डा. महेंद्रभटनागर,
.
आदमी —
अपने से पृथक धर्म वाले
आदमी को
प्रेम-भाव से — लगाव से
क्यों नहीं देखता?
उसे ग़ैर मानता है,
अक्सर उससे वैर ठानता है!
अवसर मिलते ही
अरे, ज़रा भी नहीं झिझकता
देने कष्ट,
चाहता है देखना उसे
जड-मूल-नष्ट!
देख कर उसे
तनाव में
आ जाता है,
सर्वत्र
दुर्भाव प्रभाव
घना छा जाता है!
.
ऐसा क्यों होता है?
क्यों होता है ऐसा?
.
कैसा है यह आदमी?
गज़ब का
आदमी अरे, कैसा है यह?
ख़ूब अजीबोगरीब मज़हब का
कैसा है यह?
सचमुच,
डरावना बीभत्स काल जैसा!
.
जो - अपने से पृथक धर्म वाले को
मानता-समझता
केवल ऐसा-वैसा!
.
Saturday, January 31, 2009
Friday, January 30, 2009
बचाव
डा. महेंद्रभटनागर,
कैसी चली हवा!
.
हर कोई
केवल
हित अपना
सोचे,
औरों का हिस्सा
हड़पे,
कोई चाहे कितना
तड़पे!
घर भरने अपना
औरों की
बोटी-बोटी काटे
नोचे!
.
इस
संक्रामक सामाजिक
बीमारी की
क्या कोई नहीं दवा?
कैसी चली हवा!
कैसी चली हवा!
.
हर कोई
केवल
हित अपना
सोचे,
औरों का हिस्सा
हड़पे,
कोई चाहे कितना
तड़पे!
घर भरने अपना
औरों की
बोटी-बोटी काटे
नोचे!
.
इस
संक्रामक सामाजिक
बीमारी की
क्या कोई नहीं दवा?
कैसी चली हवा!
Thursday, January 29, 2009
बदलो!
डा. महेंद्रभटनागर,
सड़ती लाशों की
दुर्गन्ध लिए
छूने
गाँवों-नगरों के
ओर-छोर
जो हवा चली —
उसका रुख़ बदलो!
.
ज़हरीली गैसों से
अलकोहल से
लदी-लदी
गाँवों-नगरों के
नभ-मंडल पर
जो हवा चली
उससे सँभलो!
उसका रुख़ बदलो!
सड़ती लाशों की
दुर्गन्ध लिए
छूने
गाँवों-नगरों के
ओर-छोर
जो हवा चली —
उसका रुख़ बदलो!
.
ज़हरीली गैसों से
अलकोहल से
लदी-लदी
गाँवों-नगरों के
नभ-मंडल पर
जो हवा चली
उससे सँभलो!
उसका रुख़ बदलो!
Wednesday, January 28, 2009
दृष्टि
डा. महेंद्रभटनागर,
जीवन के कठिन संघर्ष में
हारो हुओ!
हर क़दम
दुर्भाग्य के मारो हुओ!
असहाय बन
रोओ नहीं,
गहरा अँधेरा है,
चेतना खोओ नहीं!
.
पराजय को
विजय की सूचिका समझो,
अँधेरे को
सूरज के उदय की भूमिका समझो!
.
विश्वास का यह बाँध
फूटे नहीं!
नये युग का सपन यह
टूटे नहीं!
भावना की डोर यह
छूटे नहीं!
.
जीवन के कठिन संघर्ष में
हारो हुओ!
हर क़दम
दुर्भाग्य के मारो हुओ!
असहाय बन
रोओ नहीं,
गहरा अँधेरा है,
चेतना खोओ नहीं!
.
पराजय को
विजय की सूचिका समझो,
अँधेरे को
सूरज के उदय की भूमिका समझो!
.
विश्वास का यह बाँध
फूटे नहीं!
नये युग का सपन यह
टूटे नहीं!
भावना की डोर यह
छूटे नहीं!
.
Tuesday, January 27, 2009
सुखद
डा. महेंद्रभटनागर,
सहधर्मी
सहकर्मी
खोज निकाले हैं
दूर - दूर से
आस - पास से
और जुड़ गया है
अंग - अंग
सहज
किन्तु
रहस्यपूर्ण ढंग से
अटूट तारों से,
चारों छोरों से
पक्के डोरों से!
.
अब कहाँ अकेला हूँ ?
कितना विस्तृत हो गया अचानक
परिवार आज मेरा यह!
जाते - जाते
कैसे बरस पड़ा झर - झर
विशुद्ध प्यार घनेरा यह!
नहलाता आत्मा को
गहरे - गहरे!
लहराता मन का
रिक्त सरोवर
ओर - छोर
भरे - भरे!
सहधर्मी
सहकर्मी
खोज निकाले हैं
दूर - दूर से
आस - पास से
और जुड़ गया है
अंग - अंग
सहज
किन्तु
रहस्यपूर्ण ढंग से
अटूट तारों से,
चारों छोरों से
पक्के डोरों से!
.
अब कहाँ अकेला हूँ ?
कितना विस्तृत हो गया अचानक
परिवार आज मेरा यह!
जाते - जाते
कैसे बरस पड़ा झर - झर
विशुद्ध प्यार घनेरा यह!
नहलाता आत्मा को
गहरे - गहरे!
लहराता मन का
रिक्त सरोवर
ओर - छोर
भरे - भरे!
Monday, January 26, 2009
युगान्तर
डा. महेंद्रभटनागर,
अब तो
धरती अपनी,
अपना आकाश है!
.
सूर्य उगा
लो
फैला सर्वत्र
प्रकाश है!
.
स्वधीन रहेंगे
सदा-सदा
पूरा विश्वास है!
.
मानव-विकास का चक्र
न पीछे मुड़ता
साक्षी इतिहास है!
.
यह
प्रयोग-सिद्ध
तत्व-ज्ञान
हमारे पास है!
.
अब तो
धरती अपनी,
अपना आकाश है!
.
सूर्य उगा
लो
फैला सर्वत्र
प्रकाश है!
.
स्वधीन रहेंगे
सदा-सदा
पूरा विश्वास है!
.
मानव-विकास का चक्र
न पीछे मुड़ता
साक्षी इतिहास है!
.
यह
प्रयोग-सिद्ध
तत्व-ज्ञान
हमारे पास है!
.
Sunday, January 25, 2009
परिवर्तन
डा. महेंद्रभटनागर,
मौसम
कितना बदल गया!
सब ओर कि दिखता
नया-नया!
.
सपना —
जो देखा था
साकार हुआ,
अपने जीवन पर
अपनी क़िस्मत पर
अपना अधिकार हुआ!
.
समता का
बोया था जो बीज-मंत्र
पनपा, छतनार हुआ!
सामाजिक-आर्थिक
नयी व्यवस्था का आधार बना!
.
शोषित-पीड़ित जन-जन जागा,
नवयुग का छविकार बना!
साम्य-भाव के नारों से
नभ-मंडल दहल गया!
मौसम
कितना बदल गया!
मौसम
कितना बदल गया!
सब ओर कि दिखता
नया-नया!
.
सपना —
जो देखा था
साकार हुआ,
अपने जीवन पर
अपनी क़िस्मत पर
अपना अधिकार हुआ!
.
समता का
बोया था जो बीज-मंत्र
पनपा, छतनार हुआ!
सामाजिक-आर्थिक
नयी व्यवस्था का आधार बना!
.
शोषित-पीड़ित जन-जन जागा,
नवयुग का छविकार बना!
साम्य-भाव के नारों से
नभ-मंडल दहल गया!
मौसम
कितना बदल गया!
Saturday, January 24, 2009
अपहर्ता
डा. महेंद्रभटनागर,
धूर्त —
सरल दुर्बल को
ठगने
धोखा देने
बैठे हैं तैयार!
.
धूर्त —
लगाये घात,
छिपे
इर्द-गिर्द
करने गहरे वार!
.
धूर्त —
फ़रेबी कपटी
चैकन्ने
करने छीना-झपटी,
लूट-मार
हाथ-सफ़ाई
चतुराई
या
सीधे मुष्टि-प्रहार!
.
धूर्त —
हड़पने धन-दौलत
पुरखों की वैध विरासत
हथियाने माल-टाल
कर दूषित बुद्वि-प्रयोग!
.
धृष्ट,
दुःसाहसी,
निडर!
.
बना रहे
छद्म लेख-प्रलेख!
.
चमत्कार!
विचित्र चमत्कार!
.
धूर्त —
सरल दुर्बल को
ठगने
धोखा देने
बैठे हैं तैयार!
.
धूर्त —
लगाये घात,
छिपे
इर्द-गिर्द
करने गहरे वार!
.
धूर्त —
फ़रेबी कपटी
चैकन्ने
करने छीना-झपटी,
लूट-मार
हाथ-सफ़ाई
चतुराई
या
सीधे मुष्टि-प्रहार!
.
धूर्त —
हड़पने धन-दौलत
पुरखों की वैध विरासत
हथियाने माल-टाल
कर दूषित बुद्वि-प्रयोग!
.
धृष्ट,
दुःसाहसी,
निडर!
.
बना रहे
छद्म लेख-प्रलेख!
.
चमत्कार!
विचित्र चमत्कार!
.
Friday, January 23, 2009
विजयोत्सव
डा. महेंद्रभटनागर,
एरोड्रोम पर
विशेष वायुयान में
पार्टी का
लड़ैता नेता आया है,
.
‘शताब्दी’ से
स्टेशन पर
कांग्रेस का
चहेता नेता आया है,
.
‘ए-सी एम्बेसेडर’ से
सड़क-सड़क,
दल का
जेता नेता आया है,
.
भरने जयकारा,
पुरज़ोर बजाने
सिंगा, डंका, डिंडिम,
पहुँचा
हुर्रा-हुर्रा करता
सैकड़ों का हुजूम!
.
पालतू-फालतू बकरियों का,
शॅल लपेटे सीधी मूर्खा भेड़ों का,
संडमुसंड जंगली वराहों का,
बुज़दिल भयभीत सियारों का!
.
में-में करता
गुर्रा-गुर्रा हुंकृति करता
करता हुआँ-हुआँ!
.
चिल्लाता —
लूट-लूट,
प्रतिपक्षी को ....
शूट-शूट!
जय का जश्न मनाता
‘गब्बर’ नेता का!
एरोड्रोम पर
विशेष वायुयान में
पार्टी का
लड़ैता नेता आया है,
.
‘शताब्दी’ से
स्टेशन पर
कांग्रेस का
चहेता नेता आया है,
.
‘ए-सी एम्बेसेडर’ से
सड़क-सड़क,
दल का
जेता नेता आया है,
.
भरने जयकारा,
पुरज़ोर बजाने
सिंगा, डंका, डिंडिम,
पहुँचा
हुर्रा-हुर्रा करता
सैकड़ों का हुजूम!
.
पालतू-फालतू बकरियों का,
शॅल लपेटे सीधी मूर्खा भेड़ों का,
संडमुसंड जंगली वराहों का,
बुज़दिल भयभीत सियारों का!
.
में-में करता
गुर्रा-गुर्रा हुंकृति करता
करता हुआँ-हुआँ!
.
चिल्लाता —
लूट-लूट,
प्रतिपक्षी को ....
शूट-शूट!
जय का जश्न मनाता
‘गब्बर’ नेता का!
Wednesday, January 21, 2009
दो ध्रुव
डा. महेंद्र भटनागर,
स्पष्ट विभाजित है
जन-समुदाय —
समर्थ
असहाय।
.
हैं एक ओर —
भ्रष्ट राजनीतिक दल
उनके अनुयायी खल,
सुख-सुविधा-साधन-सम्पन्न
प्रसन्न।
धन-स्वर्ण से लबालब
आरामतलब
साहब और मुसाहब!
बँगले हैं
चकले हैं,
तलघर हैं
बंकर हैं,
भोग रहे हैं
जीवन की तरह-तरह की नेमत,
हैरत है, हैरत!
.
दूसरी —
जन हैं
भूखे-प्यासे दुर्बल, अभावग्रस्त ... त्रस्त,
अनपढ़,
दलित असंगठित,
खेतों - गाँवों
बाजा़रों - नगरों में
श्रमरत,
शोषित
वंचित
शंकित!
Tuesday, January 20, 2009
समता-स्वप्न
डा. महेंद्र भटनागर
.
विश्व का इतिहास
साक्षी है —
.
अभावों की
धधकती आग में
जीवन
हवन जिनने किया,
अन्याय से लड़ते
व्यवस्था को बदलते
पीढ़ियों
यौवन
दहन जिनने किया,
.
वे ही
छले जाते रहे
प्रत्येक युग में,
क्रूर शोषण-चक्र में
अविरत
दले जाते रहे
प्रत्येक युग में!
.
विषमता
और ...
बढ़ती गयी,
बढ़ता गया
विस्तार अन्तर का!
हुआ धनवान
और साधनभूत,
निर्धन -
और निर्धन,
अर्थ गौरव हीन,
हतप्रभ दीन!
.
लेकिन;
विश्व का इतिहास
साक्षी है —
.
परस्पर
साम्यवाही भावना इंसान की
निष्क्रिय नहीं होगी,
न मानेगी पराभव!
.
लक्ष्य तक पहुँचे बिना
होगी नहीं विचलित,
न भटकेगा
हटेगा
एक क्षण
अवरुद्व हो लाचार
समता-राह से मानव!
.
विश्व का इतिहास
साक्षी है —
.
अभावों की
धधकती आग में
जीवन
हवन जिनने किया,
अन्याय से लड़ते
व्यवस्था को बदलते
पीढ़ियों
यौवन
दहन जिनने किया,
.
वे ही
छले जाते रहे
प्रत्येक युग में,
क्रूर शोषण-चक्र में
अविरत
दले जाते रहे
प्रत्येक युग में!
.
विषमता
और ...
बढ़ती गयी,
बढ़ता गया
विस्तार अन्तर का!
हुआ धनवान
और साधनभूत,
निर्धन -
और निर्धन,
अर्थ गौरव हीन,
हतप्रभ दीन!
.
लेकिन;
विश्व का इतिहास
साक्षी है —
.
परस्पर
साम्यवाही भावना इंसान की
निष्क्रिय नहीं होगी,
न मानेगी पराभव!
.
लक्ष्य तक पहुँचे बिना
होगी नहीं विचलित,
न भटकेगा
हटेगा
एक क्षण
अवरुद्व हो लाचार
समता-राह से मानव!
Monday, January 19, 2009
उद्देश्यपूर्ण पत्रिका

-[वाड्मय]- यूं तो राही मासूम रजा पर अनेक पत्रिकाओं ने विशेष अंक प्रकाशित किए हैं परन्तु राही की बहुमुखी रचनात्मक प्रतिभा के अनेक रंगों को उजागर करती हुई दुर्लभ सामग्री से भरपूर है त्रैमासिक पत्रिका वाड्मय का राही मासूम रजा अंक। प्रथम खंड में प्रताप दीक्षित के परिचयात्मक लेख के साथ राही की चुनी हुई 7 कहानियां हैं। दूसरे खंड में उनके लेखन की बहुकोणीय पडताल और मीमांसा है। साक्षात्कार खंड में प्रेम कुमार की उनकी संगिनी नैयर रजा से बेहद दिलचस्प और बेबाक बातचीत है जो इस आयोजन की उपलब्धि है। हिंदी सिनेमा को राही के योगदान पर प्रकाश डालते हुए चौथा खंड अपने में विशिष्ट और महत्वपूर्ण है। -[वाड्मय/ सं. डा.एम.फीरोज अहमद]http://in.jagran.yahoo.com/sahitya/?page=slideshow&articleid=1969&category=11#0
हैरानी
डा. महेंद्रभटनागर
.
कितना ख़ुदग़रज़
हो गया इंसान!
बड़ा ख़ुश है
पाकर तनिक-सा लाभ —
बेच कर ईमान!
.
चंद सिक्कों के लिए
कर आया
शैतान को मतदान,
नहीं मालूम
‘ख़ुददार’ का मतलब
गट-गट पी रहा अपमान!
.
रिझाने मंत्रियों को
उनके सामने
कठपुतली बना निष्प्राण,
अजनबी-सा दीखता —
आदमी की
खो चुका पहचान!
.
कितना ख़ुदग़रज़
हो गया इंसान!
बड़ा ख़ुश है
पाकर तनिक-सा लाभ —
बेच कर ईमान!
.
चंद सिक्कों के लिए
कर आया
शैतान को मतदान,
नहीं मालूम
‘ख़ुददार’ का मतलब
गट-गट पी रहा अपमान!
.
रिझाने मंत्रियों को
उनके सामने
कठपुतली बना निष्प्राण,
अजनबी-सा दीखता —
आदमी की
खो चुका पहचान!
संवेदना
डा. महेंद्रभटनागर
.
काश, आँसुओं से मुँह धोया होता,
बीज प्रेम का मन में बोया होता,
दुर्भाग्यग्रस्त मानवता के हित में
अपना सुख, अपना धन खोया होता!
.
काश, आँसुओं से मुँह धोया होता,
बीज प्रेम का मन में बोया होता,
दुर्भाग्यग्रस्त मानवता के हित में
अपना सुख, अपना धन खोया होता!
Sunday, January 18, 2009
राजधानी में गँवार
प्रेम जनमेजय
ट्रेन प्लेटफार्म पर आकर रुकी तो लगा कि जैसे किसी ने कूड़ा बिखेर दिया हो। सारी भीड़ उस पर मक्खियों की तरह तरह बैठने का प्रयत्न कर रही थी। ट्रेन के डिब्बे अन्दर से भीड़ को उगल रहे थे जैसे कै कर रहे हों। निकलने वाली भीड़ के चेहरे पर घुटन थी, रेल विभाग के प्रति गालियों की सौगात थी।
आत्मा ने बड़ी कठिनाई से अपना सामान और अपने-आपको बाहर निकाला। खड़े होकर उसने एक विश्रामसूचक लम्बी सांस ली और नथुनों को फैलाकर फिर उसे छोड़ दिया, जैसे इंजिन भाप छोड़ता है। चारों ओर चीखती-चिल्लाती भीड़ को देखकर उसे लगा कि परिवार-नियोजन वास्तव में एक समस्या है।
‘‘साहब ! सामान उठेगा !’’ कुली ने आत्मा की आँखों में प्यार से अपनी आँखें डालीं जैसे वह उसकी प्रेमिका हो। आत्मा ने आँखें मिचमिचाईं और उसे घूरते हुए बोला, ‘‘सामान बाहर ही ले चलोगे, कहीं भाग तो नहीं जाओगे ?’’
‘‘साले ! हमें बेईमान कहता है !’’ कुली ने लगभग चीखती आवाज में कहा जिससे डरकर आत्मा के गालों पर दो आँसू रेंग गए। उसने रुँधे गले से कहा, ‘‘ले चलो।’’
पैसे पूछने का आत्मा को साहस नहीं हो रहा था। कुली की चीख का डर अब भी उसके हृदय में दही की तरह जमा हुआ था। वह कुली के साथ गेट की ओर बढ़ा। गेट पर टिकट-चैकर स्वागतम् की मुद्रा में खड़ा हुआ था। उसने आत्मा को शिकारवाली नजरों से घूरा। आत्मा घबरा गया। टिकट-चैकर की आँखों में ब्रह्म-ज्योति जल उठी।
‘‘टिकट निकालो !’’ उसने घरघराती आवाज में आदेश दिया और फिर स्वयं ही उसकी जेबें टटोलने लगा। ‘‘टिकट नहीं है तो चायपानी के लिए बीस रुपये निकालो।’’
‘‘नहीं, टिकट है।’’ आत्मा ने हकलाते हुए कहा और उसने कमीज के अंदर से मैली-कुचैली टिकट निकालकर उसे पकड़ा दी।
टिकट-चैकर को लगा जैसे किसी ने उसकी जेब काट ली हो। उसने आत्मा को गाली देते हुए कहा, ‘‘बड़े देशभक्त बनते हो।’’ इसके साथ ही वह काफी उदास हो गया। उसे उदास देखकर आत्मा की हिचकी बंध गई। आत्मा को लगा कि वह वास्तव में बेवकूफ है। आधे पैसे आराम से बचाए जा सकते थे। उसने सोच लिया कि अब वह आगे से कभी भी देशभक्त नहीं बनेगा।
‘‘साला ! बड़ा खाऊ है।’’ गेट से बाहर निकलते ही कुली ने यह वाक्य निकाला और उसके साथ ही गले में अटकी हुई बलगम को थूक दिया।
आत्मा आश्चर्यचकित नगर की सभ्यता का पहला पाठ पढ़ रहा था। प्लेटफार्म पर लोग शरणार्थियों की तरह सोए हुए थे। बाहर निकलकर कुली ने सामान को जमीन पर पटका और हाथ फैला कर खड़ा हो गया जैसे दान मांग रहा हो।
‘‘कितने पैसे ?’’ आत्मा ने गंभीर स्वर में कहा।
‘‘डेढ़ रुपया।’’ कुली ने अपनी श्रम-नीति की घोषणा की।
आत्मा की सिकुड़ी आँखें एकाएक फैल गईं। उसको लगा जैसे कोई उसका गला घोंट रहा है। पैसे वाली जेब पर कसकर हाथ रखते हुए बोला—
‘‘तुम मुझे लू़ट रहे हो, मैं तुम्हें इस तरह नहीं लूटने दूँगा। आठ आने से एक पैसा अधिक नहीं दूंगा।’’
‘‘तेरा बाप भी देगा !’’ कुली ने गिराबन पकड़ लिया। आत्मा ने गिरेबान छुड़ाने के लिए हाथ को पकड़ा तो कुली ने अपना दूसरा हाथ उसकी जेब में डाल दिया। आत्मा निढाल हो गया। कुली ने जेब में से एक-एक के दो खरे नोट निकाले और अपनी जेब में रख लिए।
‘‘आठ आने तो लौटा दो।’’ आत्मा रो पड़ा।
‘‘आठ आने का तुमने मेरा समय नष्ट किया है। मैं एक पाई भी तुमको नहीं लौटाऊँगा।’’ और कुली उनकी निःसहाय छोड़कर चला गया।
उसे इस तरह भकुएपन में देखकर एक स्कूटर वाले की आँखें दोगुनी हो गईं। उसने बढ़कर आत्मा का जैसे स्वागत किया और बड़े मीठे लहजे में बोला, ‘‘कहाँ जाना है, मेरी सरकार ?’
आत्मा को लगा कि स्कूटर वाला काफी शरीफ है और उसकी मदद अवश्य करेगा। वह उसके गले से लिपट गया और उसको कसकर भींचते हुए तोतली भाषा में बोला, ‘‘रामकृष्णपुरम् कहाँ है ?’’
स्कूटर वाला समझ गया कि बाऊ परदेसी है। उसकी आँखों में चमक पैदा हो गई जैसे उसकी लाटरी खुल गई हो। उसने पुचकारते स्वर में कहा, ‘‘दिल्ली के दूसरे कोने में। परंतु आप घबराएँ मत, मैं आपको अपने इस स्कूटर पर बिठाकर ले जाऊँगा। आप लोगों की सेवा के लिए ही तो यह स्कूटर है।’’
आत्मा की आँखों में प्रसन्नता की बाढ़ आ गई। उसने मन-ही-मन उसकी प्रशंसा की। परदेस में कौन इतनी मदद करता है ! अपने स्कूटर में ले जा रहा है। अपने गाँव का ही कोई होगा।
‘‘क्या आपका सामान यही है ?’’
‘‘सामान मैं अपने आप उठा लेता हूँ।’’ आत्मा ने उसकी सहायता करनी चाही।
‘‘अरे, हम तो आपके नौकर हैं। पैसे लेंगे तो काम भी करेंगे।’’ ड्राइवर ने मक्खन लगाते हुए कहा।
‘‘तुम पैसे भी लोगे ?’’ आत्मा को लगा कि उसका दिल स्कूटर के पहिये के नीचे दब गया है।
‘‘और नहीं तो क्या स्कूटर तुम्हारे बाप ने खरीदरकर दिया है ? छब्बीस मील दूर क्या तुम्हें मैं पानी डालकर ले जाऊँगा ?’’ ड्राइवर ने बाप की तरह डाँटते हुए कहा।
‘‘छब्बीस मील दूर ? कितने पैसे होंगे ?’’ आत्मा की आँखें प्रश्नवाचक चिह्न की तरह फैल गईं।
‘‘यह तो मीटर बताएगा।’’ ड्राइवर ने मीटर की ओर इशारा किया।
आत्मा ने उसे घूर कर देखा, जैसे किसी अजूबे को देख रहा हो। आश्चर्य भरी आवाज में उसने पूछा, ‘‘यह कैसे बताएगा ?’’
‘‘इसमें एक आदमी बैठा हुआ है वह बताएगा।’’ ड्राइवर ने स्कूल मास्टर की तरह डाँटा।’’ पता नहीं किस गाँव से आए हो कि तुम्हें मीटर का भी पता नहीं है।’’
‘‘बादलपुर से आया हूँ दिल्ली देखने बेटे के पास।’’ आत्मा ने मासूम होकर कहा।
‘‘चुप भी कर बे, मेरा टाइम वेस्ट हो रहा है।’’ ड्राइवर ने अपनी थोड़ी अंग्रेजी का रोब आत्मा पर झाड़ा।
और वह सामान रखने लगा। आत्मा को लगा कि वह क्लास में मुर्गा बना हुआ है। वह खंभे की तरह निश्चल एक जगह खड़ा रहा। ड्राइवर सामान रखने में मस्त था।
‘‘फिर भी, कितने पैसे लगेंगे, बता दो ?’’ एकाएक आत्मा को कुली का किस्सा याद हो आया।
ड्राइवर ने एक बार तीखी नजरों से उसको घूरा जैसे प्रेमिका का प्रेमी अपने विरोधी को घूरता है। फिर वह दबाव भरे शब्दों में बोला, ‘‘कम से कम बीस रुपये लग जाएँगे।’’
आत्मा को लगा जैसे उसके सारे पैसे जेब में से निकलकर सड़क पर फैल गए हैं। उसने अपने आपको संभालने का प्रयत्न किया। उसके माथे पर पसीने की बूंदे चमक उठीं जैसे भाप की बूंद बर्तन पर चमकती है। उसने सूखी आवाज में कहा, ‘‘बीस रुपये...? मैं नहीं दे सकता, मेरा सामान उतार दो। मैं किसी बैलगाड़ी या ताँगे से चला जाऊँगा। मुझे छोड़ दो।’’ आत्मा छटपटाने लगा।
‘‘तुमने मेरा समय नष्ट किया है, मैं तुम्हें जबरदस्ती ले जाऊँगा।’’ और ड्राइवर ने उसे स्कूटर में ढकेल दिया। आत्मा को लगा जैसे वह बहुत बड़े खड्डे में जा गिरा हो। वह मासूम होकर आंसू बहाता चुपचाप बैठ गया। उसने जेब को कसकर पकड़ा हुआ था परंतु फिर भी उसे लग रहा था कि कोई उसका सब कुछ निकाल रहा है।
स्कूटर पुरानी दिल्ली की सड़कों से रेंगकर नई दिल्ली की सड़कों पर फिसल गया। आत्मा पहले क्षण तो स्कूटर में ही उसी तरह उदासीन मुँह लटकाए बैठा रहा परंतु बाहर की चकाचौंध ने उसकी अवस्था बदल दी। रात का कालापन अभी इतना अधिक नहीं फैला था परंतु फिर भी दुकानों के सिरों पर विज्ञापन चमक रहे थे।
आत्मा ने घड़ी को घूरा जैसे अपना सारा गुस्सा उस पर उतारना चाहता हो। उसने एक बार ‘रिव्यू-मिरर’ में ड्राइवर का चेहरा देखा और फिर घड़ी को अपनी जेब में रख लिया। उसे डर हो आया कि कहीं ड्राइवर उससे घड़ी न छीन ले। उसने जेब को कसकर पकड़ लिया जैसे उसमें पड़ा सब कुछ स्कूटर के धचकों के कारण निकलकर स्कूटर के पहिये के नीचे आत्महत्या कर लेगा।
आत्मा बाहर की ओर घूर रहा था। शहर की चकाचौंध देखकर उसके हृदय में वसंत की बहार आ गई। आत्मा को लगा कि उसके अंदर खूब हरी-भरी घास उग आई है।
‘इतना किराया तो रेल से आने में नहीं लगा है जितना इस स्कूटर वाले ने ऐंठ लिया। यह सोचते ही आत्मा का रक्त उबल पड़ा जैसे चाय का पानी उबलता है। परंतु आत्मा अनचाहे ही उसे शांत कर गया।
ड्राइवर उसके सामने काफी भारी था।
आत्मा ने सोचा कि वह ड्राइवर से अपने बेटे के घर पहुँचने पर निबट लेगा। वह अपने बेटे से कहकर इस स्कूटर वाले को पुलिस में पकड़ा देगा।
वह ड्राइवर को चौदह आने से एक पैसा अधिक नहीं देगा। आत्मा ने अपनी जेब की पकड़ और मजबूत कर दी। अनजान लोगों को तंग करते हैं, मजा चखाऊँगा—आत्मा गलियों में लड़ते हुए बच्चों की तरह सोच रहा था। उसका बेटा जैसे उसका बेटा नहीं, बाप था जिससे वह शिकायत करता। आत्मा ने इस उत्साह में होंठ काट लिया और निकले खून को इस तरह चूस लिया मानो वह ड्राइवर का खून हो।
आत्मा ने चुपके से जेब से घड़ी निकाली और उसमें समय देखा-सवा आठ। मतलब की डेढ़ घंटा हो गया उसे रेल से उतरे पर अभी तक वह घर नहीं पहुँच पाया है। समय देखकर आत्मा ने घड़ी बड़ी चालाकी से जेब में रख ली और झटके के साथ ड्राइवर को देखा। ड्राइवर की अवस्था देखकर उसे विश्वास हो गया कि उसने उसे नहीं देखा। उसने एक लंबी सी सांस ली और छोड़ दी मानो उसके घर लड़की पैदा होते-होते लड़का हो गया हो।
स्कूटर के झटके साथ ड्राइवर को झटका लगा और उसकी पकड़ हैंडिल पर मजबूत हो गई। उसे लगा कि हैंडिल उसके हाथ से निकल जाएगा। वह सवारी को उसके घर नहीं ले जाएगा। अगर ले गया तो वहाँ रहने वाले उसकी चालाकी समझ जाएँगे। वे तो दिल्ली के पुराने पापी होंगे। वह सवारी को कॉलोनी के पास उतार देगा।
आत्मा को स्कूटर में बैठे काफी प्रसन्नता हो रही थी परंतु ड्राइवर का भय उसको समेटे हुए था। उसे लग रहा था जैसे किसी ने हँसी के गोलगप्पे खिलाकर उसके पेट पर नुकीला चाकू रख दिया है। जरा-सा भी हँसने पर चाकू दबाव डालने लगता है। आत्मा ने अपने पेट पर हाथ फेरा, लगा जैसे वास्तव में ही चाकू उसके पेट में चुभ रहा है। उसे अपनी इस अवस्था पर काफी क्रोध आया। उसे लगा कि वह शिखण्डी हो गया है।
एकाएक आत्मा ने बाहर देखा, काफी अंधेरा था। वह कुछ घबरा-सा गया। उसे लगा कि वह ड्राइवर उसे लूटने की तैयारी कर रहा है। आत्मा का हृदय पिचक गया और उसमें से चिपचिपी तरल वस्तु बहने लगी। आत्मा ने उस तरल वस्तु को बड़े प्रेम से अपने शरीर पर मल लिया और उसको लगा कि वह अब ‘युद्धवीर’ हो गया है। उसने ड्राइवर से पूछा, ‘‘अभी कितनी देर है ?’’
आवाज़ कड़क थी।
ड्राइवर को आत्मा की आवाज पर आश्चर्य हुआ। उसने आत्मा को पलटकर घूरा। आत्मा की वीरता पराजित हो गई। ड्राइवर फिर वैसा ही प्रसन्न हो गया। उसने शब्दों को चबाते हुए कहा, ‘‘बस, अधिक देर नहीं।’’ जैसे बच्चे को पुचकार रहा हो।
ड्राइवर ने एक झटके से स्कूटर रोक दिया। आत्मा यकायक उछल गया। उसको लगा जैसे वह अंतरिक्ष यान में झटका खा गया है। गले में फंसी आवाज में आत्मा ने पूछा, ‘‘क्यों, क्या हुआ ?’’
‘‘तुम्हारा जन्मस्थान आ गया।’’
‘‘अं....।’’
‘‘अरे, उतर भी, मैंने अभी और भी सवारियाँ पटानी हैं। देख ! कितने ठाट से बैठा है जैसे स्कूटर इसके बाप का हो। पैसे सुनकर तो साले के होश उड़ गए थे।’’ ड्राइवर ने आत्मा का हाथ पकड़कर उसे एक झटके से बाहर निकाल दिया।
‘‘पर यहाँ तो कहीं मकान नज़र नहीं आ रहे हैं ?’’ आत्मा की मच्छर जैसी टाँगें कांप गईं।
‘‘और क्या श्मशान नजर आ रहा है ? वह सामने क्या है ?’’ ड्राइवर ने आत्मा के तमाचा जड़ दिया।
‘‘इतनी दूर...क्या मुझे घर तक नहीं पहुँचाओगे ?’’ आत्मा ने रोते हुए कहा।
‘‘तुम्हारे बाप का ठेका ले रखा है क्या ? जल्दी से पैसे निकालो, मुझे देर हो रही है।’’
आत्मा की आँखों से दो बूंद पानी टपककर होंठों में घुस गए जिसे आत्मा चाट गया, खारा लगने पर वह पानी निगल गया। ड्राइवर उसकी इस दशा पर करुण-गीत हो गया। उसकी आँखों से मेघ बरस पड़ा, परंतु वह अपनी आदत से मजबूर था। उसने आत्मा के सिर पर हाथ फेरते हुए पुचकारकर कहा, ‘‘चलो, एक रुपया कम ले लेता हूँ, तुम उन्नीस दे दो।’’ ड्राइवर आत्मा के गले से लिपट गया। उसने गले से लिपटे-लिपटे ही आत्मा की जेब में से रुपये निकाल लिए। उनमें से उन्नीस रुपये रखकर शेष आत्मा को लौटा दिए। (स्कूटर-ड्राइवर की शराफत)
‘‘देखो, मुझ पर रहम खाओ। मेरे रुपये लौटा दो। मैं अपनी पोती के जन्मदिन पर जा रहा हूँ, मेरे पास कुछ नहीं बचेगा। तुम केवल पाँच रुपये ले लो।’’ और आत्मा उसके कदमों में अदब के साथ झुक गया।
ड्राइवर का हृदय पिघलने लगा परंतु उसने ठोककर उसे कठोर बना लिया। उसने आत्मा के हाथों से अपना पैर झटकते हुए कहा, ‘‘मैं ड्राइवर हूँ, कोई घसियारा नहीं हूँ। मैं और कोई रियायत नहीं कर सकता हूँ।’’ ड्राइवर बाँस की तरह अकड़कर खड़ा हो गया।
इतनी देर में वहाँ एक पुलिस वाला आ पहुँचा। उसने यह घटना देखी तो उसका दिमाग हवा में उड़ने लगा। उसे लगा कि आज वह काफी अमीर हो सकता है।
पुलिस वाले को देखकर आत्मा के हृदय में एक नया उत्साह उगा। वह अपने कपड़े झाड़ता हुआ पुलिस वाले के कदमों में पतिव्रता स्त्री की तरह लिपट गया। पुलिस वाले ने आत्मा को आशीर्वाद दिया। आत्मा ने पुलिस वाले अभयदान पाकर अपनी करुण-कथा सुनानी आरंभ कर दी। कथा सुनकर पुलिस वाले ने ड्राइवर के चेहरे की ओर मिचमिचाई नजरों से घूरा। ड्राइवर ने दबाकर आँख मार दी। पुलिस वाले का जबड़ा कुत्ते की तरह चौड़ा हो गया। उसने अपनी जेब को बड़े प्यार से सहलाया। स्कूटर वाला उसको अकेले में ले गया और एक पाँच का नोट उसकी ओर बढ़ा दिया।
पुलिस वाले की फैली आँखें सिकुड़ गईं और उसने आँख में से कीच निकालकर ड्राइवर के मुँह में ठूँसते हुए कहा, ‘‘बस !’’
‘‘काफी मोटी आसामी है, बाकी इससे ऐंठ लेना।’’ ड्राइवर ने कीच का स्वाद लेते हुए कहा। दोनों ने आर्थिक संधि पर हस्ताक्षर किए।
ड्राइवर के चेहरे पर फुलफलापन देखकर आत्मा का दिल अंदर को धंस गया। पुलिस वाला आत्मा की ओर बढ़ा और उसने कहा, ‘‘इसने ठीक पैसे लिए हैं। घर मैं तुम्हें पहुँचा दूँगा।’’ पुलिस वाले के स्वर में शासकीय रौब था।
आत्मा को कुछ संतोष हुआ। कम से कम वह घर तो पहुँच जाएगा। उसने सामान की ओर देखते हुए याचना-भरे स्वर में कहा, ‘‘कोई मजदूर नहीं मिलेगा ?’’
सामान की ओर देखकर पुलिस वाले की आँखें फैल गईं। उसने अपने में एक योजना बनाई और कहा, ‘‘क्यों नहीं मिलेगा ? मैं अभी पकड़कर लाता हूँ।’’
‘‘पैसे कितने लगेंगे ?’’ आत्मा को दोनों किस्से याद थे।
‘‘तुम चिंता मत करो, साले को एक पैसा नहीं दूंगा !’’ पुलिस वाले ने अपनी ‘पर्सनेलिटी’ बताई।
रात तीन घंटे व्यतीत हो चुकी थी। सड़क पर अब भी काफी भीड़ थी। सबकी आँखों में आत्मा के प्रति सहानुभूति थी।
कुछ देर में पुलिस वाला एक मजदूर को पकड़ लाया। उसके चेहरे पर जगह-जगह कटाव था, जैसे भारत का नक्शा। उसकी आँखों में एक विशेष चमक थी। उसने बिना कुछ कहे सामान उठा लिया। कुछ दूर चलकर उनको एक बहुत बड़ी भीड़ मिली। पुलिस वाले की आँखों में चाँद चमक गया। उसने मजदूर को हल्की सी चोट की और मजदूर सामान के साथ भीड़ में गोल हो गया। आत्मा का ध्यान कहीं और देखकर पुलिस वाला भी भीड़ में घुस गया। कुछ कदम चलने के बाद आत्मा ने जैसे ही दाएं देखा, पुलिस वाला गायब था। पीछे मुड़कर देखा मजदूर सामान-सहित गायब था। आत्मा को पुलिस वाले की मुस्कराहट का रहस्य समझ आ गया।
आत्मा को लगा किसी ने उसके सिर पर दस-बारह हथोड़े मार दिए हैं। वह चकारकर गिर गया। जैसे कोई खोखला पेड़ गिरता है। आसपास की भीड़ ने बड़ी सोच-समझ के बाद आत्मा को उठाया क्योंकि यह पुलिस का मामला था। कुछ पानी छिड़का और होश में लाया गया। आत्मा होश में आते ही रो पड़ा। उसकी आँखों से परनाले की तरह आँसू बह रहे थे। सारी भीड़ की हिचकियाँ बँध गईं। अपने प्रति सहानुभूति देखकर आत्मा ने अपनी कहानी सुनानी आरंभ कर दी और एक मजमा लग गया। सारी भीड़ यकायक रो पड़ी, जैसे देश के किसी महान नेता की मृत्यु हो गई हो। आत्मा ने भीड़ से सहायता मांगी। सारी भीड़ छिटक गई। आत्मा को लगा कि वह यतीम हो गया है।
तभी एक व्यक्ति उसके पास आया। उसकी आँखों में सहानुभूति भरी थी जैसे बरसात में जोहड़ भरा जाता है। उसने पुचकारते हुए कहा, ‘‘कहाँ जाना है ?’’
‘‘सैक्टर आठ में।’’ आत्मा ने आंसू पोंछते हुए कहा।
‘‘देखो, वह सामने है, उधर। सीधे चले जाओ फिर दाएँ मुड़ जाना। वहाँ से जाकर किसी और से पूछ लेना।’’ कहते हुए वह व्यक्ति ऐसे देख रहा था जैसे चोरी कर रहा हो।
आत्मा उठा और उसी दिशा की ओर बढ़ गया। उसने घड़ी में समय देखा साढ़े नौ बजे थे। लगभग आधा घंटा लग जाएगा। उसने घड़ी को डरकर जेब में रख लिया।
आत्मा की चाल फटेहाल आशिक से कम न थी। घूमते-घूमते वह पौन घंटे में उस स्थान पर पहुँच गया। अब इससे आगे जाने को उसके पास कोई अनुमान नहीं था। मकानों की भीड़ में तो वह पहुँच चुका था परंतु उसके नंबर अभी तक अंधकार में ही थे। उसका चश्मा सामान के साथ ही चल गया था। बिना चश्मे के इस समय वह उल्लू नजर आ रहा था। उसने एक व्यक्ति को रोककर पूछा, ‘‘सैक्टर आठ कहाँ है, भाई साहब ?’
उस व्यक्ति ने आत्मा को घूरा और फिर एक करारा चांटा उसके जड़ दिया वह क्रोध में फुफकारता हुआ बोला, ‘‘मेरी जेब में रखा है सैक्टर आठ ! साले मुझे चलाता है। सैक्टर आठ में खड़ा है और पूछता है कि सैक्टर आठ कहाँ है ? और वह व्यक्ति एक-दो गालियाँ और देकर पंक्ति की तरह आगे बढ़ गया।
इसके बाद किसी से कुछ पूछने की आत्मा की शक्ति नहीं रही। उसको लगा कि उसके अंदर का पुरुष मर गया है। एक-दो बार कुछ सोचकर उसने पूछने का साहस भी किया परंतु उसको वही रूखे उत्तर मिले। आत्मा को लगा कि जैसे वह कटघरे में बंद एक पागल है।
अंधकार धीरे-धीरे और गहरा होता जा रहा था। सड़कों पर बिखरी हुई भीड़ यकायक सिमटती जा रही थी। धीरे-धीरे भीड़ सिमटकर कुछ ही व्यक्तियों में सीमित रह गई। आत्मा अब भी उसी प्रकार आशिकों की तरह मकान ढूँढ़ रहा था।
यकायक रात की चुपचुपाहट में सीटियों और लाठियों की गूंज उठी जैसे सवेरा होने पर मंदिरों मे घंटे गूँजते हैं। आत्मा ने समय देखा—सवा-ग्यारह बजे थे।
तभी उसे सामने से एक पुलिस वाला आता दिखाई दिया। आत्मा के मस्तिष्क में उस पुलिस वाले का किस्सा नए बच्चे की तरह जीवित था। वह एकदम विमुख हो गया।
‘‘कहाँ भाग रहा है ?’’ पुलिस वाले की आवाज ने जैसे उसके पैरों को सड़क पर चिपका दिया। वह समीप आया और आत्मा को घूरते हुए बोला, ‘‘कौन है, बे ?’’
‘‘एक परदेसी हूँ।’’ आत्मा ने दयनीय भाव से कहा।
‘‘परदेसी है...! थाने में चल, सब पता चल जाएगा।’’ और उसने आत्मा की कलाई इतनी जोर से पकड़ ली जैसे शादी की गाँठ लगा दी हो।
थाने में पहुँचकर आत्मा की तलाशी ली गई। पैसों के साथ उसकी घड़ी और खोए ट्रंक की चाबी भी मिली। थानेदार की आँखें ट्यूबलाइट की तरह चमचमा उठीं।
‘‘यह घड़ी तुझे ससुराल से मिली है जो इस तरह जेब में रखता फिर रहा है। और बिना ताले के इस चाबी का क्या मतलब ?’’ थानेदार ने जासूसी आँखों से उसको घूरा।
‘‘हवलदार साहब, मैं परदेसी हूँ। मुझे छोड़ दो। मैं चोरी करने नहीं आया हूँ।’’
प्रकाशक : डायमंड पाकेट बुक
Thursday, January 15, 2009
Wednesday, January 14, 2009
ज्योतिषी की शादी
-राजेन्द्र राज
गिरा जो गोरी बाँहों पर
सैण्डिलों से फिर उठा
लाल बालों की चाहत में
चेहरा पूरा लाल हुआ।
गिरा जो गोरी बाँहों पर
सैण्डिलों से फिर उठा
लाल बालों की चाहत में
चेहरा पूरा लाल हुआ।
Tuesday, January 13, 2009
चालान का गणित
ईशान महेश
मैंने देखा मुख्य चोराहे पर लाल बत्ती थी लेकिन फिर भी सभी वाहन ऐसे भागे जा रहे थे जैसे मंदिर के बाहर कोई धनी भक्त डबल रोटी बाँट रहा हो और उसे प्राप्त करने के लिए याचक उमड़-घुमड़ कर पड़ रहे हों। मैंने सोचा हो सकता है रात को पुलिस विभाग के किसी अति बुद्धिमान परामर्शदाता ने यह सुझाया हो कि लोगों को लाल बत्ती का उल्लंघन करने में मजा आता है इसलिए उन्हें मजे लेने दो और नया कानून बना दो कि हरी बत्ती पर रुकना है और लाल बत्ती को कूदना है। लेकिन मेरी बुद्धि ने टोका, नहीं यह संभव नहीं है। हो सकता है कि जब बत्ती लाल हो तो संकेतों ने काम करना बंद कर दिया हो। ऐसे में वहाँ तैनात सिपाही ने वाहनों के संचालन का दायित्व ले लिया होगा और उसने ही इन सब वाहनों को लाल बत्ती को पार करने की अनुमति दी होगी। खैर कुछ भी रहा हो। मैं भी अन्य वाहनों की रेलम-पेल में लाल बत्ती कूद गया।
जैसे ही चौराहा पार किया तो देखा कि दो- तीन यातायात पुलिस के सिपाही लाल बत्ती पार करने वाले वाहनों को रुकने का संकेत कर रहे थे लेकिन सभी वाहन अपनी लाइन में, उनकी उपेक्षा कर आगे बहते चले गए। सिपाही हाथ मलते रह गए और अपने मलते हाथों से उन्होंने मुझे भी रुकने का इशारा किया। मैंने अपना स्कूटर रोक दिया।
‘‘गाड्डी सैड में लगा।’’ सिपाही ने मुझे आदेश दिया।
‘‘लाइसेंस निकालो।’’ अकस्मात प्रकट हुए इस्पैक्टर ने चालान बुक में मेरे स्कूटर का नंबर लिखते हुए मुझसे पूछा, ‘सौ रुपए हैं ?’’
‘‘हाँ, हैं।’’ मैं अपना लाइसेंस इंस्पैक्टर की ओर बढ़ा दिया।
‘‘फिर ठीक है।’’ उसने आश्वस्त होकर चालान में मेरा-नाम पता इत्यादि दर्ज किया और पन्ना फाड़ कर मेरी ओर बढ़ाते हुए बोला, ‘‘सौ रुपए निकालो।’’
मैंने सौ रुपए निकाल कर इंस्पैक्टर को दे दिए और पूछा। ‘‘अब मेरा अपराध तो बता दीजिए।’’
‘‘तुमने रेड लाइट क्रोस की है।’’ इंस्पैक्टर बोला।
‘‘हाँ, लाल बत्ती तो मैंने पार की है।’’ मैं बोला, ‘‘लेकिन भ्रम मैं पार हो गई। बाकि सभी वाहन जा रहे थे। मैंने सोचा हो सकता है बत्ती खराब हो।’’
‘‘बत्ती बिल्कुल ठीक है। इंस्पैक्टर चौराहे की लाल बत्ती का उल्लंघन करते वाहनों की अगली खेप को देखने लगा। ‘‘धत् तेरे की। एक भी साला नहीं रुका।’’
घात लगाकर बैठे सिपाही प्रकट हुए और लिफ्ट माँगने की शैली में उल्लंघनकर्ताओं को रुकने का इशारा करते रहे और वाहन उन्हें मुँह चिढ़ाकर सरपट दौड़ गए।
‘‘आपने मेरे आगे जा रहे किसी भी वाहन का चालन क्यों नहीं किया ?’’ मैंने पूछा।
‘‘उनका चालान तो तब होता, जब रुकते।’’ इंस्पैक्टर बोला, ‘‘तुम भले आदमी लगते हो। इसलिए तुम रुक गए और हमने तुम्हारा चालान कर दिया।
‘‘वह देखिए।’’ तभी मैंने इंस्पैक्टर का ध्यान लालबत्ती का उल्लंघन करते दस-बारह रेबड़े-रिक्शे और साइकिल वालों की ओर आकृष्ट किया, इन्हें तो आप पकड़ सकते हैं। इनका चालान कीजिए। ये रेहड़ी- रिक्शा-साइकिल वाले लालबत्ती की परवाह ही नहीं करते। जिसके कारण, दूसरी ओर जिसकी ही बत्ती है, उसे रुके रहना पड़ता है और जब तक रिक्शाओं का काफिला गुजरता है तब तक उसकी लाल बत्ती हो जाती है और आक्रोश में वह उसे टाप जाता है। इसलिए आप इनका भी चालान कीजिए। इन्हें आप पकड़ भी सकते हैं।’’
‘‘पर हम इनका चालान नहीं कर सकते।’’ इंस्पैक्टर ने कहा।
‘‘क्यों ?’’
‘‘क्योंकि ये बेचारे गरीब आदमी है।’’ इंस्पैक्टर उदारतापूर्वक बोला।
‘‘क्या गरीब होने से नियम तोड़ने की अनुमति मिल जाती है ?’’ मैंने आश्चर्यपूर्वक पूछा।
‘‘हाँ गरीब होने से नियम तोड़ने की अनुमति मिल जाती है।’’ इंस्पैक्टर निर्द्वंद्व स्वर में बोला, ‘‘तुम रिक्शा रेहड़ा लेकर आओ। लाल बत्ती पार कर जाओ। मैं क्या, कोई भी तुम्हारा चालान नहीं करेगा।’’
‘‘पर ऐसा क्यों हैं ? ’’ मैंने जिज्ञासा की।
‘‘सरकार की नीति है।’’ वह कंधे उचकाकर बोला।
‘‘वह कैसे हैं’’ मेरी आँखें जिज्ञासा में फैल गई।
‘‘वह ऐसे।’’ इंस्पैक्टर विश्राम की मुद्रा में मोटर साइकिल पर बैठ गया। उसने पश्चिम दिशा की ओर इशारा किया और बोला, ‘‘वह देखो। झुग्गी झोपड़ी वालों ने बीच सड़क में अपनी झुग्गियाँ डाल दीं। फलतः हमें वह सड़क यातायात के लिए बंद करनी पड़ी। तुम अपने घर के नक्शे से अलग एक कमरा भी डालकर दिखा सकते हो ? हम यानी हमारा मित्र वर्ग उसे अगले दिन ढा देगा; लेकिन इन्हें हम छू भी नहीं सकते। इन्होंने बिजली के तारों पर अवैध कनेक्शन उछाले हुए हैं-तुम बिना मीटर के बिजली ले कर तो देखो। ये कहीं भी पाइप लाइन तोड़ सकते हैं-क्योंकि ये गरीब और पिछड़े वर्ग से हैं। जैसे शास्त्रों में ब्राह्मण और दूत अवध्य है; वैसे ही सरकारी कानून की दृष्टि में चालान मुक्त हैं।’’
मैंने अपना सिर इंस्पैक्टर के चरणों में झुका दिया और प्रभावित स्वर में बोला, गुरुदेव आप सत्य कहते हैं-गरीब का चालान कैसा ? मुझ मूर्ख को तो यह तथ्य आज ही समझ में आया कि हमारी सरकार ! ‘गरीबों की सरकार’ कैसे कहलाती है। मैंने अपना सिर उठाया और कहा, ‘‘अब मैं भविष्य में कभी लाल बत्ती पार नहीं करूँगा। लेकिन अगर फिर यही सीन बने तो क्या करूँ।’’
‘‘तो।’’ इंस्पेक्टर हँसा, ‘‘तो किसी रिक्शा में अपना स्कूटर रख कर लाल बत्ती टाप जाना। तुम्हारा चालान नहीं होगा। यह मेरा वचन है।
Sunday, January 11, 2009
आरज़ू के आईने में
-राजेन्द्र राज
अपने बारे में.....
‘‘शायर लिखते नहीं
कलम लिखती है खुद-ब-खुद
ज़ब्बे जब जल्वाफ़रोश होते हैं।’’
अपने बारे में.....
‘‘शायर लिखते नहीं
कलम लिखती है खुद-ब-खुद
ज़ब्बे जब जल्वाफ़रोश होते हैं।’’
Saturday, January 10, 2009
एक जनवरी मार्ग
ईशान महेश
‘‘हैप्पी न्यू ईयर।’’ उन्होंने एक चमचमाता सुनहरा कार्ड मेरी ओर बढ़ाते हुए कहा, ‘‘यह आपके लिए इंविटेशन है।’’
‘‘किस बात का न्योता है ?’’ मैंने अभिवादन स्वरूप मुस्कराकर पूछा।
‘‘कल से नया साल शुरू होने जा रहा है न, इसलिए हर साल की तरह इस साल भी हमारा क्लब क्नॉट प्लेस के किसी एक होटल में पार्टी दे रहा है।’’ उन्होंने अपनी छाती फुलाकर बताया, ‘‘इस साल इस क्लब का प्रेसिडेंट मैं हूँ। मैंने सोचा अब घर-घुरसु पड़ोसी को जरा दुनिया दिखवा दूँ।’’ वे जबरदस्ती हँसे, ‘‘मेरी बात का बुरा मत मानना। नए साल पर सब माफ होता है।’’
मन में आया, उनसे पूछूँ कि यह अंग्रेजी नव वर्ष क्या तुम्हारे पूर्वजों का बनाया हुआ है। क्या कभी अंग्रेजों ने दीपावली पर दीए जलाए हैं जो तुम इतने हर्षोल्लास से उनका नव वर्ष मना रहे हो।...किंतु शिष्टाचारवश मन की बात कह न सका और औपचारिकता में कार्ड खोलकर पढ़ने लगा। ‘‘अरे पार्टी रात के दस बजे से एक बजे तक क्यों है ?’’ मैं चौका। ‘‘तुम घर से बाहर निकलोगे तो दुनियादारी का कुछ पता चलेगा।’’ वे हँसे, ‘‘अरे भई, दस बजे तो लोग पीना शुरू करेंगे। सारी विदेशी दारु मँगवाई है। इधर लोग पीना शुरू करेंगे, उधर गर्ल्स डांस करना शूरु करेंगी। पौने बारह बजे तक डांस चलेगा।’’ उन्होंने मुस्कराकर अपने दाँतों से अपना होंठ काटा और अपनी जीभ से इसे गीला करते हुए धीरे से कहा। ‘‘डांस, नॉनवेज है। तुम्हारी तबीयत हरी हो जाएगी और तुम इस पार्टी के इंविटेशन से इंम्प्रैस होकर मेरे पैर पकड़ लोगे ! और कहोगे, ‘‘मुझे अपने क्लब का मैम्बर बना लो।’’
मुझे लगा कि उन्होंने सुबह-सुबह ही मदिरा का सेवन किया है, तभी उल्टी बात कर रहे हैं। मैंने उन्हें टोका, ‘‘अरे भाई, भोजन का नॉनवेज होना तो मेरी समझ में आता है, किन्तु नृत्य भला कैसे नॉनवेज हो सकता है ?’’
‘‘कैसे लेखक हो यार तुम।’’ उन्होंने मुझे धिक्कारा, ‘‘वेज और नॉनवेज का कॉनसैप्ट बड़ा अजीब है। भेड़िए के लिए हरी सब्जियाँ नॉनवेज हैं और गाय के लिए खरगोश का मांस।’’ वे अपनी बात पर स्वयं मुग्ध हुए और ठहाका मार कर हँस दिए, ‘‘खैर आगे का प्रोग्राम सुनो। बारह बजे तक सब पीकर धुत्त हो जाएँगे। जैसे ही बारह बजेंगे, मै होटल के हॉल में लगा बड़ा गुब्बारा फोडूँगा। और दो मिनट के लिए लाइटें बंद कर दी जाएँगी। उस दो मिनट में आप किसी के साथ कुछ भी करें-सब माफ होगा। किसी का मतलब समझ रहे हो न ?
उनकी आँखों से झाँकता पिशाच मुझे मुँह चिढ़ा रहा था, ‘‘और जमकर हो-हंगामा करेंगे। शैम्पेन के फव्वारे छोड़ेंगे। सैक्सी साँग गाएँगे। भद्दे इशारों वाले नाच नाचेंगे। जी भर कर मुँह उठाकर अपने दुशमनों को गालियाँ देंगे। पुलिस की जो टुकड़ियाँ कानून और व्यवस्था बनाने के लिए तैनात होंगी, उनको भी पिलाएँगे। अपनी- अपनी कारों या जीपों के बोनट पर खड़े होकर ठुमके लगाएँगे। और जानते हो एक जनवरी के न्यूज पेपरों के मेन पेजों पर हमारी फोटोग्राफ छपेगी। उस पर लिखा होगा। ‘‘नव वर्ष का स्वागत करते कुछ नवयुवक।’’
अपने देश का वर्तमान देखकर मुझे चक्कर आ गया और मैं अपना माथा पकड़ भूमि पर बैठ गया।
Friday, January 9, 2009
चंगु-मंगु इन बॉम्बे
-राजेन्द्र राज
फिल्में देख-देख कर चंगु
खुद को स्टार समझने लगा
आईने के आगे खड़े होकर
अपनी सूरत से प्यार करने लगा
छितराए बाल, पिचके हुए गाल
सिमटी हुई छाती, फैली हुई चाल
झुक-झुकके है कि चलता है
लहराके निकलता है
रंगमंच की लघु-तारिकाएँ
इस पर जान छिड़कती हैं
ये ऐश्वर्या पर मरता है
सल्लू से मगर डरता है
चंगु को मिल गया मंगु
दोनों फिल्मों के दीवाने
मंगु के पास थे आठ सौ
चंगु के पास आठ आने
चंगु ने कहा मंगु से
चल मुम्बई चलते हैं
जूहू-बीच पर खड़े होकर
फिल्म की शूटिंग करते हैं
एक रोज़ दोनों भागकर
घर से मुम्बई आ गए
नीना गुप्ता की कमजोर कड़ी को
एक नज़र में भा गए
बोली नमस्ते ! आप आ सकते हैं
मेरी सूनी सेज सजा सकते हैं
बूढ़ी घोड़ी को हिनहिनाते देख
चंगु-मंगु सकपका गए
वहाँ से भागकर दोनों
सुभाष घई के दफ़्तर आ गए
मैनेजर ने कहा, आइए आपके आने से
फिल्मों के भाग्य जाग गए
सेल्यूलॉइड की दुनिया से
दोनों का परिचय कराया
चंगु को स्पॉट-ब्वॉय
मंगु को मेकअप मैन बनाया
झूठी दुनिया नकली लोग
दोनों को होश आ गए
बोले अपने शहर में जिएँगे
दिन में सिनेमा देखेंगे, रात में पिएँगे
चंगु-मंगु ट्रेन में बैठकर
वापस जयपुर आ गए
सत्तर एम.एम. के परदे पर
टाइटल बनकर छा गए।
फिल्में देख-देख कर चंगु
खुद को स्टार समझने लगा
आईने के आगे खड़े होकर
अपनी सूरत से प्यार करने लगा
छितराए बाल, पिचके हुए गाल
सिमटी हुई छाती, फैली हुई चाल
झुक-झुकके है कि चलता है
लहराके निकलता है
रंगमंच की लघु-तारिकाएँ
इस पर जान छिड़कती हैं
ये ऐश्वर्या पर मरता है
सल्लू से मगर डरता है
चंगु को मिल गया मंगु
दोनों फिल्मों के दीवाने
मंगु के पास थे आठ सौ
चंगु के पास आठ आने
चंगु ने कहा मंगु से
चल मुम्बई चलते हैं
जूहू-बीच पर खड़े होकर
फिल्म की शूटिंग करते हैं
एक रोज़ दोनों भागकर
घर से मुम्बई आ गए
नीना गुप्ता की कमजोर कड़ी को
एक नज़र में भा गए
बोली नमस्ते ! आप आ सकते हैं
मेरी सूनी सेज सजा सकते हैं
बूढ़ी घोड़ी को हिनहिनाते देख
चंगु-मंगु सकपका गए
वहाँ से भागकर दोनों
सुभाष घई के दफ़्तर आ गए
मैनेजर ने कहा, आइए आपके आने से
फिल्मों के भाग्य जाग गए
सेल्यूलॉइड की दुनिया से
दोनों का परिचय कराया
चंगु को स्पॉट-ब्वॉय
मंगु को मेकअप मैन बनाया
झूठी दुनिया नकली लोग
दोनों को होश आ गए
बोले अपने शहर में जिएँगे
दिन में सिनेमा देखेंगे, रात में पिएँगे
चंगु-मंगु ट्रेन में बैठकर
वापस जयपुर आ गए
सत्तर एम.एम. के परदे पर
टाइटल बनकर छा गए।
Wednesday, January 7, 2009
कभी किसी रोज
SEEMA GUPTA
सुनना चाहता हूँ तुम्हे
बैठ खुले आसमान के नीचे सारी रात
चुनना चाहता हूँ रात भर
तुम्हारे होठों से झरते मोतियों को
अपनी पलकों से एक एक कर
भरना चाहता हूँ अपनी हथेलियों में
चाँदनी से धुले तुम्हारे चेहरे की स्निग्धता
महसूस करना चाहता हू
तुम्हारे बालों से ढके अपने चेहरे पर
तुम्हारे साँसों की उष्णता सारी रात
वह रात जो समय की
सीमाओं से परे होगी
और फिर किसी सूरज के
निकलने का भय न होगा.
सुनना चाहता हूँ तुम्हे
बैठ खुले आसमान के नीचे सारी रात
चुनना चाहता हूँ रात भर
तुम्हारे होठों से झरते मोतियों को
अपनी पलकों से एक एक कर
भरना चाहता हूँ अपनी हथेलियों में
चाँदनी से धुले तुम्हारे चेहरे की स्निग्धता
महसूस करना चाहता हू
तुम्हारे बालों से ढके अपने चेहरे पर
तुम्हारे साँसों की उष्णता सारी रात
वह रात जो समय की
सीमाओं से परे होगी
और फिर किसी सूरज के
निकलने का भय न होगा.
Tuesday, January 6, 2009
बड़े मियाँ दीवाने
-राजेन्द्र राज
उम्र चौंसठ के पार हुई
जिस्म से रूह बेज़ार हुई
लड़खड़ा कर चलते हैं
हर हसीन पर गिरते हैं
बड़े मियाँ दीवाने
पान चबाके होठों से
लाल रस टपकाते हैं
टूटी हुई ऐनक को
आँखों पे चढ़ाते हैं
बड़े मियाँ दीवाने
इनके घर के सामने
एक पड़ोसिन रहने आई
मियाँ ने सूरत देखी
और बालों में कंघी घुमाई
बड़े मियाँ दीवाने
पतली कमर तिरछी नज़र
छत्तीस की उम्र में ऐसी फिगर
बाल सुखाने खिड़की पे जो आई
मियाँ ने इंग्लिश धुन बजाई
बड़े मियाँ दीवाने
रात सारी गुजर गई
करवट बदल-बदल कर
सुबह-सुबह मियाँ ने
पड़ोसिन के घर की घंटी बजाई
बड़े मियाँ दीवाने
जाने कहाँ से कुत्ता एक
लपका मियाँ की ओर
मियाँ ने वहाँ से दौड़कर
जान बचाई पतलून गंवाई
बड़े मियाँ दीवाने
हाँफते-हाँफते पहुँचे घर पे
दो गिलास लस्सी चढ़ाई
कफन में लिपटी देह में
थोड़ी सी जान लौट आयी
बड़े मियां दीवाने
एक कंकड़ उठाके मियाँ ने
खिड़की के शीशे पर दे मारा
पड़ोसिन ने गन्दे पानी से
मियाँ को धो डाला
बड़े मियाँ दीवाने
मियाँ ने सोचा यह प्यार है
पहले तकरार फिर इज़हार है
एक रुपये में टेलीफोन नम्बर घुमाया
पड़ोसिन को पार्क में बुलाया
बड़े मियाँ दीवाने
बालों में लगाकर ख़िजाब
हाथों में लेकर गुलाब
काले कुर्ते लाल पाजामे में
मियाँ लग रहे लाजवाब
बड़े मियाँ दीवाने
गली के कुत्तों ने फिर
मियाँ को पार्क पहुँचाया
बूढ़े घोड़े की पीठ पर
जैसे किसी ने चाबुक बरसाया
बड़े मियाँ दीवाने
खाली पड़ी बेन्च पर
जाकर मियाँ निढ़ाल हुए
चार आने के चने लेकर
मोहब्बत करने को तैयार हुए
बड़े मियाँ दीवाने
मियाँ ने घड़ी देखी
पड़ोसिन अब तक नहीं आई
गुलाबी साड़ी में दिखी कोई
और मियाँ ने सीटी बजाई
और मियाँ ने सीटी बजाई
बड़े मियाँ दीवाने
फिर लपककर मियाँ ने
पकड़ी कलाई आवाज लगाई
इतनी देर कर दी आने में
मेरे प्यार को आजमाने में
बड़े मियाँ दीवाने
उसका पति मुस्टण्डा था
जिसके हाथ में डण्डा था
उसने पकड़ा मियाँ को
और जमके चार लगाई
बड़े मियाँ दीवाने
मियाँ की टूटी हड्डी
पहुँच गए हॉस्पिटल
कॉटेज-वार्ड में नर्स ने
मियाँ को दवा लगाई
बड़े मियाँ दीवाने
मियाँ बोले कोई बात नहीं
पड़ोसिन नहीं नर्स ही सही
अपना काम आसान हुआ
दवा-दारू का इंतिज़ाम हुआ
बड़े मियाँ दीवाने।
उम्र चौंसठ के पार हुई
जिस्म से रूह बेज़ार हुई
लड़खड़ा कर चलते हैं
हर हसीन पर गिरते हैं
बड़े मियाँ दीवाने
पान चबाके होठों से
लाल रस टपकाते हैं
टूटी हुई ऐनक को
आँखों पे चढ़ाते हैं
बड़े मियाँ दीवाने
इनके घर के सामने
एक पड़ोसिन रहने आई
मियाँ ने सूरत देखी
और बालों में कंघी घुमाई
बड़े मियाँ दीवाने
पतली कमर तिरछी नज़र
छत्तीस की उम्र में ऐसी फिगर
बाल सुखाने खिड़की पे जो आई
मियाँ ने इंग्लिश धुन बजाई
बड़े मियाँ दीवाने
रात सारी गुजर गई
करवट बदल-बदल कर
सुबह-सुबह मियाँ ने
पड़ोसिन के घर की घंटी बजाई
बड़े मियाँ दीवाने
जाने कहाँ से कुत्ता एक
लपका मियाँ की ओर
मियाँ ने वहाँ से दौड़कर
जान बचाई पतलून गंवाई
बड़े मियाँ दीवाने
हाँफते-हाँफते पहुँचे घर पे
दो गिलास लस्सी चढ़ाई
कफन में लिपटी देह में
थोड़ी सी जान लौट आयी
बड़े मियां दीवाने
एक कंकड़ उठाके मियाँ ने
खिड़की के शीशे पर दे मारा
पड़ोसिन ने गन्दे पानी से
मियाँ को धो डाला
बड़े मियाँ दीवाने
मियाँ ने सोचा यह प्यार है
पहले तकरार फिर इज़हार है
एक रुपये में टेलीफोन नम्बर घुमाया
पड़ोसिन को पार्क में बुलाया
बड़े मियाँ दीवाने
बालों में लगाकर ख़िजाब
हाथों में लेकर गुलाब
काले कुर्ते लाल पाजामे में
मियाँ लग रहे लाजवाब
बड़े मियाँ दीवाने
गली के कुत्तों ने फिर
मियाँ को पार्क पहुँचाया
बूढ़े घोड़े की पीठ पर
जैसे किसी ने चाबुक बरसाया
बड़े मियाँ दीवाने
खाली पड़ी बेन्च पर
जाकर मियाँ निढ़ाल हुए
चार आने के चने लेकर
मोहब्बत करने को तैयार हुए
बड़े मियाँ दीवाने
मियाँ ने घड़ी देखी
पड़ोसिन अब तक नहीं आई
गुलाबी साड़ी में दिखी कोई
और मियाँ ने सीटी बजाई
और मियाँ ने सीटी बजाई
बड़े मियाँ दीवाने
फिर लपककर मियाँ ने
पकड़ी कलाई आवाज लगाई
इतनी देर कर दी आने में
मेरे प्यार को आजमाने में
बड़े मियाँ दीवाने
उसका पति मुस्टण्डा था
जिसके हाथ में डण्डा था
उसने पकड़ा मियाँ को
और जमके चार लगाई
बड़े मियाँ दीवाने
मियाँ की टूटी हड्डी
पहुँच गए हॉस्पिटल
कॉटेज-वार्ड में नर्स ने
मियाँ को दवा लगाई
बड़े मियाँ दीवाने
मियाँ बोले कोई बात नहीं
पड़ोसिन नहीं नर्स ही सही
अपना काम आसान हुआ
दवा-दारू का इंतिज़ाम हुआ
बड़े मियाँ दीवाने।
Monday, January 5, 2009
जियो मेरे लाल
-राजेन्द्र राज
माँ ने कहा बेटे से
दिखा कोई कमाल
बेटे ने पड़ोसी की लड़की को
मल दिया गुलाल
जियो मेरे लाल
बेटा बड़ा सयाना है
हर हसीन का दीवाना है
महफिलों और मैखानों में
उसका आना-जाना है
उसके मिथुन से बाल हैं
जैसी जैसी चाल है
कमर में गमछा है
जीन्स में जमता है
हल्के-हल्के धुएँ में
हर रोज़ नहाता है
नुक्कड़ के पनवाड़ी के यहाँ
इसका चालू खाता है
सिनेमा देखने की खातिर
कितना पसीना बहाता है
जीतता है जुए में जब
चार शोर चलवाता है
बेटा बड़ा प्यार है
माँ का दुलारा है
आशिक है थोड़ा-सा
थोड़ा-सा आवारा है
पढ़ता है उपन्यास सुबह
शाम को जिम जाता है
हाथ-पैरों को मरोड़कर
सलमान खान हो जाता है
बाइक पर निकलता है जब
लड़कियों को लपकाता है
हसीन कोई शॉर्ट्स में दिख जाए तो
इसका शॉर्ट-सर्किट हो जाता है
आधी गुजर गई जवानी
खाने-पीने नाचने-गाने में
बाकी रह गई है जो
जाएगी अफ़साने बनाने में
दो नम्बर की दौलत को
दोनों हाथों से लुटाना
कुछ कमी रह जाए तो
गहने-जेवर बेच खाना
माँ ने कहा बेटे से
दिखा कोई कमाल
बेटे ने पड़ोसी की लड़की को
मल दिया गुलाल
जियो मेरे लाल।
माँ ने कहा बेटे से
दिखा कोई कमाल
बेटे ने पड़ोसी की लड़की को
मल दिया गुलाल
जियो मेरे लाल
बेटा बड़ा सयाना है
हर हसीन का दीवाना है
महफिलों और मैखानों में
उसका आना-जाना है
उसके मिथुन से बाल हैं
जैसी जैसी चाल है
कमर में गमछा है
जीन्स में जमता है
हल्के-हल्के धुएँ में
हर रोज़ नहाता है
नुक्कड़ के पनवाड़ी के यहाँ
इसका चालू खाता है
सिनेमा देखने की खातिर
कितना पसीना बहाता है
जीतता है जुए में जब
चार शोर चलवाता है
बेटा बड़ा प्यार है
माँ का दुलारा है
आशिक है थोड़ा-सा
थोड़ा-सा आवारा है
पढ़ता है उपन्यास सुबह
शाम को जिम जाता है
हाथ-पैरों को मरोड़कर
सलमान खान हो जाता है
बाइक पर निकलता है जब
लड़कियों को लपकाता है
हसीन कोई शॉर्ट्स में दिख जाए तो
इसका शॉर्ट-सर्किट हो जाता है
आधी गुजर गई जवानी
खाने-पीने नाचने-गाने में
बाकी रह गई है जो
जाएगी अफ़साने बनाने में
दो नम्बर की दौलत को
दोनों हाथों से लुटाना
कुछ कमी रह जाए तो
गहने-जेवर बेच खाना
माँ ने कहा बेटे से
दिखा कोई कमाल
बेटे ने पड़ोसी की लड़की को
मल दिया गुलाल
जियो मेरे लाल।
Sunday, January 4, 2009
-राजेन्द्र राज
-राजेन्द्र राज
गली के कुत्तों ने फिर
मियाँ को पार्क पहुँचाया
बूढ़े घोड़े की पीठ पर
जैसे किसी ने चाबुक बरसाया
गली के कुत्तों ने फिर
मियाँ को पार्क पहुँचाया
बूढ़े घोड़े की पीठ पर
जैसे किसी ने चाबुक बरसाया
Saturday, January 3, 2009
मिलन
-विजय अग्रवाल
‘‘उस दिन तुम आए नहीं। मैं प्रतीक्षा करती रही तुम्हारी।’’ प्रेमिका ने उलाहने के अंदाज में कहा।‘‘मैं आया तो था, लेकिन तुम्हारा दरवाजा बंद था, इसलिए वापस चला गया।’’ प्रेमी ने सफाई दी।‘‘अरे, भला यह भी कोई बात हुई !’’ प्रेमिका बोली।
‘‘क्यों, क्या तुम्हें अपना दरवाजा खुला नहीं रखना चाहिए था ?’’ प्रेमी थोड़े गुस्से में बोला।‘‘यदि दरवाजा बंद ही था तो तुम दस्तक तो दे सकते थे। मैं तुम्हारी दस्तक सुनने के लिए दरवाजे से कान लगाए हुए थी।’’ प्रेमिका ने रूठते हुए कहा।
‘‘क्यों, क्या मेरे आगमन की सूचना के लिए मेरे कदमों की आहट पर्याप्त नहीं थी ?’’ प्रेमी थोड़ी ऊँची आवाज में बोला।
इसके बाद वे कभी मिल नहीं सके, क्योंकि न तो प्रेमिका ने अपना दरवाजा खुला रखा और न ही प्रेमी ने उस बंद दरवाजे पर दस्तक दी।
‘‘उस दिन तुम आए नहीं। मैं प्रतीक्षा करती रही तुम्हारी।’’ प्रेमिका ने उलाहने के अंदाज में कहा।‘‘मैं आया तो था, लेकिन तुम्हारा दरवाजा बंद था, इसलिए वापस चला गया।’’ प्रेमी ने सफाई दी।‘‘अरे, भला यह भी कोई बात हुई !’’ प्रेमिका बोली।
‘‘क्यों, क्या तुम्हें अपना दरवाजा खुला नहीं रखना चाहिए था ?’’ प्रेमी थोड़े गुस्से में बोला।‘‘यदि दरवाजा बंद ही था तो तुम दस्तक तो दे सकते थे। मैं तुम्हारी दस्तक सुनने के लिए दरवाजे से कान लगाए हुए थी।’’ प्रेमिका ने रूठते हुए कहा।
‘‘क्यों, क्या मेरे आगमन की सूचना के लिए मेरे कदमों की आहट पर्याप्त नहीं थी ?’’ प्रेमी थोड़ी ऊँची आवाज में बोला।
इसके बाद वे कभी मिल नहीं सके, क्योंकि न तो प्रेमिका ने अपना दरवाजा खुला रखा और न ही प्रेमी ने उस बंद दरवाजे पर दस्तक दी।
Friday, January 2, 2009
अनंत खोज
-विजय अग्रवाल
‘‘यह तुमने कैसा वेश बना रखा है ?’’
‘‘तुम भी तो वैसी ही दिख रही हो !’’
‘‘हाँ मैंने अब अपने आपको समाज को सौंप दिया है। उन्हीं के लिए रात-दिन सोचता-करता रहता हूँ।’’
‘‘कुछ ऐसी ही स्थित मेरी भी है। एम.डी. करने के बाद अब मैं आदिवासी इलाकों में मुफ्त इलाज करती हूँ। बदले में वे ही लोग मेरी देखभाल करते हैं। खैर, लेकिन तुम तो आई.ए.एस. बनने की बात करते थे ?’’
‘‘हाँ, करता था। बन भी जाता शायद, बशर्ते कि तुम्हें पाने की आशा रही होती। जब तुम नहीं मिलीं तो आई.ए.एस. का विचार भी छोड़ दिया !’’
‘‘अच्छा !’’ उसके चेहरे पर अनायास ही दुःख की हलकी लकीरें उभर आईं। उसने धीमी आवाज में कहा, ‘‘कहाँ तो आई.ए.एस. के ठाट-बाट और कहाँ गली-गली की खाक छानने वाला ये धंधा ! इनमें तो कोई तालमेल दिखाई नहीं देता।’’
‘‘क्या करता ? यदि तुमने एक बार अपने मन की बात बता दी होती तो आज जिंदगी ही कुछ और होती।’’
‘‘लेकिन तुमने भी तो अपने मन की बात नहीं कही।’’
थोड़ी देर के लिए वातावरण में घुप्प चुप्पी छा गई। दोनों की आँखें एक साथ उठीं, मिलीं और फिर दोनों एक साथ बोल उठे, ‘‘इसके बाद से शायद हम दोनों ही एक-दूसरे को औरों में खोजने में लगे हुए हैं। शायद इसीलिए किसी ने भी अपने मन की बात नहीं कही।’’
‘‘यह तुमने कैसा वेश बना रखा है ?’’
‘‘तुम भी तो वैसी ही दिख रही हो !’’
‘‘हाँ मैंने अब अपने आपको समाज को सौंप दिया है। उन्हीं के लिए रात-दिन सोचता-करता रहता हूँ।’’
‘‘कुछ ऐसी ही स्थित मेरी भी है। एम.डी. करने के बाद अब मैं आदिवासी इलाकों में मुफ्त इलाज करती हूँ। बदले में वे ही लोग मेरी देखभाल करते हैं। खैर, लेकिन तुम तो आई.ए.एस. बनने की बात करते थे ?’’
‘‘हाँ, करता था। बन भी जाता शायद, बशर्ते कि तुम्हें पाने की आशा रही होती। जब तुम नहीं मिलीं तो आई.ए.एस. का विचार भी छोड़ दिया !’’
‘‘अच्छा !’’ उसके चेहरे पर अनायास ही दुःख की हलकी लकीरें उभर आईं। उसने धीमी आवाज में कहा, ‘‘कहाँ तो आई.ए.एस. के ठाट-बाट और कहाँ गली-गली की खाक छानने वाला ये धंधा ! इनमें तो कोई तालमेल दिखाई नहीं देता।’’
‘‘क्या करता ? यदि तुमने एक बार अपने मन की बात बता दी होती तो आज जिंदगी ही कुछ और होती।’’
‘‘लेकिन तुमने भी तो अपने मन की बात नहीं कही।’’
थोड़ी देर के लिए वातावरण में घुप्प चुप्पी छा गई। दोनों की आँखें एक साथ उठीं, मिलीं और फिर दोनों एक साथ बोल उठे, ‘‘इसके बाद से शायद हम दोनों ही एक-दूसरे को औरों में खोजने में लगे हुए हैं। शायद इसीलिए किसी ने भी अपने मन की बात नहीं कही।’’
Thursday, January 1, 2009
प्रेमी की गली
फ़ैज़ अहमद फैज़
कब याद में तेरा साथ नहीं, कब हात में तेरा हात नहीं
सद-शुक्र कि अपनी रातों में, अब हिज्र1 की कोई रात नहीं
मुश्किल हैं अगर हालात वहां, दिल बेच आएँ, जाँ दे आएँ
दिल वालों कूचा-ए-जानाँ2 में क्या ऐसे भी हालात नहीं
जिस धज से कोई मक़तल में गया, वो शान सलामत रहती है
ये जान तो आनी-जानी है, इस जाँ की तो कोई बात नहीं
मैदान-वफ़ा दरबार नहीं, याँ नामो नसब3 की पूछ कहाँ
आशिक़ तो किसी का नाम नहीं, कुछ इश्क़ किसी की ज़ात नहीं
गर बाज़ी इश्क़ की बाज़ी है, जो चाहो लगा दो डर कैसा
गर जीत गए तो क्या कहना, हारे भी तो बाज़ी मात नहीं
1. वियोग2. प्रेमी की गली3. नाम व वंशावली
कब याद में तेरा साथ नहीं, कब हात में तेरा हात नहीं
सद-शुक्र कि अपनी रातों में, अब हिज्र1 की कोई रात नहीं
मुश्किल हैं अगर हालात वहां, दिल बेच आएँ, जाँ दे आएँ
दिल वालों कूचा-ए-जानाँ2 में क्या ऐसे भी हालात नहीं
जिस धज से कोई मक़तल में गया, वो शान सलामत रहती है
ये जान तो आनी-जानी है, इस जाँ की तो कोई बात नहीं
मैदान-वफ़ा दरबार नहीं, याँ नामो नसब3 की पूछ कहाँ
आशिक़ तो किसी का नाम नहीं, कुछ इश्क़ किसी की ज़ात नहीं
गर बाज़ी इश्क़ की बाज़ी है, जो चाहो लगा दो डर कैसा
गर जीत गए तो क्या कहना, हारे भी तो बाज़ी मात नहीं
1. वियोग2. प्रेमी की गली3. नाम व वंशावली
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