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दरमियाना


डॉ. एम.फ़ीरोज़ खान
डॉ. मो. शमीम

 हिंदी में थर्ड जेण्डर पर केन्द्रित उपन्यास लेखन की परम्परा 2002 ई. से हुई है। इस विषय पर सर्वप्रथम उपन्यास नीरजा माधव कृत यमदीप लिखा गया है। इसके कुछ वर्षों पश्चात् और भी उपन्यास प्रकाशित हुआ है। जैसे- प्रदीप सौरभ कृत तीसरी ताली, महेन्द्र भीष्म कृत किन्नर कथा और मैं पायल..., डॉ. अनुसूया त्यागी कृत मैं भी औरत हूँ, निर्मला भुराड़िया कृत गुलाम मण्डी, चित्रा मुद्गल कृत नाला सोपारा, भगवंत अनमोल कृत ज़िंदगी 50-50, गिरिजा भारती कृत अस्तित्व और सुभाष अखिल कृत दरमियाना उपन्यास प्रकाशित हो चुका है।
कथाकार सुभाष अखिल कृत दरमियाना उपन्यास (अमन प्रकाशन, कानपुर) 2018 में प्रकाशित हुआ है। यह उपन्यास थर्ड जेण्डर को केंद्र में रखकर लिखा गया है। थर्ड जेण्डर समुदाय की संस्कृति, वेशभूषा, भाषा, रहन-सहन व उनको हाशिये पर लाने के कारणों का विस्तार से वर्णन करता है। कथाकार ने इस उपन्यास को पाँच अध्यायों में विभक्त किया है। तारा और रेशमा से प्रारम्भ होकर दिल्ली के गलियारों में राजनैतिक उठा-पटक के साथ यह उपन्यास अपने अहम्-बिंदु को रेखांकित करती है। 
उपन्यास की शक्ल अख्तियार करने से पहले यह कहानी की शक्ल में सन् 1980 में ‘सारिका’ पत्रिका में प्रकाशित हुई थी। जिस समय अखिल जी ने इस विषय पर कहानी लिखी थी उस समय बहुत कम कहानी प्रकाशित हुई थी या कहे कि हिंदी साहित्य में यह विषय अछूता ही था। वर्तमान समय में कई महत्त्वपूर्ण उपन्यास जैसे ‘यमदीप’, ‘तीसरी ताली’, ‘नाला सोपारा’, ‘मैं पायल...’, ‘मैं भी औरत हूँ’, ‘गुलाम मंडी’, ‘किन्नर कथा’, ‘जिं़दगी 50-50’ और अस्तित्व उपन्यास प्रकाशित हो चुका है। इन साहित्यिक कृतियों के माध्यम से समाज का नज़रिया किन्नर के प्रति बदला है। अब लोग खुलकर इस समुदाय के बारे में बात करने लगे हैं। कई विश्वविद्यालयों में शोध छात्रों ने इसी विषय पर अपनी कलम चलाई है। भारत के सर्वोच्च न्यायालय द्वारा दिया गया फैसला जो 15 अप्रैल 2014 को आया इस समुदाय के विकास में मील का पत्थर धीरे-धीरे साबित हो रहा है।
‘दरमियाना’ उपन्यास का प्रथम अध्याय ‘तारा और रेशमा’ की संगत दो ऐसे थर्ड जेण्डर की कहानी बयाँ करती है जिसको लेखक ने नज़दीक से देखा है। अध्याय का आरंभ अप्रत्यक्ष रूप से तारा और रेशमा के परिचय के साथ शुरू होता है। परंतु परिचय की वर्णनात्मक शैली लाजवाब है। सीधे तारा को संबोधित न कर कथाकार ने तारा को पाठकों के बीच में थर्ड पर्सन के रूप में लाता है जो पाठकों में कौतूहल उत्पन्न करती है।
‘‘मैं उसे तब से जानता हूँ, जब मैंने उसे पहली बार देखा था। उसमें दोनों हाथों की हथेलियों के मध्य भाग, बहुत ही कलात्मक ढंग से फैरा रहे थे यद्यपि ढोलक की थाप और फटे हुए स्वरों में उसकी तालियों की कहीं कोई संगत नहीं थी... जिस दायरे में वह थिरक रही थी, सिकुड़ कर छोटा हो गया था। तभी वह फिरकी की तरह घूमी और घूम कर बैठ गयी। उसने दोनों हाथों की हथेलियाँ रह-रह कर अब भी टकरा रही थीं।’’1
लेखक ने बहुत स्पष्ट ढंग से पाठक का ध्यान तारा की मंडली की ओर खींचा यह कहते हुए, ‘‘उसके साथ कुल मिलाकर पाँच व्यक्ति थे- चार औरत नुमा और एक मर्द की तरह का। शायद सबके सब दरमियाने। यानी न तो वे जनाने थे और न ही मर्दाने।’’(दरमियाना)
यहाँ पर लेखक समाज के मुँह पर एक तमाचा-सा मारता है जो आदमी और औरत द्वारा बनाये गये समाज को ही समाज मानते हैं। आखिर वो कहाँ जायेंगे ‘‘जो न जनाने हैं और न मर्दाने?’’
तारा के माध्यम से लेखक ने थर्ड जेण्डर समुदाय के लोगों के उठने-बैठने, चाल-चलन व विशेष रूप से किसी बच्चे के जन्म पर जब ये लोग बधाई लेने आते हैं तो उस समय उनके द्वारा बोली जाने वाली भाषा, गीत-संगीत पर भी प्रकाश डाला है। तारा उस छोटे से दायरे में टांगें फैलाकर बैठ गई थी। पास में झोले से कपड़े की पुटलिया निकाली और पुटलियों से बनारसी पान का जोड़ा निकाल कर उसने मुँह में रख लिया था।
‘‘जिस तरह गाय घास चबाती है या ऊँट नीम के पत्ते, उसी तरह तारा भी पान के उन पत्तों से बनारसी रस निचोड़ रही थी...।’’2
उपर्युक्त उद्धरण से स्पष्ट है कि तारा का समाज एक अशिक्षित समाज है। पान खाने का तरीका और उसकी तुलना ऊँट या गाय के घास और नीम के पत्ते चबाने जैसा बतलाना शायद इसी ओर इशारा करता है। कुछ ऐसी ही उपमा महेश दत्तानी, अंग्रेजी के महान नाटककार ने अपनी कृति ‘आग के सात फेरे’ में अनारकली नाम के थर्ड जेण्डर की तुलना घोड़े से की है।
नेग मांगने के समय घर की मालकिन से तकरार व शहरी पुरुषों पर रेशमा द्वारा कसा गया तंज उनके बात करने के तरीके व संस्कृति को दर्शाता हैµ ‘‘ना-री-ना इक्यावन से कम नहीं लूंगी, हाँ! पहला लड़का होया है और वो भी चांद-सा।’’.... खुदा करे, हमारी उमर भी इसे लग जाये... बुरी नज़र वाला भी न छू सके इसका... वैसे भी इन शहर के मर्दों में कौन-सा ज़ोर रह गया है, देहातों में होयं तो हम दस-पन्द्रह आस-औलादों का हक पाती हैं...’’3
घर की मालकिन द्वारा झुँझला कर यह कहना ‘‘ये लेने हैं तो लो, नहीं तो दफा हो जाओ यहाँ से।’’ इस पर तारा की प्रतिक्रिया- ‘‘अरी ओ! मेरे खसम की दिल लगी सौत! देती है कि दिखाऊँ जलवा?’’ मालकिन का यह कहना कि, ‘‘देखो!...देखो!!... यह सब बदतमीजी यहाँ नहीं करना.... ठीक है, हम देते हैं, तुम ठहरो।’’4
मालकिन और तारा के बीच का यह वार्तालाप दर्शाता है कि तृतीय लिंगी लोग नेग माँगने के अवसर पर अपनी उपेक्षा नहीं बर्दाश्त करते हैं। वे उसी भाषा में जवाब देते हैं जिस भाषा में लोग उन्हें संबोधित करते हैं। नेग मिलने के पश्चात् तारा का व्यवहार मालकिन के प्रति बिल्कुल बदल गया। कटुपूर्ण वचनों की जगह नम्रतायुक्त शब्दों की ऐसी झड़ी लगाई कि मानो तारा के पास कर्कश शब्द के लिए कोई जगह ही नहीं- ‘‘अरी मेरी प्यारी ननदिया! अगर पहले ही मान जाती तो काहे को इतनी जिल्लत उठानी पड़ती... चल-खुश रह!... हर साल फूले-फले, हमारे नन्दोई की जवानी बनी रहे... इस चांद के टुकड़े को भाई मिले... खुदा करे...’’5
किन्नर नेग माँगते समय अमीरी-गरीबी का ख्याल अवश्य रखते हैं। कथाकार ने बहुत ही बारीकी से इसका वर्णन अशुए (लेखक के बचपन का नाम) के घर पर तारा द्वारा नेग माँगने के समय प्रदर्शित किया है- ‘‘सगन तो सगन होता है बहना! फिर एक क्या और इक्यावन क्या?... जल्दी से बड़ा आदमी बन जाये मेरा राजा बेटा... पढ़े-लिखे-कमाये, फिर चांद-सी दुल्हनिया लाये, मेरी बहना के लिए।’’6
दुआएँ देने के अलावा तारा ने अशुए की माँ को नसीहत भी दे डाली- ‘‘बस री बहना! अब और सह न बनइओ, नहीं तो सुतरे पालने मुशकिल हो जाते हैं।’’
किन्नर भी हमारी तरह इंसान हैं। उन्हें भी अच्छाई व बुराई की समझ है। वे भी अमीरी-गरीबी महसूस करते हैं। मानवता उनकी नज़र में सबसे बड़ी उपासना है- ‘‘हमारे घर की टूटी हुई कुर्सी, फटी हुई चादर या माँ की पुरानी मैली-सी धोती पर लगे पैबंद, तारा से नहीं छिप सके थे।’’
अशुए का तारा के प्रति लगाव व तारा का अशुए के प्रति ममता प्रदर्शित करना यह दर्शाता है कि वे भी प्यार की भूखी है। उनमें ममता व स्नेह है। वे बच्चे को तो जन्म नहीं दे सकती लेकिन ममता का सागर न्यौछावर करने में सक्षम है। अशुए का गलत लड़कों की संगत में आने पर तारा उसे फटकारती है, ‘‘हरामजादे! तूने मुझे अपनी माँ समझ लिया है क्या? तू क्या समझता है, अगर उसे बेवकूफ बना लेता है तो मुझे भी बना लेगा?... जरा-सी भी शरम हो, तो अपना मुँह न दिखइओ।’’ इस फटकार से अशुए की आँखों के दोनों कोर भर आये। इसे देखकर तारा की ममता निश्छल भाव से प्रवाहित हो उठी। ममता रूपी आंचल में लपेटकर उसने अशुए को समझाया, ‘‘मान जा बेटा! ये सब अच्छे घर के लड़कों का काम नहीं है। तू उनका साथ छोड़ दे। तुझे कोई परेशानी हो, तो मुझसे कह। जितना पैसा-धेला चाहिए, मुझे बता। मैं क्या छाती पर धर के ले जाऊँगी... न जाने खुदा ने किस जनम का बैर ढाया है। मेरे ही बीज पड़ सकता, तो अब तक मेरा जना भी तेरे ही जैसा होता, पर अपनी तो धरती ही....’’7
उपन्यासकार ने तारा की सुंदरता का ज़िक्र कई जगह किया है जो इस बात को दर्शाता है कि सुंदरता की सीमाएँ हमने जो स्त्रा और पुरुषों तक सीमित की हैं वह सही नहीं है। किन्नर भी शक्ल और अक्ल में हम जैसे ही होते हैं। हम उनके प्रति पूर्वाग्रह से ग्रसित हैं। जरूरत है पूर्वाग्रह की उस दीवार को तोड़ना। लेखक ने इस बात पर भी ज़ोर दिया है कि ज़्यादातर किन्नर अपने आपको स्त्रा वेश-भूषा में ही रखती हैं, वे औरतों की तरह सजती हैं, वैसा ही शृंगार धारण करती हैं-  ‘‘उसका हल्का गेहुँआँ रंग, तीखी नाक पर नगदार फूल, आँखों में अभिसारिकाओं की-सी खुमारी काजल लगा लेने से और निखर उठती थी। उसके मेंहदी लगे हुए, सुनहरे से बाल थे। बनारसी पत्तों की सुर्खी लिये हुए, उसके रसदार होंठ, मुझे निमंत्राण देने से लगते थे।’’8
वक्त बदलता गया। अशुए की शादी मधुर से हो गयी। उसके अपने परिवार और अपनी जिं़दगी की खुशी में शायद तारा के लिए अब कोई जगह नहीं थी। एक दिन अशुए का सामना रेशमा से हुआ। उसने बहुत ही मार्मिक अंदाज में तारा के बारे में बताया, देह से चिपटी पड़ी है, छोड़ती ही नहीं... उसके जिसम को तो रोग खा गया है, मगर अब भी कभी-कभी बड़बड़ाने लगती है- ‘‘मेरे अशुए को ढूंढ़ लाओ।’’9 
किन्नर भी हमारे जैसे ही संबंधों को महत्त्व देते हैं। मृत्युशय्या पर पड़ी तारा आज भी अशुए की याद में आँसू बहा रही है। रेशमा का यह कथन कि ‘‘आप दोनों को देखकर, उसकी रूह को सुकून मिलेगा, बाबूजी।’’ किन्नर के लगाव, मोहब्बत व खुलूस को साथ ही उस तारा की ममता को जो माँ ना होते हुए भी अशुए की याद में तड़प रही है।

(दरमियाना-दो) ‘संजय से संध्या होने तक’ एक ऐसे थर्ड जेण्डर की कहानी है जो शरीर से पुरुष परंतु आत्मा से स्त्रा है। इसका शीर्षक भी ‘संजय से संध्या’ बनने की यात्रा की गवाही दे रहा है। हमारा समाज भी प्राचीन काल से समाज में उपस्थित नागरिकों को केवल जेण्डर के आधार पर विभाजित किया है। जैसे औरत होने का अर्थ है साड़ी पहनना, सजना, संवरना, गृहस्थी संभालना, वही मर्द का अर्थ उसकी बहादुरी, युद्ध कौशल में निपुणता, बाज़ार आधारित वस्तुओं के उत्पादन, क्रय व विक्रय तक सीमित रखा गया। परिवार पितृसत्तात्मक होने की वजह से निर्णय के सारे अधिकार मर्दों के हाथों में दिये गये। समाज में उसी कार्य को महत्त्व दिया गया जिसके करने से पैसा आता था। जबकि औरत सारा दिन घर का कार्य करती है लेकिन उसके कार्य का मूल्य इसलिए नहीं है कि उससे कोई मुद्रा का अर्जन नहीं होता। पाश्चात्य सभ्यता का अनुकरण करने वाली भारतीय औरत व मर्द द्वारा निर्मित समाज को समाज समझ बैठे जिसमें तृतीय लिंगी के लिए कोई जगह नहीं है। सवाल यह उठता है कि क्या उनके लिए अलग से दुनिया बसायी जायेगी? नहीं। वे भी हमारे समाज का हिस्सा हैं, उन्हें हमारे बीच ही रहना है। यह तभी संभव है जब हम जेण्डर की जगह सेक्स को महत्त्व दें। जेण्डर सामाजिक, आर्थिक, राजनैतिक व सांस्कृतिक का प्रतीक है जबकि सेक्स ईश्वर प्रदत्त है। इसका अर्थ यह है कि यदि ईश्वर किसी को औरत बनाया तो उसके शरीर में ऐसे सेक्सुअल आर्गन्स हैं जो उसे औरत होने की गवाही देते हैं, ठीक इसी तरह से पुरुष के बारे में कहा जा सकता है। थर्ड जेण्डर भी ईश्वर की ही देन है जो न पुरुष है न स्त्रा। इससे यह पता चलता है कि स्त्रा, पुरुष और तृतीय लिंगी की पहचान सेक्स है न कि जेण्डर। सेक्स उन्हें समानता दिलाता है जबकि जेण्डर विभाजित करता है, शोषण करता है और उनके अधिकारों का हनन करता है।
जेण्डर सामाजिक व सांस्कृतिक विरासत है जो समय व स्थान के हिसाब से बदल जाती है। यदि कोई औरत भारत में साड़ी पहनती है तो जरूरी नहीं कि यूरोप की भी औरतें वही ड्रेस अपनायें। यदि भारतीय पुरुष लंबी मूँछ व दाढ़ी में विश्वास करता है तो जरूरी नहीं कि अफ्रीका के पुरुष भी ऐसा करें। लेकिन यह जरूरी है कि जो सेक्सुअल आर्गन भारतीय पुरुषों व स्त्रियों को प्राप्त है वे संपूर्ण जगत के स्त्रियों और पुरुषों के पास है। स्त्रा या पुरुष की पहचान उनके सेक्सुअल आर्गन से होनी चाहिए न कि सांस्कृतिक आवरण से जिससे वे अपने-आपको ढकते हैं। जिनमें स्त्रा व पुरुष के सेक्सुअल अंग नहीं हैं वे ही थर्ड जेण्डर हैं। सेरेना नन्दा ने Neither Man nor Woman पुस्तक में "The hijras are a religious Community of Men who dress and act like women and whose culture centers on the worship of Bahuchara Mata, and one of many versions of the Mother Goddess, worshipped throughout India. In connection with the worship of this goddess, the hijras undergo an operation in which their genitals are removed. The hijra emasculation operation consists of surgical removal of penis and testicles, but no construction of a vagina.’10
‘संजय से संध्या’ होने तक में उपन्यासकार ने रेशमा के द्वारा तारा की गद्दी ग्रहण करना और तारा के अंतिम संस्कार के बारे में बताया है। साथ ही पूरा अध्याय संजय से संध्या बनने का यात्रा वृत्तांत है। संजय संध्या के रूप का वर्णन लेखक इस प्रकार करता है- ‘‘... सामने एक सुंदर-सी युवती खड़ी थी।.... गुलाबी रेशमी ज़री वाली साड़ी। सिर पर पल्लू। होंठ सुर्ख लाल। आँखों में अभिसारिकाओं की-सी खुमारी। कानों में दोनों तरफ अठखेलियाँ करती-सी बाली। नग की लौंग भी लश्कारा मार रही थी। बाल कटे, मगर करीने से संवारे हुए। तराशी हुयी कमान-सी भवें। एक स्मित-सी लकीर खींचती मुस्कुराहट। मैं पहचान नहीं सका था।’’11
संध्या का अशुए को ‘भैया’ संबोधित करना उनके समाज में प्रचलित रिश्ते की परख को बताता है। बेहिचक अशुए से सौ रुपये मांगना और यह कहना कि अभी मैं ‘सात्रो’ (महिलाओं के वस्त्रों में) कभी कड़ेताल (पुरुषों के कपड़े में) में आऊँगी उसकी छटपटाहट को दिखाती है कि हमारा समाज न तो उसे मर्द के रूप में स्वीकार करने को तैयार है और न औरत। उसका शरीर संजय का है किंतु हृदय और आत्मा संध्या की। इन्हें दोनों में से उसे चुनाव करना है। शायद आत्मा की आवाज़ शरीर पर भारी पड़ती है तभी तो वह संध्या बन जाती है। लेखक के शब्दों में, ‘‘.... ये खुद ही रहस्य का आवरण अपने इर्द-गिर्द बनाये रखते हैं। शायद इसलिए कि ये हमारे जैसे नहीं होते.... और शायद इसलिए भी कि हम उन्हें समझ नहीं पाएंगे, वे ऐसा ही मानकर चलते हैं। यही कारण है कि धीरे-धीरे ‘उनकी दुनिया’ ‘हमारी दुनिया’ से अलग होती चली जाती है... और पहचान का एक संकट उनके सामने आ खड़ा होता है।’’12
संजय का मधुर के प्रति झुकाव व मधुर द्वारा संजय के साथ सहजता से उठना-बैठना व बातें करना भी यह समझने के लिए पर्याप्त था कि संजय वास्तव में संध्या है। ईश्वर ने उसे शरीर मर्द का दिया परंतु अंदर से वह एक औरत है इसलिए वह औरतों में बैठना, उनके जैसे रहना पसंद करती है- ‘‘कुछ देर बाद मैंने महसूस किया कि         मधुर और संध्या काफी सहज थे... अपनी भाभी के माथे पर लगे सिंदूर को चूमकर वह चुपचाप लौट गया था।’’13 
संजय द्वारा मधुर के माथे के सिंदूर को चूमना यह दर्शाता है कि वे खुद शादी के बंधन में बंधने लायक नहीं है लेकिन किसी भी शादी-शुदा जोड़े को आशीष देने से वे पीछे नहीं रहते। प्रेम का भूखा यह समुदाय भी होता है। ये अपने ब्वायफ्रेंड को ‘गिरिया’ तथा प्रेमिका को ‘कोती’ कहकर पुकारते हैं। राहुल और संध्या के बीच का प्रेम संबंध यही दर्शाता है।
जब संध्या पर दबाव डाला कि वो राहुल के बारे में बताए तो संध्या तपाक से पूछ बैठी आप मेरे बारे में क्या जानते हैं। अगर मेरे बारे में जान जायेंगे तो आप मुझसे नफरत करने लगेंगे। यद्यपि कि मैं आपको भाई मानती हूँ किंतु जेण्डर पर आधारित समाज आपके अंदर भी मेरे प्रति घृणा कर भाव उत्पन्न कर देगा- ‘‘भैय्या, मैं हिजड़ा हूँ।  ...यही कहते हैं सब हमें... फिर संध्या या संजय... ऐसा कोई भी नाम बेमाने हैं।... सच पूछें हमारी जिंदगी नरक है। हम हर माँ के लिए एक स्वस्थ बच्चे की कामना करते हैं, दुआ माँगते हैं, पर हमें... पता नहीं क्यों ऊपर वाला कुछ हमारे जैसे बच्चे भी इस दुनिया में भेज देता है... जो दूसरों के लिए ऐसा बच्चा न देने की दुआ मांगते हैं।... हम मांगते हैं कि हे भगवान, हमारे जैसा किसी और को मत भेजना, किसी एक तरफ रखना...’’14
एक हिजड़ा के जन्म लेने पर परिवार की मानसिक स्थिति विशेषकर पिता के व्यवहार का ज़िक्र संध्या बहुत ही मार्मिक अंदाज में करती है। पिता द्वारा उपेक्षित किया जाना, कई अवसरों पर माँ का सुबकना व स्कूल व परिवार के द्वारा प्रताड़ित किये जाने का अश्रुपूर्ण वर्णन संध्या के शब्दों में उपन्यासकार ने कई जगह दर्शाया है- ‘‘मैं जब पैदा हुई थी, तो माँ बहुत खुश थी। उसे लगा कि बेटा हुआ है, मैं उस समय वैसी ही थी,... मैं अकुआ (लिंग सहित) थी... शुरू में किसी को कुछ भी अलग-सा, अजीब-सा नहीं लगा। मुझे भी नहीं। मगर धीरे-धीरे मैंने महसूस किया कि मैं उन लड़कों से कुछ अलग हूँ जो मेरे पास थे। मुझे लड़कों में या उनके खेलों में कोई रुचि नहीं थी।... मैं आस-पास की लड़कियों में अपने को ज्यादा अच्छा महसूस करती।... मेरी प्रताड़ना शुरू हो गयी। घर में, स्कूल में और हर कहीं....’’15 
संध्या के कुछ शब्द उसके अस्तित्व को बताने के लिए पर्याप्त हैं कि पुरुष शरीर में एक औरत का होना कितना दूभर है। यद्यपि कि प्राचीन ग्रंथों से पता चलता है कि कृष्ण का ‘मोहिनी’, अर्जुन का ‘वृहन्नला’ अंबा का ‘शिखण्डी’ व शिव का ‘अर्द्धनारीश्वर’ रूप हिजड़ों की संस्कृति का परिचायक है किंतु वर्तमान समय में इन्हें इसी कारण हाशिये पर खड़ा कर दिया गया कि न तो वे आदमी हैं न औरत। खुद संध्या के शब्दों में- ‘‘मेरी इस देह में रूह एक स्त्रा की है... मेरा मतलब मैं आत्मा से स्त्रा हूँ... और हूँ एक ऐसे शरीर में... मेरे कुछ समझ में नहीं आता मैं क्या करूँ.... मैं औरत हूँ और वही होना चाहती हूँ।’’16 
लेखक का संजय के परिवार के अन्य सदस्यों से मिलना, उसके बारे में तमाम तरह की जानकारी एकत्रित करना। रेशमा द्वारा संजय के बारे में भला-बुरा कहना, संजय के व्यक्तिगत जीवन व गुरु-चेला परंपरा जो हिजड़ों के पारिवारिक संबंधों की अनूठी मिसाल है, बहुत सारी जानकारी प्रदान करता है। ‘प्रतापगुरु’, ‘खैरगल्ले’ (दूसरों के मोहल्लों में जाकर कमाने-मांगने वाले हिजड़े) कड़ेताल (पुरुष वेश में हिजड़ा) छिबरा (लिंग का विच्छेदन) ऐसे शब्द हैं जो लेखक ने बहुतायत मात्रा में प्रयोग किये हैं, इससे हमें उनके संस्कृति, रीति-रिवाज, रहन-सहन, पारिवारिक संबंधों, आपसी लड़ाई-झगड़ों के बारे में पर्याप्त जानकारी मिलती है।
प्रतापगुरु द्वारा संजय का ‘छिबरवाना’ उसका मृत्यु को प्राप्त होना और रेशमा द्वारा उसका अंतिम संस्कार किया जाना थर्ड जेण्डर समुदाय में मानवीय रिश्तों के तार-तार होने, ईर्ष्या, द्वेष, जलन व घृणा-तृष्णा को दर्शाता है। उपन्यासकार ने अपनी कलम से हिजड़ा समुदाय पर जो लिखा है वह अद्वितीय है। कोई भी पहलू भाषा से लेकर संस्कृति तक अछूता नहीं है।


(दरमियाना-तीन) ‘जिस्म और जज़्बात का संतुलन’ सुनंदा नाम के थर्ड जेण्डर के इर्द-गिर्द घूमती है। लेखक ने पहली बार उसे एक मित्रा के यहाँ बधाई माँगते देखा था। उसकी सुंदरता का वर्णन लेखक इन शब्दों में करता है- ‘‘... करीने से बालों को बांधकर उसने जूड़ा बना रखा था।... सिर की माँग के बीच एक प्यारा-सा टीका, गोल मोटी बिंदिया... जो उसके चौड़े माथे पर खूब फब रही थी, नाक में लौंग...होंठ...एकदम रसीले-से गुलाबी।... होठों से थोड़ा-सा बायें नीचे की तरफ एक काला-सा तिल, जो उसके साँवरेपन को और निखार रहा था....’’17
सुनंदा द्वारा मित्रा के यहाँ बधाई मांगने के अवसर को लेखक ने भरपूर ढंग से सुनंदा तक पहुंचने व उसके साथ सहजता से बात करने के माध्यम के रूप में स्थापित किया। मित्रा की पत्नी ने बधाई के रूप में जैसे ही 251 रुपये व साड़ी दिये। सुनंदा ने अपनी नाराजगी इन शब्दों में जाहिर की- ‘‘न बहना! देख चांद उतरा है तेरे आँगन में ...और मैंने कौन से ज्यादा माँग लिये तेरे से... पाँच सौ ही तो मांगे हैं... हमारे पास भी कुछ हो और हो न हो, मगर पेट तो लगा है बहना!... बता हम कहाँ जायेंगे?’’18
सुनंदा भी प्यार की भूखी थी। जिस तरह से वह अशुए के करीब आने की कोशिश कर रही थी, शायद उसे शब्दों में बयाँ नहीं किया जा सकता। सुनंदा और अशुए का रिश्ता भौतिक सुख व प्रेम से परे था- ‘‘यह एक ऐसा रूहानी रिश्ता बन रहा था, जिसे कोई भी नाम देना, उस समय संभव नहीं था। न वह मेरे संसार की थी, न मैं उसके संसार का... मगर फिर भी हम दोनों का संसार एक स्तर पर आकर समान हो रहा था... अपने-अपने लिंग भेद और अपने-अपने, अलग-अलग आकर्षणों के बावजूद...’’19
सुनंदा का अशुए से मिलना-जुलना अच्छा नहीं लगा। कई अवसरों पर उसने सुनंदा को अशुए से दूर रहने को कहा जिसके लिए हिजड़ा समुदाय के लोग पतवाईदास (भगा दे) कीलीकूट (अपमानित कर दूँगा) जैसे शब्दों का प्रयोग करते हैं जिसका उल्लेख उपन्यासकार ने किया है।
सुनंदा का जन्म एक हिंदू परिवार में हुआ था। लेकिन परिवार द्वारा त्याग दिये जाने पर उसका लालन-पालन जनाब फजल अहमद व बीवी रुखसार ने किया। उसके बचपन का नाम नन्दलाल था। उसके सामने वैसी ही समस्या थी जिसे संजय ने संध्या बनने में सामना किया था। इसकी कहानी नन्दलाल से सुनंदा बनने की है।
ताई अम्मा यानी बीवी रुखसार ने जिस सुनंदा को अपनाया उसने पूरी ईमानदारी से एक बेटी का ही रोल नहीं अपितु बहन का भी रोल अदा की। जब उसे पता चला कि वह पेट से है तो वह खुशी से झूम उठी यह कहते हुए, ‘‘ताई अम्मा!... मुझे तो भाई ही चाहिए।’’20
जिस हिजड़ा को हमारा समुदाय मुख्यधारा से अलग कर देता है कि वो बच्चों को जन्म नहीं दे सकते, वे परिवार नहीं बसा सकते, उसी समुदाय की सुनंदा ने बीवी रुखसार के परिवार को संभाला। दंगे के समय उनकी हिफाजत की। बुढ़ापे का सहारा बनी और सुल्तान के जन्म पर जो आत्मीयता दिखाई वह वर्णन करने योग्य है- ‘‘यूँ समझो कि खुद की बंजर भूमि में, कभी भी कोई कोंपल न फूट सकने की निश्चित सूचना के बाद उसने ही सबसे पहले नन्हें सुल्तान को गोद में लिया था... बस यहीं से कुछ ऐसा हो गया था कि वह इसी घर का हिस्सा हो गयी थी।’’21

(दरमियाना-चार) ‘कातिल अदाओं का कत्ल’ रेखा नाम के थर्ड जेण्डर की कहानी को केंद्र में रखकर लेखक ने दिल्ली के पाश इलाके कनाट प्लेस का ज़िक्र किया है। तारा और रेशमा जहाँ ग्रामीण अंचल के हिजड़ों की व्यथा बताती है। संजय और सुनंदा नगरीय जीवन वहीं रेखा हिंदुस्तान की धड़कन दिल्ली का ज़िक्र करती है। खुशवंत सिंह ने अपने उपन्यास ‘दिल्ली’ में भागमती नाम की थर्ड जेण्डर का ज़िक्र किया है। तो सुभाष अखिल ने रेखा के माध्यम से आधुनिक दिल्ली पर प्रकाश डाला है। लेखक ने रेखा का परिचय इस प्रकार दिया है- ‘‘गौर वर्ण, अच्छी कद-काठी, तीखे नाक-नक्श, नाक पर लश्कारा मारती लौंग और कानों में लंबे लटकते झुमके। सिल्क के सूट में लिपटी वह काफी आकर्षक लग रही थी।’’22
अशुए पहली बार अपने मित्रा मुकेश कपूर के साथ रेखा से मिलने उसके घर गये। आलीशान घर, फ्रिज, टी.वी. से लेकर जरूरत के लगभग सभी सामान मौजूद। परंतु घर के आस-पास का वातावरण बहुत अच्छा न था। तमाम तरह के लोग तमाम पेशों में लगे हुए ज़िंदगी जी रहे थे। नशे और अपराध की दुनिया से ताल्लुक रखने वाली हर चीज़ वहाँ मौजूद थी। इस इलाके में रेखा के लिए जीवन जीना आसान न था। राजनैतिक रूप से भी यह इलाका बेहद खास था। बात-बात में अशुए ने रेखा की निजी ज़िंदगी में ताक-झांक शुरू कर दी। पता चला कि इसका असली नाम राजेन्द्र था। इसके पिता मोहनलाल इण्डिया गेट पर फलों की रेहड़ी लगाया करते थे। इसने भी एक पुरुष के रूप में जन्म लिया था परंतु स्त्रा रूप अंदर से उसे लगातार परेशान कर रहा था। एक दिन सलमा गुरु इसे अपने साथ ले गयी। इस तरह से वह अपनी असली दुनिया में अपने द्वारा बसाये लोगों के बीच पहुँच गयी। सलमा ने इसका हुलिया बदलवा दिया। एक दिन यह सात्रो (स्त्रा वस्त्रा) में घर आई तो घर में कोहराम मच गया। पिता ने इसे बहुत पीटा, माँ ने खाने की थाली इसके सामने पटक दी। इतना अपमानित होने के बावजूद भी उसने उफ् तक नहीं किया। गुरु सलमा ने इसका नाम रेखा रखा। उस समय रेखा की लोकप्रियता चरम पर थी। वह इसकी भी पसंदीदा अभिनेत्रा थी। पिता के गुजर जाने पर सारी जिम्मेदारी इसी ने उठाई। समाज की समस्याओं से लड़ते, माँ-बाप के द्वारा उपेक्षित किये जाने के बावजूद रेखा ने ज़िंदगी जी और औरों को भी ज़िंदगी जीना सिखाया। परंतु इसका भी अंत दुखद था। अपने ही लोगों ने ईर्ष्या और द्वेष की आग में जलकर इसकी हत्या कर दी।


(दरमियाना-पाँच) ‘दया की दया का अंत’ अध्याय दया नाम के किन्नर पर केंद्रित है। वह गाज़ियाबाद की रहने वाली थी। मोहिनी नाम की थर्ड जेण्डर ने अशुए को दया का पता दिया था। दयारानी ने राजनीति में किस्मत आजमाई। उन्होंने मेयर का चुनाव लड़ा और लोकसभा में भी किस्मत आजमाई। वर्तमान में विधानसभा की तैयारी में है। लेखक से बातचीत के दौरान दयारानी से वर्तमान भारत की राजनैतिक उठा-पटक का पता चला, साथ ही भारतीय राजनीति में दरमियाना के लिए जगह बनाना कितना कठिन है का अनुमान दयारानी के इस संवाद से लगाया जा सकता है- ‘‘बाबू हम किसी पार्टी के बड़े नेता तो हैं नहीं, न ही हमारे पास हराम का पैसा और गुंडे बदमाश हैं।.... हम तो ईमानदारी के बल पर ही लड़ते हैं।’’23
भारतीय राजनीति में किन्नरों की उपस्थिति एक ऐतिहासिक कदम है। शबनम मौसी से लेकर दया तक ने अपनी उर्जा व महत्वाकांक्षा के हिसाब से इसमें कदम रखा लेकिन मुख्यधारा के राजनैतिज्ञों के झूठ व फरेब के आगे उनकी न चल सकी। वे आज भी हाशिए पर है- ‘‘...हमारी बात इन नेताओं के झूठे नारों और वादों से दब जाती है। ....ऐसा नहीं कि मैं केवल चुनाव के लिए सामने आती हूँ।...दो अनाथ आश्रमों,         दूधेश्वरनाथ मंदिर और गऊशाला के लिए भी मुझसे जो बन पड़ता है, मैं करती हूँ।...चाहो तो इलाके में किसी से पूछ लो।’’24 
हार-जीत के प्रश्न पर दया ने बहुत ही सहजता से अशुए को उत्तर दिया। किंतु इस संवाद में उसके थर्ड जेण्डर होने का दर्द छलक उठा। ‘‘जीवन की बहुत बड़ी लड़ाई हार जाने की तरह ही... बहुत सहज रूप से स्वीकार किया था’’, यानी जब स्त्रा व पुरुष के मध्य स्थापित हो रहे, अपने अस्तित्व को उन्होंने स्वीकार किया होगा.... तब क्या यह हार उसके सामने कुछ मायने रखती है?
दयारानी का बचपन गरीबी में बीता। पिताजी जूते बनाने का काम किया करते थे, लिहाजा घर की माली हालत ठीक नहीं थी। उसके भाई, बाबू और पिता का निधन जल्दी हो गया था। लेखक ने बहुत ही सरल और रोचक ढंग से उसके जीवन के बारे में बताया है- ‘‘17-18 वर्ष की आयु तक दया कड़ेताल (पुरुषों के कपड़े) में ही रहा करती थी। पढ़ाई-लिखाई में ज्यादा मन नहीं लगा। कभी सिंहासिनी गेट के बाहर कोयले की टाल पर जा बैठता युवक दया... कभी चौपला या डासमा गेट के मोहल्लों में मटरगश्ती। परिवार ने तो पहले से कन्नी काटना शुरू कर दिया था। फिर जैसे-जैसे शरीर में परिवर्तन उभरने लगा, तो इन्होंने पूरी तरह यह जीवन जीने का निर्णय ले लिया। घर-बार सब त्यागकर ये अपने गुरु हाजी किन्नर के पास ही चली आई थी और गाना-बजाना, बधाई मांगना-खाना शुरू कर दिया था।’’25 
दयारानी ने 1996 में गाज़ियाबाद से मेयर के पद के लिए चुनाव लड़ा। वह हार तो गयी किंतु उनमें काफी राजनैतिक परिपक्वता आ गयी। अपने गुरु हाजी किन्नर की मौत के बाद इन्होंने किन्नर समाज को अपने अधिकारों के लिए जागरुक किया। इन्होंने  राष्ट्रीय स्तर पर ट्रांसजेण्डर अधिकार कमेटी बनायी जिसने इन्हें तीसरे लिंग के रूप में अलग पहचान दिये जाने में सहायक सिद्ध हुई। दयारानी ने अपनी भतीजी गीता उर्फ बबिता को गोद लिया जिसने उनके जीवन में बच्चे की कमी का एहसास नहीं होने दिया। दयारानी ने समाज में बढ़ते अपराध, बलात्कार (विशेषकर बच्चियों के साथ) को जघन्य कृत्य माना। ऐसा करने वाले को उन्होंने हिजड़ा बनाने की चाहत का इज़हार किया।
दया को अपने किन्नर होने का गहरा दुख था। इस बात को उन्होंने अशुए से साझा किया। ‘‘अपना जीना भी कोई जीना है बाबू। बस, इतना ही समझती हूँ कि यह जो जिंदगी मिली है, वह समाज और अपनी बिरादरी के काम आ जाये, तो मेरा किन्नर होना भी सफल मान लूँगी।’’26
दया के कुछ वक्तव्य थर्ड जेण्डर की छटपटाहट को समझने के लिए पर्याप्त है- ‘‘इस देह के भीतर की औरत मुझे चैन से नहीं जीने देती... आप नहीं जानते बाबू... इस अधूरी देह में, पूरी आत्मा को जीना क्या होता है?’’27 
दया जात-पाँत को नकारती है। वह कहती है मैं भी छोटी जात की हूँ बाबू... मगर जैसे साधुओं की जात नहीं होती वैसे ही हम हिजड़े भी जात-पाँत नहीं मानते।.... मेरी गुरु मुसलमान थी, अब मेरी एक चेली भी मुसलमान है। हमारी तो अपनी ही देवी है, सब उसे ही मानते हैं।28 
अपने इंसान न होने का दर्द उसके इस वक्तव्य में साफ झलकता है- ‘‘मैं हमेशा से सोचती थी कि हम इंसान नहीं हैं? कम से कम हमें भी तो इंसानों की तरह जीने का मिले...’’29 
राजनैतिक ईर्ष्या की वजह से दया का भी कत्ल कर दिया जाता है। इसमें भी उसके अपने लोग शामिल होते हैं।
इस प्रकार यह कहा जा सकता है कि दरमियाना एक ऐसा उपन्यास है जो किन्नरों के सांस्कृतिक, सामाजिक, आर्थिक, राजनैतिक और भाषा पर प्रकाश डालता है। केंद्र में रेशमा, तारा, संध्या, दया, रेखा और सुनंदा है किंतु इनके जीवन की कहानियाँ और समस्याएँ किन्नर समुदाय को रेखांकित करती हैं। निःसंदेह दरमियाना की जिं़दगी जीना एक अभिशाप है। एक समय था जब हिजड़े सम्मान भरी जिं़दगी जीते थे। कृष्ण का मोहिनी रूप, अर्जुन का वृहन्नला, अंबा का शिखंडी और शिव का अर्धनारीश्वर इसका सशक्त उदाहरण है। 
ऐसा कहा जाता है कि साहित्य समाज का दर्पण है। अभी तक साहित्य नारी, दलित व आदिवासी विमर्श इत्यादि तक सीमित था। किंतु हाल ही में किन्नर कथा, मैं पायल..., यमदीप, मैं भी औरत हूँ, गुलाम मण्डी, जिं़दगी 50-50 और नाला सोपारा अस्तित्व व अन्य उपन्यासों में इनकी जिं़दगी का रोचक व मार्मिक वर्णन किया गया है। इसी कड़ी में दरमियाना भी आती है जो ग्रामीण अंचल से लेकर भारत का दिव्य कहे जाने वाली दिल्ली तक के किन्नरों का वर्णन व उनके रहन-सहन पर प्रकाश डालती है। उम्मीद की जाती है कि दरमियाना उपन्यास लोगों की मानसिकता को बदलने में कामयाब होगी। 

संदर्भ-
1. सुभाष अखिल, दरमियाना, अमन प्रकाशन, कानपुर, 2018, पृ. 13
2. वही, पृ. 14
3. वही
4. वही, पृ. 15
5. वही
6. वही, पृ. 18
7. वही, पृ. 20
8. वही, पृ. 19
9. वही, पृ. 24
10. Serena Nanda, Neither Man nor Woman: The Hijras of India, Wardsworth Publishing House, New York, 1996, p. ix
11. दरमियाना, पृ. 27
12. वही, पृ. 29
13. वही, पृ. 31
14. वही, पृ. 37
15. वही, पृ. 37-39
16. वही, पृ. 39
17. वही, पृ. 63
18. वही, पृ. 65
19. वही, पृ. 72
20. वही, पृ. 84
21. वही 
22. वही, पृ. 92
23. वही, पृ. 114
24. वही 
25. वही, पृ. 116
26. वही, पृ. 119
27. वही, पृ. 120
28. वही, पृ. 121
29. वही, पृ. 122


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