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थर्ड जेण्डर और ज़िंदगी 50-50

सम्पादक- डा. एम. फीरोज खान


इसी पुस्तक से---
...ज़िंदगी के ताने-बाने बड़े अजीब होते हैं। कभी सुलझाए नहीं सुलझते और कभी इतने सादा हो जाते हैं कि उनकी सादगी पर भी एक सवाल-सा खड़ा हो जाता है। कई मोड़ों पर यही ज़िंदगी इतिहास सी लौट-लौट आती है तो कई जगह इतनी अनजान कि पता ही नहीं चलता कि यह ज़िंदगी ही है या कोई और अदेखा ख़्वाब या कि कोई दुःस्वप्न। जीवन  में जाने कितने किरदार, कितने फलसफे रोज आँखों के आगे गुजरते हैं कि वे इन गिरते-उठते पलों की कहानियों को जीवित करते से प्रतीत होते हैं। इन्हीं कहानियों में हर जीवन का रोजनामचा है जिन्हें कोई लेखक शिद्दत से महसूस करता है और अपने लिए कथा का आधार विषय के रूप में बनाता है।....
जीवन एक अनसुलझी पहेली है। यह जीवन किसी के लिए अभिशप्त तो किसी के लिए वरदान साबित होता है। यह समय की ही अनुकूलता है कि अभिशप्तता अब रेखांकित, चिंह्ति और शाब्दिक अभिव्यक्ति पाने लगी है। प्रकृति की एक सर्जना जिसे हम थर्ड जेण्डर की संज्ञा से नवाजते हैं, भी सामाजिक दुराग्रह के चलते इसी अभिशप्तता का क्रूरतम चेहरा है। इस अभिशप्तता की टीस इतनी गहरी है कि इसे पढ़कर तुरंत ही इससे संक्रमित हुआ जा सकता है, एक गहरी रिक्तता में डूबा जा सकता है।
थर्ड जेंडर ...जिसके इर्द-गिर्द कथानक घूमता रहता है वस्तुतः वो कथा है जो सदैव उपेक्षित रही है। यह वर्ग अपने जीवन के लिए समाज का मुँह ताकता रहता है। वह अगर सामान्य जीवन जीना भी चाहे तो समाज उसका मखौल उड़ाता है। यह समाज उसी प्रवृत्ति का पहरुआ है जो पुत्रा जन्म के समय तो इस वर्ग का आशीष लेना चाहता है परन्तु अन्य स्थलों पर इसकी उपस्थिति को  खारिज बताता है। इन समस्याओं के साथ ही लेखक दैनंन्दिन समस्याओं और जीवन के त्रास पर भी पाठक का ध्यान खींचता है। वह अनेक घटनाओं के ज़िक्र से यह बात भी रेखांकित करता है कि जब पूर्वग्रह और गढ़ी हुई मान्यताओं का रंग गाढ़ा हो जाता है तो  जीवन यात्रा दुष्कर हो जाती है।... 


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