Thursday, January 29, 2009

बदलो!

डा. महेंद्रभटनागर,

सड़ती लाशों की
दुर्गन्ध लिए
छूने
गाँवों-नगरों के
ओर-छोर
जो हवा चली —
उसका रुख़ बदलो!
.
ज़हरीली गैसों से
अलकोहल से
लदी-लदी
गाँवों-नगरों के
नभ-मंडल पर
जो हवा चली
उससे सँभलो!
उसका रुख़ बदलो!

1 comment:

परमजीत बाली said...

सामयिक रचना है।बधाई।