Saturday, January 31, 2009

अद्भुत

डा. महेंद्रभटनागर,
.
आदमी —
अपने से पृथक धर्म वाले
आदमी को
प्रेम-भाव से — लगाव से
क्यों नहीं देखता?
उसे ग़ैर मानता है,
अक्सर उससे वैर ठानता है!
अवसर मिलते ही
अरे, ज़रा भी नहीं झिझकता
देने कष्ट,
चाहता है देखना उसे
जड-मूल-नष्ट!
देख कर उसे
तनाव में
आ जाता है,
सर्वत्र
दुर्भाव प्रभाव
घना छा जाता है!
.
ऐसा क्यों होता है?
क्यों होता है ऐसा?
.
कैसा है यह आदमी?
गज़ब का
आदमी अरे, कैसा है यह?
ख़ूब अजीबोगरीब मज़हब का
कैसा है यह?
सचमुच,
डरावना बीभत्स काल जैसा!
.
जो - अपने से पृथक धर्म वाले को
मानता-समझता
केवल ऐसा-वैसा!
.

1 comment:

परमजीत बाली said...

बढिया रचना प्रेषित की।