Tuesday, December 28, 2010

राही मासूम रजा के सम्यक् मूल्यांकन का एक सार्थक प्रयास

डॉ. शिवचन्द प्रसाद



डॉ. एम. फीरोज+ खान द्वारा सम्पादित ग्रन्थ- ÷राही मासूमः कृतित्व एवं उपलब्धियाँ' प्राख्यात आँचलिक कथाकार, साझी संस्कृति प्रबल उद्गाता, राष्ट्रवाद और अपनी माँटी के सच्चे प्रेमी राही मासूम रज+ा को हर कोण से मूल्यांकित करने का एक सार्थक और यथोचित प्रयास है जिसमें, सम्पादक काफी हद तक सफल भी रहा हैं। जहाँ अब तक समीक्षाएँ आँचलिक, आँचलिकता के घिसे-पिटे सतही मुहावरे तक ही सीमित रही हैं या श्लीलता-अश्लीलता के विवाद को ही सुलझाने में अपनी इतिश्री समझती रही हैं, वहीं यह पुस्तक राही की विश्व दृष्टि और वैचारिकता का सामना करती हुई उनके विभिन्न अन्तरंग पहलूओं को भी प्रकाश में लाती है। इस कार्य में पुस्तक में सम्पादित साक्षात्कार अत्यन्त महत्त्वपूर्ण सहायक की भूमिका निभाते हैं, जिन से यह सिद्ध होता है कि राही का जीवन दुःखों का महाकाव्य और संघर्षों की वीरगाथा है। इस संदर्भ में डॉ. प्रेमकुमार के द्वारा नैयर रज+ा राही, गोपालदास नीरज, शहरयार और क़ाज+ी अब्दुल सत्तार से लिए गये साक्षातकार विशेष उल्लेखनीय है। यद्यपि जिस प्रेमकुमार पर डॉ. नामवर सिंह मुहर लगा चुके हों, उन पर अब कुछ कहना ÷छोटे मुँह बड़ी बात' होगी पर मुहर लगाने और बयान बदलने के अलावें नामवर जी किया ही क्या है? बहरहाल प्रेमकुमार के द्वारा लिए गये साक्षात्कारों में काव्यात्मक सरसता एवं कथात्मक रोचकता के दर्शन होते हैं। उनके साक्षातकार इण्टरव्यू के घिसे-पिटे ऊबाऊ सेटअप (कब लिखा? कैसे लिखा? कितनी प्रेमिकाएँ थीं? आपकी पसन्द आलू या भूर्ता) को तोड़ते हैं और पाठक को विधा-बोध से विभुक्त करते हैं। एक साथ कविता, कहानी, उपन्यास, संस्मरण और साक्षात्कार का आनन्द लेना हो तो प्रेम कुमार के साक्षात्मकार पढ़े जाने चाहिए।

प्रायः साक्षात्कार लेने वाले बन्धु जल्दबाजी में रहते हैं। वे जल्दी-जल्दी निपटने में लगे रहते है, जैसे उनके सिर पर भारी बोझ हो जिसे वे उतार फेंकना चाहते हों अथवा भीग रहे हों और टायफाइड होने का भय हो। इसके विपरीत प्रेमकुमार में काफी धैर्य और समय है और वाक् चातुरी ऐसी कि सामने वाले से सब कुछ उगलवाले और उसे पता भी न चले कि वह कहाँ से कहाँ तक कह गया। पे्रम की इसी कुशलता पर तो कुर्बान होने का मन करता है। प्रेमकुमार द्वारा विभिन्न लोगों से लिए गये साक्षातकारों के साथ विश्वनाथ द्वारा राही से की गयी बातचीत को भी शामिल कर लिया जाय तो राही की मुक्मल तस्वीर उभर कर सामने आती है ओर ऐसा प्रतीत होने लगता है कि राही को नापने के लिए अपना पैमाना बढ़ाना पड़ेगा। जहाँ नैयर रज+ा राही के मकान पर राही मासूम रज+ा और ले. कर्नल मोहम्मद खान (नैयर रज+ा के पूर्व पति) दोनों की नेम प्लेट लगी तो और अन्दर दोनों के फोटो टँगे हों, ऐसी स्थिति को दुनियाबी मनोवृत्ति के पैमाने से भला कैसे नाप सकते हैं? इसके लिए तो विराट मानसिक चेतना चाहिए जो राही जैसे लोगों के ही अन्दर हुआ करती है।

डॉ. मेराज अहमद और मोहम्मद आसिफ खान दोनों ही राही मासूम रज+ा के पड़ोसी हैं और उनके आलेखों से प्रतीत होता है कि ये लोग राही को अत्यन्त निकट से जानते हैं। राही की पारिवारिक पृष्ठभूमि और ÷गंगौली-गंगा-प्रेम' की वस्तुगत जानकारी के लिए इनके आलेख पठनीय हैं। इसी प्रकार उनके फिल्मी सफर के संदर्भ में इस संग्रह में सम्पादित सिनेमा पर सारिका में पूर्व प्रकाशित राही के ÷यथार्थ लेकिन संसार दिलीप कुमार....फिल्मकार में सामाजिक चेतना नहीं है और ÷फिल्म की भाषा; के साथ यूनुस खान तथा सिद्धेश्वर सिंह के निबन्ध उल्लेखनीय हैं।

कला के साहित्य के क्षेत्रा में अश्लीलता एक ऐसा हथियार प्रतिक्रियावादियों को मिल गया है। जिसे जब चाहे जिस पर चला दें। इसके शिकार राही मासूम रज+ा भी हुए। ÷आधा गाँव' की गालियों को लेकर बड़ा हो हल्ला मचा, नामवर जी की भी धोती ढीली पड़ गयी और जोधपुर विश्वविद्यालय के पाठ्यक्रम से ÷आधा गाँव' का नाम स्वयं वापस लेना पड़ा। इसकी विस्तृत चर्चा इस ग्रन्थ में मूलचन्द सोनकर ने ÷राही मासूम रज+ा की अश्लीलता' आलेख में की है, जहाँ विभिन्न पक्ष-प्रतिपक्ष दृष्टिगोचर होते हैं। जहाँ रामविलास जी का मानना है कि ÷आधा गाँव साम्प्रदायिकता तो नहीं है, पर अश्लील है।' वही अब्दुल बिस्मिल्लाह और अमृतलाल नागर को राही की गालियों में स्वाभाविकता के दर्शन होते हैं। उधर इस आलेख के लेखक मूलचन्द सोनकर को लगता है कि ÷आधा गाँव' की इस पराजय में नामवर जी के व्यक्तित्व में ÷जुझारूपन का अभाव और पंगा न लेने की प्रवृत्ति है। -(पृ. ५४) इस क्रम में सम्पूर्ण भारतीय वाङ्मय के आलोक सिद्ध किया है कि वहाँ दो आख्यान-यौनावार और सुर-असुर संग्राम महत्त्वपूर्ण हैं। वहाँ के निर्लज्ज और अनावृत्त चित्राणों के आगे राही की गालियाँ शर्म से सिर भी नहीं उठा सकती और उन्हें अपने गाली कहे जाने पर ग्लानि लगेगी। प्रमाण के लिए उन्होंने वेदों, उपनिषदो, संस्कृत साहित्य आदि से पर्याप्त तथ्य भी दिये हैं, लेकिन उनके यह सब सिद्ध करने के पीछे यह कदापि नहीं है कि ÷वहाँ' ऐसा कुछ है तो ÷यहाँ' क्यों नहीं है? वे गालियों की वकालत नहीं करते हैं अपितु अब्दुल बिस्मिल्लाह के इस कथन से सहमत प्रतीत होते हैं कि ÷÷गाली शब्द में नहीं नीयत में होती हैं अगर आप किसी शब्द का प्रयोग इस नीयत से कर रहे हैं कि किसी को चोट पहुँचे तो वह गाली है, लेकिन किसी शब्द का प्रयोग सिर्फ एक्सप्रेसन के लिए करते हैं तो गाली नहीं है। शब्द गाली नहीं होते, गाली नीयत में होती है।'' (पृ. ६४) यही तथ्य ÷आधा गाँव' पर भी लागू होता है। यदि ÷गंगौली' के लोग भोजपुरी उर्दू मिश्रित भाषा और गालियों में ही वार्तालाप करते हैं तो उस स्वाभाविक अभिव्यक्ति को गाली कैसे कह सकते हैं? यदि ÷शेखर : एक जीवनी' और ÷नदी के द्वीप' एक कुशल प्रशासक बना सकते हैं- काम-कुण्ठा परोस कर तो ÷आधा गाँव' एक स्वस्थ नागरिक क्यों नहीं बना सकता? गंगौली के गालीबाजों में देश और अपनी माँटी के प्रति कितना लगाव है, यह कोई तथाकथित शिष्ट रामनामीवाल ÷आधा गाँव' के ÷गंगौली' से सीखें गंगौली और वहाँ के लोगों से नफरत और ईर्ष्या करने वाले वे ही लोग हैं जो यह कहते फिरते हैं कि- ÷एक मुसलमान होते हुए भी राही..... अर्थात् ÷हाय हुसैन हम रहे।' अर्थात् अंगूर खट्टे हैं यानी ÷खेलब न खेलाइबे खेलि बिगाडब भाव यह कि मुझे खेलने तो आता नहीं, चलो खेल बिगाड़ देता हूँ परन्तु खिसियानी बिल्ली कभी खम्भा नोच पाई है क्या? राही उस राह का पथिक है जिसका पथ काँटों भरे बीहड़ों से होकर गुजरता है। ऐसे में इन छोटे-मोटे रोड़ों की उसे क्या परवाह?

इस सम्पादित ग्रन्थ में संग्रहीत शिवकुमार मिश्र, कुरबान अली, हसन जमाल, डॉ. बाकर ज+ैदी, प्रोफेसर ज+ोहरा अफ़जल और संदीप कुमार के आलेखों के सारांश से राही की प्रमुख तीन विशेषताएँ उभरकर सामने आती है- साम्प्रदायिक सद्भाव, देश और अपनी माँटी के प्रति प्रेम और सामाजिक असमानताओं के प्रति विक्षोभ। यही कारण है कि प्रो. ज+ोहरा अफ़जल को राही साम्प्रदायिकता के विर+द्ध एक आदर्शवादी उपन्यासकार की भूमिका में नज+र आते हैं।' इसके लिए उन्होंने फुन्नन मियाँ को ÷आँधा गाँव' से उद्धृत किया है, जिनकी धारणा ÷हिन्दू-मुस्लिम' की संकीर्ण मानसिकता के सर्वथा विपरीत है- ÷÷हाँ-हाँ, त हुए बा। तू तो ऐसा हिन्दू कहि रहियो जैसे हिन्दु सब भुकाऊ है कि काट लीयन। आरे ठाकुर कुँवरपाल सिंह त हिन्दू रहे। झगुरियो हिन्दू है। ऐ भाई ओ परसरमुवा हिन्दुए न है कि जब शहर में सुन्नी लोग हरमज+दगी कीहन कि हम हज+रत अली का ताबूत नहीं उठने देंगे, काहे को कि ऊ शिया लोग और तबर्रा पढ़त हैं, त परसरमुवा ऊधम मचा दीहन कि ई ताबूत उठी और ऊ ताबूत उटठा। तेरे जिन्ना साहब हमारे ताबूत उठाये न आये।'' यह मिसाल है गंगौली के आपसी भाई-चारे की जहाँ सब को विदित है कि दंगे-फसाद पढ़े-लिखे सियासतबाजों का काम है, आम आदमी की इसमें कोई र+चि नहीं है। राही मासूम रज+ा के अनुसार- ÷÷हिन्दू नाम एक राष्ट्रीयता का है।..इस देश के वासी हिन्दू मुसलमान, सिख, ईसाई आदि न होकर मुसलमान हिन्दू, ईसाई हिन्दू, सिख हिन्दू, जैन हिन्दू आदि होने चाहिए, बखेड़े इतिहास की पुस्तकों में है।''(पृ. ९१)

गंगा, गंगौली और हिन्दुस्तान से राही को अगाध प्रेम है और उतना ही प्रेम ही देश की भाषा और संस्कृति से जिसके चलते वे उर्दू को देवनागरी लिपि में लिखे जाने की वकालत करते हैं। देश में व्याप्त सामाजिक विषमताओं के प्रति छटपटाहट राही के कथा साहित्य में देखी जा सकती है। ÷आधा गाँव', ÷टोपी शुक्ला', ÷ओस की बूँद', ÷हिम्मत जौनपुरी', ÷असंतोष के दिन', ÷कटरा बी आर्जू' और ÷दिल एक सादा कागज+' आदि किसी न किसी रूप में समाज में व्याप्त असमानताओं और जटिलताओं से टकराते नज+र आते हैं।

राही के संदर्भ में ऐसी चर्चाएँ तो पहले हुई थी और अब भी हो रही है परन्तु केवल राही ही नहीं अपितु समस्त आँचलिक कथाकारों की अतीत-ग्रस्तता पर अभी तक किसी ने भी चर्चा नहीं की है जिसे बहस का विषय बनाया जा सकता है। आखिर क्या कारण था कि गाँव और शहर का परम्परागत भारतीय सम्बन्ध तथा देशी पूँजीवाद की कुंठित दशा के कारण बीसवीं शताब्दी में जब कि दुनिया के प्रतिरोध आंदोलन भविष्य के सपनों से शक्ति पा रहे थे, भारतीय प्रतिरोध का मुख्य स्वर अतीतोन्मुखी बना रहा। यह बात कथा के क्षेत्रा में भी दिखाई देती है। जब कलाकार की कलात्मक प्रतिबद्धता का केन्द्र सामाजिक अन्तर्वस्तु से पीछे रह जाता है तो उसका स्वाभाविक अन्त अतीत जीवी होने में ही होता है। यही कारण है कि ग्रामांचल कथाकारों की लोक सम्पृक्तता अतीत ग्रस्तता का रूप ले लेती है।

इस अतीत ग्रसता के कई रूप हैं। डॉ. शिवप्रसाद सिंह को गाँव में एक ÷अवरूद्ध वर्तमान' दिखाई देता है जिसमें किसी भी तरह के भविष्य के परिस्फुटित होने की कोई उम्मीद नहीं है-÷÷यहाँ के रहते हैं जो रहना नहीं चाहते।'' (÷अलग-अलग वैतरणी') यही कारण है कि विपिन कर्त्तव्य- बोध घुटन और विक्षोम में पड़कर गाँव छोड़ देता है। इस तरह गाँव का यह अंधा वर्तमान अतीत की स्वाभाविक वकालत बन जाता है।

फणीश्वरनाथ रेणु में सामंती अतीत और वर्तमान दोनों सुरक्षित हैं। आजादी के बाद गाँवों में गुजरने वाले समय की सम्पूर्ण कहानी रेणु में मिलती है। समय के साथ भारतीय सामंतवाद ने अपने को कैसे पुनर्जीवित किया, एक नाटकीय आस्था के मोले प्रहरी ÷बावनदास अपने ही चक्के के नीचे कैसे पिस गये, स्वतः र्स्फूत प्रतिरोधों का समाज सुधारकों की उपस्थिति में ही किस प्रकार हास्यास्पद अन्त हुआ, इन सबका चित्रा रेणु के दो उपन्यासों ÷मैला आँचल' और ÷परती परिकथा' में मिलता है। दोनों उपन्यास एक ही कहानी कहते हैं। एक जहाँ समाप्त होता है, दूसरा वहीं से शुरू होता है। दोनों ही उपन्यासों में रेणु हवेली के प्रति अपनी प्रतिबद्धता में पूरी तहर जागरूक हैं। रेणु की आँखें ग्रामोद्धार के लिए पुनर्जीवित भारतीय सामंतवाद के समाजवादी प्रहरियों पर टिकी हैं। यही से रेणु के ÷÷रोमैंटिक इल्युजन' की शुर+आत होती है और इसी कारण वे यथार्थवादी परम्परा से दूर जा पड़ते हैं। सामन्ती जमीन पर खड़े होकर टॉल स्टाय और बाल्जाक ने भी समाज का सर्वेक्षण किया है लेकिन अपने वर्ग की भोगलिप्सा और पतनशीलता के प्रति उनकी जेनुइन घृणा उन्हें लेखकों की अगली कतार में ला खड़ा करती है। लेकिन रेणु सामंती शानोशौकत से अभिभूत लोक चेतना के उस हिस्से के प्रतिरूप लगते हैं जो परिवर्तन रहित भारतीय ग्राम व्यवस्था के लिए अति आतुर थे, जिनकी दृष्टि राजकुमारों की दिग्विजयों स्त्राी-विजय और राज-पाट से सम्मोहित थी।

रेणु की तरह अतीत का सम्मोहन मार्कण्डेय में भी है परन्तु वे विभाजित चेतना के कथाकार हैं। उनमें अतीत के प्रति सम्मोहन के साथ-साथ वर्तमान का भी दबाव है। वे गाँव की सीमा पर खड़े शहरी मार्क्सवादी कथाकार हैं। अपने प्रथम कहानी संग्रह ÷पान फूल' (१९५४) में दो मार्कण्डेय दिखाई देते हैं-÷गुलरा के बाबा' और ÷कहानी के लिए नारी पात्रा चाहिए' के मार्कण्डेय। दोनों एक दूसरे से भिन्न हैं। इन दोनों कहानियों की चार पंक्तियों से बात साफ हो जायेगी-

÷÷कवन है रे सरपत काट रहा है। बाबा ने आमिलहवा के नीचे खड़े होकर कंधे से लाठी उतारते हुए कहा। आवाज+ सारे गुलरा में गूंज गयी। बड़ी गम्भीर और बलुन्द आवाज+ थी वह अनजान आदमी तो एक बार डर जाय और चिरई चुरमुन भी पेड़ों से उड़ गये।'' (गुलरा के बाबा)

÷÷चाची को मेरी कहानी के स्त्राी पात्रा पसन्द नहीं। उनका कहना कहानियों में जिन स्त्राी पात्राों को मैं चित्रिात करता हूँ वे उच्छृंखल, सीना जोर और मुँह फट होती हैं। उनके प्रेम में मौन का स्थान नहीं होता। वे मुहब्बत का इज+हार करती फिरती है-(÷कहानी के लिए स्त्राी पात्रा चाहिए')

मार्कण्डेय की द्विविभाजित रचनात्मक चेतना के तत्कालीन द्वेध बिन्दुओं का प्रतिफलन हैं। वे बिन्दु हैं- प्रेमचन्द की परम्परा और नयी कहानी की आधुनिकता। अतीत ग्रस्तता मार्कण्डेय के यहाँ भी है-÷÷पहले यही घर थे कि काम करने का खेत मिलते थे आम के पेड़ मिलते थे, शादी-ब्याह पर लकड़ी, कपड़ा फाटा, गहरा मिलता था, हरजी-गरजी को अनाज-पानी मिलता था। मालिक लोग तनी-तनी बात पर मुँह जोहते थे।'' (÷हंसा जाइ अकेला')

सामन्ती अतीत की यह वकालत राही मासूम रज+ा के ÷आधा गाँव' में भी देखने को मिलती है। स्वयं राही स्वीकार करते हैं कि ÷सामन्तवादिता' उनमें है- सामन्तवाद के विघटन से वे दुःखी भी हैं साम्प्रदायिकता और अस्वाभाविक बँटवारे के खिलाफ लेखक की संवेदनात्मक स्तर पर कलात्मक प्रतिबद्धता उपन्यास में भावात्मकता का सृजन करती है लेकिन अपनी सम्पूर्ण प्रभावान्विति में एक शानदार रागात्मक अतीत की तस्वीर बन कर रह जाती है। जिसमें दोस्त अपनी दोस्ती के प्रति वफ़ादार है, रखैल और गुलाम अपने मालिक के ख्वाहिशमन्द हैं और मालिक इनकी तरफ से मुतमइन हैं। सच पूछा जाय तो इस उपन्यास का नाम ÷आधा गाँव' न रखकर ÷फ्रीडम ऑफ गंगौली' रखा जाना चाहिए। कर्नल टाड के राजपूताने के राजाओं की तरह राही ने गंगौली के सैयदों को ग्लोरीफाई किया है। उपन्यास में सबसे सशक्त फुन्नव मियाँ की हेकड़ी, अपनी माँटी से उनका लगाव और ठाकुर जयपाल सिंह के खानदान से दोस्ती निभाने के उनके पैंतरे देखते ही बनते हैं और जब ढलती उम्र में रात के अंधेरे में उनके ऊपर लाठियों से गढराना हमला होता है। तो भी ललकारते हैं-÷÷ई त बड़ी नामर्दी बा'' टोक के मार त जानें। और ÷÷हट जनखे'' कहते हुए गिर पड़ते हैं। वे अपने मौत में भी वैसे ही बहादुर रहें, जैसे जि+न्दगी में। सारा वर्णन कुछ इस तरह का है जैसे लैरी कालिन्स और डॉमनिक लैपरे में ÷आधी रात की आज+ादी' नामक पुस्तक में ब्रिटिश साम्राज्यवाद द्वारा शान्ति पूर्वक सत्ता हस्तांतरित किये जाने में भी बहादुरी और गुर+त्व के दर्शन किये हैं-÷नथिंग इन हिज लाइफ हिम दैन लिविंग इट।'

फुन्नन मियाँ, फुस्सू मियाँ, थब्बू मियाँ, सैयद अली हादी, अलीम अली, कबीर और मौलवी बेदार के मालिकाना प्यार और प्राकृतिक बलात्कार, मौरूसी इमामबाड़े और रिवाज के विघटित होने पर लेखक का मर्सियाना लहजा उसके अतीत जीवी होने का सबूत है। भूमिका में समय की कहानी का दावा करने वाले राही समय के खिलाफ सहानुभूति दे बैठते हैं। विश्लेषण के बजाय ÷थे' के नगमें से जुड़ जाते हैं- ÷÷हर जनाने कमरबन्द में कुंजियों का भारी गुच्छा था पर बक्स खाली थे। तालों की कोई जरूरत नहीं थी पर औरतें कुंजियों के गुच्छों से चिपटी हुई थीं क्योंकि वही उनके खुशहाली के सामने की यादगार हर चुके थे।

केन्द्रिय चरित्रा की कभी ÷आधा गाँव', मैला आँचल', ÷परती परिकथा', अलग-अलग बैतरणी सब में है। ऐसा नहीं है कि इनमें जीवन्त पात्राों की कमी है। फुन्नन, डॉ. प्रशान्त, जितेन्द्र, विपिन, ताजमनी, सईदा, सैफुनिया आदि में से निर्णय करना कि नायक नायिका कौन हैं, मुश्किल है। यद्यपि रात्राी ने भूमिका में समय को नायक ठहराया है-÷÷यह कहानी न धार्मिक होता है न राजनैतिक और यह कहानी समय की कहानी है। यह गंगौली से गुजरने वाले समय-समय की कहानी है।'' कथा में गिरफ्+तार समय की कहानी पात्राों और चरित्राों से अलग नहीं होती। संकट तब खड़ा होता हैं जब समीकरण उलट दिया जाता है। जब हम पात्राों द्वारा समय तक पहुँचने के बजाय समय के सहारे पात्राों तक पहुँचते लगते हैं।

नैसर्गिक भाषा में नैसर्गिक चिंतन का उद्गार है-

समीक्षक- डॉ. आजम



मेरा मानना है कि कविताओं की पुस्तकें तीन तरह के घर की तरह होती हैं, एक जिनमें प्रवेश द्वार होता है जो निष्कासन द्वार भी साबित हो जाता है, अर्थात् जाइए इधर-उधर देखिए वहीं खड़े -खड़े फिर निकल जाइए। दूसरी तरह की पुस्तक में प्रवेश द्वार से घुस जाइए कुछ आगे बढ़िए तो पता चलता है कि हर जगह बड़ी-बड़ी खिड़कियाँ हैं और आप पछता कर लौटने के बजाए किस खिड़की से बाहर कूद आते हैं। मगर तीसरी पुस्तक ऐसी होती है जिसमें प्रवेश करने के बाद भले ही एक आध खिड़कियाँ भी दिखाई दें, मगर आगे बढ़ने का आकर्षण आप को आगे बढ़ाता रहता है, अन्ततः आप उस घर के अंत तक पहुँच कर बाहर निकलने के द्वार से ही अपने अंदर बहुत सी प्रशंसाएँ, अनुभूतियाँ लेकर निकलते हैं। ÷÷धूप से रूठी चाँदनी'' ऐसा ही घर है जो आप को प्रारंभ से अंत तक आकर्षण में बांधे रखने में सक्षम है।

÷÷धूप से रूठी चांँदनी'' वास्तव में नैसर्गिक भाषा में नैसर्गिक चिंतन का उद्गार है जो सच के अत्यंत समीप प्रतीत होता है। उन्होंने हर पंक्ति में भाव के पूरे के पूरे संसार को समेट दिया है। शाब्दिक चित्राण ऐसा कि हम स्वयं अपने सामने कविता को एक खाका, एक दृष्य पटल का रूप लेते देख लेते हैं और शनैः शनैः हम भी उस का एक हिस्स बन जाते हैं। सुधा जी और ÷÷धूप से रूठी चांदनी'' की लोकप्रियता अवश्य ही सरहदों को पार करती हुई जहांँ-जहाँ हिंदी आबाद है वहाँ-वहाँ अपना परचम लहराएगी।

उनकी कविताओं में जाबजा स्त्राी की पहचान एक इंसान के रूप में कराने का आग्रह और महज माँ, बहन, पत्नी की छवि में न बँधे रहने की छटपटाहट दिखती है- मैं ऐसा समाज निर्मित करूँगी/जहाँ औरत सिर्फ माँ, बेटी/बहन पत्नी, प्रेमिका ही नहीं/एक इंसान/सिर्फ इंसान हो। दूसरी जगह कहती हैं-दुनिया ने जिसे सिर्फ औरत और तूने/महज बच्चों की मांँ समझा/और तेरे समाज ने नारी को/वंश बढ़ाने का बस एक माध्यम ही समझा/पर उसे इंसान किसी ने नहीं समझा।

चिरपरिचित नारी संवेदनाओं का जब वह चित्राण करती हैं तो एक भिन्न परिवेश उजागर कर देती हैं- अश्रुओं की धार बहाती/हृदय व्यथित करती/इच्छाओं को तरंगित करती/स्मृतियाँ उनकी चली आई। हर साहित्यकार इस आभास के साथ जीता है कि जीवन एक रंगमंच है और भगवान के हाथों की हम सब कठपुतलियाँ मात्रा हैं-कराए हैं नौ रस भी अभिनीत/जीवन के नाट्य मंच पर/हँसो या रोओ/विरोध करो या हो विनीत/नाचता तो होगा ही/धागे वो जो थामे हैं।

बचपन वह अवस्था होती है जब मन में तर्क-वितर्क नहीं आते, प्रकृति की हर घटना उसके लिए सुखदायक होती है। मगर बड़ा होते ही चार किताबें पढ़ लेने के बाद वह तमाम सुखों से वंचित हो जाता है। जिस इंद्रधनुष को बचपन में रंगों से भगवान द्वार की गई चित्राकारी समझता था अब उस उसके लिए फिजिक्स की एक वैज्ञानिक प्रक्रिया के अलावा कुछ नहीं रहता। वैज्ञानिक सत्य उसके लिए महज एक घटना बन कर रह जाता है ÷विज्ञान बौद्धिक विकास/और भौतिक संवाद ने/बचपन की छोटी छोटी/खुशियाँ छीन लीं/शैशव का विश्वास/परिपक्वता का अविश्वास बन जाता/अच्छा नहीं लगता है....।'

विदेश में भू्रण हत्या अधिक ही होती होंगी, कारण दूसरा होगा। हमारे देश में अधिकतर कन्या भू्रण की ही हत्या सुनने को मिलती है। यहाँ लोग पुत्रा की चाह में कन्या को मारने की साजिश कर लेते हैं। जहाँ सुधा जी रहती हैं वहाँ तो यौन स्वच्छंदता ही एक कारण प्रतीत होती हैं। मगर पूरे विश्व में ऐसा हो रहा है कारण जो भी हो। सुधा जी कहती हैं- मैं एक नन्हा सा स्पंदन हूँ/मुझ पर यह सितम क्यों/स्वयं आया नहीं/लाया गया हूँ/फिर यह जुल्म क्यों/पालने की जगह कूड़ादान दिया। आप चाहें तो इसे बनाकर पढ़ लें तो यह कविता भारत की हो जाती है। अभी-अभी गुजरात में सोलह भू्रण कूड़ेदान से प्राप्त हुए जिनमें अधिकतर कन्याएँ थीं।

अमेरिका एक मशीनी देश है जहाँ लोग मात्रा कलपुर्जे की तरह व्यवहार करते हैं। जहाँ कलपुर्जे समय-समय पर बदल दिये जाते हैं। उनमें संवेदना नहीं होती। भारत में हमें अपने बेकार हो चुके कबाड़े से भी अपनेपन का रिश्ता महसूस होता है इसलिए हम उन्हें फेंक नहीं पाते। उनमें स्मृतियाँ बसी रहती हैं। अमेरिका में दिल से उतरने पर कोई सामग्री क्या रिश्ते भी फेंक दिए जाते हैं। सुधा जी को वहाँ पहुँचते ही यह एहसास हो गया- एयरपोर्ट पर वह आए/मुस्कारए/ एक गौरी भी मुसकुराई/में चकराई/क्या तुम उसे जानते हो? वे बोले/यह देश अजनबियों को हाय/अपनों को बाय कहता है/मैं घबराई कैसे देश में आई।

स्त्राी-पुरुष के रिश्ते कहते है कि स्वर्ग में निर्धारित होते हैं। मेरे ख्+याल में जिस तरह स्वर्ग एक कल्पना है उसी तरह यह उक्ति भी कोरी कल्पना है। वरना तमाम ताम झाम के बाद बाँधे रिश्ते के धागे बार-बार और कभी हमेशा लिए पूरी तरह क्यों टूट जाते हैं। सच तो यह है कि जिसको एक आदर्श रिश्ता कहा जा सके वैसा कुछ होता ही नहीं....हांँ समझौतों के सहारे घर के अंदर-अंदर कोई रिश्ता बरसों बरस तक ढोया जा सकता है। जिसे बाहर वाले लम्बी अवधि तक कायम रहने के कारण आदर्श रिश्ता कह देते हैं। वरना तो वह दोनों इकाइयाँ ही जानती हैं जो कभी नहीं जुड़ती...। न जुड़ पाना ही मुझे तो अधिक स्वाभाविक प्रतीत होता है....खैर सुधा जी कहती है....लकीरें भी मिलीं/अहम् तुम्हारा/अकड़ी गर्दनों से अड़े रहे हम/आकाश से तुम/धरती सी मैं/क्षितिज तलाशते रहे हम। अर्थात् दो अलग अलग व्यक्तित्व फिर समता तलाशना तो निरर्थक ही है न फिर शिकवा शिकायत क्या।

माँ पवित्रा रिश्ता है आज हर शाइर, कवि इस रिश्ते को भुना रहा है। मगर कविता मेलोड्रामाई अंदाज की हो और ग्लीसरीनी आँसू कवि/कवयित्राी बहाने लगता है तो कविता अपने निम्न स्तर पर चली जाती है। लेकिन सुधा जी ने मांँ के प्रति जो अनुभूतियाँ प्रस्तुत की हैं वह इतनी सहज हैं कि दिल में उतरती प्रतीत होती हैं क्षण-क्षण, पल-पल/बच्चे में स्वयं को/स्वयं में तुमको पाती हूँ/जि+ंदगी का अर्थ/अर्थ से विस्तार/विस्तार से अनंत का सुख पाती हूँ/मेरे अंतस में दर्प के फूल खिलाती हो/माँ तुम याद बहुत आती हो।

सुधा जी ने दुनिया भर में घटित होने वाली मार्मिक घटनाओं पर भी पैनी नज+र रखी हुई है कई कविताएँ दूसरे देशों में घटित घटनाओं से उद्वेलित होकर लिखी हैं। जैसे ईराक युद्ध में नौजवानों के शहीद होने पर लिखी कविता हो या पाकिस्तान की बहुचर्चित मुख्तारन माई को समर्पित कविता, इस सत्य को उजागर करता है कि साहित्यकार वही है जो वैश्विक हालात पर न सिर्फ दृष्टि रखे, बल्कि उद्वेलित होने पर कविता के माध्यम से अपने विचार व्यक्त कर सके। इस तरह सुधा जी एक ग्लोबल अपील रखने वाली कवयित्राी हैं। धूप से रूठी चाँदनी में विविधता है, रोचकता है, जीवन के हर शेड मौजूद हैं। जमाने का हर बेढंगापन निहित है। पुरुषों का दंभ उजागर है, महिला का साहस दृष्टिगोचर है।

तुम चाहो तो

सीमा गुप्ता




एक अधूरे गीत का

मुखड़ा मात्रा हूँ,

तुम चाहो तो

छेड़ दो कोई तार सुर का

एक मधुर संगीत में

मैं ढल जाऊंगा...

खामोश लब पे

खुश्क मरुस्थल-सा जमा हूँ

तुम चाहो तो

एक नाजुक स्पर्श का

बस दान दे दो

एक तरल धार बन

मैं फिसल जाऊंगा...

भटक रहा बेजान

रुह की मनोकामना-सा

तुम चाहो तो

हर्फ बन जाओ दुआ का

ईश्वर के आशीर्वाद-सा

मैं फल जाऊंगा...

राख बनके अस्थियों की

तिल-तिल मिट रहा हँू

तुम चाहो तो

थाम ऊंगली बस

एक दुलार दे दो

बन के शिशु

मातृत्व की ममता में

मैं पल जाऊंगा...

चाँद मुझे लौटा दो ना

चंदा से झरती

झिलमिल रश्मियों के बीच

एक अधूरी मखमली सी

ख्वाइश का सूनहरा बदन

होने से सुलगा दो न

इन पलकों में जो ठिठकी है

उस सुबह को अपनी आहट से

एक बार जरा अलसा दो ना

बेचैन उमंगो का दरिया

पल-पल अंगड़ाई लेता है

आकर फिर सहला दो न

छू करके अपनी सासो से

मेरे हिस्से का चांद कभी

मुझको भी लौटा दो ना

मौन करवट बदलता नहीं

शब्द कोई गीत बनकर

अधरों पे मचलता नहीं

सुर सरगम का साज कोई

जाने क्यूँ बजता नहीं...

बाँध विचलित सब्र के

हिचकियों में लुप्त हो गये,

सिसकियों की दस्तक से भी,

द्वार पलकों का खुलता नहीं...

रीति हुई मन की गगरिया,

भाव शून्य हो गये,

खमोशी के आवरण में,

मौन करवट बदलता नहीं....

मुझे जन्म लेने दो

नग़मा जावेद




माँ!

पिताजी कहते हैं।

उन्हें लड़की नहीं चाहिए।

तुम डरी-डरी सी

जी रही हो....

अगर

पैदा हुई लड़की

तो क्या होंगा?



माँ!

मत डरो-

मुझे जन्म लेने दो

मैं-

अपनी लड़ाई

खुद लडूँगी।

जैनेन्द्र के विचारों में वेश्या की समस्या

डॉ. रविन्द्र एस. बनसोडे



आज नेक, इमानदारी, सचरित्रता और नैतिकता का युग नहीं बल्कि बेईमान, गैरजिम्मेदार, ऐयाशी और कामचोर जैसे अव्यवस्था से भरा दूषित समाज है। एक ओर मिनिस्टर, कमिश्नर, कलेक्टर, सीनियर सुपरिटेंडडेण्ट आफ़ पुलिस, व्यवसायी, अध्यापक, प्राध्यापक, उप-कुलपति, बड़े-बड़े स्टॉकिस्टों ये सभी सुन्दरी के पिछे पड़े भ्रष्टाचार, डकैती, घूस, नग्न नृत्य आदि का पोषण करते जा रहे है। इसलिए नारी मन में खफगी छा गई है। वे कदम-कदम पर नारी तन के प्यासे हो जाने के कारण वह तलबगार की प्यास मिठाने के लिए मौजूद होती है तो वह उसे भोग की वस्तु समझ बैठा है। तो वह जो अर्थवश, बेसहारा अबला क्या करती? उसे अनायास ही अपने तन के वस्तु का व्यापार ही तो करना पड़ता है और दूसरी बात यह रही कि हम अकल के पीछे लट्ठ लेकर फिरते है। क्योंकि उसके साथ अमानवीय कुकृत्यों की स्थिति को ऊपर उठाकर उसे अनैतिक सम्बन्ध, असहाय, दुर्व्यवहार, व्याभिचारिणी, बेशर्मी, रण्डी, बेऔलाद, निर्लज्य, निकम्मा औरत जैसा किसी औरत पर यह हम समाज का पट्टा लगा देते है, तो वह सुन्दर औरत आखिर उसे जीना है तो क्या करती ? वह वेश्या नहीं बनती तो और क्या करती। इस प्रकार एक नव रमणी का आर्विभाव हो जाता है। हालात एवं आर्थिक समस्या के कारण इन्सान को इन्सान नहीं रहने देती। ÷व्यतीत' उपन्यास का पात्रा बुधिया को उसका पिता ताड़ी एवं आर्थिक समस्या के कारण उस जवान बेटी की शादी नहीं, बल्कि उसे जबरदस्ती वेश्या बनाता। आर्थिक कारणवश रंजना को वेश्यावृत्ति करना पड़ता है। हर वेश्या के जीवन में एक साध रहती है कि उसकी शादी हो, दुल्हन बने। कोई उसका अपना हो। उसके साथ फोटो निकलवायेगी। उससे छोड़ कहीं नहीं जायेगी और उसे भी कहीं नहीं जाने देगी प्रेम बन्धन में रहने का सोचेगी। मगर ऐसा कहा होता है। वेश्या का जीवन तो कुछ अलग-सा होता है। बस वह किशोरी संध्या से धंधे में दबती जाती है। मर्दों की उसके साथ हर हरकत, छोटी-बड़ी, मानी-बेमानी, होनी-अनहोनी सभी घटनाएँ होती जाती है। किन्तु इसमें प्यार होता है न मोहब्बत होती है, फिर भी सहना पड़ता है। हकीकत तो उसकी यह है कि जीवन भर उसे रोना पड़ता है और एक कोने में ही जि+न्दगी खोना पड़ता है। सेक्स का सवाल अलग है तो गृहस्थी बनाये रखने का सवाल कुछ अलग होता है। दूसरी बात यह है कि दोनों के दाम्पत्य के बीच का अलगाव कुछ और होता है। यहीं दाम्पत्य का अलगाव लेखक जैनेन्द्र कुमार ने अपने उपन्यास कथा में प्रस्तुत आवश्यकता पड़ने पर वेश्या बनने का चित्राण चित्रिात किया है। इनके उपन्यास के पात्रा रंजना दशार्क उपन्यास की नायिकाएँ जैसी ये निर्धारित समय एवं स्थान पर पहुँचने पर ही वेश्यावृत्ति करती है। पति समझाकर घर ले जाना चाहता है। किन्तु वह अपने पति से कहती है- कह रही थी मैं, हाँ, धर्म। आज वह धर्म रुपया-धर्म, वैश्य धर्म है। राजधर्म भी वही है। राष्ट्र विनियम पर चलते और फलते है। जो सौदे में बाजी ले गया उन्नत हो गया। अर्थात् आदर्श पुरुष गहरा व्यवसायी होगा। इसलिए आदर्श स्त्राी के लिए भी गहन व्यवसायिनी बनना है। सुनो वारांगना से यह आगे की चीज+ है। मज+ाक न समझ लेना। गहरे सोच-विचार से नतीजे पर पहुँची हूँ और यह सब आप से इसलिए कह रही हूँ कि विवाह अदालत से हमारे बीच से अभी टूटा नहीं है। यानी यह जो सात एक बरस बीते हैं, अनधिकृत बीते हैं। आप ताप-संताप उठाते रहे, फिर भी यह नहीं किया, इसके लिए मैं आपकी ऋणी हूँ। आशा करती हूँ कि आपकी सहानुभूति साथ है और मैं प्रयोग में आगे बढ़ सकती हूँ।'' रंजना पति की अनुमति से नहीं खुद-ब-खुद स्वेच्छा से कुछ हालात से रौंदी जाने से वेश्यावृत्ति करती है।

स्त्राी हो या पुरुष काम हर स्वस्थ शरीर की भूख है। चाहे न चाहे वे दोनों एक दूसरे के पास काम पूर्ति हेतु आना ही पड़ता है। बट्रेन्ड रसेल ने तो भले ही कहा हो कि, ÷÷विवाह प्रधानतः यौन-सह चर्य नहीं है। बल्कि इसका सबसे बड़ा उद्देश्य है सन्तानोत्पत्ति'' परन्तु आज के प्रसंग में केवल मात्रा यौन-सहचर्य ही रहा है। इस में भी यदि कुछ गड़बड़ी हो जाती है तो पुरुष नारी तलाक लेना चाहते हैं और औरों से अपनी सेक्स पूर्ति करने का सोचते हैं। भले ही वे सन्तान के माता-पिता बने हुए क्यों न हो। वे अपनी-अपनी रुचि के अनुसार चलते हैं। विवाहित जीवन में सेक्स का बहुत बड़ा महत्त्व होता है कि इसी चट्टान के मारे कितने सारे घर बनते और बने हुए घर टूट-फूट भी जाते है। परन्तु जैनेन्द्र के उपन्यासों में इससे कुछ विपरीत ही दिख पड़ता है। इनके उपन्यासों की पात्रा ÷सुनीता' की सुनीता ÷कल्याणी' की कल्याणी ÷विवर्त' की भुवनमोहिनी, ÷व्यतीत' की अनिता, एवं ÷अनामस्वामी' की वसुंधरा जैसी नारी पात्रााएँ को दुश्चरित्राा बनाकर पति-पत्नी के मधुर सम्बन्धों के टूटने के दुर्भाग्य की चर्चा नहीं की गई बल्कि सम्पन्नयुक्त घराना एवं व्यक्तियों के साथ विवाह कर लेती हैं और पति प्रेमी इन दोनों के बीच अपना जीवनयापन करती जाती हैं। उनमें और एक बात यह है कि सुखी दाम्पत्य के लिए व्यवसाय, व्यापार, आमदनी, शिक्षा, नौकरी घरेलू उत्तरदायित्व एवं पति-पत्नी का एक-दूसरे के प्रति उत्तरदायित्व प्राप्त करने का चित्राण भी इन नारी पात्राों में मिलता है। इनमें पति-पत्नी की पारस्पारिक एक निष्ठता एवं संरक्षा का स्थान विवाह पूर्व प्रेमी पर का ही दिख पड़ता है। वे पति-प्रेमी के बीच की कड़ी को सरता-परता बराबर करके अपने मानसिक कुण्ठा का बोझ हलका करती है।

आर्थिक दृष्टि से नारी की स्थिति अत्यन्त कारूणिक होती है। पति के अमानवीय व्यवहार, अर्थाभाव से पीड़ित एवं पारिवारिक उत्पीड़न के कारण उसकी स्थिति अत्यन्त भयंकर होती है। बे-सहारा नारी को समाज उसे स्वावलम्बी नहीं बनने देता और उसे अपने स्वतन्त्रा रूप से जीविकापार्जन करने में भी अनेक बाधाएं एवं निम्नकोटि का उपाय वेश्यावृत्ति ग्रहण कर बैठती है। जैनेन्द्र के उपन्यासों में वेश्या समस्या नहीं दिखाई पड़ती। किन्तु कुलशील पतिव्रत्या की समस्या के कारण उसका चित्राण मिलता है। ÷त्यागपत्रा' उपन्यास में नारी की कुलशील और पतिव्रत्य समस्या का उल्लेख किया गया है। ÷त्यागपत्रा' की मृणाल का प्रेम एक ओर शारीरिक सुख तक ही सीमित है तो दूसरी ओर वह समर्पण करने वाला भी है। वह स्वच्छंद प्रेम की पक्षपातिनी ही नहीं आदर्श प्रेम पर जीवन उत्सर्ग कर देने वाली सती है। वह कहती है- ÷÷दान स्त्राी का धर्म है। नहीं तो उसका और क्या धर्म है? उससे मन मांगा जायेगा, तन भी मांगा जायेगा। सती का आदर्श और क्या? तन उसकी बिक्री....न, न, यह न होगा।'' वह स्त्राीत्व दान करके उससे पैसा नहीं लेना चाहती। पैसों से तन की बिक्री करना उसे स्वीकार नहीं हैं। इसके अतिरिक्त वह स्त्राी-धर्म को ही पति-धर्म मानती हैं। क्योंकि स्त्राी धर्म के बिना पति धर्म कहा होता है। ÷÷मैं स्त्राी धर्म को ही पति धर्म ही मानती हूँ। उसको स्वतंत्रा धर्म मैं नहीं मानती। क्या पतिव्रता को यह चाहिए कि पति उसे नहीं चाहता तब भी अपना भार उस पर डाले रहे?'' जब पति उसे नहीं चाहता हो तो पतिव्रता उस पर अपना भार क्यों डाले यह सोचकर वह पति के तिरस्कार से वह कोयले वाले के साथ रहती है और वहाँ पर पुरुष मानने के लिए तैयार नहीं है वह प्रमोद उसका है। उसकी सेवा में मैं त्राुटि नहीं कर सकती। पतिव्रता-धर्म तो यह कहता है।'' यहाँ अन्य पुरुष के प्रति पतिव्रत धर्म की व्याख्या की गई है तो इसका अर्थ यह है कि मन से तन देना वेश्यापन है। यों ही मन से तन देना सतीत्व है। इसे वेश्यापन नहीं माना जा सकता। किन्तु उसके ऊपर अनैतिकता का आरोप लग जाता है कि वह परिस्थितियों की दासी हो जाती है, स्वयं नहीं होती। उसके साथ एक प्रकार दुःख का जीवन-दर्शन, उद्घाटित होते जाता है। उसकी परिस्थिति माँ-बाप का न होना, भाई-भाभी के बीच का कठोर अनुशासन, पति से ठोकर खाकर घर से बाहर निकल देना यह मृणाल की परिस्थिति का होना, यह अपने आप में एक पीड़ाग्रस्त जीवन जिसमें व्यक्ति अपने अचेतन में अकेलेपन से लड़ना है। सब खोकर लड़ना ऐसा क्या उसका जीवन कई बचा था? बचा भी हो तो अन्य पुरुष कोयले वाले के पास कम-ज्यादा वह भी पानी के बुलबुले जैसा पता नहीं वह भी कब रुक जाता है। तब वह अबला मृणाल जैसी नारी क्या कर सकती है? प्रमोद अपनी बुआ को घर ले जाने के लिए आता है। किन्तु वह अधमरी आत्मा को खोकर जीवन की गति को पाना चाहे तो भी वह गति तममय है। इस पर उसे मृणाल कहती है- ÷÷जरूर ले चलेगा, तो सुन, मैं नहीं जाऊँगी, मैं नहीं जा सकती। तुम मुझको नहीं जानते हो, मैं पति के घर को छोड़कर आ रही हूँ। तुम अपनी आँखें ढक लो, लेकिन मुझसे अपना यह पातक निगल जाने को नहीं कह सकते- फिर जिनको साथ लेकर पति को छोड़ आई हूँ। उनको मैं छोड़ दूँ। उन्होंने मेेरे लिए क्या नहीं त्यागा? उनकी करूणा पर मैं बची हूँ। मैं मर सकती थी, लेकिन मैं नहीं मरी। मरने को अधर्म जानकर ही मैं मरने से बच गई। जिसके सहारे मैं उस मृत्यु के अधर्म से बची उन्हीं को छोड़ देने को मुझसे कहते हो? मैं नहीं छोड़ सकती। पापिनी हो सकती हूँ, पर उसके ऊपर क्या बेहया भी बनूँ? क्यों मुझे तंग करते हो?'' वह कोयले वाले के एहसान में उसे धोखा देकर नहीं जाना चाहती। उसे अपना देह-दान देकर स्त्राी धर्म निभाती है। कोयले वाली छोड़ देने पर भी वह अन्यों को अपना देह दान करती है। मृणाल में यौन एवं दाम्पत्य जीवन में नैतिक मूल्य होते हुए भी पर्याप्त अन्तर परिलक्षित होता है।

नारी अपने को मुक्त करने के लिए अनेक दुखों से ही वह अपना धर्म नष्ट करने के लिए तैयार होती है। जैनेन्द्र के दृष्टि में उनके उपन्यास में नारी पात्रा के लिए पतिव्रत और सतीत्व दो भिन्न धर्म है। इन दोनों में वे सतीत्व पर ही ज्यादा जोर देते है। इस पर डॉ. नंददुलारे वाजपेयी जी ने लिखा है- ÷जैनेन्द्र ने एक बार कहा था कि उनके सभी उपन्यासों की नारियाँ प्रतिव्रत और सतीत्व के द्वन्द्व की प्रतीक है। भारतीय आदर्श का उल्लेख करते हुए वे यह भी कहते है कि सतीत्व का आदर्श पतिव्रत के आदर्श से श्रेष्ठ है। उनकी नारियाँ एक ओर पति के प्रति वफादार होना चाहती है तो दूसरी ओर उनका सती धर्म उन्हें उन प्रेमियांें की ओर खींचता है जो देश के लिए संघर्षशील हैं। जैनेन्द्र का कदचित यह भी कथन है कि उनके नारी-पात्रा सतीत्व की भूमिका पर गढे+ गए है, पतिव्रत की भूमिका पर नहीं। वे परिस्थिति और आदर्श के बीच खड़ी है, परिस्थिति उन्हें पति की ओर झुकाती है, आदर्श उन्हें प्रेमी की ओर ले चलता है।' कल्याणी में विवाह एवं पतिव्रत की समस्या को उठाया गया है। कल्याणी का पति धन-लोलुप व्यक्ति है। वह उसके शरीर का सौदा करता है तो पत्नी अपने आपको एक इन्वेस्टमेंट मानती है और वह अपने पति से यह चाहती है कि पतिव्रत या डॉक्टरी किन्तु वह दोनों भी चाहता है।

कल्याणी में कुछ घुटन है जिसके कारण पति असरानी में सन्देह प्रवृत्ति को जन्म देकर जन-समाज में वह बार-बार प्रकट होती है और एक बात यह भी है कि डॉ. असरानी के मित्राों के साथ राय साहब और डॉक्टर भटनागर जैसों से कुछ आरोप काण्ड कल्याणी पर लग जाते है। खुलेआम कल्याणी का अपहरण का लाँछन लगाकर डॉक्टर भटनागर के घर जाकर कुछ तलाशी लेना, डॉक्टर भटनागर की पत्नी के सामने सड़क पर ही कल्याणी को जूतों से मारना और कल्याणी के पुराने मधुर सम्बन्धों को उठाकर प्रीमियर से कुछ आर्थिक उपलब्धियों का उत्साह योजन आदि ऐसे ही काण्ड सेक्स कामना की चीज+ बन सकती है। इस घटना से कल्याणी पर का विश्वास उड़ जाता है, कि उसे कामकाजी कहे, अन्य पुरुष मिथुन सम्बन्ध कहे, प्रेम सम्बन्ध कहे या उसे वेश्या कहे ऐसे अपवादों की बात पाठकों के सामने उभर आती है। किन्तु जैनेन्द्र जी कहते हैं- ÷÷स्त्राी अत्याचार अपने ऊपर मानकर अपने को जैसे पहले ही से अबला ठहरा लेती है। यह बात सही नहीं है। सृष्टि-बल में मनुष्य को प्रबल मान भी लो, लेकिन वाक्-बल में स्त्राी के आगे मनुष्य कोई भी चीज+ नहीं है। अर्थात् स्त्राी को यह भूल जाना चाहिए कि वह निर्बल है। निर्बल वह सचमुच नहीं है। मनुष्य रोना रोने सामने नहीं आता हैं, इतने ही से स्त्राी अपने बल को जानने में भूली रहे यह आवश्यक नहीं है।'' लेकिन ÷कल्याण' की कल्याणी सारे अपराध अपने पर ही बनने देने से पति का कुछ स्वार्थ होगा यह मतलब समझते हुए भी वह सारे दोष अपने पर ही लेती हैं। वह कहती है- ÷÷मैं ही तो दोष की जड़ हूँ। मेरे कारण डॉक्टर को धन की चाह है और मेरे ही कारण होंगे, तो प्रीमियर कर्तव्य-च्युत होंगे। ओ मुझे क्या प्रायश्चित काफी होगा?'' और वह यह भी कहती है कि मेरे कसूर सब माफ कीजिएगा। प्यार तन में जगता है, तन में से उपजता है और तन में ही रहता है। यह काम की प्रवृत्ति है किन्तु पति के साथ रहना चाहती है। परिस्थिति की सूक्ष्मता को समझकर पति पर छोड़ देती है। जैनेन्द्र की नायिकाओं पतिव्रत धर्म के परम्परागत संस्कार उनके अचेतन मन में इतने गहरे घसे है कि वे पति के प्रति उदासीन होने के विचार मात्रा से अपने को अपराधी पाती और अपने से पति को बिल्कुल अलग नहीं कर पाती है। ऐसे ही सुनीता, सुखदा, मृणाल, अनीता, वसुन्धरा, भुवनमोहिनी में यही प्रवृत्ति पायी जाती है। उनकी यौन प्रवृत्ति इस विवेक बुद्धि पर विजय पा जाती कि पति प्रति विश्वासघात करके उन्हें अपनी ही नज+रों में गिरने नहीं देती। पर वह प्रेमी को भी उतना समर्पित नहीं हो पाती कि वह मन से जितना चाहती। क्योंकि सुनीता का हरिप्रसन्न के प्रति, सुखदा का लाल के प्रति, भुवनमोहिनी का जितेन के प्रति तथा व्यतीत की अनीता का जयन्त के प्रति, वसुन्धरा का उपाध्याय के प्रति समर्पण है। ÷व्यतीत' में अनीता ब्याहता के एक दिन पहले कहती है- ÷क्रूर पापी खबरदार जो मुझे छुआ है और दूसरे दिन ही उच्श्रृंखल व्यवहार की क्षमा मांगते हुए कहती है- ÷÷जयन्त, रात की बात भूल जाना मैं सुध में न थी। अब सुध में हूँ मैं यह सामने हूँ। मुझ को तुम ले सकते हो।'' समूची को जिस विधि चाहों ले सकते हो तथा सुनीता के प्रति हरिप्रसन्न का प्रेम वेग दोनों हाथों से सुनीता को ....आलिंगन में बांँध लेना चाहता है तो तब वह कहती है- ÷÷मैं तो सदा तुम्हारी हूँ। फिर छिः छिः मेरे लिए प्रेम का यह आवेग कैसा? और ऐसा धीरज क्यों खोते हो? मुझे तनिक संभालने भी तो दो।''

यदि परिस्थितिवश, संयोगवश एवं नियति से दोनों का सहज मिलन होता हो यह दो देहों का व्यापार पाप नहीं बन सकता। यह तो यौन-सम्बन्ध का ऊहापोहात्मक स्वीकृति है। ऐसा ही प्रसंग हरिप्रसन्न एवं सुनीता के व्यवहार में मिलता है। किन्तु उपन्यासकार सुनीता के निर्वसन होने में तात्कालिक हरिप्रसन्न आशंकित होकर चट से मुड़ जाने की लेखक की यह खूबी है। उनके उपन्यासों की पात्रााएँ यौन-तृप्ति की जुगाड़ करती है। सच बात तो यह है कि औरत के लिए एक यौन-तृप्ति के यत्न से अधिक कुछ नहीं, क्योंकि शरीर तृप्ति ही उसकी असली चीज है। वहीं उसकी कुंजी है। जैनेन्द्र कुमार के उपन्यास की नायिका इसी को पाने के लिए तत्पर है। वह अपने को निष्फल बनाना नहीं चाहती। उनमें इसी बात का दर्द, कलह एवं तड़पन है। वह चलती-फिरती जि+न्दा लाश नहीं, बल्कि प्रकृति के मनमोहर दृश्य को तलाशना चाहती है। वह जानी-अनजानी पीड़ा एवं खुशी के द्वन्द्व के बीच अपना अस्तित्व ढूँढती है।

÷जो कामेच्छाओं को उत्तेजित या प्रोत्साहित करती हो', वह कानून की दृष्टि में अश्लील है। वस्तुतः कोई भी चीज+ स्वयं में अश्लील नहीं हुआ करती है। यों जैनेन्द्र का साहित्य (सुनीता या कोई और कृती) कामेच्छओं को प्रोत्साहित करने वाला नहीं है।' क्योंकि जैनेन्द्र ने स्त्राी-पुरुष के बीच बदलती हुई परिस्थितियों से मनुष्य में आत्म समर्पण की स्थिति पैदा करना चाहते हैं। समाज टूट रहा है, परिवार टूट जाता है और फिर जब व्यक्ति टूट जाता है तो तब क्या रहेगा, कौन बचेगा? चाहत के बिना विवाह अधिक काल तक नहीं टिक सकता। भावनाओं और वासनाओं का बाज+ार स्त्राी-पुरुष के मध्य स्थितियाँ और परिस्थितियाँ पैदा करना नहीं बल्कि उनके अपने एक-दूसरे के बीच के तत्त्व को प्राप्त करना पड़ता है। जो एक अस्तित्व को दूसरे अस्तित्व के बीच से वह तत्त्व अनिवार्य बनता हो तो उसे अपनाना चाहिए....

दक्षिण राज्यों में देवदासी प्रथा का प्रारम्भ दसवीं शताब्दी के आरम्भ में कर्नाटक से हुआ। जब हम विश्व के प्राचीन धार्मिक इतिहास को देखते है तो देवदासी प्रथा भारत में ही नहीं अपितु यूनान-मिस्र-बेबीलोन में भी दिखाई देती है। इसका कारण यह माना जाता है- देवदासी या वेश्या का अभ्युदय कहीं ग्रहविधानों, तो कहीं लौकिक या पारलौकिक ज्ञान और धर्म से जोड़कर कला के साथ इन दो धर्म के विकास के लिए हुआ था। ÷÷शताब्दियों तक देवदासियाँ पवित्राता की प्रतीक बनी रहीं, पर आते-आते प्राचीन काल में देवदासी प्रथा यहाँ के मन्दिरों में प्रारम्भ हुई, मन्दिरों में अभिलेखों में ÷÷पात्रााद्रवारू'' या ÷÷पावालकम'' शब्द मिलते है जो मन्दिरों को समर्पित युवतियों के लिए है।'' कर्नाटक के कुछ हिस्सों में ऐसी युवतियों के लिए ÷÷बासवी'' शब्द का प्रयोग किया जाता था। कालान्तर में ÷÷देवदासी'' शब्द का प्रयोग होने लगा। जो यल्लम्मा, दुर्गम्मा, महापूरताई, हुलगेम्मा, तायम्मा आदि जैसे मन्दिरों में देवी को समर्पित आज भी वह परम्परा नाचने गाने वाली, सेवा करने वाली, युवतियों के लिए किया जाने लगा है। ÷÷देवदासी'' शब्द से तात्पर्य उस कन्या से था जो देवदासी बनकर देवता को अर्पित होती और जीवन पर्यन्त मन्दिर के प्रांगण में देवता की सेवा में रहती थी। धार्मिक अन्धविश्वास और इसकी ओट में फायदा उठाते रहे पूजारी खुबसूरत कन्याओं को देवदासी बनाने के लिए बाध्य कर देते थे।

महाराष्ट्र में खण्डोबा को समर्पित की जाने वाली कन्या ÷मुरली' कहलाती है। यह भी देवदासियों की भाँति होती है एवं बेलगाँव की देवदासियाँ ÷जोगनी' कहलाती है। किन्तु जैनेन्द्र की नारी पात्रा आर्थिक लोभ के कारण पैसों की अधिक चाह होने के कारण वेश्या बनती है। रंजना के शब्दों में ÷÷माफ करना, रुपयों में यही बुराई है। वह सुधार का जिम्मा लेता और अपनी शर्त रखता है... क्या कह रही थी मैं, हाँ, धर्म। आज वह धर्म रुपया-धर्म, वैश्य धर्म है। राजधर्म भी वही है। राष्ट्र विनिमय पर चलते और फलते हैं। जो सौदें में बाजी ले गया। अर्थात् पुरुष गहरा व्यवसायी होगा। इसलिए आदर्श स्त्राी को भी गहन व्यवसायिनी बनना है। सुना वारांगना से यह आगे की चीज+ है। मज+ाक न समझ लेना। गहरे सोच-विचार से नतीजे पर पहुंँची हूँ और यह सब आप से इसलिए कह रही हूँ कि विवाह किसी अदालत से हमारे बीच से अभी टूटा नहीं है। यानी यह जो सात एक बरस बीते है, अनधिकृत बीते हैं। आप ताप-संताप उठाते रहे, फिर भी यह नहीं किया, इसके लिए मैं आपकी ऋणी हूँ। आशा करती हूँ कि आपकी सहानुभूति साथ है और मैं प्रयोग में आगे बढ़ सकती हूँ।'' अतः रंजना रुपयों की शर्त पर अपने पति से अलग रहकर वेश्यावृत्ति करती रही सात साल बीते हुए हैं। यह आर्थिक समस्या के कारण गहरे सोच-विचार से नतीजे पर पहूँची और वेश्या का पेशा करने लगी है। जैनेन्द्र कुमार वेश्यावृत्ति के मूल में स्त्राी को दोषी न मानकर पुरुष को ही दोषी ठहराते है। वे कहते है कि ÷समाज' में वेश्या को स्थान तो अर्थवृद्धि होने पर ही आरम्भ हुआ था।....उजरत और कीमत देकर जब भोग के लिए नारी को प्राप्त करते हैं, तभी तो उसे वेश्या कहते है। कीमत पैसे के रूप में चुकाने की विधि ही न हो तो वेश्या की स्थिति नहीं बन सकती।' वेश्यावृत्ति के संदर्भ में यह ज्ञात होता है कि पुरुष की कामुकता ही नारी को विवश करता है।

जैनेन्द्र वेश्या उसे मानते है- ÷÷वेश्या वह नहीं है जो अनेक को प्रेम करती है। वेश्या वह है, पैसे के एवज में अपने को देती है।'' जो पैसे के लिए पेशा करती है उसे जैनेन्द्र वेश्या सम्बन्धी गम्भीर उस सत्य को स्वीकार करते हैं। क्योंकि वह अर्थ के लिए अपने को देती है। उसका कारण समाज में व्याप्त गरीबी और निर्धनता से विवश होकर अनेक वेश्याओं का अर्विभाव होता है। जब मनुष्य नारी की मनोवैज्ञानिकता को समझने का प्रयास करेगा, तब अवश्य ही नारी पर का शोषण एवं अत्याचार कम होते जायेगा। उसकी मजबूरी क्या है? वह लाचार एवं विवश है तो उसे मनोवैज्ञानिक दृष्टि से सोचे समझे चाहे उचित हो तो उसे अपना ले या मदद करें। अबला नारी की मजबूरी होने के कारण हर पल उसके बारे में उचित ही सोचना ठीक होगा। क्योंकि स्त्राी एक जीवन है। वह आनन्द, जोश एवं एक सुन्दर सपना भी है।

सन्दर्भ ग्रन्थ सूची-



१. जैनेन्द्र कुमार, दशार्क, पृ. ५१

२. बट्रेण्ड रसेल, विवाह और नैतिकता, पृ. १५०

३. जैनेन्द्र कुमार, त्यागपत्रा, पृ. ५१

४. वही, पृ. ५१

५. वही, पृ. ५७

६. वही, पृ. ४२

७. डॉ. नन्ददुलारे वाजपेयी, नया साहित्य, नये प्रश्न, पृ. २६०

८. जैनेन्द्र कुमार, काम, प्रेम और परिवार, पृ. ११२

९. जैनेन्द्र कुमार, कल्याणी, पृ. १२६

१०. जैनेन्द्र कुमार, व्यतीत, पृ. १६६

११. जैनेन्द्र कुमार, सुनीता, पृ. २४२

१२. डॉ. राजेन्द्र मोहन भटनागर, जैनेन्द्र कुमार और उनका साहित्य, पृ. ५३

१३. विद्याभास्कर श्री सच्चिदानंद शास्त्री, नारी दर्पण, पृ. २८

१४. जैनेन्द्र कुमार, दशार्क, पृ. ५१

१५. जैनेन्द्र कुमार, समय और हम, पृ. ३४५

१६. वही, पृ. ३५१



हिन्दी रंगमंच के अग्रदूत मोहन राकेश

डॉ. गिरीश सोलंकी



हिन्दी रंगमंच विविध राजनीतिक, साहित्यिक एवं सांस्कृतिक कारणों से अभी तक अपनी परिपक्वावस्था तक नहीं पहुँच सका है। हिन्दी रंगमंच में हमें दो रूप मिलते है-

१. लोक नाट्य साहित्य को प्रस्तुत करने वाले रंगमंच

२. साहित्यिक नाटकों को प्रस्तुत करने वाले रंगमंच

यहांँ हमारा ताल्लुक साहित्यिक हिन्दी में लिखे गए नाटकों के रंगमंच से हैं। हिन्दी में लिखे गए नाटकों के आधार पर निम्नलिखित कालों में विभाजित किया जा सकता है-

१. भारतेन्दु पूर्व का हिन्दी रंगमंच

२. भारतेन्दु युगीन हिन्दी रंगमंच

३. द्विवेदी युगीन हिन्दी रंगमंच

४. प्रसाद युगीन हिन्दी रंगमंच

५. स्वातंत्रयपूर्व हिन्दी रंगमंच

६. स्वातंत्रयोत्तर हिन्दी रंगमंच

भारतेन्दुपूर्व हिन्दी रंगमंच को इन दो भागों में विभाजित करते हैं-

अ. साहित्यिक नाटकों के रंगमंच

ब. पारसी रंगमंच

साहित्यिक नाटकों के रंगमंच में आगा हसन लिखित ÷इन्दरसभा' और पंडित शीतलप्रसाद लिखित ÷जानकी मंगल' उल्लेखनीय रचना है। इनमें ÷इन्दर सभा' रंगमंचीय नाटक था। इनकी रचना १८५३ ई. में हुई थी यह एक भिन्न नाटक के रूप में प्रसिद्ध है। इसका रंगमंच बहुत अव्यवस्थित, अपूर्व और अश्लीलता लिए हुए था। भारतेन्दु इसी से बहुत ही विक्षुब्ध हुए थे। यद्यपि जानकी मंगल का अभिनय करने का प्रयास किया गया था लेकिन वह रंगमंच की दृष्टि से सफल नहीं हैं।

पारसी रंगमंच भारत में अंग्रेजों के आगमन से शुरू हुआ था। इस रंगमंच का प्रयास इग्लैण्ड में बहुत जोरों से हुआ था और विकसित भी हुआ। उनकी प्रेरणा और प्रयास से भारत में कुछ पारसियों के प्रयास से उनकी नए ढंग से इस रंगमंच की स्थापना की गई। उनके प्रयासों से बहुत सी थिएट्रिकल कंपनियाँ खुली जिसमें मनोरंजन-नाटकों के अनुकूल रंगमंच का विकास किया गया। इन कम्पनियों में अल्फेड थिएट्रिकल कम्पनी, न्यू अल्फेड थिएट्रिकल कम्पनी, कारथ्रिएन विक्टोरिया थिएट्रिकल कम्पनी तथा एलेग्जेन्ड्रीया कम्पनी विशेष प्रसिद्ध थी। उन सारी कम्पनियों की स्थापना सन् १८७० से १९२० ई. के आसपास हुई थी। उन सब कम्पनियों का प्रमुख उद्देश्य जनरुचि को तृप्त करके पैसा कमाना था। जिसका परिणाम यह हुआ कि इन्होंने जो नाटक प्रदर्शित किये वे साधारण कोटि के उत्तेजक नाटक थे। जिनमें खंजर, खंजा, खूबसूरत औरत, पंजाब मेल इत्यादि। इन्होंने कुछ प्राचीन नाटकों को भी रंगमंच पर दिखाने की कोशिश की किन्तु पैसा कमाने की कामाना में वे सफल नहीं हुए।

भारतेन्दु स्वयं इस समय के रंगमंच से काफी क्षुब्ध रहते थे उन्हीं प्रतिक्रिया के रूप में उन्होंने साहित्यिक नाटक मंडली की स्थापना की और साहित्यिक नाटकों का सफल अभिनय किया। उसी की प्रेरणा से हिन्दी रंगमंच में नई चेतना का संचार हुआ और बड़े-बड़े नगरों में बहुत सी नाट्य मंडलियाँ की भी स्थापना हुई जैसे कि बलिया, प्रयाग, मेरठ, कानपुर मंडलिया स्थापित हुई जिनका उद्देश्य व्यवसाय न होकर अभिनयकला का विकास करना रहा था। किन्तु ये बाद में द्विवेदीजी के शुष्क प्रवृत्ति के आगे इन नाटक मंडलियाँ आगे बढ़ न सकी। इसी बीच प्रतिभाशाली नाटककार प्रसाद का उदय हुआ।

प्रसाद के नाटकों के विषय के संदर्भ में नाट्य मंडलियों की यह धारणा थी कि ये नाटक अभिहित नहीं हो सकते है किन्तु बनारस में चन्द्रगुप्त नाटक का सफल अभिनय सन् १९३४ में किया गया। इसके अभिनय में नगर की अन्य मंडलियों का भी सहयोग रहा। तत्कालीन समय में प्लेटो, विगोसीन, सीनरियों, टेम्पो, ट्रोक्सीनों आदि का बोलबाला था। उसी मंच पर दृश्यान्तर गत दृश्य प्रदर्शन का भी विधान रहता था। सीन ट्रासकर के द्वारा कलात्मक चित्राों के प्रदर्शित करने की व्यवस्था भी थी। नृत्य, गान आदि की अच्छी संगति रहती थी।

इस प्रकार प्रसाद युगीन रंगमंच साधना सम्पन्न न होते हुए भी विकास की ओर उन्मुख था। प्रसाद जी रंगमंच के कामकाज इतने संतुष्ठ न थे। इसी कारण कहा था हिन्दी का कोई अपना रंगमंच नहीं है। जब उसके पनपने का अवसर था, तभी सस्ती भावुक्ता लेकर वर्तमान सिनेमा में बोलने ेवाले थियेटर्स का उदय हो गया। फलतः अभिनयों का रंगमंच नहीं-सा हो गया। साहित्यिक सुरुचि पर सिनेमा ने ऐसा धावा बोल दिया कि कुरुचि को नेतृत्व करने का पूर्ण अवसर मिल गया। मण्डलियाँ कभी-कभी साल में एक-दो बार वार्षिकोत्सव मनाने के अवसर पर कोई अभिनय कर लेती है। पुकार होती है आलोचकों की हिन्दी में नाटक के अभाव की। रंगमंच नहीं है ऐसा समझने का कोई साहस नहीं करता।

अब हम सीधे मोहन राकेश के रंगमंच से जुड़े तो वे अपने ÷आषाढ़ का एक दिन' नाटक की भूमिका में कहते है कि हिन्दी रंगमंच की हिन्दी भाषी प्रदेश की सांस्कृतिक पूर्तियों और आकांक्षाओं का प्रतिनिधित्व करना होगा, रंगों और राशियों के विवेक को व्यक्त करना होगा हमारे दैनदिन जीवन के रागरंग को प्रस्तुत करने के लिए हमारे संवेदों और स्पदंनों को अभिव्यक्त करने के लिए जिस रंगमंच की आवश्यकता है वह पाश्चात्य रंगमंच से कहीं भिन्न होगा।

उपर्युक्त निवेदन से यह बात भी स्पष्ट है जिस बात से प्रसाद पीड़ित थे वही बात राकेश जी को भी खलती थी। पर वहांँ वे रुके नहीं आगे बढ़े नाट्यकार के दायित्व सबसे ऊपर है उसी के समर्थन की एक नई रंगदृष्टि तलाश की। उन्होंने रूढ़ियों को तोड़ा और रंगमंच के बारे में नये सिरे से शुरुआत की। साहित्यिक तत्त्व अक्षुण रखते हुए रंगीय क्रिया व्यापार अपने नाटकों नये प्राण की सृष्टि की।

÷आषाढ़ का एक दिन' में मेघ के बदलते रंग रंगमंच पर एक पूरी कविता रच डालते है। उसमें सच्चे अर्थों में रंगमंच के कवि दिखाई देते हैं। वह काव्य भाषा से नहीं वरन् स्थितियों से निर्मित हैं। इस तरह पूरी तरह रंगमंच का काव्य है जो शब्द पर निर्भर तो है पर उसके साथ-साथ पात्रा की स्थितियों, मनः स्थितियों मंचीय उपकरणों और प्रतीकों और बिम्बों पर भी आश्रित है। उदाहरण के लिए कालिदास और मल्लिका और विलोम की नाट्य स्थिति एक ओर प्रेम की रसासिक्ति तो दूसरी ओर संघर्ष अथवा विवशता की पीड़ा में नाट्यकीय ही नहीं प्रेक्षक के लिए समसामयिक आस्वाद देने वाली भी हैं।

इसी प्रकार लहरो के राजहंस नाटक में कामोत्सव का आयोजन श्यामांग प्रलाप, मृग-प्रकरण नेपथ्य में बौद्ध भिक्षुओं का समवेत स्वर, सुन्दरी का प्रसाधन, नन्द का मुडिर सिर लौटना सब अद्भुत भावसृष्टि करते है।

अनुभूति की इसी प्रधानता के काव्य इन दोनों नाटकों की आत्मा काव्यमयी हो गयी है।

आधे अधूरे भी एक ऐसा नाटक है जिसमें कथ्य के अनुरूप अंधेरे बंद कमरे का प्रभावशाली बिम्ब बिलकुल प्राकृतिक परिवेश से कटकर उभरता है क्योंकि सारा नाटक घरेलू है। ये नाटक अन्त में पात्रा और परिवेश को लेकर जो रंगीय बाह्यता उभारता है- फाइलें झाड़ना, कैची से तस्वीर काटना, कार्टून बनाना तुतलाना या हकलाना, पैन्ट में कीड़े घुसने का नाटक करना जैसे सामान्य घिसी-पिटी रंगचर्याओं और रंगीयतावादी दृष्टि से अपूर्व प्रभाव छोड़ जाती है- लौटता हुआ महेन्द्रनाथ वर्षा में मल्लिका के घर से निकलता कालिदास और बांँह छुड़ाती पत्नी की उपेक्षा से आहत नन्द आदि उदाहरण रंगमंच पर अपनी छाप छोड़ जाते हैं।

उनके नाटकों में दृश्यों के बहुलता नहीं है। एक अंक और दूसरे अंक के बीच काल का व्यवधान भी अधिक नहीं है। इस प्रकार राकेश जी नाट्य स्थितियों, पात्रा के द्वन्द्व और उसकी भाव भंगिमाओं और बदलती आकृतियों और संवादों को ढालने में कुशल है। उसके नाटकों में शब्द रूप दृश्यरूप से अनुरूप है और वे सभी नाटकीय तत्त्वों का सफल प्रयोग कर दिखाते हैं।

हिन्दी नाटक साहित्य में भारतेन्दु हरिश्चन्द्र और जयशंकर प्रसाद के बाद यदि कोई नाम लीक से हटकर है तो वह है मोहन राकेश जी। हिन्दी नाटक को विशेषकर नये रंग संकेत देने का गम्भीर सम्बल मोहन राकेश के नाटकों में देखा जाता है। मोहन राकेश ने नाटक को अंधेरे बन्द कमरों से बाहर निकाला और उसे युगों के रोमानी रंग में डुबाकर एक नए दौर के साथ जोड़ने का कार्य किया। मोहन राकेश सिर्फ हिन्दी के नाटककार न रहकर पूरे भारतीय नाट्य प्रवृत्तियों के परिचायक बन गयें। उन्होंने हिन्दी नाट्य-साहित्य को भारतीय स्तर की ही नहीं अपितु विश्व साहित्य के नाट्य साहित्य की धारा के साथ जोड़ती हैं। वैसे भी आधुनिक नाटक की बात करते हैं तो नाटक न किसी भाषा का रह जाता है न किसी देश का।

राकेश जी ने हिन्दी नाटक को नई जमीन पर खड़ा कर दिया जो उन्होंने स्वयं ने जमीन तलाशी थी। उनके पूर्ववर्ती प्रयोगधर्मी नाट्यकारों- लक्ष्मीनारायण, जगदीशचन्द्र माथुर, उपेन्द्रनाथ अश्क, लक्ष्मीनारायण लाल, धर्मवीर भारती आदि जिन विश्वजनीन चेतना को अग्रसर किया था उसका विकास क्रम मोहन राकेश में देखा जा सकता है जिन्हें हम आधुनिक भाव बोध का नाम भी दे सकते हैं। जिनमें हम यथार्थवाद, प्रकृतिवाद, प्रतीकवाद, अभिव्यक्तिवाद, एपिक थियेटर या अतियथार्थवाद या असंगतवाद आदि अनेक मत-मतान्तरों में देखा है। मोहन राकेश के नाटकों ने नाटक की क्षेत्राीय और देशीय परिसीमाओं तोड़कर विश्वभर की समान्तर प्रवृत्तियों के रूप में उभरी है। वही उनके नाटकों की समस्त देशीप्त के बावजूद भी एक सामान्य पृष्ठभूमि के रूप में सामने आयी। वस्तुतः यह समान जीवनानुभूतियों। और मानवीय स्थितियों के बीच नाटक के ने एक ऐसा सामान्य स्वरूप ग्रहण किया जो सारे विश्व को आकर्षित किया और कालान्तर में इसका प्रभाव भारत पर भी पडे+ बिना न रहा।



सहायक ग्रन्थ-

१. गोविन्द चातक, आधुनिक हिन्दी नाटक, अग्रदूत- मोहन राकेश

२. डॉ. लक्ष्मीनाराण लाल, पारसी हिन्दी रंगमंच

३. डॉ. बसन्त कुमार परिहार, मोहन राकेश के साहित्य में सामाजिक यथार्थ

४. मोहन राकेश, लहरों का राजहंस

५. मोहन राकेश, आषाढ़ का एक दिन

६. वही, आधे अधूरे

Friday, December 24, 2010

राष्ट्रीय एकता और आधुनिक हिन्दी ग़जल

डॉ. सादिक़ा नवाब सहर



ग़जल हमेशा से ही विचारों के आदान-प्रदान का लोकप्रिय माध्यम रही है, बड़ी बात को कम शब्दों में गहराई तक पहुँचाने वाली और अब तो ग़जल केवल भारत ही नहीं बल्कि विश्व की अनेक भाषाओं में अपनी पहचान रखती है।

आज का युग उन सपनों के साकार होने का युग है जिसे हमारे पूर्वज एक लम्बे समय के संघर्ष के समय से देखते आ रहे थे। हजारों साल की संयुक्त संस्कृति और राष्ट्रीय एकता का प्रतीक भारत, अंग्रेजों के नफ़रत के शासन काल से लहू में तरबतर बाहर निकल आया। ग़जल के शायर ने दुआ की-ख्ुदा करे कि ये दस्तूर साज-गार आए/जो बेक़रार हैं अब तक उन्हें क़रार आए।/नुमायशी ही न हो ये निजामे-जम्हूरी/हक़ीक़तन भी ज+माने को साज+-गार आए।''

भारत के इतिहास से लक्ष्मण, भरत, रजिया सुलताना, भगत सिंह, गुरुनानक, वाजिद अली शाह अख्तर आदि जैसे व्यक्ति हमारी साझा संस्कृति और परम्पराओं के प्रतीक के रूप में हमारी ग़ज+ल की विरासत बने। स्वतंत्राता के बाद भी गाँधीजी, सरोजिनी नायडू, जवाहर लाल नेहरू और मौलाना आजाद हीरो के रूप में हमारी कविता तथा ग़जल को आकर्षित करते रहे।

हमारे ग़जलकारों ने अपने युग की अपने देश की जनता की इच्छाओं, आकांक्षाओं, आरजूओं, हसरतों का चित्रा ख्ूब खींचा है। समस्याओं की ओर हल्के-हल्के इशारे किए और उनका हल ढूंढने निकलने का प्रयत्न किया।

कमोबेश हर कवि अपनी शायरी की इब्तिदा रोमानियत से करता है। कुछ आवारा-मिजाज तथा लज्जत-परस्त अपनी प्रतिभा का रुख् मोड़ देते है, तो कुछ इस मामले में सतर्क रहते हैं।

सूर्यभानु गुप्त का यह शेर इसी सतर्कता की मिसाल है- चाँद-दरिया, चश्मेतर जिंदगी,/ख्ूबसूरत ग़मों का सफ़र जिंदगी।''

वास्तव में ग्जल में कवि के जीवन के बेहतरीन क्षणों का प्रभाव जि+न्दा रहता है। पेट भरने के लिए जब ग़ज+ल बाज+ार में लाना पड़ता है तो कवि चिल्ला उठता है-÷÷मैं ने जो गीत तेरे प्यार की ख्ातिर लिखे/आज उन गीतों को बाजार में ले आया हूँ।''

आधुनिक काल में साकारात्मक राष्ट्रीय तत्त्वों के वास्तविक शत्रुओं की निशानदेही करने का फ़जर् भी उन कवियों ने निभाया है......तथा साहित्य के स्तर पर जनता की उमंगों, इच्छाओं तथा आकांक्षाओं को आईना दिखाया है। समाजवाद की हिमायत भविष्य पर विश्वास, जनता पर भरोसा तथा अंतर्राष्ट्रीय वातावरण में शोषण के विरुद्ध लड़ने वालों से जुड़ाव लगाव समाज के शोषित-दमित वर्ग की समस्याओं को उजागर करना और जनता के हित के विरुद्ध काम करने वाली शक्तियों का भांडा-फ़ोड़ आज के ग़जलकार के प्रमुख विषय हैं। उदाहरण स्वरूप- पद्मश्री गोपालदास नीरज' जिन्होंने ग़जल को गीतिका' का नाम दिया है, अपनी ग़जलों के माध्यम से समाज के यथार्थ को प्रदर्शित करके क्रांति लाना चाहते है। उनका यह शेर देखिए जिसमें उन्होंने भारत की दुर्दशा का मातम यों किया है- ÷÷ज्यों लूट ले कहार ही दुल्हन की पालकी/हालत यही है आजकल हिन्दोस्तान की''

आधुनिक ग़ज+लकार अब अरूजी पाबंदियों की ओर ध्यान देने लगे है किंतु कहीं-कहीं इसे तोड़ते भी रहते है कि विचार बंधनों में समा नहीं पाते। मिजर् ग़ालिब को भी कुछ ऐसी ही शिकायत थी। कहते हैं- ÷बक़द्रे-जौक़ नहीं जर्फ़े-तंगनाए-ग़जल'

हमारी साझी परम्पराएँ और साझे नेता भारतीय संस्कृति का प्रतीक बनकर हिन्दुस्तानी ग़ज+ल को एकता और अखंडता का प्रतिनिधि बनाती है। महात्मा गाँधी गौतमबुद्ध, भगतसिंह हों या ताजमहल, अजंता-एलोरा.....भारतीय संस्कृति की साझी पूंजी हैं।

दुष्यंत कुमार से पहले हिन्दी ग़जल में फ़ारसी भाषा के शब्दों, बिम्ब और प्रतीकों एवं दृष्टांतों का बहुतायत के साथ प्रयुक्त किया जाता था। दुष्यंत कुमार को हिन्दी ग़जल में फ़ारसी शब्दों को कम करने का श्रेय मिलता है। साथ ही साथ हिन्दी के सरल शब्दों, प्रतीकों आदि के प्रयोग से उन्होंने हिन्दी ग़जल में भारतीय वातावरण का निर्माण किया। जिससे भारतीय और विशेषकार हिन्दी भाषा-भाषी ग़जल का आनंद ले सकें। भारतीय परिवेश, सभ्यता और संस्कृति यहाँ तक कि ऋतुएँ, पेड़-पौधों का चित्राण दुष्यंत कुमार ने अपनी ग़ज+लों में कुछ इस प्रकार किया है कि वह अजनबी या ठूँसा हुआ नहीं लगता- ÷÷अब तो इस तालाब का पानी बदल दो,/ये कँवल के फूल कुम्हलाने लगे हैं।'' या ÷÷तूने ये हरसिंगार हिलाकर बुरा किया,/पँवों की सब ज+मीन को फूलों से ढँक दिया।''

दुष्यंत कुमार ने हिन्दी ग़ज+ल का संस्कार दिया। वरना आज भी हिन्दी ग़ज+ल घिसे-पिटे लहजे में परंपरागत विषयों से जुड़ी रहती है। दुष्यंत कुमार ने हिन्दी ग़ज+ल को जीवन और उसके यथार्थ से जोड़ा। उसे स्वतंत्रा अस्तित्व दिया। भोगे हुए यथार्थ को अपनी गहरी संवेदना के साथ रूपायित करने का हुनर दिया। हिन्दी के मुहावरे, लोच, गति और प्रवाह दिया। उसे नए आयाम और शिल्प दिये और हिन्दी ग़ज+ल को उनकी यही सबसे बड़ी देन है।

आधुनिक युग के कवि दुष्यंत कुमार के नक्+शे-क़दम पर चल पड़े और उर्दू साहित्य की लोकप्रिय तथा शताब्दियों से बरती-बरताई विधा ग़ज+ल की प्रभावोत्पादकता, गेयता, समर्थता, लोच और स्मरणीयता से आकर्षित हुई। ग़ज+ल में आत्मसंघर्ष और अंतर्द्वन्द्व से भरे अनुभवों को समाहित कर दिया और कथ्य और शिल्प दोनों ही के माध्यम से दुधारी तलवार का काम लिया। आधुनिक जनजीवन के गहरे स्वरूप को रूपायित करने की ग़ज+ल में क्षमता पाकर वे ग़ज+ल की ओर आकर्षित हुए।

सर्वहारा वर्ग के दैनिक जीवन से जुड़ी हुई तकलीफ़ों, दहशत और शंकाओं, क़ानून, न्याय की गड़बड़ियाँ जीवन-मूल्यों का हनन, बलिष्ठ व्यवस्था और सामाजिक विषमता को आज के युग के ग़ज+लकार ने कुछ इस प्रकार आशावादी स्वरों में और भविष्य के प्रति आश्वासित होकर प्रस्तुत किया कि उनका स्वर युग का स्वर बन गया -÷÷बन्द पलको, तुम्हीं दीखते, सूरदासी नयन हो गये,/प्रेम जब ऊर्ध्वगामी हुआ, गेरुए सब वसन हो गये।''

भारत में ग़ज+ल का इतिहास दीर्घ है और अब वह इतनी संपन्न हो चुकी है कि प्रेमानुभूति प्राकृतिक वर्णन, राजनीति, समाज, नीति, अर्थ, चरित्र इत्यादि से संबंधित विभिन्न विषयों को बड़ी सरलता के साथ अपने में समाहित कर लेती है। हिन्दी ग़ज+ल और उर्दू ग़जल के मिजाज में अंतर नजर आता है बल्कि कुछ लोगों का यहाँ तक विचार है कि हिन्दी ग़जल का मिजाज उर्दू ग़ज+ल की भाँति ÷÷नाजुक नहीं है बहुत कठोर है।'' (काल तुझ से होड़ है-शमशेर बहादुर सिंह, पृ.२७-२८)

इसका उत्तर यों है कि एक स्थान पर पहुँचकर हिन्दी और उर्दू ग़जल एक ही दिखाई देने लगती हैं। तेरहवीं शताब्दी में ÷अमीर ख्ुसरो' और चौदहवीं में ÷कबीर' के बाद हिन्दी ग़ज+ल रीतिकालीन श्रृगारिकता में खो गयी किन्तु उर्दू ग़ज+ल निरंतर लिखी जाती रही और मध्ययुगीन दरबारों में पलने के कारण उसमें रीतिकालीन दोहों की श्रृंगारिकता और अलंकारिता आने से वैसी ही नजाकत सौंदर्य और प्रेम-संबंधी सूक्ष्म अनुभूतियों की पीड़ा और कसक दृष्टव्य होती रही। उसमें युगबोध की झलक पहले कम और आजकल अधिक दिखाई देने लगी है -÷÷तुम्हारी फ़ाइलों में गाँव का मौसम गुलाबी है-मगर ये आंकड़े झूठे हैं ये दावा किताबी है।/रोज बढ़ते रहते हैं कुछ मकान बस्ती में,/रोज घटता रहता है आसमान बस्ती में।''

दुष्यंत कुमार के रूप में हिन्दी ग़जल को मसीहा मिला। उनकी आम बोलचाल की भाषा और समसामयिक कविता के प्रभाव में समाज और राजनीति पर तीखे व्यंग्य प्रहार की विशेषताओं को ऐसी लोकप्रियता प्रदान हुई कि पूर्ववर्ती कवियों ने न केवल हिन्दी में ग़ज+लों का एक ख्जाना जमा कर लिया बल्कि अधिकाशतः दुष्यंतजी को ही भाषा और कथ्य संबंधी विशेषताओं को सीने से लगाए रखा।

आज ग़जल पत्र-पत्रिकाओं के योगदान से,ग़जल-संग्रहों और ग़जल-गायकी के कारण पर्याप्त संवेदनाशील विधा हो चुकी है। उसमें और व्यापकता और प्रभाव की गुंजाइश है। अभी संभावनाएॅं बाक़ी है।

अभी हिन्दी ग़जल में एक विशेष दृष्टिकोण ही अधिक उभर पाया है और वह है राजनैतिकता और सामाजिक विसंगतियों पर प्रहार करने का दृष्टिकोण। वास्तव में हिन्दी ग़जल को आधुनिक काल में पुनर्जन्म मिला। इसीलिए उसमें नयी परंपराएं आधुनिक काल से अधिक जुड़ी हुई दिखाई देती हैं। आज किसी भी भाषा की ग़ज+ल ही नहीं, साहित्य की कोई भी विधा तीखे और इंक़लाबी स्वर को अपनाए बिना नहीं रह सकती।

चन्द्रसेन विराट कहते हैं- ÷÷भेद कुल खुल गया वह सूरत हमारे दिल में है,/देश को मिल जाये जो पूँजी तुम्हारी मिल में है।''(आरोह, हिंदी ग़ज+ल में, आलोक भट्टाचार्य, पृ.३३)

हिन्दी की तरह उर्दू और अन्य भारतीय तथा विदेशी भाषाओं में ग़ज+ल ÷÷बैठे रहें तसव्वुरे-जानाँ किए हुए'' की कल्पना को छोड़कर बदलते हुए परिवेश और परिस्थितियों की ओर लौट आयी है। यदि वह ऐसा नहीं करेगी तो परिवर्तनशील परिस्थितियों में अपनी मौत आप मर जायेगी।

हिन्दी ग़ज+ल के क्षेत्रा में दुष्यंत कुमार का लहजा आज भी अन्य हिन्दी ग़ज+लकारों के स्वर में छलकता दिखाई देता है। दुष्यंत कुमार के आंदोलनात्मक व्यक्तित्व के बाद हिन्दी ग़ज+ल में एक और बहुत बड़े इंक़लाब की आवश्यकता है और वह आधुनिक ग़ज+लकार ही लायेंगें।

हिन्दी ग़जल में उर्दू भाषा के ही शब्द नहीं दिखाई देते बल्कि हिन्दी का एक बड़ा शब्द भंडार उर्दू भाषा और काव्य में घुल-मिल गया है। हिन्दी और उर्दू भाषाओं एक-दूसरे के सामीप्य के संबंध में विश्व के अनुपम उदाहरण है। विश्व की अन्य कोई भाषा दूसरी किसी भाषा से उतना साम्य नहीं रखती, जितना कि उर्दू और हिन्दी रखते हैं। जाने-अनजाने दोनों भाषाएं एक-दूसरे से आकर्षित रही है।

राजेश रेड्डी का शेर देखिए- ÷÷मेरे दिल के किसी कोने में इक मासूम-सा-बच्चा,/बड़ों की देखकर दुनिया बड़ा होने से डरता है।''

यह लबो-लेहजा राष्ट्रीयता के शरीर में प्राण भर देता है।

हिन्दी ग़ज+ल में नए मूल्य, नए परिवेश, नए दृष्टिकोण और नए विषय वस्तु का समावेश अनिवार्य है। पत्र-पत्रिकाओं में छपने वाली ग़जल विधा के संदर्भ में नयी संभावनाओं की ओर संकेत करती है। आवश्यकता है तो बस छंद अनुशासन की। इस ओर स्वस्थ क़दम उठाना भी जरूरी है, क्योंकि ग़जल का अपना व्याकरण है जिसमें शेर, रदीफ़, क़ाफ़िया, वज्न आदि का पालन करना आवश्यक हैं। ÷मिजर् ग़ालिब' जैसे महान् ग़जलकार भी ग़जल के लिए एक उस्ताद की आवश्यकता अनुभव करते हैं। नवोदित ग़जलकारों को ग़ज+ल विधा आसान-सी प्रतीत होती है। इसीलिए तुरन्त क़लम उठाकर ग़जलें लिखना आरंभ कर देते हैं।

ग़ज+ल की कला बहुत अभ्यास चाहती है। ÷अमीर मीनाई' ठीक ही कहते हैं- ÷÷सौ शेर एक जलसे में कहते थे हम अमीर/जब तक न शेर कहने का हमको शऊर था।''

इसी अभ्यास ने आज के लोकप्रिय कवियों के शऊर को निखारा है।

महिला ग़जलकारों की संख्या बहुत कम है। उन्हें उचित प्रोत्साहन नहीं मिला कुछ समाज के बंधन और कुछ लोकलाज का डर, कुछ घर-परिवार की बंदिश स्त्रियाँ अपनी प्रतिभा को खुलकर प्रस्तुत नहीं कर पातीं। परतुं इनकी ग़जलों में जिनमें भाव की सच्चाई, अभिव्यक्ति की सादगी, सौंदर्य और ताजगी और स्त्री के अनुभव दिखाई देते हैं। वे जीवन में आशावादी दृष्टिकोण और सुंदर भविष्य की इच्छा को महत्त्व देती है इनका चिंतन संगठित है। एलिजाबेथ कोरियन ÷मौना', डॉ. ममता आशुतोष शर्मा, डॉ. राजकुमारी शर्मा ÷राज+', रंजना श्रीवास्तव ÷रंजू', डॉ. सादिक़ा नवाब ÷सहर' यानी ख्+ााकसार, मरियम ग़ज+ाला, डॉ. साधना शुक्ला, कृष्णाकुमारी, शैलजा म.न. नरहरि, उमा श्रीवास्तव की कोशिशें जारी हैं।

जैसे कि शैलजा नरहरि का शेर देखिए-

÷÷मोहब्बत में असर इतना नहीं था

वो दीवाना तो था लगता नहीं था।''

÷÷ऊँचे क़द की महत्ता न समझा

सके ख्+ाुद ही बौने हुए जग हँसाई हुई।''

(साधना शुक्ला)



÷÷एक चिनगारी छिपाने के लिए

राख बनती जा रही है जि+न्दगी।''

(रंजना श्रीवास्तव ÷रंजू')



÷÷आँखों को ज+रा खोलो, ढूँढो शिवा कहाँ?

हमको तो दीखता है रब से भरा जहाँ।''

(ममता आशुतोष शर्मा)



÷÷कौन बनवा सकेगा ताजमहल,

अब कहाँ अैसे चाहने वाले।''

(उमा श्रीवास्तव)



÷÷उसने चाहा नहीं मगर अै ÷राज+'

सच उभरकर ज+बान पर आया।''

(राजकुमारी शर्मा ÷राज+')



÷÷दुःख तो बहुत हुआ है मगर फिर भी जाने क्यों

चूमा है दिल के दाग़ को मैंने कभी-कभी।''

(सादिका नवाब ÷सहर')

राष्ट्रीय भावना एक मानसिक अनुभूति है। अनेकता में एकता की भावना अपने देश भारत की विशेषता रही है। भारत अनेक धर्मों, जातियों, और भाषाओं का देश है। इन परिस्थितियों में अपने राष्ट्र को एक सूत्रा में बाँधे रखने के लिए सभी धर्मावलम्बियों में देशप्रेम और साम्प्रदायिक सद्भाव की भावना का होना आवश्यक ही नहीं, अनिवार्य है।

राष्ट्रीयता की भावना का आधार पारस्परिक सहानुभूति है। यह भावना व्यक्ति या समुदाय से राष्ट्र के प्रति सर्वोपरि कर्तव्य निष्ठा का अर्पण कराती है।

आज हमारी राष्ट्रीय भावना को एक ख़तरा सम्प्रदायवाद से है। देश में जब धर्मान्धता बढ़ती है तो देश की एकता तथा सामन्जस्य को गहरा आघात पहँुचता है। कुर्सी के लालच में यह सब हो रहा है। अपने राजनैतिक स्वार्थों के कारण कुछ राजनेताओं ने धर्म की आड़ में देश की अखण्डता और साम्प्रदायिक सौहार्द को कट्टरपंथियों से मिलकर चोट पहुँचाई है। चंद्रसेन विराट जैसे सशक्त ग़ज+लकार, अपनी मुक्तिकाओं में देश की साम्प्रदायिक विद्रूपताओं का सजीव चित्राण किया है,

-÷÷पंथ, अखाडे+, सम्प्रदाय या फ़िरक़ों की पग-पग खिंची लकीर हमारी बस्ती में'' (न्याय कर मेरे समय पृ. १७)

राष्ट्रीयता के प्रबल समर्थक, भाषाई सौहार्द तथा साम्प्रदायिक सद्भावना के हामी पद्मश्री बेकल ÷उत्साही÷ ने अपनी ग़ज+लों में जो उद्गार व्यक्त किए हैं, वे राष्ट्रीय एकता को सुदृढ़ बनाने मैं सदैव सहायक रहेंगे। बेकल साहब की ग़ज+लों में वतन परस्ती और राष्ट्रीय एकता का जज्+बा पुर असर शक्ल में भरपूर दिखाई देता है। धर्मान्धता को देष के लिए ख्+ातरा बताते हुए वे कहते हैं कि-÷÷हम कहीं हिन्दू , कहीं मुस्लिम बने बैठे रहे/धर्म की चौपल पर सारा वतन जलता रहा'' (हिन्दी ग़ज+ल, उद्भव और विकास, पृ.२२६)

प्रमुख ग़ज+लकारों के राष्ट्रीय एकता पर कहे गए अशआर पढ़ने से यह सिद्ध हो जाता है कि राष्ट्रीय एकता की भावना एक श्रेष्ठ भावना है। आज हिन्दी ग़ज+लकारों में देश पे्रम, साम्प्रदायिक सद्भाव, भाषाई सौहार्द, सामाजिक समरसता तथा राष्ट्रीय एकता के प्रति लगाव है, इसीलिए डॉ. नसीम बेचैन का कहना क्या सच नहीं!

÷÷जब सुनाई किसी ने दिल की बात

हम उसे अपनी दास्ताँ समझे।''

÷मेयार सनेही' ने प्रेम का संदेसा यों पहुँचाने का प्रयास किया है- ÷÷हम मुहब्बत के पुजारी हैं मुहब्बत की क़सम/जिसको भी सजदा करेंगे वो ख्+ाुदा हो जाएगा'' (ग़ज+ल दुष्यंत के बाद, भाग २, पृ.७०)

आम आदमी के दुख-दर्द, राष्ट्रीय एकता तथा देशप्रेम पर ग़ज+लें लिखने वाले ग़ज+लकारों में दुष्यंत कुमार, नीरज, शमशेर बहादुर सिंह, हरिकृष्ण प्रेमी, बलबीर सिंह ÷रंग', भवानी शंकर, ज्ञानप्रकाश विवेक, हनुमंत नायडू, कुँअर बेचैन, चन्द्रसेन विराट, नंदलाल पाठक, ज+हीर क़+ुरैशी, शिव ओम् अम्बर, कुलदीप सलिल, रामावतार त्यागी, बालस्वरूप राही, अवध नारायण मुद्गल, शेरजंग गर्ग, राजकुमार कृषक, अजय प्रसून, केदार नाथ कोमल, डॉं. उर्मिलेश, रोहिताश्व अस्थना, राजेश रेड्डी, म.न. नरहरि, शैलजा नरहरि, डॉ.नसीम बेचैन, मरियम ग़ज+ाला, रसूल अहमद ÷साग़र', सादिक़ा नवाब ÷सहर', अदम गोंडवी, नूर मुहम्मद नूर , हरेराम समीप , दर्शन बेज+ार, श्रीराम मधुर , उदय प्रताप सिंह , बशीर अहमद मयुख, मणिक वर्मा, बाबा कानपुरी, वृन्दावन राय ÷सरल', डॉ. रसूल अहमद ÷सागर', दिनेश प्रभात , मु. मुजीब आलम, देवमणि पाण्डेय, मेयार ÷सनेही' तथा डॉ. मीर सैयद मेहदी -आदि के नाम प्रमुख हैं। (ग़ज+ल... दुष्यन्त के बाद भाग-एक, पृ.४१)

वृन्दावन राय ÷सरल' अपनी तेहज+ीब से प्यार करने के लिए यों प्रेरित करते हैं- ÷÷अपनी तहज+ीब अगर जान से प्यारी है ÷सरल'/ग़म के मारों के लिए प्यार का साग़र लिखना'' (ग़ज+ल दुष्यंत के बाद, भाग २ पृ. २५०)

दिनेश ÷प्रभात' देश-प्रांत की सीमाओं से आगे निकल कर कुछ इस तरह मानवता का पाठ पढ़ाते हैं -÷÷हमारे प्यार की ख्+ाुशबू तुम्हारे देश जाएगी/हवा अपने पराये में कभी अन्तर नहीं करती'' (ग़ज+ल दुष्यंत के बाद, भाग २, पृ. २५६)

मु. मुजीब ÷आलम' राष्ट्रीय एकता का पक्ष लेते दिखाई देते हैं-÷÷न ख्+ााली कर सके अमृत कलष वो एकता रूपी /सदा से देश में जो विष वमन की बात करते हैं।'' (ग़ज+ल दुष्यंत के बाद, भाग २ पृ. ४७०)

बशीर अहमद ÷मयूख' तो भारत की धर्म-निर्पेक्षता की नीति का कुछ इस प्रकार बयान करते हैं कि कई सदियाँ आँखों के आगे घूम जाती हैं-÷÷सैकड़ों सदियाँ चले हैं हम, सफ़र में साथ-साथ/एकता के कारवाँ का नाम है हिन्दोस्ताँ'' (ग़ज+ल दुष्यंत के बाद, भाग २, पृ. २६)

मणिक वर्मा देश को मुहब्बत का मंदिर मानते हैं -÷÷लोग पढ़ते हों जहाँ रोज+ मुहब्बत की नमाज/+ऐसा मंदिर भी हर इक घर में बनाया जाए'' (ग़ज+ल दुष्यंत के बाद, भाग २ पृ. ९०)

डॉ. रसूल अहमद ÷साग़र÷ का अंदाज+ देखिए-÷÷एकता कहती है पुरखों की रिवायत से जुड़ो/देश के हित में करो विषपान हँसते-बोलते'' (संवेदनाओं के क्षितिज पृ.५६)

बाबा कानपुरी राष्ट्रीय एकता की भावना इस प्रकार व्यक्त करते हैं--÷÷इसे मंदिर कहो, मस्जिद कहो, गिरिजा कि गुरुद्वारा/इसी में हमने अपनी आस्थाएँ ला के रखी हैं (ग़ज+ल दुष्यन्त के बाद भाग-तीन पृ.२३८)

हरेराम ÷समीप÷ धर्म के नाम पर होने वाले दंगलों को रोकना चाहते हैं-क्या हुआ उपवन को क्यों सारे शजर लड़ने लगे/आँधियाँ कैसी हैं जो ये घर से घर लड़ने लगे (ग़ज+ल... दुष्यन्त के बाद भाग-एक पृ.२३६)

देवमणि पाण्डेय देशवासियों के बीच प्यार के पनपने की दुआ करते हैं-÷÷इस जहाँ में प्यार महके जि+न्दगी बाक़ी रहे/ये दुआ माँगो दिलों में रोशनी बाक़ी रहे'' (ग़ज+ल दुष्यंत के बाद, भाग 1 पृ. ३४४)

ग़ज+ल के साहित्य की सैद्धांतिक अनुशीलन की आवश्यकता महसूस की जाने लगी है। दुष्यंत कुमार जैसे आधुनिक ग़ज+ल के मसीहा और मील के पत्थर तक की ग़ज+लों की सही समीक्षा आज तक सामने नहीं आयी। ग़ज+ल के क्षेत्रा में अखिल भारतीय स्तर पर आदान-प्रदान की आवश्यकता भी अनुभव की जाने लगी है। व्यक्तिगत और शासकीय संस्था में यदि संगोष्ठियों, कवि सम्मेलनों का आयोजन करें तो ग़ज+ल के उज्ज्वल भविष्य के वर्तमान में परिवर्तित होने में अधिक समय नहीं लगेगा। साहित्य अकादमी जैसे संस्थानों को ग़ज+ल संग्रहों और संकलनों को अनुदान देकर प्रेरित करने की ओर अधिक गंभीरता से विचार करना होगा।

डॉ. कुँअर ÷बेचैन' तहज+ीब की ख्+ाुशबू के हामी हैं। कहते हैं- ÷÷ये माना आदमी में फूल जैसे रंग हैं, लेकिन/÷कँुअर' तहज+ीब की ख्+ाुशबू मुहब्बत ही से आती है''(ग़ज+ल... दुष्यन्त के बाद भाग-एक, पृ.११३)

अवश्य ही संवेदना और शिल्प के क्षेत्रा में साठोत्तरी हिन्दी ग़ज+ल संवेदनाशील विधा है और अभी हाफ़िज+ फ़िरदौसी, मीर, ग़ालिब, इक़बाल जैसे महान ग़ज+लकारों की हिन्दी ग़ज+ल को प्रतीक्षा है।



Thursday, December 23, 2010

हिन्दी साहित्य में उच्च षिक्षा के क्षेत्र में बढ़ते तकनीकी प्रयोग

जया सिंह

उच्चा षिक्षा तकनीक के द्वारा आज का व्यक्ति जागरूक हो चुका है। दुसरी बात यह कि बी०ए० और एम०ए० के छात्रों को ÷प्रयोजनमूलक हिन्दी' जो पूरा पेपर ही तकनीक का है, का षिक्षण दिया जा रहा है। ऐसी उच्च षिक्षा प्रहण करने के बाद व्यक्ति हिन्दी को कम्प्यूटर से दूर नहीं रख सकता है। कम्प्यूटर, इन्टरनेट, ई-मेल के द्वारा सूचना तुरन्त पहुँचती है जिससे हमें पुस्तकें मंगवाने, जानकारी लेने में सुविधा होती है। इस तकनीक के माध्यम से पठन-पाठन का कार्य सरल और जल्दी हो गया है। अब हम घर बैठे-बैठे ही पुस्तकों, पत्रिकाओं का आर्डर कर सकते हैं, पत्र-व्यवहार कर सकते हैं, पुस्तकें और पत्रिकायें पढ़ सकते हैं, नयी पुस्तकों के विशय में जानकारी ले सकते हैं। इन्टरनेट की लोकप्रियता दिनों-दिन बढ़ती जा रही है। इन्टरनेट कनेक्षन धारक व्यक्ति किसी भी समय, किसी भी विशय पर तत्काल इच्छित जानकारी प्राप्त कर सकता है। छात्र, षिक्षक, वैज्ञानिक, व्यापारी, खिलाड़ी मनोरंजन इच्छुक तथा सरकारी विभाग इन्टरनेट से अपनी आवष्यकता और रूचि के अनुसार सूचनाएँ पा रहे हैं। साथ ही हिन्दी के क्षेत्र में नए सॉटवेयर बन रहे हैं तथा इन्टरनेट पर भी हिन्दी वर्तमान समय में उपलब्ध है। इस समय लगभग ३०,००० पाठक हिन्दी के साथ इन्टरनेट पर उपलब्ध हैं तथा इस क्षेत्र में काफी विकास हो रहा है। जैसे-जैसे भारत विष्व बाज्+ाार का नया पड़ाव बनता गया, इन्टरनेट पर हिन्दी की आवष्यकता को महसूस किया जाने लगा। हिन्दी के प्रमुख समाचार पत्र दैनिक जागरण, नई दुनिया, वेब इुनिया, इंडिया इंफो, अमर उजाला, नवभारत टाइम्स, मिलाप और अनेक पत्रिकाऐं व इनके संस्करण नेट पर भी उपलब्ध होते हैं।

आज कम्प्यूटर उच्च षिक्षा और मानव-जीवन के हर क्षेत्र का अपरिहार्य अंग बनता जा रही हैं। षिक्षा के क्षेत्र में, अनुसंधान के क्षेत्र में, विषाल और जटिल यंत्रों के संचालन तथा उनके रख-रखाव के क्षेत्र में, मौसम सम्बन्धी जानकारी, भूगर्भ के रहस्य जानने, अस्त्र-षस्त्रों के निर्माण और परीक्षण तथा अन्तरिक्षयानों के संचालन तथा निर्देषन, यात्राओं के आरक्षण आदि के क्षेत्रों में कम्प्यूटर का अखण्ड स्थापित हो चुका है। अब तो कम्प्यूटर ने ज्योतिशी और पण्डित का भी कार्य संभाल लिया है। वह जन्म-कुण्डली निर्माण और विवाह-सम्बन्ध कराने का भी कार्य करने लगा है। साथ ही विदेषों में रह रहे भारतीय व विदेषी लोग इन्टरनेट के माध्यम से विभिन्न पूजा - पाठों, मंत्रों व यज्ञों को सम्पन्न करा रहे हैं, जो भारतीयों के निए एक नये बाजार के रूप में सामने आ रहा है इलेक्ट्रानिक यानी ÷ई' कॉमर्स के आ जाने और ÷ई' प्रषासन के होने से पुराने डाक - तार और कॉपीराइट कानूनों, दस्तावेज और प्रमाण कानूनों , बैंकिंग कानूनों आदि में बहुत परिवर्तन हो गया है। इलेक्ट्रानिक दुनिया ने भौगोलिक रूपाकार वाली है। तेज सूचना की वजह से समाज की दषा और दिषा बदल गई है। सूचना तकनीक की क्रान्ति से एक नयी ÷जीवन दषा' बन गई है। आज समाज को यह स्वीकार करना ही पड़ेगा। इसे स्वीकार किये बिना कोई देष-समाज आगे नहीं जा सकता। चिंतन एवं कुछ न कुछ नया कर गुजरने की तमन्ना ने आजादी के ५० वर्श के बाद भी हमारे देष को कम्प्यूटर के क्षेत्र में विष्व स्तर पर मान्यता प्राप्त देषों की श्रेणी में लाकर खड़ा कर दिया है। वैष्विम जरूरतों, भूमण्डलीकरण एवं आर्थिक उदारीकरण के कारण आज कम्प्यूटर, इनटरनेट को आषा भरी नजरों से देखा जा सकता है। अब इनटरनेट पर हिन्दी का काफी विकास होता जा रहा है। दिन-प्रतिदिन के हम आंकड़े देखें तो हजारों की संख्या में इन्टरनेट का इस्तेमाल करने वाले ग्राहक बढ़ते जा रहे हैं। निष्चित तौर पर यह कहा जा सकता है, कि आने वाला समय भारत में ऐसा होगा, कि लोग इन्टरनेट पर हिन्दी के प्रयोग को बढ़ावा देंगे तथा इसी का इस्तेमाल करेंगें। इन्टरनेट पर हिन्दी का स्वरूप प्रसार पा रहा है। इन सबके बावजूद निरन्तर प्रयास की गति सुखद भविश्य का संकेत दे रही है। विष्व मानव की हिन्दी चेतना के प्रति जागरूकता व हिन्दी की अन्तर्राश्ट्रीय स्थिति को बेहतर बनाने के लिए हिन्दी का सुर, मानवीकृत रूप, लिपिगत, व्याकरणगत, उच्चारणगत, वर्तनीगत, और तकनीक स्तर पर केन्द्रित, एकीकृत करने की अति आवष्यकता है सॉटवेयर बनाने वाली कम्पनियाँ एक प्रतिमान भाशा कोड का उपयोग नहीं करती । अतः भारत जैसे देष में जहाँ १८ राजकीय भाशाएँ है, स्थानीय भाशा-कोडों का प्रतिमान तैयार करना होगाा। कम्प्यूटर से जुुड़ा कार्य ७० प्रतिषत कार्य अंग्रेजी में ही हो रहा है, जिसका नतीजा यह निकल रहा है कि धीरे-धीरे लोगों का रूझान अंग्रेजी की तरफ होता जा रहा है। लोग अंग्रेजी की तरफ खिंचते चले जा रहे हैं, जो कि इस क्षेत्र में एक बहुत बड़ी चुुनौती है। हिन्दी के लिए यह एक मुख्य समस्या है। इस समस्या को रोकना होगा, इसे रोकने व इसके समाधान हेतु इन्टरनेट चलाने वालों को हिन्दी के प्रति जागरूक करना होगा। तभी हम अपनी राश्ट्रभाशा हिन्दी के प्रति सम्मान को प्रकट कर सकते हैं। जो हम भारतीयों को एकता के सूत्र में बोंधने का कार्य कर रही है और करती रहेगी।



जय हिन्दी, जय भारत,

वन्दे मातरम्।



सन्दर्भ :-

१. सुधीष पचौरी - उत्तर आधुनिक समाज और संस्कृति - प्रथम संस्करण, २००६

२. सुधीष पचौरी - भूमण्डलीय समाज और मीडिया - प्रथम संस्करण, २००६

३. दीप्ति मिश्रा - ÷नव-निकश पत्रिका', अंक-६, दिसम्बर-२००७, पृ.सं.-३१-३३

४. डॉ० अचलानन्द जखभोला - ÷नव-निकश पत्रिका', अंक-६, दिसम्बर-२००७, पृ.सं ४०-४३





समकालीन साहित्य में स्त्री विमर्श

जया सिंह



औरतों की चुप्पी सदियों और युगों से चली आ रही है। इसलिए जब भी औरत बोलती है तो शास्त्र, अनुशासन व समाज उस पर आक्रमण करके उसे खामोश कर देते है। अगर हम स्त्री-पुरुष की तुलना करें तो बचपन से ही समाज में पुरुष का महत्त्व स्त्री से ज्यादा होता है। हमारा समाज स्त्री-पुरुष में भेद करता है।

स्त्री विमर्श जिसे आज देह विमर्श का पर्याय मान लिया गया है। ऐसा लगता है कि स्त्री की सामाजिक स्थिति के केन्द्र में उसकी दैहिक संरचना ही है। उसकी दैहिकता को शील, चरित्रा और नैतिकता के साथ जोड़ा गया किन्तु यह नैतिकता एक पक्षीय है। नैतिकता की यह परिभाषा स्त्रिायों के लिए है पुरुषों के लिए नहीं। एंगिल्स की पुस्तक ÷÷द ओरिजन ऑव फेमिली प्राइवेट प्रापर्टी' के अनुसार दृष्टि के प्रारम्भ से ही पुरुष सत्ता स्त्राी की चेतना और उसकी गति को बाधित करती रही है। दरअसल सारा विधान ही इसी से निमित्त बनाया गया है, इतिहास गवाह है सारे विश्व में पुरुषतंत्रा, स्त्राी अस्मिता और उसकी स्वायत्तता को नृशंसता पूर्वक कुचलता आया है। उसकी शारीरिक सबलता के साथ-साथ न्याय, धर्म, समाज जैसी संस्थायें पुरुष के निजी हितों की रक्षा करती है और स्त्राी को कमजोर और हीन साबित करती हैं''१ हमारे समाज में स्त्रिायों का आर्थिक और सामाजिक दोनों ही दृष्टिकोणों में शोषण हो रहा है। समाज की सारी परम्परायें स्त्रिायों पर ही लागू होती हैं। खान-पान, वेश-भूषा, रहन-सहन, काम-काज, पढ़ाई-लिखाई यहाँ तक की तीज-त्योहारों के नियम भी स्त्रिायों पर लागू होते है। यह नियम पुरुषों पर क्यों नहीं लागू होते हैं? हमारे देश में लगभग सभी स्त्रिायाँ उपवास रखती हैं। क्योंकि पुरुषों ने ही यह सब किया है। कभी अपने पति की लम्बी आयु के लिये, तो कभी पुत्रा के लिये यहाँ तक कि संतान प्राप्ति के लिए भी स्त्राी ही उपवास रखती है। पुरुष क्यों नहीं रखते हैं? पुरुष ने सारे उपवास स्त्राी के लिए ही क्यों बनाये हैं? क्या पुरुष का हक नहीं बनता कि वह इनमें से एक भी उपवास रख सके या फिर सिर्फ संतान प्राप्ति के लिए ही उपवास रख सके। लेकिन पुरुष ऐसा नहीं करते हैं। क्योंकि वह पुरुष हैं और अपने लिए सर्वाधिकार सुरक्षित रखते हैं। करवाचौथ पर चाँद को देख कर हमारे समाज की औरते पति की लंबी आयु की कामना करती हैं। लेकिन पति अपनी पत्नी की लंबी आयु के लिए, उसके अच्छे जीवन के लिए कोई भी व्रत नहीं रखते हैं। तब हम यह सोचने पर विवश हो जाते हैं कि सारी परम्परायें, नियम, कानून, धारणायें स्त्रिायों पर ही क्यों लागू की गई है। बीमारी की हालत में भी उन्हें अनेक व्रत रखने पड़तें हैं। न रखने पर परिवार, समाज ताने मारने लगता है। जिससे मजबूर होकर उन्हें उपवास रखना पड़ता है। उपवास स्त्रिायों के प्रति एक जर्बदस्ती की सजा है। जिसे कुछ स्त्रिायाँ समाज और परिवार के डर से रखती हैं। नमिता सिंह के संपादकीय में स्त्राी पक्ष की परम्परा के बारे में वर्णन किया गया है कि ÷÷करवाचौथ पर चाँद को देखकर हमारी औरतें पति की लंबी आयु की कामना करती हैं। कोई पूछे तो भला कि पति भी उनके लिए ऐसी ही कामना करते है या नहीं।''२ बेटियों के जन्म पर समाज और परिवार माँ और बच्ची दोनों को ही ताने मारते हैं। उस अबोध बच्ची को जिसने अभी-अभी बस धरती पर आँखे खोली ही हैं कि उसका स्वागत ÷÷दूसरे की अमानत, पराए घर का दरिद्र, एक और डिग्री, मालगाड़ी, पंक्चर साइकिल''३ जैसे शब्द बेटियों को सम्बोधन में दिए जाते हैं तो कुछ सम्बन्धित बेटा पैदा करने के लिए व्रत-उपवास, पूजा-पाठ और टोने-टोटके करने की सलाह देते, जिसे स्त्रिायों को अनिच्छा से समाज व परिवार की डाँट-डपट, ताने से बचने के लिए करना पड़ता है। साहित्य जगत में भी लेखिकाओं के प्रति पुरुषों का नजरिया भेदभावपूर्ण है। राजेन्द्र यादव के संपादकीय इसके सबूत हैं अगर किसी पत्रिाका में महिलाओं की संख्या पुरुषों की संख्या से थोड़ी अधिक है तो पुरुषों में हंगामा मचने लगता है कि फला पत्रिाका महिलाओं की पत्रिाका है। पुरुष की अपेक्षा स्त्रिायाँ सेक्स पर लिखती है तो लोग उन पर उँगलियाँ उठाने लगते हैं। छींटा-कशी करने लगते हैं। स्त्रिायों के साथ अन्याय, शोषण, अत्याचार पर जब भी ÷हंस' ने आवाज+ उठायी, इन विषयों पर जब-जब कहानियाँ छापी तब-तब हंगामा मचा। स्त्रिायों के प्रति यही है हमारे समाज की सोच।

हमारे समाज में बहु विवाह की प्रथा है। लेकिन सिर्फ पुरुष के लिए ही क्यों? आज भी अधिकांश महिलायें दूसरा विवाह नहीं कर सकती समाज व परिवार आड़े आ जाते हैं। कुछ जगहों पर तो स्त्राी की कोई गलती नहीं होती फिर भी समाज दोष स्त्राी के मत्थे मढ़ देता है। अधिकांशतः लोग बलात्कारी को सजा देने की जगह उसको उसके द्वारा भोगी गई लड़की से विवाह करने को कहते हैं। समाज उसके लिए यही एक मात्रा सजा तय करता है। लड़की की तरफ कोई ध्यान नहीं देता है। उसकी रजामंदी कोई नहीं पूछता कि वह उस दरिंदे से विवाह करना चाहती है कि नहीं, उसके मनोभाव को समझना तो दूर लोग यह भी भूल जाते हैं कि वह अभी-अभी किस परिस्थिति से गुज+री है। जब लड़की बलात्कारी लड़के से विवाह करने के लिए मना कर देती है तो पूरा घर, समाज मिलकर उसे विवाह करने पर मजबूर कर देता है। तरह-तरह के ताने मारता है। लड़की एक दुःख से निजात नहीं पाती कि उसे दूसरा दुःख देने के लिए लोग तैयार खड़े हो जाते हैं। लोग सोचते हैं इसका तो बलात्कार हो गया है । कुछ दिनों में यह गर्भवती हो जायेगी। बिन ब्याही माँ को देखकर घर की इज्ज+त दाँव पर लग जायेगी तो इससे बढ़िया है उसी बलात्कारी से इसका विवाह कर दिया जाये, भले बाद में वह बलात्कारी उस लड़की को मारे-काटे चाहे जैसे रखे, घर वालों की नाक तो बच जायेगी। यानी समाज में घर की इज्ज+त, इज्ज+त है। लड़की की कोई इज्ज+त नहीं? कोई इच्छा नहीं? दुनिया की नज+र में भी हो जायेगा कि इस बलात्कारी को सजा मिल गई, कि जिं+दगी भर वह इस लड़की का साथ देगा, उसके बच्चे को अपना नाम देगा, देख-भाल करेगा। लेकिन यह कैसी सजा है? इस सजा को देखते हुए लगता है कि यह सजा बलात्कारी को नहीं बल्कि बलात्कार की शिकार हुई उस लड़की को दी जा रही है जिसे मीठा जहर बोल सकते हैं। जो लड़की को जीवन भर थोड़ा-थोड़ा करके पीना पड़ता है। घर के बाहर वाले तो बलात्कार करते ही हैं लेकिन वह बलात्कार शारीरिक होता है। लेकिन घर वाले तो अपनी ही बेटी को ताना मारकर बार-बार बलात्कार करते हैं। जो मानसिक बलात्कार है। जिससे लड़की जिं+दगी भर छुटकारा नहीं पा पाती है। यह बलात्कार उसके दिलो-दिमाग में एक नासूर की तरह अपनी जगह बना लेता है। तब बेचारी लड़कियों के पास मरता क्या न करता वाली स्थिति का जन्म होने लगता है। वह सोचती हैं जि+ंदगी भर बातें सुनने, दुनिया वालों के ताने झेलने, कुँआरे रहने से अच्छा है उसी दरिंदे से विवाह कर लें यानी न चाहते हुये भी उन्हें यह समझौता करना पडा+ता है। आर्थिक क्षेत्रा में भी स्त्रिायों की स्थिति दयनीय है। वहाँ पर भी भेद है। जितना पुरुष काम करता है उतना ही काम स्त्राी भी करती है लेकिन पुरुष को मज+दूरी दी जाती है और स्त्राी को उतनी नहीं, मजदूरी दी भी जाती है तो बहुत कम मात्राा में यानी स्त्राी-पुरुष दोनों का कार्य बराबर घंटे का होने पर भी मज+दूरी देने में कम-ज्यादा का भेद है। ÷÷महिला मजदूरों को मर्द मज+दूरों द्वारा खोदी जा रही मिट्टी को उठाने का काम दिया जाता है। इस मिट्टी को चार से पाँच मील की दूरी तक ढोना भी पड़ता है। महिलाओं का कहना है कि वे एक बार में ३० किलो मिट्टी उठाती हैं लेकिन इस काम के लिए उन्हें एक पैसा नहीं मिलता है। अगर मजदूर खुदाई और मिट्टी हटाने का, दोनों काम करता है तो अपने मौजूदा काम से आधा काम ही कर पाता है। इसलिए हरेक मजदूर अपने साथ परिवार की किसी महिला को लाता है। ये औरतें मिट्टी उठाने तथा हटाने का काम करती हैं और सरकार तिहाई मजदूरी पर दो मजदूरों के बराबर काम करा लेती है''४ बीजापुर शहर में ग्रामीण महिला मजदूर होटलों में सुबह छः बजे से रात के ग्यारह बजे तक रोटी पकाने का काम करती हैं। जिसकी मजदूरी महीने में मात्रा १०० रु. है। ÷÷पूछने पर वह कहती है कम से कम कुछ रोटियाँ तो मिल जाती हैं। जिसे वह अपने बच्चे के साथ खाकर पेट की भूख मिटाती हैं''५ इस तरह से यह स्त्रिायों का आर्थिक शोषण है। श्रम से अधिक श्रम कराने के बाद भी उन्हें उचित आय नहीं दी जाती है। मैत्रोयी पुष्पा के ÷इदन्नमम्' उपन्यास में भी आर्थिक शोषण को देख सकते हैं। ÷÷राउतिनों को अभिलाख सिंह द्वारा शराब पिलाकर अधिक से अधिक जानलेवा श्रम कराने के बावजूद उसकी एवज में कम पारिश्रमिक देना और साथ ही साथ उसका यौन-शोषण करना आर्थिक शोषण का उत्कृष्ट उदाहरण है।''६

ऊषा ओझा की ÷गुम्मी-गुम्मी' कहानी में आदिवासी स्त्रिायों के शोषण का चित्राण है। वे रोजगार से वंचित हैं। जंगल के बाहर भी शातिर दिमाग वालों ने इनकी निडरता और बलिष्ठता का चोरी-चकारी में भरपूर उपयोग किया है। भुखमरी से बचने के लिये आदिवासी स्त्रिायों को यह रास्ता सरल लगा फिर आगे चलकर चोरी करना इनकी आदत बन गई। ÷÷जंगल के शहरी सरकारी बाबुओं ने भी इन्हें छला उन्हें बहलाकर मजदूरी की लालच पर वनों की लकड़ियों की कटाई, उनकी तस्करी और अपने विरोधियों एवं दुश्मनों की हत्याओं में चालाकी से इस्तेमाल किया। इस्तेमाल के बाद इनके अपराध की झूठी-सच्ची कहानियाँ गढ़कर इनकी भावनाओं के साथ खेला और इन्हें अपराधी बनने पर बाध्य किया।''७

दूरदर्शन चैनलों में महिलाओं का दोहरा शोषण किया जा रहा है। महिला अपनी तरक्की चाहती है तो उन्हें अंग प्रदर्शन करना पड़ता है और मजबूरन महिलाओं को अपने बॉस के इशारों पर कठपुतली की तरह नाचना पड़ता है। ÷÷कभी-कभी ऐसा भी देखा जाता है कि पुरुष अपने कार्य में उन्नति, तरक्की करता है तो लोग उसे उसकी काबिलियत समझते हैं लेकिन महिला की उन्नति पर कहते हैं। जरूर बॉस को इसने खुश किया होगा। उन्हीं की मेहरबानी से इस मुकाम पर आयी है।''८ जबकि ऐसा नहीं है। महिलायें भी मेहनती, लगनशील होती है लेकिन समाज इसे मानने को तैयार नहीं होता है। सामाजिक और आर्थिक दोनों ही दृष्टिकोणों से स्त्राी पीड़ित है। दोनों ही क्षेत्राों में वह अपने ढंग से तरक्की नहीं कर पा रही है। उसे बार-बार समाज के बनाये कानूनों का ही पालन करना पड़ता है न करने पर दंडित होना पड़ता है।



संदर्भ -



१. चाणक्य-विचार, मई-२००९, लखनऊ, पृ. ४३

२. वर्तमान साहित्य, मासिक पत्रिाका, संपादकीय-नमिता सिंह, अक्टूबर-२००८, अलीगढ़, पृ. ६

३. मैत्रोयी पुष्पा, गुड़िया भीतर गुड़िया (आत्मकथा), राजकमल प्रकाशन, नई दिल्ली, २००८, पृ. ९३

४. बृंदा कारात, जीना है तो लड़ना होगा, सामयिक प्रकाशन, नई दिल्ली, २००६, पृ. २६

५. वही, पृ. ४२

६. सम्मेलन पत्रिका, भाग-९२, संख्या-१, अंक : ९, इलाहाबाद, पृ. २००

७. ÷हंस' पत्रिका, सितम्बर-२००८, नई दिल्ली, पृ. ५४

८. वही, पृ. ९५