Sunday, January 18, 2009

राजधानी में गँवार




प्रेम जनमेजय
ट्रेन प्लेटफार्म पर आकर रुकी तो लगा कि जैसे किसी ने कूड़ा बिखेर दिया हो। सारी भीड़ उस पर मक्खियों की तरह तरह बैठने का प्रयत्न कर रही थी। ट्रेन के डिब्बे अन्दर से भीड़ को उगल रहे थे जैसे कै कर रहे हों। निकलने वाली भीड़ के चेहरे पर घुटन थी, रेल विभाग के प्रति गालियों की सौगात थी।

आत्मा ने बड़ी कठिनाई से अपना सामान और अपने-आपको बाहर निकाला। खड़े होकर उसने एक विश्रामसूचक लम्बी सांस ली और नथुनों को फैलाकर फिर उसे छोड़ दिया, जैसे इंजिन भाप छोड़ता है। चारों ओर चीखती-चिल्लाती भीड़ को देखकर उसे लगा कि परिवार-नियोजन वास्तव में एक समस्या है।

‘‘साहब ! सामान उठेगा !’’ कुली ने आत्मा की आँखों में प्यार से अपनी आँखें डालीं जैसे वह उसकी प्रेमिका हो। आत्मा ने आँखें मिचमिचाईं और उसे घूरते हुए बोला, ‘‘सामान बाहर ही ले चलोगे, कहीं भाग तो नहीं जाओगे ?’’
‘‘साले ! हमें बेईमान कहता है !’’ कुली ने लगभग चीखती आवाज में कहा जिससे डरकर आत्मा के गालों पर दो आँसू रेंग गए। उसने रुँधे गले से कहा, ‘‘ले चलो।’’

पैसे पूछने का आत्मा को साहस नहीं हो रहा था। कुली की चीख का डर अब भी उसके हृदय में दही की तरह जमा हुआ था। वह कुली के साथ गेट की ओर बढ़ा। गेट पर टिकट-चैकर स्वागतम् की मुद्रा में खड़ा हुआ था। उसने आत्मा को शिकारवाली नजरों से घूरा। आत्मा घबरा गया। टिकट-चैकर की आँखों में ब्रह्म-ज्योति जल उठी।

‘‘टिकट निकालो !’’ उसने घरघराती आवाज में आदेश दिया और फिर स्वयं ही उसकी जेबें टटोलने लगा। ‘‘टिकट नहीं है तो चायपानी के लिए बीस रुपये निकालो।’’
‘‘नहीं, टिकट है।’’ आत्मा ने हकलाते हुए कहा और उसने कमीज के अंदर से मैली-कुचैली टिकट निकालकर उसे पकड़ा दी।

टिकट-चैकर को लगा जैसे किसी ने उसकी जेब काट ली हो। उसने आत्मा को गाली देते हुए कहा, ‘‘बड़े देशभक्त बनते हो।’’ इसके साथ ही वह काफी उदास हो गया। उसे उदास देखकर आत्मा की हिचकी बंध गई। आत्मा को लगा कि वह वास्तव में बेवकूफ है। आधे पैसे आराम से बचाए जा सकते थे। उसने सोच लिया कि अब वह आगे से कभी भी देशभक्त नहीं बनेगा।

‘‘साला ! बड़ा खाऊ है।’’ गेट से बाहर निकलते ही कुली ने यह वाक्य निकाला और उसके साथ ही गले में अटकी हुई बलगम को थूक दिया।
आत्मा आश्चर्यचकित नगर की सभ्यता का पहला पाठ पढ़ रहा था। प्लेटफार्म पर लोग शरणार्थियों की तरह सोए हुए थे। बाहर निकलकर कुली ने सामान को जमीन पर पटका और हाथ फैला कर खड़ा हो गया जैसे दान मांग रहा हो।
‘‘कितने पैसे ?’’ आत्मा ने गंभीर स्वर में कहा।
‘‘डेढ़ रुपया।’’ कुली ने अपनी श्रम-नीति की घोषणा की।
आत्मा की सिकुड़ी आँखें एकाएक फैल गईं। उसको लगा जैसे कोई उसका गला घोंट रहा है। पैसे वाली जेब पर कसकर हाथ रखते हुए बोला—

‘‘तुम मुझे लू़ट रहे हो, मैं तुम्हें इस तरह नहीं लूटने दूँगा। आठ आने से एक पैसा अधिक नहीं दूंगा।’’

‘‘तेरा बाप भी देगा !’’ कुली ने गिराबन पकड़ लिया। आत्मा ने गिरेबान छुड़ाने के लिए हाथ को पकड़ा तो कुली ने अपना दूसरा हाथ उसकी जेब में डाल दिया। आत्मा निढाल हो गया। कुली ने जेब में से एक-एक के दो खरे नोट निकाले और अपनी जेब में रख लिए।
‘‘आठ आने तो लौटा दो।’’ आत्मा रो पड़ा।
‘‘आठ आने का तुमने मेरा समय नष्ट किया है। मैं एक पाई भी तुमको नहीं लौटाऊँगा।’’ और कुली उनकी निःसहाय छोड़कर चला गया।

उसे इस तरह भकुएपन में देखकर एक स्कूटर वाले की आँखें दोगुनी हो गईं। उसने बढ़कर आत्मा का जैसे स्वागत किया और बड़े मीठे लहजे में बोला, ‘‘कहाँ जाना है, मेरी सरकार ?’

आत्मा को लगा कि स्कूटर वाला काफी शरीफ है और उसकी मदद अवश्य करेगा। वह उसके गले से लिपट गया और उसको कसकर भींचते हुए तोतली भाषा में बोला, ‘‘रामकृष्णपुरम् कहाँ है ?’’

स्कूटर वाला समझ गया कि बाऊ परदेसी है। उसकी आँखों में चमक पैदा हो गई जैसे उसकी लाटरी खुल गई हो। उसने पुचकारते स्वर में कहा, ‘‘दिल्ली के दूसरे कोने में। परंतु आप घबराएँ मत, मैं आपको अपने इस स्कूटर पर बिठाकर ले जाऊँगा। आप लोगों की सेवा के लिए ही तो यह स्कूटर है।’’
आत्मा की आँखों में प्रसन्नता की बाढ़ आ गई। उसने मन-ही-मन उसकी प्रशंसा की। परदेस में कौन इतनी मदद करता है ! अपने स्कूटर में ले जा रहा है। अपने गाँव का ही कोई होगा।
‘‘क्या आपका सामान यही है ?’’
‘‘सामान मैं अपने आप उठा लेता हूँ।’’ आत्मा ने उसकी सहायता करनी चाही।
‘‘अरे, हम तो आपके नौकर हैं। पैसे लेंगे तो काम भी करेंगे।’’ ड्राइवर ने मक्खन लगाते हुए कहा।
‘‘तुम पैसे भी लोगे ?’’ आत्मा को लगा कि उसका दिल स्कूटर के पहिये के नीचे दब गया है।
‘‘और नहीं तो क्या स्कूटर तुम्हारे बाप ने खरीदरकर दिया है ? छब्बीस मील दूर क्या तुम्हें मैं पानी डालकर ले जाऊँगा ?’’ ड्राइवर ने बाप की तरह डाँटते हुए कहा।
‘‘छब्बीस मील दूर ? कितने पैसे होंगे ?’’ आत्मा की आँखें प्रश्नवाचक चिह्न की तरह फैल गईं।
‘‘यह तो मीटर बताएगा।’’ ड्राइवर ने मीटर की ओर इशारा किया।
आत्मा ने उसे घूर कर देखा, जैसे किसी अजूबे को देख रहा हो। आश्चर्य भरी आवाज में उसने पूछा, ‘‘यह कैसे बताएगा ?’’
‘‘इसमें एक आदमी बैठा हुआ है वह बताएगा।’’ ड्राइवर ने स्कूल मास्टर की तरह डाँटा।’’ पता नहीं किस गाँव से आए हो कि तुम्हें मीटर का भी पता नहीं है।’’
‘‘बादलपुर से आया हूँ दिल्ली देखने बेटे के पास।’’ आत्मा ने मासूम होकर कहा।
‘‘चुप भी कर बे, मेरा टाइम वेस्ट हो रहा है।’’ ड्राइवर ने अपनी थोड़ी अंग्रेजी का रोब आत्मा पर झाड़ा।

और वह सामान रखने लगा। आत्मा को लगा कि वह क्लास में मुर्गा बना हुआ है। वह खंभे की तरह निश्चल एक जगह खड़ा रहा। ड्राइवर सामान रखने में मस्त था।
‘‘फिर भी, कितने पैसे लगेंगे, बता दो ?’’ एकाएक आत्मा को कुली का किस्सा याद हो आया।
ड्राइवर ने एक बार तीखी नजरों से उसको घूरा जैसे प्रेमिका का प्रेमी अपने विरोधी को घूरता है। फिर वह दबाव भरे शब्दों में बोला, ‘‘कम से कम बीस रुपये लग जाएँगे।’’

आत्मा को लगा जैसे उसके सारे पैसे जेब में से निकलकर सड़क पर फैल गए हैं। उसने अपने आपको संभालने का प्रयत्न किया। उसके माथे पर पसीने की बूंदे चमक उठीं जैसे भाप की बूंद बर्तन पर चमकती है। उसने सूखी आवाज में कहा, ‘‘बीस रुपये...? मैं नहीं दे सकता, मेरा सामान उतार दो। मैं किसी बैलगाड़ी या ताँगे से चला जाऊँगा। मुझे छोड़ दो।’’ आत्मा छटपटाने लगा।

‘‘तुमने मेरा समय नष्ट किया है, मैं तुम्हें जबरदस्ती ले जाऊँगा।’’ और ड्राइवर ने उसे स्कूटर में ढकेल दिया। आत्मा को लगा जैसे वह बहुत बड़े खड्डे में जा गिरा हो। वह मासूम होकर आंसू बहाता चुपचाप बैठ गया। उसने जेब को कसकर पकड़ा हुआ था परंतु फिर भी उसे लग रहा था कि कोई उसका सब कुछ निकाल रहा है।
स्कूटर पुरानी दिल्ली की सड़कों से रेंगकर नई दिल्ली की सड़कों पर फिसल गया। आत्मा पहले क्षण तो स्कूटर में ही उसी तरह उदासीन मुँह लटकाए बैठा रहा परंतु बाहर की चकाचौंध ने उसकी अवस्था बदल दी। रात का कालापन अभी इतना अधिक नहीं फैला था परंतु फिर भी दुकानों के सिरों पर विज्ञापन चमक रहे थे।
आत्मा ने घड़ी को घूरा जैसे अपना सारा गुस्सा उस पर उतारना चाहता हो। उसने एक बार ‘रिव्यू-मिरर’ में ड्राइवर का चेहरा देखा और फिर घड़ी को अपनी जेब में रख लिया। उसे डर हो आया कि कहीं ड्राइवर उससे घड़ी न छीन ले। उसने जेब को कसकर पकड़ लिया जैसे उसमें पड़ा सब कुछ स्कूटर के धचकों के कारण निकलकर स्कूटर के पहिये के नीचे आत्महत्या कर लेगा।

आत्मा बाहर की ओर घूर रहा था। शहर की चकाचौंध देखकर उसके हृदय में वसंत की बहार आ गई। आत्मा को लगा कि उसके अंदर खूब हरी-भरी घास उग आई है।
‘इतना किराया तो रेल से आने में नहीं लगा है जितना इस स्कूटर वाले ने ऐंठ लिया। यह सोचते ही आत्मा का रक्त उबल पड़ा जैसे चाय का पानी उबलता है। परंतु आत्मा अनचाहे ही उसे शांत कर गया।
ड्राइवर उसके सामने काफी भारी था।
आत्मा ने सोचा कि वह ड्राइवर से अपने बेटे के घर पहुँचने पर निबट लेगा। वह अपने बेटे से कहकर इस स्कूटर वाले को पुलिस में पकड़ा देगा।

वह ड्राइवर को चौदह आने से एक पैसा अधिक नहीं देगा। आत्मा ने अपनी जेब की पकड़ और मजबूत कर दी। अनजान लोगों को तंग करते हैं, मजा चखाऊँगा—आत्मा गलियों में लड़ते हुए बच्चों की तरह सोच रहा था। उसका बेटा जैसे उसका बेटा नहीं, बाप था जिससे वह शिकायत करता। आत्मा ने इस उत्साह में होंठ काट लिया और निकले खून को इस तरह चूस लिया मानो वह ड्राइवर का खून हो।
आत्मा ने चुपके से जेब से घड़ी निकाली और उसमें समय देखा-सवा आठ। मतलब की डेढ़ घंटा हो गया उसे रेल से उतरे पर अभी तक वह घर नहीं पहुँच पाया है। समय देखकर आत्मा ने घड़ी बड़ी चालाकी से जेब में रख ली और झटके के साथ ड्राइवर को देखा। ड्राइवर की अवस्था देखकर उसे विश्वास हो गया कि उसने उसे नहीं देखा। उसने एक लंबी सी सांस ली और छोड़ दी मानो उसके घर लड़की पैदा होते-होते लड़का हो गया हो।

स्कूटर के झटके साथ ड्राइवर को झटका लगा और उसकी पकड़ हैंडिल पर मजबूत हो गई। उसे लगा कि हैंडिल उसके हाथ से निकल जाएगा। वह सवारी को उसके घर नहीं ले जाएगा। अगर ले गया तो वहाँ रहने वाले उसकी चालाकी समझ जाएँगे। वे तो दिल्ली के पुराने पापी होंगे। वह सवारी को कॉलोनी के पास उतार देगा।
आत्मा को स्कूटर में बैठे काफी प्रसन्नता हो रही थी परंतु ड्राइवर का भय उसको समेटे हुए था। उसे लग रहा था जैसे किसी ने हँसी के गोलगप्पे खिलाकर उसके पेट पर नुकीला चाकू रख दिया है। जरा-सा भी हँसने पर चाकू दबाव डालने लगता है। आत्मा ने अपने पेट पर हाथ फेरा, लगा जैसे वास्तव में ही चाकू उसके पेट में चुभ रहा है। उसे अपनी इस अवस्था पर काफी क्रोध आया। उसे लगा कि वह शिखण्डी हो गया है।

एकाएक आत्मा ने बाहर देखा, काफी अंधेरा था। वह कुछ घबरा-सा गया। उसे लगा कि वह ड्राइवर उसे लूटने की तैयारी कर रहा है। आत्मा का हृदय पिचक गया और उसमें से चिपचिपी तरल वस्तु बहने लगी। आत्मा ने उस तरल वस्तु को बड़े प्रेम से अपने शरीर पर मल लिया और उसको लगा कि वह अब ‘युद्धवीर’ हो गया है। उसने ड्राइवर से पूछा, ‘‘अभी कितनी देर है ?’’
आवाज़ कड़क थी।
ड्राइवर को आत्मा की आवाज पर आश्चर्य हुआ। उसने आत्मा को पलटकर घूरा। आत्मा की वीरता पराजित हो गई। ड्राइवर फिर वैसा ही प्रसन्न हो गया। उसने शब्दों को चबाते हुए कहा, ‘‘बस, अधिक देर नहीं।’’ जैसे बच्चे को पुचकार रहा हो।
ड्राइवर ने एक झटके से स्कूटर रोक दिया। आत्मा यकायक उछल गया। उसको लगा जैसे वह अंतरिक्ष यान में झटका खा गया है। गले में फंसी आवाज में आत्मा ने पूछा, ‘‘क्यों, क्या हुआ ?’’
‘‘तुम्हारा जन्मस्थान आ गया।’’
‘‘अं....।’’
‘‘अरे, उतर भी, मैंने अभी और भी सवारियाँ पटानी हैं। देख ! कितने ठाट से बैठा है जैसे स्कूटर इसके बाप का हो। पैसे सुनकर तो साले के होश उड़ गए थे।’’ ड्राइवर ने आत्मा का हाथ पकड़कर उसे एक झटके से बाहर निकाल दिया।
‘‘पर यहाँ तो कहीं मकान नज़र नहीं आ रहे हैं ?’’ आत्मा की मच्छर जैसी टाँगें कांप गईं।
‘‘और क्या श्मशान नजर आ रहा है ? वह सामने क्या है ?’’ ड्राइवर ने आत्मा के तमाचा जड़ दिया।
‘‘इतनी दूर...क्या मुझे घर तक नहीं पहुँचाओगे ?’’ आत्मा ने रोते हुए कहा।
‘‘तुम्हारे बाप का ठेका ले रखा है क्या ? जल्दी से पैसे निकालो, मुझे देर हो रही है।’’

आत्मा की आँखों से दो बूंद पानी टपककर होंठों में घुस गए जिसे आत्मा चाट गया, खारा लगने पर वह पानी निगल गया। ड्राइवर उसकी इस दशा पर करुण-गीत हो गया। उसकी आँखों से मेघ बरस पड़ा, परंतु वह अपनी आदत से मजबूर था। उसने आत्मा के सिर पर हाथ फेरते हुए पुचकारकर कहा, ‘‘चलो, एक रुपया कम ले लेता हूँ, तुम उन्नीस दे दो।’’ ड्राइवर आत्मा के गले से लिपट गया। उसने गले से लिपटे-लिपटे ही आत्मा की जेब में से रुपये निकाल लिए। उनमें से उन्नीस रुपये रखकर शेष आत्मा को लौटा दिए। (स्कूटर-ड्राइवर की शराफत)
‘‘देखो, मुझ पर रहम खाओ। मेरे रुपये लौटा दो। मैं अपनी पोती के जन्मदिन पर जा रहा हूँ, मेरे पास कुछ नहीं बचेगा। तुम केवल पाँच रुपये ले लो।’’ और आत्मा उसके कदमों में अदब के साथ झुक गया।
ड्राइवर का हृदय पिघलने लगा परंतु उसने ठोककर उसे कठोर बना लिया। उसने आत्मा के हाथों से अपना पैर झटकते हुए कहा, ‘‘मैं ड्राइवर हूँ, कोई घसियारा नहीं हूँ। मैं और कोई रियायत नहीं कर सकता हूँ।’’ ड्राइवर बाँस की तरह अकड़कर खड़ा हो गया।
इतनी देर में वहाँ एक पुलिस वाला आ पहुँचा। उसने यह घटना देखी तो उसका दिमाग हवा में उड़ने लगा। उसे लगा कि आज वह काफी अमीर हो सकता है।

पुलिस वाले को देखकर आत्मा के हृदय में एक नया उत्साह उगा। वह अपने कपड़े झाड़ता हुआ पुलिस वाले के कदमों में पतिव्रता स्त्री की तरह लिपट गया। पुलिस वाले ने आत्मा को आशीर्वाद दिया। आत्मा ने पुलिस वाले अभयदान पाकर अपनी करुण-कथा सुनानी आरंभ कर दी। कथा सुनकर पुलिस वाले ने ड्राइवर के चेहरे की ओर मिचमिचाई नजरों से घूरा। ड्राइवर ने दबाकर आँख मार दी। पुलिस वाले का जबड़ा कुत्ते की तरह चौड़ा हो गया। उसने अपनी जेब को बड़े प्यार से सहलाया। स्कूटर वाला उसको अकेले में ले गया और एक पाँच का नोट उसकी ओर बढ़ा दिया।
पुलिस वाले की फैली आँखें सिकुड़ गईं और उसने आँख में से कीच निकालकर ड्राइवर के मुँह में ठूँसते हुए कहा, ‘‘बस !’’
‘‘काफी मोटी आसामी है, बाकी इससे ऐंठ लेना।’’ ड्राइवर ने कीच का स्वाद लेते हुए कहा। दोनों ने आर्थिक संधि पर हस्ताक्षर किए।
ड्राइवर के चेहरे पर फुलफलापन देखकर आत्मा का दिल अंदर को धंस गया। पुलिस वाला आत्मा की ओर बढ़ा और उसने कहा, ‘‘इसने ठीक पैसे लिए हैं। घर मैं तुम्हें पहुँचा दूँगा।’’ पुलिस वाले के स्वर में शासकीय रौब था।
आत्मा को कुछ संतोष हुआ। कम से कम वह घर तो पहुँच जाएगा। उसने सामान की ओर देखते हुए याचना-भरे स्वर में कहा, ‘‘कोई मजदूर नहीं मिलेगा ?’’
सामान की ओर देखकर पुलिस वाले की आँखें फैल गईं। उसने अपने में एक योजना बनाई और कहा, ‘‘क्यों नहीं मिलेगा ? मैं अभी पकड़कर लाता हूँ।’’

‘‘पैसे कितने लगेंगे ?’’ आत्मा को दोनों किस्से याद थे।
‘‘तुम चिंता मत करो, साले को एक पैसा नहीं दूंगा !’’ पुलिस वाले ने अपनी ‘पर्सनेलिटी’ बताई।
रात तीन घंटे व्यतीत हो चुकी थी। सड़क पर अब भी काफी भीड़ थी। सबकी आँखों में आत्मा के प्रति सहानुभूति थी।
कुछ देर में पुलिस वाला एक मजदूर को पकड़ लाया। उसके चेहरे पर जगह-जगह कटाव था, जैसे भारत का नक्शा। उसकी आँखों में एक विशेष चमक थी। उसने बिना कुछ कहे सामान उठा लिया। कुछ दूर चलकर उनको एक बहुत बड़ी भीड़ मिली। पुलिस वाले की आँखों में चाँद चमक गया। उसने मजदूर को हल्की सी चोट की और मजदूर सामान के साथ भीड़ में गोल हो गया। आत्मा का ध्यान कहीं और देखकर पुलिस वाला भी भीड़ में घुस गया। कुछ कदम चलने के बाद आत्मा ने जैसे ही दाएं देखा, पुलिस वाला गायब था। पीछे मुड़कर देखा मजदूर सामान-सहित गायब था। आत्मा को पुलिस वाले की मुस्कराहट का रहस्य समझ आ गया।

आत्मा को लगा किसी ने उसके सिर पर दस-बारह हथोड़े मार दिए हैं। वह चकारकर गिर गया। जैसे कोई खोखला पेड़ गिरता है। आसपास की भीड़ ने बड़ी सोच-समझ के बाद आत्मा को उठाया क्योंकि यह पुलिस का मामला था। कुछ पानी छिड़का और होश में लाया गया। आत्मा होश में आते ही रो पड़ा। उसकी आँखों से परनाले की तरह आँसू बह रहे थे। सारी भीड़ की हिचकियाँ बँध गईं। अपने प्रति सहानुभूति देखकर आत्मा ने अपनी कहानी सुनानी आरंभ कर दी और एक मजमा लग गया। सारी भीड़ यकायक रो पड़ी, जैसे देश के किसी महान नेता की मृत्यु हो गई हो। आत्मा ने भीड़ से सहायता मांगी। सारी भीड़ छिटक गई। आत्मा को लगा कि वह यतीम हो गया है।
तभी एक व्यक्ति उसके पास आया। उसकी आँखों में सहानुभूति भरी थी जैसे बरसात में जोहड़ भरा जाता है। उसने पुचकारते हुए कहा, ‘‘कहाँ जाना है ?’’

‘‘सैक्टर आठ में।’’ आत्मा ने आंसू पोंछते हुए कहा।

‘‘देखो, वह सामने है, उधर। सीधे चले जाओ फिर दाएँ मुड़ जाना। वहाँ से जाकर किसी और से पूछ लेना।’’ कहते हुए वह व्यक्ति ऐसे देख रहा था जैसे चोरी कर रहा हो।

आत्मा उठा और उसी दिशा की ओर बढ़ गया। उसने घड़ी में समय देखा साढ़े नौ बजे थे। लगभग आधा घंटा लग जाएगा। उसने घड़ी को डरकर जेब में रख लिया।
आत्मा की चाल फटेहाल आशिक से कम न थी। घूमते-घूमते वह पौन घंटे में उस स्थान पर पहुँच गया। अब इससे आगे जाने को उसके पास कोई अनुमान नहीं था। मकानों की भीड़ में तो वह पहुँच चुका था परंतु उसके नंबर अभी तक अंधकार में ही थे। उसका चश्मा सामान के साथ ही चल गया था। बिना चश्मे के इस समय वह उल्लू नजर आ रहा था। उसने एक व्यक्ति को रोककर पूछा, ‘‘सैक्टर आठ कहाँ है, भाई साहब ?’

उस व्यक्ति ने आत्मा को घूरा और फिर एक करारा चांटा उसके जड़ दिया वह क्रोध में फुफकारता हुआ बोला, ‘‘मेरी जेब में रखा है सैक्टर आठ ! साले मुझे चलाता है। सैक्टर आठ में खड़ा है और पूछता है कि सैक्टर आठ कहाँ है ? और वह व्यक्ति एक-दो गालियाँ और देकर पंक्ति की तरह आगे बढ़ गया।

इसके बाद किसी से कुछ पूछने की आत्मा की शक्ति नहीं रही। उसको लगा कि उसके अंदर का पुरुष मर गया है। एक-दो बार कुछ सोचकर उसने पूछने का साहस भी किया परंतु उसको वही रूखे उत्तर मिले। आत्मा को लगा कि जैसे वह कटघरे में बंद एक पागल है।
अंधकार धीरे-धीरे और गहरा होता जा रहा था। सड़कों पर बिखरी हुई भीड़ यकायक सिमटती जा रही थी। धीरे-धीरे भीड़ सिमटकर कुछ ही व्यक्तियों में सीमित रह गई। आत्मा अब भी उसी प्रकार आशिकों की तरह मकान ढूँढ़ रहा था।
यकायक रात की चुपचुपाहट में सीटियों और लाठियों की गूंज उठी जैसे सवेरा होने पर मंदिरों मे घंटे गूँजते हैं। आत्मा ने समय देखा—सवा-ग्यारह बजे थे।

तभी उसे सामने से एक पुलिस वाला आता दिखाई दिया। आत्मा के मस्तिष्क में उस पुलिस वाले का किस्सा नए बच्चे की तरह जीवित था। वह एकदम विमुख हो गया।
‘‘कहाँ भाग रहा है ?’’ पुलिस वाले की आवाज ने जैसे उसके पैरों को सड़क पर चिपका दिया। वह समीप आया और आत्मा को घूरते हुए बोला, ‘‘कौन है, बे ?’’
‘‘एक परदेसी हूँ।’’ आत्मा ने दयनीय भाव से कहा।
‘‘परदेसी है...! थाने में चल, सब पता चल जाएगा।’’ और उसने आत्मा की कलाई इतनी जोर से पकड़ ली जैसे शादी की गाँठ लगा दी हो।
थाने में पहुँचकर आत्मा की तलाशी ली गई। पैसों के साथ उसकी घड़ी और खोए ट्रंक की चाबी भी मिली। थानेदार की आँखें ट्यूबलाइट की तरह चमचमा उठीं।

‘‘यह घड़ी तुझे ससुराल से मिली है जो इस तरह जेब में रखता फिर रहा है। और बिना ताले के इस चाबी का क्या मतलब ?’’ थानेदार ने जासूसी आँखों से उसको घूरा।
‘‘हवलदार साहब, मैं परदेसी हूँ। मुझे छोड़ दो। मैं चोरी करने नहीं आया हूँ।’’
प्रकाशक : डायमंड पाकेट बुक



3 comments:

Nirmla Kapila said...

bhuthibdiya aur aaj ke smaaj ki sachi tasveer hai

Nirmla Kapila said...

bhuthibdiya aur aaj ke smaaj ki sachi tasveer hai

संगीता पुरी said...

सही चित्रण किया है आपने.....राजधानी में कितनी परेशानी आयी बंचारे आत्‍मा को.....मेरी समझ में एक बात नहीं आयी कि पहली बार वहां आ रहे आत्‍मा को उसका बेटा स्‍टेशन पर लेने क्‍यों नहीं पहुचा......उसे तो अवश्‍य जानकारी होगी कि वहां यही सब होता है ?