Friday, January 30, 2009

बचाव

डा. महेंद्रभटनागर,

कैसी चली हवा!
.
हर कोई
केवल
हित अपना
सोचे,
औरों का हिस्सा
हड़पे,
कोई चाहे कितना
तड़पे!
घर भरने अपना
औरों की
बोटी-बोटी काटे
नोचे!
.
इस
संक्रामक सामाजिक
बीमारी की
क्या कोई नहीं दवा?
कैसी चली हवा!

1 comment:

परमजीत बाली said...

बहुत सही सामयिक समस्या को उठाया है।बढिया रचना है।बधाई।