Wednesday, January 21, 2009

दो ध्रुव


डा. महेंद्र भटनागर,

स्पष्ट विभाजित है
जन-समुदाय —
समर्थ
असहाय।
.
हैं एक ओर —
भ्रष्ट राजनीतिक दल
उनके अनुयायी खल,
सुख-सुविधा-साधन-सम्पन्न
प्रसन्न।
धन-स्वर्ण से लबालब
आरामतलब
साहब और मुसाहब!
बँगले हैं
चकले हैं,
तलघर हैं
बंकर हैं,
भोग रहे हैं
जीवन की तरह-तरह की नेमत,
हैरत है, हैरत!
.
दूसरी —
जन हैं
भूखे-प्यासे दुर्बल, अभावग्रस्त ... त्रस्त,
अनपढ़,
दलित असंगठित,
खेतों - गाँवों
बाजा़रों - नगरों में
श्रमरत,
शोषित
वंचित
शंकित!

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