Friday, August 1, 2008

आख़िर नहीं माना

रचना गौड़ भारती
मेरी आंखों के कुछ मोती
बिख़र गए हैं थोड़ा रूको
मैं इन्हें समेट लूं
तुम दर्पण हो तो मेरे भी
मन का अक्स ये शरीर है
आंखों की क़ोरें अभी गीली हैं
और पलके बोझल बोझल
धुंधली आंखों की कांपती ज्योति
तुम कुछ साफ़ नजर नहीं आते
ठहरो जरा इन आंखों को पोंछने दो
गम के बादल छंट जाएगें
मैं फिर से ताजा गुलाब हो जाऊंगीं
दो चार पल जो ठहरे से लगते हैं
इन पलों को आगे ख़िसकने दो
तुमसे फिर मुलाकात होगी
फिर दो बात होगी
पहले पिछला हिसाब तो होने दो
मेरे सभी ग़मों को सुनकर
कोई चाहे बेअसर हो
यह दर्पण ही अपना सा लगा
इसे ही थोड़ा चटकने दो
सह नहीं पाया मेरा ग़म
आख़िर चटक ही गया
कितना कहा मुझे अकेले रहने दो
आख़िर नहीं माना चटक ही गया ।

1 comment:

seema gupta said...

मेरी आंखों के कुछ मोती
बिख़र गए हैं थोड़ा रूको
मैं इन्हें समेट लूं
"very emotional poetry, loved reading it'