माने को मुझे दुनिया में आने तो दो मैं जीना चाहती हूँ मुझे जीने तो दो ***********************

नारी शक्ति

सीमा सचदेव हे विश्व की सँचालिनी कोमल पर शक्तिशालिनी प्रणाम तुम्हें नारी शक्ति क्या अद्भुत है तेरी भक्ति तू सहनशील और सदविचार चुपचाप ही सह जाती प्रहार तुझसे ही तो जग है निर्मित परहित के लिए तुम हो अर्पित तुमने कितने ही किए त्याग दी अपने अरमानों को आग जिन्दा रही बस दूसरों के लिए नि:स्वार्थ ही उपकार किए खुशियाँ बाँटी बेटी बनकर माँ-बाप हुए धन्य जनकर अर्धांगिनी बनकर किए त्याग समझा उसको भी अच्छा भाग माँ बन काली रातें काटीं बच्चे को चिपका कर छाती जीवन भर करती रही संघर्ष चाहा बस इक प्यारा सा घर नहीं पता चला बीता जीवन हर बार ही मारा अपना मन .................... .................... ऐसी ही होती है नारी वही दे सकती जिन्दगी सारी उस नारी के नाम इक नारी दिवस खुश हो जाती है इसी में बस नहीं उसका दिया जाता कोई पल नारी तुम हो दुनिया का बल तुझमें ही है अद्भुत हिम्मत तेरी शक्ति के आगे झुका मस्तक। ********************************

मृग-तृष्णा

सीमा सचदेव एक दिन पड़ी थी माँ की कोख में अँधेरे में सिमटी सोई चाह कर भी कभी न रोई एक आशा थी मन में कि आगे उजाला है जीवन में एक दिन मिटेगा तम काला होगा जीवन में उजाला मिल गई एक दिन मंजिल धड़का उसका भी दुनिया में दिल फिर हुआ दुनिया से सामना पड़ा फिर से स्वयं को थामना तरसी स्वादिष्ट खाने को भी मर्जी से इधर-उधर जाने को भी मिला पीने को केवल दूध मिटाई उसी से अपनी भूख सोचा, एक दिन वो भी दाँत दिखाएगी और मर्जी से खाएगी जहाँ चाहेगी वहीं पर जाएगी दाँत भी आए और पैरों पर भी हुई खड़ी पर यह दुनिया चाबुक लेकर बढ़ी लड़की हो तो समझो अपनी सीमाएँ नहीं खुली हैं तुम्हारे लिए सब राहें फिर भी बढ़ती गई आगे यह सोचकर कि भविष्य में रहेगी स्वयं को खोजकर आगे भी बढ़ी सीढ़ी पे सीढी भी चढ़ी पर लड़की पे ही नहीं होता किसी को विश्वास पत्नी बनकर लेगी सुख की साँस एक दिन बन भी गई पत्नी किसी के हाथ सौप दी जिन्दगी अपनी पर पत्नी बनकर भी सुख तो नहीं पाया जिम्मेदारियो के बोझ ने पहरा लगाया फिर भी मन में यही आया माँ बनकर पायेगी सम्मान और पूरे होंगे उसके भी अरमान माँ बनी और खुद को भूली अपनी हर इच्छा की दे ही दी बलि पाली बस एक ही ...